तरसती निगाहें

रामाशीष चच्चा शहर मे अफसर थे। उनकी दो बेटियाँ और दो बेटे थे जिनकी परवरिश उन्होने बढ़े ठाठ-बाट से किया बिना कोई भेदभाव किए। उनके बेटे और बेटियाँ शहर के नामी-गिरामी स्कूल कॉलेज से पढ़े और सरकारी नौकरी पा गए। बेटियाँ तो पराई होतीं ही हैं, शादी होने के बाद अपने अपने घर संभालने लगीं। अब दोनों बेटे शादी को बचे थे। रिश्ते तो काफी आ रहे थे शादी के, पर लड़की देखा-देखी होने के बाद अक्सर कट जाती। बड़ा बेटा सुधीर बाबू का डिमांड था की लड़की पढ़ी-लिखी हो और नौकरी भी करती हो। खुद तो शाहरुख खान था नहीं, पर मन मे दीपिका पादुकोने जैसी बीबी की लालसा लिए बैठा था। खैर, चाहने से तो भगवान भी मिल जाते हैं तो बीबी कौन सी बड़ी बात थी, मिल गई मनपसंद लड़की तो विवाह भी हो गया। दोनों मियां-बीबी शहर मे ही रहने लगे। दो दो नौकरी से पैसा आने लगा तो घर बनते भी देर न लगा। बच गया छोटा बेटा, वह तो अपना भाई से भी दो कदम आगे निकला, साथ काम करने वाली एक लड़की से शादी कर सीधे चच्चा चाची के आशीर्वाद लेने आ पहुंचा। रामाशीष चच्चा थोड़ा कसमसाए, लेकिन चाची के समझाने पर मान गए। ऐसी करनी के लिए अपने छोटे बेटा को मन से उतार चुके थे चच्चा। छोटका बेटा भी अपनी बहुरिया को लेकर चलते बना।

चच्चा जबतक नौकरी किए अपना मकान न बना पाये शहर मे, और बनाते भी कैसे सारा पैसा तो अपने बच्चों के परवरिश मे लगा दिये थे। जब रिटायर हुए तो सोचा की चलो हम तो घर नहीं बनाए, बेटों ने तो बना लिया और पहुँच गए बिना बताए बड़े बेटे के यहाँ।

बड़ी बहू और उनके पालतू कुत्ते ने उनदोनों को पहले थोड़ा तजबीजा फिर घर मे प्रवेश हुआ। चाची को थोड़ा बुरा लगा पर चच्चा समझाये कि बहू घर मे रही ही कितना दिन है जो झट से पहचान जाती हमें...? चाय बिस्कुट मिला नास्ते में पर भोजन नसीब बेटे के आने के बाद ही हुआ। चाची का कलेजा तब फट गया, जब बेटे से बहू को कुत्ते वाले कमरे मे चच्चा-चाची की सोने की व्यवस्था करने का हिदायत देते सुना। चच्चा को जब इस बात की जानकारी हुई उन्होने अपना बोरिया-बिस्तर समेटना ही उचित समझा।

अरे...... इतनी रात को जाओगे....?- चाची ने विस्मय से पूछा।

हाँ... तो रह लिए न...., शौक पूरा हो गया आपका....?
और लगाओ रट, बेटे के यहाँ जायेंगे, बेटे के यहाँ जायेंगे -रामाशीष चच्चा थोड़ा खीजते हुए बोले।

अरे... सुधीर पूछेगा तो...?– चाची ने आशंका जताई।

चच्चा खामोशीपूर्वक सामान लगाते रहे।

सुधीर...सुधीर... जरा बाहर का दरवाजा खोल दो... हमारी ट्रेन है...- चच्चा ने बेटे को आवाज लगाया।

अभी...इतनी रात को... कहाँ जा रहे हैं....? हमें लगा... रहने आए हैं.... तो रहिएगा दु.. चार... दिन.. –बेटे ने अपनी मनःस्थिति दर्शा दी।

अरे नहीं...., हमलोग तो तुमलोगों को देखने ही आए थे..., देख लिए.. अब का करेंगे रह कर..?, जा रहे हैं..., ई देखो... ट्रेन का टिकिट...- रामाशीष चच्चा ने आने वाला टिकिट आधा छुपाते आधा दिखाते कहा...।

बहू कहाँ है...? तनी आशीर्वाद दे देते...- चाची ने घर मे झाँकते कहा।

वो.. वो... सो रही है - सुधीर थोड़ा असहज होते बोला।

बेटे को आशीर्वाद देकर चच्चा-चाची विदा हो लिए।

कितना दिन शहर के मकान का किराया देते? कुछ दिन बाद दोनों ने अपना मन बनाया और गाँव लौट आए। दिन बीतने लगा, दोनों खुदे बनाते खुदे खाते और आपस मे ही अपना दुखड़ा रो लेते। एक दिन रामाशीष चच्चा सीढ़ी से फिसल गए पैर फ्रैक्चर हो गया। गांव वाले ढो-टांग कर डॉक्टर के पास ले गए। प्लास्टर हुआ और चच्चा बेड पर आ गए। बुढ़ारी का फ्रैक्चर जल्दी थोड़े न जुड़ता है, समय लगने लगा। बेड पर पड़े पड़े बेडसोर हो गया, पूरा कमर और धीरे धीरे पीठ के तरफ फैलने लगा। स्थिति चिंताजनक होने लगी, तो चाची अपने बेटे बेटियों को खबर भिजवा दीं। पर बेटों को फुरसत कहाँ थी? किसी तरह फुर्सत निकाल एक बेटी आई तब जाकर मलहम पट्टी का काम सुचारू ढंग से होने लगा। चाची भी पति की दशा देख देख मरियल सी होने लगी। कमजोरी इतनी हुई कि चच्चा की यादाश्त शरीर के साथ कमजोर पड़ने लगी। कभी अपनी बेटी और पत्नी को पहचानते कभी नहीं। पर जब भी कोई गाड़ी की आवाज या किसी मर्द की आवाज सुनाई दे तो पूछा करते- सुधीर आया क्या...?

चाची जल भून कर जबाब देतीं-नहीं जी।

जब तक जागे रहते बार बार पूछते रहते - लगता है.. आ गया.. मेरा बेटा आ गया...।

चाची कभी रोते कभी झिड़कते बोला करतीं-ना... जी, नहीं आया है...।

चच्चा बोलते - आप बताये..?, खबर भिजवाए....? जानता अगर मेरे बारे में...तो जरूर आता...।

बेटे के आस लगाए चच्चा एक दिन चल बसे। चाची यह आघात सह न सकीं, उनके शरीर पर लोट लोट रोती हुई वो भी चच्चा के साथ हो लीं।

यही साश्वत सत्य है कि एक माता-पिता अनेक बच्चों को पाल लेते हैं लेकिन अनेक बच्चे मिलकर भी एक माता -पिता को नहीं पाल पाते ।चच्चा के प्राण पखेरू भले ही उड़ चुके थे परंतु उनकी पथरायी आँखें अब भी बेटे का इंतजार कर रही थीं ।पुत्र का जन्म पिता की आत्मा से होता है इसीलिए उसे आत्मज कहते हैं।पड़ोसियों की सहायता से बेटी ने दोनों का अंतिम संस्कार किया ।घर के बाहर लटका हुआ ताला अब घर के नए मालिक का इंतजार कर रहा है ।कहते हैं इतिहास अपनी पुनरावृत्ति करता है शायद इसी बाबत ताले को भी सुधीर के बुढ़ापे का इंतजार है ।

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.