मधुबाला का नाम लेते ही आँखों  के सामने एक  खुबसूरत चेहरा आता है और पूरे मन - मस्तिष्क पर छा जाता है | 'जब प्यार किया तो डरना क्या .......' की प्रगल्भ प्रेमिका  दिल में घर कर जाती है तो 'बरसात की रात' की  मदहोश खूबसूरती तन - मन को झकझोर जाती है | 

मधुबाला की  पहली हिट फिल्म  रही " बसंत "| जिसमें इन्होंने एक बाल कलाकार के रूप में अपने अभिनय की छटा बिखेरी थी | इस मूवी में जब ये " हमको  तो प्यारी हमारी गलियाँ हमारी .........." गाते  हुयें हँसती हैं तो दर्शक उस मासूम हँसी के कायल हो जाते हैं बिना यह जाने कि एक दिन यह मासूम हँसी ऎसी दिलकश हँसी में  बदल जायेगी जिसके दीवाने उनके समकालीन दर्शकों के अलावा आने वाली पीढी भी बनी रहेगी |

'आयेगा आयेगा आने वाला आयेगा  ................ कोई  नहीं  चलाता  और तीर चल रहे हैं ...." 1949 में आई फिल्म "महल " की  भोली लेकिन बला की उस खुबसूरत रहस्यमयी बाला को भला कौन भूल सकता है जो " वहम  नहीं हकीकत " थी | अशोक कुमार जैसे मंजे हुए अभिनेता के गंभीर और सधे अभिनय के सामने अपनी पहचान बना लेना आसान बात नहीं | मधुबाला की सहज अभिनय प्रतिभा ने ऐसा कर दिखाया और उनका जादू दर्शकों के सर चढ़ गया | दुसरे शब्दों में कहें तो उन्हों ने भले ही तीर न चलाया हो लेकिन इस फिल्म के बाद कई - कई तीर चले और वे हिन्दी फिल्म के दर्शकों के दिल में जा बैठीं | 

बॉलीवुड की "मर्लिन मुनरो " कही जाने वाली मधुबाला का जन्म 14 फरवरी 1933 में दिल्ली में हुआ था |मुमताज़ के नाम से उन्हों ने कई फिल्मों में बाल कलाकार का रोल किया | उस समय की बॉलीवुड क्वीन देविका रानी उनके अभिनय की सहजता से काफी प्रभावित हुईं और उनहोंने उनका नाम 'मधुबाला ' रख दिया | जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है - शहद की बेल -- वे सचमुच हिंदी सिनेमा के लिए ऎसी ही साबित हुईं | अपनी पहली बड़ी फिल्म "महल " से ही उन्हों ने हिन्दी सिने - प्रेमियों का दिल जीत लिया और खूबसूरती की हकीकत लोगों को कभी 'वहम ' तो कभी 'हकीकत ' लगने लगी |

इस बड़ी सफलता के बाद मधुबाला को कई फ़िल्में मिलीं |पर , दुलारी ,दौलत ,अपराधी ,नाजनीन , खजाना ,बादल सहित कुल 23 फिल्मों के बाद उनके अभिनय की गंभीरता को रेखांकित करती फिल्म आई "अमर " | जिसमें दिलीप कुमार और निम्मी के साथ उन्हों ने अपने अभिनय की छाप दर्शकों के दिल पर गहरी छोडी | निम्मी की अंगड़ाईयों और भोली अदाओं से शुरू हुई यह फिल्म कब मधुबाला के सादगी भरे सौन्दर्य और अभिनय की गंभीरता की फिल्म बन गई यह अहसास फिल्म देखते हुए नहीं होता | हाँ , फिल्म के बाद दर्शकों के दिलो - दिमाग पर एक सुन्दर गंभीर चेहरा छा जाता है जिसका असर दिलीप कुमार के शानदार अभिनय से अलग लम्बे समय  तक जेहन में बना रहता है | मधुबाला की यह बड़ी कामयाबी थी हिन्दी सिने जगत में | हाँ , फिल्म "अमर " की कहानी में आये कुछ मोड़ और सीन आज फिल्म देखते हुए जरुर चुभ जाते हैं |  प्रेम - त्रिकोण पर बनी इस फिल्म में प्रेम में आकंठ डूबी निम्मी का चरित्र कभी मधुबाला के आधुनिक ,उच्च शिक्षा प्राप्त  चरित्र पर हावी तो नहीं हो पाया लेकिन फिल्म में बार - बार पुरुष के प्रति समर्पण उसके चरणों में झुककर करने का सीन - जो निम्मी और मधुबाला - दोनों पर फिल्माया गया है - फिल्म का सर्वाधिक कमजोर पक्ष है  यह आज के परिपेक्ष्य में |  1951 के दशक की स्त्री - चेतना इससे आगे बढ़ भी नहीं पाई थी | खैर , वह समय की मांग थी | हाँ ,अगर इन दो - चार सीन्स को एडिट कर दिया जाए तो बेशक फिल्म अच्छी है और फिल्म से भी अधिक दिलकश है मधुबाला - यह फिल्म देखकर ही जाना जा सकता है | 

