"मौसमी और वो लड़का"

नोट ÷ "पिथौरागढ़" यहां एक काल्पनिक शहर का उल्लेख किया गया है, कृपया इसे वास्तविक पिथौरागढ़ (जो उत्तराखंड में स्थित हैं) से ना जोडे़। धन्यवाद।


पिथौरागढ़ में आये अभी एक महीना ही हुआ था मौसमी को, उसके पापा का स्थानांतरण मुरादाबाद से पिथौरागढ़ हो गया था।
11वी में नाम लिख गया G. G. I. C स्कूल में मानो उसका सपना पूरा हो गया... इसके बाद कब अगस्त से सितंबर आ गया उसे पता ही नहीं चला।
धीरे-धीरे उसे वहाँ अच्छा लगने लगा था वहीं पड़ोस में रहने वाली सरिता उसकी अच्छी दोस्त बन गई थी.. दोनो एक ही कक्षा में थी.. यू तो मौसमी बहुत समझदार थी लेकिन कही न कही अपरिपक्वता थी उसके अंदर.. पापा से ज्यादा जुड़ी थी वो.. ।
इधर कुछ दिनों से वह परेशान रहने लगी थी, इसका कारण था सामने रहने वाला लड़का अक्सर जब भी उसकी नज़र सामने जाती वो उसको अपने को देखते हुए पाती.. शुरू में तो उसे ये लगा कि शायद मै कुछ अजीब हू इसलिए वो देखता है क्या?? और अन्दर जाती शीशे में अपने आप को बहुत ध्यान से देखती.. उसे सब कुछ ठीक- ठाक लगता तो उसे इत्मीनान हो जाता.. असल मे उसकी छत से मौसमी का आंगन दिखता था तो वहां मौसमी का आना-जाना लगा रहता था, और आते जाते उधर उसकी नज़र पड़ ही जाती थी।


समय बीत रहा था और वह, १२वी में आ गई थी। यू तो मौसमी देखने में सामान्य ही लगती थी लेकिन कुछ दिनों से वो अपने ऊपर थोड़ा ध्यान देने लगी थी.. बालों को सवार कर रखती थी.. शीशे में दस बार देखती थी अपने आप को,, वो बड़ी हो रही थी..।
नया साल आ गया सब एक दूसरे को बधाई दे रहे थे.. इसी बीच सामने वाले घर के लड़के ने उसको कार्ड दिया कार्ड बहुत सुन्दर था और उसमें लिखी लिखावट भी । मौसमी समझ नहीं पा रही थी कि उसने मुझे ही क्यों कार्ड दिया खैर कार्ड मे केवल शुभकामनाएं लिखी थी सुन्दर लिखावट में .. धीरे-धीरे मौसमी को वो नही दिखता तो वो उसे देखने की कोशिश करती और गलती से कही दिख जाता तो घबरा के अन्दर आ जाती.. स्कूल जाने के समय जब रिक्शा वाला बुलाता तो मौसमी बाद में और वो पहले ही अपने ड्राईगं रूम का दरवाजा खोल के खड़ा रहता.. कभी-कभी मौसमी झेंप जाती और अपने आप मे बड़बड़ाती कि इनके पास कोई काम वाम नहीं है, जब देखो तब इधर ही देखते रहते हैं..।

मौसमी के परीक्षा का समय आ गया.. वो पुरी तरह तैयारी में लग गई.. उस दिन पहला पेपर था उसका सुबह से ही वो तैयार थी। ममी ने दही चीनी खिलाया और वो बड़े खुशी से रिक्शे का इंतजार करने लगी.. रिक्शा वाला नहीं आया.. पेपर शुरू होने मे केवल आधा घंटा बचा था.. घर में कोई भी नही था.. सिवाय ममी के, अब वो रोते हुए घर से बाहर निकल गई..। घबराहट में घर से पैसे लेना भी भूल गई.. केवल दौड़ते हुए जा रही थी वो, कि तभी पीछे से एक अजनबी से आवाज ने बाइक रोक के कहा,,,,, रूक जाओ.. मौसमी पीछे मुड़ी तो वही सामने के घर वाला लड़का खड़ा था।
कुछ भी कहने और सुनने के लिए समय नही था वो अपने आँसुओं को पोंछते हुए बैठ गई.. जैसे ही स्कूल आ गया वो अन्दर चली गई.. थैंक्स भी नहीं बोली उसको..

