धीरे-धीरे आई कार एक छोटे से मकान के सामने आकर खड़ी हुई। कार से धीरे से उतरी शालिनी। बड़ा सा पेट, मातृत्व के बोझ से परिपूर्ण।
‘‘ आपको डॉक्टर साहिबा ने 2 घण्टे में वापस आने को कहा है। जाकर जल्दी आ जाइयेगा।’’ ड्राइवर के कहने पर शालिनी सिर हिलाकर अन्दर चली गई।
‘‘आ ! अम्मा आ गई।’’ हर्षित दौड़ कर शालिनी के पैरों से लिपट गया। आवाज सुन रसोई से श्रीकान्त बाहर आया।
‘‘ शालिनी आओ .......आओ बैठो.......तबियत कैसी है। अभी मैंने सब्जी बनाकर रखी है। वे अच्छी तरह तुम्हारी देखभाल करते हैं ? ’’ प्रेम से पूछते हुये पत्नी के पास आया श्रीकान्त।
‘‘आपकी नौकरी का क्या हुआ ? मिल को पुनः खोलने वाले है या नहीं ’’
‘‘बातचीत चल रही है शालिनी। निश्चय ही एक महीने में खुल जायेगी, ऐसा सुपर वाइजर कह रहे थे। जो नौकरी चली गई थी वह दोबारा मिल जाएगी।.....फिकर मत करो। अभी चिंता करना तुम्हारे लिए ठीक नहीं है। बहुत सी बातें सोच सोच कर मन खराब मत करो। षान्ति से रहो। तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक रहना चाहिए। मेरे लिए ये ही जरूरी है।
‘‘मुझे क्या है जी ! मैं तो अच्छी हूं। रोजाना बढ़िया, तरह तरह का, स्वास्थ्य प्रद खाना मिलता है। समय पर दवाई, गोलियां बहुत ही अच्छी देखभाल के बीच रह रही हूं। पर मेरा मन तो घर के इर्द गिर्द ही घूमता है। हर्षित ने खाना खाया नहीं। आप अकेले कितना परेषान होते हो। यह सोच मन बहुत ही तड़पता है।’’
‘‘फिक्र मत करो शालिनी।तुम्हारे प्रसव में थोड़े दिन ही तो बाकी हैं। सब कुछ ठीक से हो जाएगा। ’’
‘‘ अम्मा तुम कब आओगी ? ’’ पांच साल के बच्चे हर्षित ने पूछा तो शालिनी की अाँखें नम हो गईं।
वह बोली ‘‘ पापा का कहना मानो मेरे राजा बेटे अच्छे बच्चे बन कर रहो......अम्मा जल्दी आ जाएगी। अच्छा मैं चलती हूं।’’
‘‘ ठहरो, शालिनी, खाना बन गया है। एक रोटी तो खाकर जाओ। ’’
‘‘ नहीं जी........बाहर कुछ भी खाने को सख्त मना किया है। अभी तो सिर्फ बच्चे से मिलने आई हूं। इसके लिए डाक्टर साहिबा से बहुत अनुरोध कर के आई हूं। हर्षित का पूरा ध्यान रखना जी। मैं चलती हूं।’’
कमरे की खिड़की से शालिनी ने बाहर झांका। अस्पताल में लोग, बहुत सी चिंताओं में घिरे इधर उधर आ जा रहे थे। नीम के पेड़ की हवा के कारण बाल बार बार उड़ कर उसके चेहरे पर आ रहे थे। पेट के अंदर बच्चा जोर जोर से लात मार रहा था। उसका शरीर रोमांचित हो रहा था।
‘वह बुदबुदाने लगी। ‘मेरे खून से पलने वाले मेरे प्यारे बच्चे तू तो बहुत ही भाग्यषाली है। तेरा जन्म भले ही इस गरीब मां के कोख से हुआ हो पर तेरे लिए आगे तो ऐषो आराम की जिन्दगी तुम्हारे स्वागत के लिए खड़ी है। उसका मन बहुत ही उदास हो रहा था उसने अपने पेट पर हाथ फेरा और आंखें बंद कर ली।
‘‘षालिनी, क्या खड़े खड़े ही सो रही हो। खाना लेकर आई हूं.........खालो।’’
नर्स के कहने पर शालिनी ने आंखें खोली ‘‘रख कर जाओ, बाद में खा लूंगी। अभी भूख नहीं है।’’