इस फिल्म की सफलता के बाद मधुबाला की जो उल्लेखनीय फिल्म आई वह थी 1955 में गुरुदत्त की "मि.&मिसेज 55" |"ठंढी हवा काली घटा आ ही गई झूम के ......" गाते - गाते स्त्री - मुक्ति के व्याख्यानों के साथ स्त्री - पुरुष संबंधों की  पड़ताल करती फिल्म | जैसा कि गुरुदत्त की खासियत है वे अपनी फिल्मों में हिरोईन के चरित्र की मजबूती के साथ - साथ उसकी खूबसूरती को भी बेमिसाल तरीके से उभारते हैं ; इसमें भी मधुबाला का अभिनय और उनकी खूबसूरती - दोनों ही ऐसे उभरकर आई है कि वह दर्शकों के दिलो -दिमाग को झनझना जाती है | और दर्शक अकेले में अनायास  ही " तुम्हें दो - चार दिनों तक रोटी नहीं मिलती ? तो -तो तुम उसकी जगह बिस्किट खा लिया करो " वाले डायलौग को  याद कर मुस्कुरा उठाता है और एक बार फिर से उस पर छा जाता है एक सहज ,भोले अभिनय का सौन्दर्य | अपनी फिल्मांकन की खासियत के साथ - साथ गुरुदत्त ने इस फिल्म की कहानी का ताना - बाना भी इतनी खूबसूरती से बुना है कि अपनी बात पूरी कह देने के बाद भी एक या दो सीन के अलावा अपने से दर्शकों को भिन्न नहीं होने देते | यह वह समय था जब भारत में हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का विल पास हुआ था | जाहिर है जिस सदिच्छा से क़ानून बना उसका स्वरूप भविष्य में बिगड़ना भी था | जिसका बड़ा सुन्दर चित्र इस फिल्म के द्वारा किया गया है | भारतीय समाज सदा से जोड़ने का हामी रहा है ;उसमें अगर क़ानून विलगाव का आता है तो  उस पर हमला होना स्वाभाविक ही था  मधुबाला के चरित्र में इस बात की कशमकश रुपहले परदे पर बड़ी बारीकी से उभरकर आई है | और , नि:संदेह यह मधुबाला की सहज अभिनय प्रतिभा का जादू था जो वे गुरुदत्त जैसे यथार्थवादी फिल्मकार की कल्पना और उनके द्वारा चुनी गई कहानी के पात्र को सफलतापूर्वक परदे पर सजीव कर सकीं| 

इसके बाद एक के बाद एक कई हिट फ़िल्में आईं मधुबाला की | भारत भूषण के साथ  आई फिल्म " बरसात  की  रात " में मधुबाला को शायराना अंदाज में फिल्माया गया | इस फिल्म में प्रेम का संयोग पक्ष जितना मादक था विरह भी उतना ही दर्दीला और नाटकीय चित्रित किया गया |मुहम्मद रफी की मादक आवाज में खोई यह फिल्म दर्शकों के लिए सच में " नहीं भूलेगी वह बरसात की रात " ही साबित हुई | 1960 में आई इस फिल्म ने अपने गीत - संगीत और नायिका के विद्रोही तेवर वाले कथानक के कारण दर्शकों के दिल में एक ख़ास जगह बना ली | हाँ , इसके पहले 1958 में मधुबाला की एक और उल्लेखनीय फिल्म आई - "चलती का नाम गाडी "|जिसमें किशोर कुमार के चुलबुले अभिनय के साथ '5 रुपय्या 12 आने ' की  जगह  अपनी  अंगडाईयों  और  सौन्दर्य की दुहाई देती मधुबाला दर्शकों को खूब भाई | यों तो मधुबाला के हिस्से में और भी कई  हिट्स दर्ज हुए जैसे - 'यहूदी की लड़की  ' , हावड़ा ब्रीज ' ,'इंसान जाग उठा ' , 'झुमरू ', ' हाफ टिकट ' 'शराबी 'आदि | लेकिन जिस एक फिल्म ने मधुबाला को मधुबाला से अलग  एक हसीं किरदार के रूप में पहचाने जाने को दर्शकों को मजबूर किया ,वह थी के.आसिफ साहब की "मुग़ल ए आजम "|