घर आने पर उसका नजरिया बदल चुका था। वो अब उस लड़के का रिस्पेक्ट करने लगी थी.. देखते देखते रिजल्ट भी आ गया.. अच्छे नम्बरों से पास हो गई थी वो.. इसी दौरान मौसमी के पापा का स्थानांतरण हो गया.. और वो दिन भी आया जब वो इस शहर को छोड़कर जाने लगे.. 3 जुलाई 2003 की वो शाम अपने साथ बहुत कुछ लेकर चली गई.. बहुत सी यादे.. सारा सामान पैक हो चुका था.. देखते देखते पूरा घर खाली हो गया.. वो अलमारी जो किताबो और बैग से सजी रहती थी.. अब सूनी हो गई थी.. पूरा परिवार नम आँखो से घर को खाली कर रहा था.. मौसमी भी उदास मन से घर से सामान लिये निकल रही थी.. किसी को दूढ़ रही थी वो लेकिन सुबह से एकबार भी वो नही दिखा.. पता नही कहा चला गया.. रोज तो बड़ा खड़े खडे़ देखता था.. मन में बड़बड़ाती हुई वो अपनी सहेलियों से मिलने चली गई.. सरिता बहुत रो रही थी क्योकि कुछ दिन पहले ही उसके पापा कि असमय मौत हो गई और मौसमी उसकी बेस्ट फ्रेंड छोड़ के हमेशा के लिए जा रही थी..मौसमी उसे इस हाल में छोड़कर नहीं जाना चाह रही थी लेकिन मजबूर थी वो। पूरा मुहल्ला छोड़ने आया स्टेशन पर, वो कही नही दिखा.. ट्रेन भी चल दी.. तभी मौसमी कि नजर उस लड़के पर पड़ी जो एक किनारे चुप चाप खड़ा था.. देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान सी आ गई लेकिन तब तक ट्रेन अपनी लय में आ चुकी थी.. मौसमी का मन कर रहा था कि वो दौड़ के जाये और उससे पूछे कहा थे अब तक.. कब से वो उसे दूढ़ रही थी.. उस दिन पेपर में छोड़ने के लिए थैंक्स बोलना चाह रही थी वो.. एक बार फिर उसके सामने रोना चाह रही थी वो ताकि वो अपनी हाथो से उसके आसू पोछ सके.. ये सब सोचते कब वो चेहरा.. स्टेशन.. वो शहर सब कुछ आखों से ओझल हो गया.. रह गई तो सिर्फ़ एक याद...... एक खूबसूरत सा यादों का रिश्ता जिसे ना उसनें बाधा और ना किसी ने छोड़ा .....


*चौदह साल बाद *

गुड़गांव से राजीवचौक की मेट्रो लेने के बाद मौसमी लक्ष्मी नगर तक जाने वाली मेट्रो के लिए लेट हो गई.. वैसे भी लक्ष्मी नगर मेट्रो स्टेशन से निकल कर उसे घर तक के लिए कैब करना ही पड़ता था.. सो काफी सोच विचार के बाद उसने राजीव चौक से डायरेक्ट टैक्सी लेना ही मुनासिब समझा।

