यह तो दुनिया का दस्तूर ही है कि ग़लती चाहे जो भी करें पर सज़ा तो जो छोटा होता है उसी को मिलती है.लाश को कंधा देते हुए आगे वाला आदमी कह रहा था.देखो घर हो,समाज हो या राष्ट्र सभी जगह यह ही नियम लागू होता है.अब इस बेचारे को ही देखलो इसकी क्या ग़लती थी इसे क्या पता था की यह जिस फैक्ट्री में काम कर रहा है वह काले धन की बुनियाद पर खड़ी है और बारह साल बाद इस कारण से बंद हो जायगी.

अरे भैया पैसा चाहे काला रहा हो या सफ़ेद आ तो रहा था गरीबों के भी काम ना.यह और इसके जैसे पचासों मजदूर बेरोज़गार हो कर भूखे मरने की नौबत पर आ गए है.दुसरा साथी कह रहा था.

आज को स्याह कर भविष्य के उजले सपने देखना कहां की समझदारी है.अरे नोटबंदी करनी ही थी तो पहले उसके तात्कालिक परिणामों के बारे में भी सोचकर भविष्य की रुपरेखा तैयार करती सरकार तो मेहनतकश मजदूरों को इस तरह बेमौत नहीं मरना पड़ता.बीच में से किसी ने कहा.

रामेश्वर एक निजी कारख़ाने में काम करता था तथा पिछले दस सालो की मेहनत के बाद उसने लोन लेकर यह घर बनवाया था.उसने या उसके किसी साथी ने नोटबंदी के परिणाम की परिणिती कारखाना बंदी के रूप में नहीं सोची थी.जब वेतन मिलाना ही बंद हो गया तो घर की किश्तें भरने का प्रश्न ही नहीं उठता.जब चलते हुए रोज़गार ही बंद हो गए तो नया सृजन तो अभी बहोत दूर की बात है.कहाँ से मिलेगा काम कहा से पैसा आएगा यह सोचते सोचते ही रामेश्वर ने एक दिन आत्महत्या कर ली,सभी उसकी शवयात्रा में जा रहे थे और नोटबंदी को कोस रहे थे.

यह तो सभी जानते है की उच्च स्तर पर लिए गए किसी भी निर्णय का प्रभाव सबसे ज़्यादा समाज के निचले मध्यम वर्ग पर पड़ता है.आपने अभी तक नहीं सुना होगा की नोटबंदी के कारण किसी पैसेवाले ने आत्महत्या की.वह तो आज भी भरपेट खा रहा है और उस टाइम भी खा रहा था.भूखे तो हम जैसे लोग ही मर रहे है ना.कुछ पड़ा लिखा साथी कह रहा था.हम भी चाहते है हमारा देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो,सभी को न्याय मिले परन्तु आने वाले कल की सुखद कामना में आज की,वर्तमान की हत्या क्यों.हमारे जैसे मरने वालों की गिनती ना तो बलिदान के रूप में होगी नाही हम नोटबंदी के शहीद कहलाएंगे.

भविष्य में यदि सभी कुछ आशा के अनुरूप हो भी गया तो क्या हम यह स्वीकार कर पाएंगे की इस सुन्दर भारत की बुनियाद हज़ारो बेरोजगारों,असमय सेवा से पृथक किए गए मजदूरों की लाश पर रखी गयी है.शवयात्रा में शामिल एक सज्जन ने अपने विचार रखे.

अरे भाई सपने तो सपने होते हैं यदि एक व्यक्ति अपने अच्छे भविष्य के लिये किसी तांत्रिक की मदद से बकरे की भी बलि देता है तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता है जबकि अच्छे भारत के सपने को लेकर इतने निरिह लोगों की बलि ली जा रही है इनका क्या?कल से कोई नई सरकार आयेगी वो फिर कुछ निर्णय करेगी और उसका मूल्य चुकाएंगे हम जैसे ग़रीब .

रामायण में हम जैसे गरीबो को लेकर लिखा गया है कोउ नृप भए हमें का हानि परन्तु आज के परिवेश में अगर लिखा जाय तो इस प्रकार होगा कोउ नृप भए मौत हमें ही आनी .शवयात्र में शामिल सबसे बुजुर्ग ने हाँफते हुए अपने विचार रखे .

सभी ने मौन के रूप में अपनी स्वीकृति दी.शायद शवयात्रा में शामिल सभी सोच रहे थे अगली बारी किसकी .

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