"शव साधना ..." -

मैं औघड़ अघोर साधक भूखा था कई दिनों से, मेरे औघड़त्व की परीक्षा थी , गुरू दक्षिणा मे एक ताजा शव देना था गुरू को, जिस पर वे अंतिम साधना सिखलाएंगे और फिर उपवास खत्म.. मैं भी पूर्ण औघड़ हो जाऊंगा,काल कापालिक औघड़, काल भैरव को प्रकट करूंगा । ये सोचते सोचते गंगा किनारे बैठा किसी बहते शव की तलाश में मैं गुनगुनाने लगा-

" देवराज सेव्यमान पापनाघ्रिपंकजं, व्याल यज्ञ सुत्रमिंदू शेखरम कृपाकरम्, नारदादियोग वृंद वृंदितं दिगम्बरम, काशिकापुराधिनाथ काल भैरवं भजे"।


तभी एक शव बहता आया, मैने पकड़ के किनारे लगाया, शायद ये कोई अंतिम संस्कार वाला नहीं बल्कि गंगा में डूबा हुआ व्यक्ति था, मैने सांसे टटोली कुछ जीवन दिखा मैं सोच में था इसके मरने का इंतजार करूं या जीवन का प्रयास, मेरे कई दिनों की तपस्या और भूूख मुझे तड़पाए दे रही थी, ये तो वैसे ही जीवन छोड़ देगा क्यों न मैं अपनी क्रिया पूर्ण करूं, गुरू भी राह तकते होंगे, पर पता नहीं क्यों अंदर से आवाज आ रही थी........ "रुक जा औघड़"।
अंतत: मैने मन की सुनी व्यक्ति को पास के अस्पताल पहुंचा वहां से वापस आश्रम आया, गुरू के चरणों में बैठ रोता हुआ बोला -
"मैं लायक नहीं अब तक एक शव भी प्राप्त न कर सका"
"तो क्या मिला तुझे" वे बोले..
"एक अधमरा व्यक्ति " मैनें कहा।
"तो उसे ही ले आता क्षुधा मिटाने, क्या औघड़ साधना पूरी नहीं करनी तुझे " बादलों से गरजते वे दहाड़े।
" आप ने कहा था जीवन शिव है मृत्यु शव... शव समझ तब शिवत्व मिलेगा, मैं जीवित शिव को शव कैसे करता, मैं तो जीवन सीखने औघड़ हुआ हूं, और हम औघड़ तो मोह-माया-लोभ -तत्व-अतत्व, सजीव- निर्जीव हर एक को छोड़ उस भूत भभूत भस्म शवचर्म धारी अनादी अनन्त मृत्युंजय को समझने ही औघड़ हुए है, उनके जीवन पर मेरा क्या हक"
"गुरु की आँखे चमकने लगी थी वो मेरे सर पर हाथ रख बोले यही है शिवत्व, शव में शिव का ध्यान और भान, मन के शव की जागृती, भैरव भव:।
मैं फिर द्वंद्ध में था मैं औघड़ हूं या नहीं...?


- अभिषेक तिवारी


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