दिसम्बर की कड़ाके की ठंड और शाम के 7 बज रहे थे.. मौसमी के लिए दिल्ली अभी नया ठिकाना था। 2 महीने ही हुये थे उसे अभी दिल्ली आये हुये..छोटे शहर की मौसमी दिल्ली की तड़क भड़क से अलग थी। उसकी कलीग व दोस्त रिया ने उसे लक्ष्मी नगर में एक फ्लैट दिला दिया था। मौसमी ने M. B. A किया था और एक साफ्टवेयर कम्पनी मे नौकरी लगी थी उसकी। घर पहुचते पहुचते उसे 8 बज गये थे, फ्लैट में वो अकेली ही रहती थी.. शुरू मे कुछ दिन रिया उसके साथ थी लेकिन बाद में वो अपने चचेरे भाई के घर शिफ्ट हो गई। घर पहुचते ही मौसमी बेड पर जाकर बैठ गई..इतनी थकी थी कि.. प्यास महसूस होने पर भी पानी लेने की हिम्मत नहीं थी उसमे.. कुछ देर आँखे मूदकर लेटने के बाद आखिरकार वो उठ ही गई, वो भूल गई थी कि यहां माँ नही है जो उसको बार बार डाटेगी और आते ही पानी का गिलास फिर चाय लिये खड़ी रहेगी जब तक वो कपड़े नही चेंज कर लेगी.. चाय नही पी लेगी वो एेसे ही पास बैठी रहेगी. . आज उसे माँ बहुत याद आ रही थी. लेकिन क्या करे अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए उसे घर छोड़ना पड़ा.. पापा ने भी उसे नही रोका उन्हे मौसमी पर पूरा भरोसा था तभी तो.... रिश्तेदारो की बातो की परवाह किये बगैर उन्होने पूरी स्वतंत्रता दी उसे पढ़ाया - लिखाया और दिल्ली जैसे शहर में उसे उसके सपनों को पूरा करने के लिए भेज दिया। मौसमी को अपने माता पिता पर गर्व है कि उन्होने उसे समझा.. शादी जैसे बन्धन में बंधने के लिए उसे समय दिया अन्यथा उसकी चचेरी बहन पारूल की तरह उसकी शादी भी ग्रेजुएशन के बाद ही कर दी जाती..
यही सब सोचते-सोचते कब वो किचन में गई और कब उसकी चाय बन गई मौसमी को खुद भी पता नहीं चला, चाय की चुस्की लेते ही जैसे सारी थकान दूर हो रही थी.. अकेलेपन मे एक चाय ही तो है जिसे होठों से लगा के वो बेवजह मुस्कुरा देती थी. . तो कभी कुछ उलझने चुटकियों मे सुलझा लेती थी।
चाय पीने के बाद कप वही टेबल पर रख मौसमी वही बिस्तर पर औधे मुहं गिर गई और कब उसकी आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला। फोन के बेल से उसकी नींद खुली तो देखा 15 मिसडकाल घर से. . ये देख वो घबरा गई, जल्दी से काॅल बैक किया तो एक ही बेल मे मां ने उठा लिया... "कहां हैं तू फोन क्यो नही रिसीव कर रही थी.. खाना खाया तूने तू ठीक तो है ना. .. कोई परेशानी तो नही है. ..?? " मां एक सांस मे इतने सवाल पूछती गई.. "ठीक हू मां मै.. थक गई थी इसलिए कब आँख लग गई पता ही नहीं चला" घर में सब ठीक है ना मां?? पापा कैसे है गोलू कैसा है? पढ़ाई कर रहा है या नहीं??
"सब ठीक है बेटा.. बस तुम अपना ख्याल रखना और हां एक फोटो भेजी है वाटसएप पर देख लेना अच्छा रिश्ता है.. निव यर पर आयेगी तो हो सकता है तुझे देखने आये " क्या माँ बस आप भी ना शुरू हो जाती हो.. चलो बाॅय मै फोन रख रही हू.. कहते हुए मौसमी ने फोन काट दिया... . नींद तो जैसे उसकी आँखों से कोसो दूर जा चुकी थी. . साल भर से यही सब चल रहा था..28 की मौसमी को अक्सर उम्र अधिक होने पर रिजेक्ट कर दिया जाता था.. ये ओछी मानसिकता के लोग अपने लड़के की उम्र नही देखेगे और लड़की धूढ़ते फिरेंगे.. वेल एजुकेटेड, सेटेलड, सर्व गुणसमपन्न, संस्कारी और उम्र हो 23,24 के आस पास... सोचते हुए मौसमी ने गहरी सांस ली और फिर लैपटॉप खोल कर मेल चेक करने लगी कि तभी.. मोबाइल से नोटिफिकेशन की रिंग बजी देखा तो फेसबुक मैसेंजर को अपडेट करने का नोटिफिकेशन था.. कितनी आलसी थी वो कितनी बार नोटिफिकेशन इग्नोर करती रही और हफ्तों से एप अपडेट ना होने के कारण अनइनसटाॅल हो गया.. खैर नींद तो पूरी हो ही गई थी.. और अगले दिन सन्डे भी.. तो रात तो बितानी थी.... उसने मैसेंजर अपडेट कर दिया। जैसे ही मैसेंजर अपडेट हुआ लगातार मैसेजेस आने लगे.. कुछ फ्रेंड रिक्वेस्ट के थे तो कुछ एेसे ही.. फालतू के.. ये फेसबुक की दुनिया और सोशल नेटवर्किंग की दुनिया भी बड़ी अजीब है.. जो सामने नही बोल सकते वो रिक्वेस्ट भेज कर इजहार तक कर देते हैं.. एेसा ही एक मैसेज रिक्वेस्ट पढ़कर मुस्कुराये बिना नही रह पाई वो, मैसेज था "मौसमी जी मै बहुत संस्कारी हूँ.. सुबह शाम मन्दिर भी जाता हूँ प्लीज मुझे एड कर लीजिये अपने फ्रेंड लिस्ट में" खैर मौसमी ने मुस्कुराते हुए.. मैसेज डिलीट कर दिया उसके बाद एक के बाद एक मैसेज डिलीट करती जा रही थी वो कि एक मैसेज को देखते ही उसकी नजरे थम गई... "हाॅय.. नाइस क्लिक, यू रिमेमबर.. योर 11th हॉफ यरली इकजाॅम... पिथौरागढ़".....
इस मैसेज को देखते ही मौसमी के आँखो के आगे एक धुधली सी स्मृति उभरने लगी.. तो क्या ये वही है जल्दी से उसने उस लड़के का फेसबुक प्रोफाइल चेक किया.. सामने जो तस्वीर थी उसे यकीन ही नहीं हो रहा था.. कि कोई इतने सालो बाद भी एेसे मिल सकता है। खैर आज उसे पहली बार उसका नाम पता चला “शरद सिंह "नाम था उसका। उसने तुरन्त मैसेंजर पर आकर रिप्लाई किया, " हाँ मुझे याद है आप पिथौरागढ़ से है ना "इतना लिखने के बाद मौसमी ने रिप्लाई आने तक इंतजार करना ठीक समझा.. फोन एक तरफ रख के मौसमी पुरानी यादो मे खो गई जैसे कि अभी की ही बात हो.. कितनी बेफिक्री के दिन थे वो ना कोई उलझने ना कोई कशमकश सादगी और मासूमियत से सरोबर जिन्दगी जहाँ रिश्तो में कोई मिलावट नही थी.. प्यार मे कोई बनावट नही थी... अगर था तो एक प्यारा सा, अनकहा सा, अनछुआ सा एहसास.. सोचते हुए कब मौसमी की आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला।