‘‘क्या कह रही हो...........भूख नहीं है..........तबियत तो ठीक है ना..........डाक्टर से कहूं क्या ? ’’ नर्स ने घबरा कर पूछा।
‘‘नहीं वह सब कुछ नहीं है। सोचा कुछ देर में खा लूंगी। ठीक है अभी खा लेती हूं।’
‘‘ ठीक है खा लो। खाने के बाद तुम्हें दवाई व गोलियां देनी है। खाना खाकर आराम करना। शाम को चार बजे बरामदे में चलना है। ऐसा डाक्टर ने कहा है। फिर मैं तुम्हें ले जाऊंगी।’’
सब्जी, रोटी,कढ़ी,सूप, फलों का रस, सलाद, खीर आदि से थाली भरी हुई थी। वह सोचने लगी कि जब हर्षित होने वाला था तो मुझे सिर्फ सूखी रोटी नसीब थी। अब देखो तो रोज ही दावत जैसे थाली नाना प्रकार के व्यंजनों से भरी रहती है।
डाक्टर ने शाम को चेकअप किया। ‘‘सब कुछ नॉर्मल है शालिनी। कोई भी परेषानी नहीं है। क्या तुम बच्चे का हिलना डुलना महसूस कर रही हो।’’
‘‘हां जी ! डॉक्टर साहब। बच्चा बहुत ही चंचल है। पूरी रात पेट में लात मारता रहता है। ’’
‘‘थैक्स गॉड, सब अच्छी तरह से चल रहा है, बच्चा पूरा स्वस्थ पैदा हो तो उस दम्पति को प्रसन्नता होगी।’’
‘‘डॉक्टर एक बात पूछूँं ? ’’
‘‘ क्या बात है शालिनी ? ’’
‘‘मेरे गर्भ में पल रहे बच्चे के मां-बाप से मैं एक बार मिल सकती हूंँ?’’
‘‘तुम ऐसा क्यों चाहती हो, शालिनी ?.......इसकी जरूरत नहीं है। ’’
‘‘क्यों नहीं डॅाक्टर। भले ही बीज उनका है, पर मैं अपने खून से सींच रही हूं। अतः ये बच्चा मेरा है ऐसा मुझे महसूस होता है ना ? इसे अपना मान कर ही इसका बोझ उठा रही हूं ना ? मेरे पेट में पल रहे बच्चे के मां-बाप वही लोग हैं ये मुझे मालूम नहीं होना चाहिए क्या डाक्टर ? ’’
‘‘ये गलत है षालिनी, जो समझौता हुआ है, उसके हिसाब से तुम एक किराये की मां हो। उनके बीज का दस महीने भार उठाकर तुम सिर्फ उसे पैदा कर उन्हें देने वाली हो। उसके बाद तुम्हारा कर्त्तव्य पूरा हुआ। उसके लिए रूपये लेकर तुम्हें अलग हो जाना चाहिए। उनसे तुम्हें मिलना है तुम्हारा सोचना गलत है। वे भी तुम्हारा मिलना पसंद नहीं करेगें न इस बात के लिए राजी होगे।वे तो तुम्हारे क्रिया-कलापो पर अप्रत्यक्ष रूप से ध्यान रख रहें हैं। फिर क्या बात है शालिनी ! शांंत से रहो। ’’
सुबह से ही शालिनी की तबियत खराब हो रही है। बच्चे का सिर नीचे आ गया है, और दो दिन में ही प्रसव हो जाएगा ऐसा डाक्टर ने कह दिया। पता नहीं क्यों शालिनी को अपने पति से मिलने की तीव्र इच्छा हो रही है। उसे ये भी पता है कि उन्हें यहां आने की अनुमति नहीं मिलेगी।
‘ क्या करें.......मेरा बच्चा बाहर आने वाला है।उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है सब लोग कह रहे हैं। कुछ भी हो, फिर भी मेरे खून से सींच कर बना वह जिसके भार को इतने महीने मैने वहन किया इस वजह से मेरे मन में जो मातृत्व की जो भावना है उसका किसी को ख्याल नहीं ? मुझे मेरे पति से मिलने का मन बहुत कर रहा है। प्रसव का मतलब एक औरत का पुर्नजन्म होता है।मेरा दूसरा जन्म होते समय आप मेरे पास नहीं होगे ?मैं क्या करूं?