फिल्म "मुग़ल ए आजम " की 'अनारकली' अब तक के जीये गए सभी किरदारों से अलग थी | इस एक ही फिल्म में 'अनारकली ' के चरित्र के कई शेड्स थे - एक संगतराश की कल्पना को साकार करने के लिए बुत बनी अनारकली ; हिन्दुस्तान की मल्लिका और सलीम की माँ जोधाबाई के लिए 'मोहे पनघट पर नन्दलाल छेड़ गयो रे ......' गाकर नृत्य की अद्भुत छटा बिखेरती अनारकली ; अपने प्रेमी सलीम के साथ अभिसार की रात सुध - बुध खोई अनारकली ; बादशाह अकबर से डरकर सलीम की बांहों में छुपती अनारकली तो वहीँ भरे दरबार में बादशाह की आँखों में आँखें डाल अब तक का सबसे बेहतरीन प्रेम गीत गाती अनारकली -- हर शेड ,हर सीन में अपने ही किये पहले सीन को मात देती मधुबाला - जितना खुबसूरत सौन्दर्य उतना ही डूबाने वाला अभिनय | मुगल ए आजम पर के आसिफ ने काम करना शुरू किया था 1944 में ही ; लेकिन यह रिलीज हो सकी 1960 में | यानी कुल 16 वर्ष लगे फिल्म को दर्शकों तक पहुँचने में | कहते हैं , इस फिल्म के एक - एक सीन के लिए काफी मेहनत की थी डायरेक्टर और सभी कलाकारों ने | फिल्म जब बन ही रही थी तभी मधुबाला की तबियत भी खराब हो गई थी | उन्हें मोटी - मोटी जंजीरों में जकड कर काम करने में काफी तकलीफ होती थी | लेकिन , के आसिफ जैसे निर्देशक ने उस बीमारी की हालत में भी उनसे ऐसा काम लिया जो हिन्दी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर बन गया | फिल्म जब रिलीज हुई तो यह सिनेमा हॉल्स से 15 वर्षों के बाद ही उतरी - 'शोले' रिलीज होने के बाद |इस फिल्म ने सफलता के वे कीर्तिमान स्थापित किये जो उस समय तक हिन्दी सिनेमा के इतिहास में कोई फिल्म नहीं कर पाई थी |

ऐसा सुनने में आता है कि मधुबाला का व्यक्तिगत जीवन कभी सुखी नहीं रहा |  यह विडंबना ही है कि व्यक्तिगत जीवन के दुखों की प्रतिक्रया किसी भी कलाकार की कला को ऊँचाई दे जाती है |मधुबाला की आखिरी फिल्म थी राज ऋषि की ' शराबी ' | जो 1964 में  देवानंद के साथ आई |हलांकि 'तुम हो हसीं कहाँ के  ' के जवाब में ' हम चाँद आसमां के ' - कहते हुए मधुबाला के सौन्दर्य पर बीमारी का साया कहीं से नहीं नजर आता | लेकिन ,हकीकत यह थी कि फेफड़े की बीमारी उन्हें दिन ब दिन कमजोर और अन्दर से खोखला बनाती जा रही थी | एक दिलचस्प किस्सा  इनकी बीमारी और फिल्मों के बारे में कहीं पढ़ा था कि हॉलीवुड में काम करने का एक ऑफर मधुबाला को मिला | लेकिन उनके अब्बा हुजुर ने यह कह कर डायरेक्टर को मना कर दिया था कि वे एक ख़ास कुंए का ही पानी पीती हैं ताकि उनका स्वास्थ्य और खूबसूरती दोनों ही बरकरार रहे |लेकिन , बिमारी पर यह जादुई पानी भी लम्बे समय तक असर नहीं कर सका | वे 9 वर्षों तक लगातार बेड पर रहीं | बीच - बीच में जब भी उनका स्वास्थ कुछ इम्प्रूव करता वे फिल्मों के लिए काम करतीं | अपने अंतिम दिनों में थोड़ा स्वस्थ अनुभव करने पर इन्हों ने राज कपूर के साथ फिल्म 'चालाक ' की शूटिंग शुरू की | लेकिन यह फिल्म उनकी अस्वस्थता के कारण पूरी न हो सकी और मात्र 36 वर्ष की छोटी आयु में 23 फरवरी 1969 को वे हिंदी सिने जगत को हमेशा के लिए  छोड़ गईं |

वस्तुत: मधुबाला सौन्दर्य और अभिनय प्रतिभा का मिलाजुला एक ऎसी ख्वाब भरी सच्चाई थी जैसा बॉलीवुड आज तक न पा सका |इनपर जितना भी लिखा जाए कम ही होगा | 

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