दूसरे दिन सुबह देर से उसकी आँख खुली.... फ्रेश होने के बाद.. किचन में काफी बनाई अपने लिये और लीविंग रूम की तरफ बढ़ गई कि मोबाइल में नोटिफिकेशन की रिंग बजी, मन खुशी की लहर दौड़ गई जैसे बरसों से खोया ख्वाब पूरा हो रहा हो। उसने काफी का कप टेबल पर ही रख कर झट से मोबाइल हाथ में ले लिया और नोटिफिकेशन पर क्लिक किया। उफ्फ कितना टाइम लग रहा है.. ये नेटवर्क भी ना क्या करू मै इसका.. मौसमी का धैर्य जवाब दे रहा हो जैसे इतनी अधीर वो कभी नही महसूस करी थी जितना कि एक नोटिफिकेशन खोलने में आज महसूस कर रही थी वो.. नोटिफिकेशन ओपेन हो गया.. शरद की फ्रेंड रिक्वेस्ट थी.. उसने तुरन्त एक्सेप्ट किया कि तभी मैसेंजर पर मैसेज आया.. शरद का मैसेज था,
हाय.. हाय.. कैसी हो..??
अच्छी हूँ आप बताइए, आप लोग कैसे हो??

ठीक हूँ.. सब ठीक है यहां.. आपको मै याद हूँ??

" हां" मौसमी ने रिप्लाई किया, पिथौरागढ़ अब भी वैसा ही है?
"हां वैसा ही है लगभग.. लेकिन" ..... शरद

काफी देर तक कोई रिप्लाई नही आया उसके बाद.. मौसमी एक घंटे तक अखबारों के पन्ने पलटने के बहाने मैसेंजर में देखती रही.. जब सब्र की सीमा टूट गई तो उसने रिप्लाई किया...

"लेकिन क्या आपने कुछ कहा नहीं?.."

उसके बाद पूरा दिन उसका कोई रिप्लाई नही आया..।
मौसमी बेचैन थी..

"मुझे तलाश करके जाने कहां चला गया. . ढूढ़ती रही उसे मैं और वों मुझे इस कदर तन्हा कर गया. ."।

आखि़रकार रात हो गई.. मौसमी ने पूरा दिन कुछ नही खाया..। नींद भी दूर तक आँखो मे नहीं थी.. रह - रह कर गुजरे हुये पल उसके आँखो के सामने घूम रहे थे जैसे वो फिर से पिथौरागढ़ पहुंच गई हो..।

पिथौरागढ़ के बारे में सोचते- सोचते कब सुबह हो गई उसे पता ही नहीं चला..।
सुबह जल्दी - जल्दी आफिस गई..।
आज मीटिंग थी आफिस में.. मीटिंग में पता चला कि मुरादाबाद के किसी कालेज में कैम्पस सिलेक्शन के लिए कुछ दिनो के लिए उसे मुरादाबाद जाना पड़ेगा.. अगले ही दिन निकलना था.. तो तैयारियां करनी थी अतः वो घर जल्दी आ गई.. अभी तैयारियों में जुटी ही थी कि मैसेंजर पर कोई मैसेज आया.. सारी तैयारियां बीच में ही छोड़ के फोन लेकर वो एक तरफ बेड पर बैठ धंस गई.. मैसेज था...

"कुछ नही.. साॅरी वो थोड़ा भावनाओं मे बह गया था.. आप बताइए क्या हो रहा है..? आप देहली में है आपके फेसबुक प्रोफाइल में लिखा है.." शरद


"हां मैं यहां पर एक साफ्टवेयर कम्पनी मे HR हूं. . और दिल्ली में अकेली ही हूं.. ममी पापा और गोलू कानपुर में है.
आप पिथौरागढ़ में ही है.. क्या कर रहे हैं आज कल? "

" जी मै एक कालेज में लेक्चरर हूँ.. आपके बारे में जान कर बहुत खुशी हुई.. "शरद

" सेम हियर ग्रेट टू हेयर अबाउट यू.. वेरी नाइस.. आपकी ड्राइंग बहुत अच्छी थी, याद है मैने एक बार आपसे माइक्रोस्कोप बनवाया था.." मौसमी

" याद है.. " शरद

" और वो जब आपने मुझे स्कूल छोड़ा था, मेरे पेपर वाले दिन.. उसके लिये थैंक्स उस समय नहीं बोल पायी थी." .. ."

"हाँ याद है.." इसमे थैंक्स की क्या जरूरत है.. बस मैं चाहता था कि उस समय आपके साथ कुछ गलत ना हो फिर चाहे मुझे कुछ भी करना पड़ जाये.. " शरद

कुछ देर तक कोई मैसेज नही आया,.. मौसमी का

" क्या हुआ कुछ गलत कह दिया क्या मैने " शरद ने कहा

नही.. गलत क्या है.. मौसमी ने आगे कहा " वो घर अब भी वैसा ही है..? पिथौरागढ़ अब बदल गया होगा..?

"कुछ भी नहीं बदला है सब कुछ वैसा ही है, बस आप नही है, सब है यहां। वही गलिया वही घर, वही शहर.. केवल आप को छोड़ कर..."