कमर का दर्द धीरे धीरे बढ़ता चला गया। ‘अम्मा’ कहते हुये शालिनी कमर पकड़ कर पलंग के पास जो बुलाने के लिए घण्टी लगी है उसे दबाने लगी।
प्रसव वाले कमरे में उसके चारों ओर डाक्टर व नर्स खड़े हुए थे। भयंकर दर्दष्होने के साथ ही ,.........
‘‘हाँ, आप तुरन्त आ जाईयेगा।प्रसव पीडा शुरू हो गई। अब थोड़ी देर में बच्चा पैदा हो जाएगा। ’’ डाक्टर फोन पर कह रहीं है,उसे कहीं कुंए से बोल रही जैसे लगा। आधे होष में शालिनी ने ये सुना।
‘‘अम्मा’’ उसके जोर से चिल्लाने के साथ नये कोमल बच्चे की रोने की आवाज बाहर आई। जो कानों में मिश्री घोलने के साथ, शरीर व मन को भी सुकून देने लगी। षालिनी बेहोष होने लगी।
जैसे ही उसने आंखें खोली, कमरे में अपने को लेटे पाया। पास में श्रीकान्त व बेटे हर्षित को खड़े देखा।
‘‘ आप आ गये क्या ? ’’
बड़ी उत्सुकता से उसकी आंखे पास पड़े हुए झूले को देखने लगी।
‘‘क्यों जी, बच्चा........बच्चा कहां है ?’’ कमरे में घुसे डाक्टर बोले ‘‘ सब अच्छी तरह से सम्पन्न हो गया। सुन्दर सा लड़का हुआ। उसकी आँखें सुन्दर व रंग गोरा है बिल्कुल गुलाब के फूल जैसे बच्चा है। उसके मां-बाप बहुत खुष हैं। जो समझौता हुआ उससे ज्यादा रूपये देकर गये।’’
रूपये श्रीकान्त को देते हैं। ‘‘डाक्टर मुझे बच्चे को देखना है। मुझे दिखाईये।’’
‘‘नहीं शालिनी, प्रसव होते ही आधे घण्टे के अन्दर ही वे लोग बच्चे को लेकर चले गये। तुम देख नहीं सकती। ’’
‘दस महीने पेट में रख कर भार उठाया, उस बच्चे के मुख को मैं देख नहीं सकती ! ......एक मिनट उस बच्चे को देख नहीं सकती ! ........एक मिनट उस बच्चे को गोद में लेकर मेरे बेटे कह कर चूम लूं , तो क्या ये अधिकार भी मुझे नहीं ? .......मेरा व उसका जो रिष्ता है वह सिर्फ दस महीने का ही है..........? सोच सोच कर उसका रोना रूकता ही नहीं था। ’
‘‘ डॉक्टर, मैंने दस माह जिसे पेट में रखा उसके चेहरे को मैं देखना चाहती हूं।दस महीने मेरे पेट में, मेरे खून से जिसे सींचा है उसे सिर्फ एक बार उठा कर चूमना चाहती हूं डाक्टर। मेरे दर्द को समझो आप। कृपा कर उसे मुझे दिखाइये डॉक्टर। ’’
शालिनी का दिल फटने लगा वह रोने लगी।
‘‘मां , मेरा छोटा भाई कहाँ है मां ? ’’ बिना समझे हर्षित पूछने लगा।
‘‘ रोओ मत शालिनी। तुम्हारी हालत को मैं समझता हूं। ये तुम्हारे लिये नया अनुभव है। गरीबी के कारण तुमने उस बच्चे का भार उठाया तो भी
तुम्हारे मातृत्व के भावना को मैं सम्मान देता हूं। परन्तु, मैं कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हूँं। भगवान ने जिसे बच्चा नहीं दिया उसे तुमने दें दिया। तुम एक भगवान की तरह हमेषा उनके मन में रहोगी। अभी तुम्हारा शरीर कमजोर है। रोना तुम्हारे लिए ठीक नही...........’’
डॉक्टर के सांत्वना देने पर हाथ में रूपयों के साथ खड़े श्रीकान्त की आंखें भी भर आई व उसने फूट-फूट कर रो रही शालिनी को गले लगा कर तसल्ली दी।

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