"ह्म्म्म.. और वो हैंडपंप जिसे चलाने के लिये हम भाई बहन मे लड़ाई होती थी.. गोलू कहता तुम चलाओ और मै कहती वो.. "

" और उसमे पानी भी कम निकलता था" शरद

"आप को कैसे पता आपने तो कभी चलाया नही था" मौसमी ने कहा।

"तुम्हारी हालत देखकर पता चल जाता था " खिड़की पर जब खड़ा होता था तो तुम दिख जाती थी अक्सर आँगन में"

"अच्छा और वो मंकी मैन याद है (मुहनोचवा) कितना डरते थे सब शाम से ही छत पर जाना बन्द कर देते थे और सुबह सब मजाक उड़ाते थे एक दूसरे का "

" हाँ याद है, तब मै आपसे पहली बार बोला था, मैने पूछा था, डर लगता है? और आपने कहा था कि लगता तो है ही,.. फिर दूसरी बार जब बात की थी.. भारत पाकिस्तान का मैच था. . इंडिया के हारने के चांसेज जादा थे.. सब ने खाना नही खाया था.. मै, गोलू, और भी लोग तब आपने मुझसे कहा था, मैने तो खा लिया पता था हार जायेगी इंडिया.. अब आप लोग भूखे रहिये इंडिया के हार के शोक में "... शरद

" ओह गॉड आप को यें भी याद है.. पहली बार कब बात किये थे.. आप की याददाश्त बहुत अच्छी है, वैसे हमने ज्यादा बात किया ही कहा था ज्यादा से ज्यादा दो चार बार बाते हुई थी बस.. . . और वो न्यू ईयर कार्ड याद है... "..... . . मौसमी

" सब याद है वो न्यू ईयर कार्ड, वो तुम्हारा पहली बार स्काई ब्लू कलर का सूट पहनना.. .वो पीले रंग की शार्ट फ्राॅक और.. .. . . वो साईकिल से तुम्हारा गिरना.... वो पहली बार दीपिका के घर पूजा मे तुम्हारे हाथ से प्रसाद लेना.. तुम्हे रोज स्कूल जाते हुये देखना और फिर इन्तज़ार करना.. और 3 जुलाई 2003 को तुम्हारा हमेशा के लिए पिथौरागढ़ छोड़ कर जाना. .. सब याद है "

ओह गाॅड.. वाह काबिले तारीफ याददाश्त है.. आपको तो तारीख भी याद है.. 14 साल बाद भी... 'मौसमी'



"
हाँ और सबसे बड़ी बात कि इन यादों का 14 साल बाद भी ज्यों का त्यों रहना".. शरद

मौसमी.." ह्म्म
पता है आपने वो न्यू ईयर कार्ड जो दिया था, बहुत सुंदर था और लिखावट भी लेकिन मेरे समझ में नहीं आ रहा था उस समय कि आपने मुझे ही वो कार्ड क्यों दिया" ... ।

" अब समझ में आ रहा है आपको कि अभी भी नही." शरद..

... काफी.. देर बाद मौसमी ने टाईप किया...

" तो क्या उस समय. .. डिड यू लव मी...?

" हाँ.".. आई लव यू दैट टाईम एंड यू?? शरद



"
पता नहीं.... नही पता प्यार किसे कहते हैं.. हां लेकिन उस दिन जब हम पिथौरागढ़ छोड़ के जा रहे थे.. सुबह से मै बस आपका इन्तज़ार कर रही थी.. लेकिन आप मुझे उस दिन पूरा दिन नही दिखे.. मेरी नजरे बस आपको दूढ़ रही थी... और वैसे तो आप.. हर रोज सुबह से ही मौजूद रहते थे छत कभी बालकनी.. कभी अपने ड्राईंग रूम के बाहर लेकिन उसी दिन .. कहाँ थे आप? "



"
कहीं नही था मैं, मैं उस दिन पूरा दिन घर पर था.. तुम्हे जाते हुये नही देख सकता था..बहुत मुश्किल था ये सब मेरे लिए, फिर भी नही रहा गया तो.. लास्ट में स्टेशन पहुच गया था.. तब तक ट्रेन चल दी थी.. और मै अन्दर तक टूट सा गया था.. बस ट्रेन को जाते हुये देख रहा था... बहुत बेबस था मै." . शरद



"
देखा था मैने आपको लेकिन मै भी बेबस थी.. चाह के भी कुछ नही कर पा रही थी.. मन कर रहा था.. ट्रेन से उतर कर गले लग जाउ और पूछू कहाँ थे अब तक.. कितना परेशान कर दिया मुझे.. लेकिन तब तक ट्रेन अपने रफ़्तार मे आ गई थी.. मै बस आपके ओझल होते चेहरे को देख रही थी और धीरे-धीरे कब वो चेहरा वो शहर आँखो से ओझल हो गया पता ही नहीं चला .".. .. मौसमी



" प
ता है.. आपके जाने के बाद तीन दिन तक मै सोया नही था.. कुछ भी अच्छा नही लगता था.. बस लगता था कि सामने आप दिख जाये.. मै आपको कभी भूल नहीं सकता.. यू आर माई फर्स्ट लव एंड लास्ट.... मै खुद से झूठ नही बोल सकता.. आपका तो नही पता लेकिन मै अभी भी आपको बहुत प्यार करता हू.. और करता रहूंगा. . और रिस्पेक्ट भी.".. -शरद

मौसमी शांत थी क्या लिखती वों.. 14 साल बाद पता चलता है आज कि कोई उसको इतना प्यार करता है.. उसको समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे.. क्या रिएक्ट करे.. घर पर तो शादी की बात चल रही है.. एेसे मे क्या कहे वो.. ख़ैर.. उसको गुड नाईट बोल मौसमी.. ने चैट आफ कर दिया.. और पूरी रात बस पुरानी यादे उसके आँखो के सामने घूमती रही.. जैसे वो वही पहुंच गयी हो.. कब उसकी आँख लग गई पता भी नहीं चला।
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सुबह जब आँख खुली तो.. साढ़े 9 हो रहे थे.. . मौसमी हड़बड़ी में उठी आफिस फोन मिलाया.. पता चला मुरादाबाद के लिए आफिस की बस आधे घंटे मे निकल रही है.. ओह गाॅड अब कैसे होगा. . आधा घंटा तो घर से ही निकलने मे लग जायेगे क्या करे अब.. परेशान थी वो.. एक तो नई जाॅब और पहली बार उसे इन्टरव्यू पैनल मे रखा गया था. .. वो रिस्क नही लेना चाहती थी.. तभी मैसेज का नोटिफिकेशन बजा देखा तो शरद.. गुड मॉर्निंग.. मौसमी जल्दी मे थी तो मैसेंजर वाइस काल कर लिया उसने.. बोला .. हैलो कल आपसे देर तक बात करने के वजह से मेरी नींद नही खुली.. और आज मुरादाबाद के लिये आधे घंटे मे आफिस से सब निकलेंगे.. और मै इतनी लेट हो गई अब क्या करू?? कुछ समझ मे नही आ रहा है... ।
उधर से शरद बोला.. वैसे एक बात कहूँ... अगर आप आराम से पैकिंग करके वहाँ से बस ले ले पिथौरागढ़ के लिए तो यहाँ से मै आपको मुरादाबाद सुबह छोड़ दुँगा.. आप टाइम से कैम्पस पहुंच जायेगी ये मेरा वादा है..

हाँ लेकिन मुझे पिथौरागढ़ आना पड़ेगा. .... (मौसमी ने कहा)
तो आज तो वैसे भी आप शाम तक मुरादाबाद पहुंचेगीं.. रिपोर्टिंग तो दूसरे दिन 10 बजे तक है आपने बताया था.. रात मे मुरादाबाद में कहा रूकेंगी आप? शरद ने पूछा

"जी कालेज के गेस्ट हाउस में"... . मौसमी

"तो जैसे वहां रूकेंगी वैसे पिथौरागढ़ रूक लीजिएगा इसी बहाने आप अपने पुराने शहर को देख भी लेंगी।

. ..... तभी मौसमी ने कहा.. एक मिनट फोन आ रहा है आफिस से बात करके फाइनल करती हूँ. .. मौसमी आफिस के कोआरडिनेटर से बात करके बता देती है और परसो सीधे कालेज पहुचने के लिये बोल देती है.. उसके बाद जल्दी - जल्दी पैकिंग करती है. . और घर से निकलते हुए.. शरद को बता देती है. . मौसमी बस मे बैठते ही पुरानी दुनिया में खो जाती है..

एक - एक बीते पल जिसे वो महसूस कर रही है.. आज जब वो फिर से इतने सालो बाद पिथौरागढ़ जा रही है.. उसकी खुशी आँखो से बया हो रही थी... कभी चलती बस से बाहर देखते हुए.. अकेले में मुस्कुराती तो कभी मन ही मन कोई गीत गुनगुनाती.. कितना सुखद एहसास था.. बीते लम्हों के यादों की सारी मोतियां जो बिखर गई थी.. बरसो बाद आज शरद से मिल जाने पर हकीकत के धागो मे वक्त उसे पिरोने जा रहा था.. कब पिथौरागढ़ आ गया उसे पता ही नहीं चला.. हड़बड़ा कर जब यादों की दुनियां से बाहर निकली तो देखा.. सामने शरद खड़ा था..

कुछ भी नहीं बदला था उसके अन्दर बिल्कुल वैसा ही..

"अब बस में ही बैठी रहोगी कि बाहर भी आओगीं"
शरद ने कहा..

"जी.. आप पहले से ही..

" हाँ एक घंटे पहले ही यहां आ गया था.. चलो कार उधर पार्क किये हैं". . शरद ने कहा

मौसमी मंत्रमुग्ध सी, खोयी सी अपने पुराने शहर की पुरानी यादों को ताजा कर रही थी. . तभी...." अरे वाह यहाँ तो पार्किंग जोन बन गया.. पहले यहां वो छोटी छोटी आलू चाट की दुकाने होती थी. . और वो वहां एक छोटी सी समोसे की दुकान थी ना.. कहते हुए वो सड़क के उस पार चली जाती है.. और पैरडाइज होटेल है सामने..

" हां वो तो अभी भी है.. (शरद बीच में ही मुस्कुराते हुए बोला)

" हमम यहां से कुछ ही दूरी पर छोटी स्टेशन माल गोदाम है वहां मै साइकिल सीखने आती थी. . मौसमी ने चमकती आखों से कहा..

"हां याद है. . मैने भी कई बार पीछे से पकड़ा था साइकिल.. तब भी तुम डरती थी.."



"
मै पता नहीं क्यो नर्वस हो जाती थी.. साइकिल चलाने मे.."

" पता है तुम्हारे चेहरे से दिखता था.. कहते हुए शरद ने मौसमी को चिढ़ाते हुये कहा.. डरपोक थी तुम.."

"अच्छा.. मै डरपोक नही थी.. जब आप सामने आते थे तो पता नहीं क्यों मै नर्वस हो जाती थी". . मौसमी ने कहा. .

" अच्छा यें बात मुझे आज पता चली".. कहते हुए शरद ने कार का दरवाजा खोला और मौसमी को बैठने के लिए बोला.. दोनों बैठ गये.. कार चल दी..।

शरद ने गहरी सांस लेते हुए बोला पता है तुम्हारे जाने के, जाने कितने दिनो तक मे सोया नही.. अन्दर से टूट गया था और बेहद अकेला हो गया था मै. ... बस आँखो मे तुम्हारा चेहरा घूमता रहता था.. और आखिर 14 साल बाद तुम मेरे सामने हो.. फेसबुक पर तुम्हे कितना खोजा मैने.. आखिर तुम मिल गई, मुझे तो यकींन नही हो रहा है.. जैसे यें सब एक सपना हो.. मौसमी ने बीच में ही बोलते हुए कहा.. मुझे भी यकींन नहीं हो रहा है.. कि मै पिथौरागढ़ में हूँ.. सच्ची बहुत अच्छा लग रहा है.. तभी शरद ने कार एक गली में मोड़ ली.." ये कहां जा रहे हैं.. मुहल्ला तो आगे चौराहे के बाद है.. मुझे याद है अभी तक. . "मौसमी ने चीखते हुये कहा शरद ने कार धीमी करते हुए बोला," हम लोग अब उस मुहल्ले में नही रहते. . दूसरी जगह रहते हैं "
अरे लेकिन मै तो उसी जगह जाना चाहती हूँ... अपने उसी पुराने घर उसी मुहल्ले में. .. नही प्लीज़ मुझे वही जाना है, वहाँ जाकर मै अपनी पुरानी यादों मे खोना चाहती हूँ. . चलो ना फिर. . शरद उसकी बात टाल नही सका.. बस इतना ही बोला वहाँ कोई नही है घर में. . फिर भी चलो..।

दोनों पहुचते है.. माल गोदाम के थोड़ी दूर पर ही सटा हुआ था वो मुहल्ला.. और उसके पीछे खेत व बगीचा था.. लेकिन अब सब बदल गया है.. उन खेतो की जगह बिल्डिंग खड़े हो गए हैं.. बगीचे की जगह शापिंग काम्पलेक्स खुल गया है.. ये सब देख कर मौसमी उदास हो गई.. बस इतना ही बोल पायी.. "मेरे यादो का शहर कही खो गया है"... शरद.. है ना

तभी उसकी नजर वही एक छोटी सी चाय के दुकान पर पड़ी. . जो उस समय भी हुआ करती थी.. बस वहां एक बाबा जी बैठते थे.. और अब शायद उनका बेटा बैठा था... मौसमी ने कहा.. "चलो ना शरद चाय पीते हैं.. तुम्हें तो चाय बहुत पसन्द है ना.. उस समय दिन भर तुम्हारी चाय बनती थी.. तुम्हारे किचन की खिड़की मेरे आँगन की तरफ खुलती थी. . और तुम अक्सर दिख जाते थे.. "


"
हाँ तब मै बहुत पीता था. . और आज भी पीता हूँ. . चाय लेकिन उस समय चाय पीने की वजह ही कुछ और थी तुम्हारा दीदार जो करना रहता था। "


"
चाय की तलब़ से शुरू इश्क की कहानी हुई दीदार ए महबूब हुआ रौशन जिंदगानी हुई "


"
अच्छा मौसमी धीरे से मुस्कुरा देती है.. और उसकी ये मुस्कुराहट उसके खूबसूरती मे चार चांद लगा देती है.. जिसको शरद देखता ही रह जाता है.. दोनो चाय पीते हैं.. कुलहड़ में चाय पीने का मजा ही कुछ और है नई. . मौसमी ने कुलहड़ को अपने होठों से छुआते हुये कहा. . जैसे अपने देश की सोंधी मिट्टी को चूम रही हूँ..। "

शरद ने कहा " और जब ये चाय किसी खास के साथ हो तो चाय का स्वाद दोगुना बढ़ जाता है.. शरद के इतना कहते ही दोनों एक दूसरे को मुस्कुरा के देखने लगते हैं.. चाय पीने के बाद दोनो पुराने घर जाते हैं.. मौसमी सीधे छत पर जाती है.. वो देखो वही हैंडपंप लगा रहता था. . और यहां टीन की छत होती थी और यहां सामने से तुम खडे़ देखा करते थे.. और तुम मुझे नोटिस करती थी.. मै देख रहा हूँ या नही. ... है ना इतना कहकर दोनो हँस पड़े. . "सच में कितने हसीन. . ख्वाब सरीखे दिन हुआ करते थे.. मुझे तो एक कार्ड देने मे ही तीन साल लग गये वो भी केवल हैप्पी न्यू ईयर ही लिख पाया "शरद ने कहा. .. मौसमी ने कहा . .

" आजकल तो प्यार के मायने ही बदल गये लोग एहसास भी नही कर पाते और इजहार कर देते हैं. . ब्वॉयफ्रेंड के साथ होटल में घूमना डेट करना अब स्टेटस सिम्बल बन गया है.. युवाओं का फिर मन भरा तो ब्रेकअप.. और दूसरे दिन दूसरे के साथ. . दिल्ली में तो ये सब आम है.. मुझे तो बहुत चीप लगता है ये सब. . प्यार को समझो उसे महसूस करो.. यही तो इसकी मासूमियत है. . प्यार की मासूमियत ही उसकी पहचान है "।

शरद तो जैसे उसकी बातों मे खो सा गया था. . तभी क्या हुआ कहा खो गये??? ? मौसमी ने शरद को हिलाते हुए पूछा .. कुछ नही.. पता है मैने कभी तुम्हे इस तरह बोलते हुए नही सुना था.. आज सुना तो सच में मुझे अपनी पसन्द पर नाज है. . तुम्हारी ये सादगी तो मुझे दिख गयी थी 14साल पहले ही लेकिन. . तुम्हारी इन मासूमियत भरी बातें से मै अनजान था. . मुझे अब तो और... .. . कह के शरद रूक गया.... क्या.. बोलो क्या कहना चाहते हो.. मौसमीकुछ नही.. शरद कुछ तो... . काफी देर तक दोनो तरफ खामोशी छायी रही.. . . शरद दूसरी ओर देखने लगता है मौसमी भी बात को काटते हुये बोलती है. . पता है इस बार घर जाने पर. . लड़के वाले देखने आयेगे. . और तब तुम मिले नही थे... मैने माँ को हां कर दिया. .. लेकिन मै बहुत परेशान हूँ अब. . मुझे कुछ समझ में नही आ रहा है. . कहते हुये मौसमी कई बार छीक देती है. .. आकछी. ..
शरद जो दूर खड़ा रहता है.. तुरन्त अन्दर से शाल लाता है और मौसमी को ओढ़ाते हुये कहता है.. क्या तुम मुझे इजाजत दोगी.. मै इसी तरह पूरी जिन्दगी तुम्हे शाल ओढ़ाना चाहता हूं. . तुम्हारा ख्याल रखना चाहता.. पूरी जिंदगी तुम्हारे साथ बैठकर तुम्हारी बाते सुनना चाहता हूं..
तभी मौसमी का फोन बज उठता है. . माँ का फोन था घर से. . मौसमी फोन रिसीव करती है. .. माँ पूछती है "बेटा मुरादाबाद पहुंच गई. .. और हाँ तुम रिजर्वेशन करा लो 1 जनवरी को लड़के वाले मिलने आ रहे हैं लड़के को तुम पसन्द हो और हमसे अच्छे खानदानी लोग है वो. . मै बहुत खुश हूँ बेटा तुम्हारे लिए जैसे इश्वर ने मेरी मनोकामना सुन ली हो.. "
मौसमी सुनती जाती है. . माँ की खुशी के आगे उसके होठ रूक जाते.. जो वो कहना चाहती थी. वो कह नही पा रही थी.. कैसे कहती.. उन माँ बाप ने उसकी हर बात मानी.. और आज उसकी बारी थी. .
मौसमी ने धीरे से कहा माँ मै पिथौरागढ़ में हूँ.. यहाँ मुझे शरद मिल गया. . याद है ना तुम्हे वही लड़का जो सामने वाले घर में रहता था. . जिसने मुझे पेपर वाले दिन स्कूल छोड़ा था. . हाँ याद है मुझे बड़ा अच्छा और संस्कारी लड़का है.. कैसे है वो लोग? सब अच्छे हैं माँ.... माँ वो.. . वो.. मौसमी बोल नही पा रही थी। बोलो क्या बात हैं.. माँ ने बीच में ही कहा मौसमी एक सासं मे ही बोलते हुए कहाँ मां हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं. . शरद ने चौदह साल मेरा इंतज़ार किया है. . हम शादी करना चाहते हैं. . मां मुझे माफ करना शरद से अच्छा लड़का कोई हो ही नहीं सकता.. कह के मौसमी फोन काट देती है.. .
और दौड़ते हुए दूर गुमसुम से बैठे शरद के गले लग जाती है. . और यादो का रिश्ता. . अब प्यार के डोरी मे बध जाता है.. एक एेसी डोर... जो चौदह सालो तक ख्वाबो और एहसासों के बुनियाद पर बधी थी.... आज हकीकत बन अपने वजूद को पहचान दे रही थी. ... . ।

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