मैं एक कोरा कागज़ ले कर बैठी थी,अखबार में पिता के प्रथम पुण्यस्मरण पर श्रद्धांजलि छपवानी थी पर शब्द नहीं मिल रहे थे। उनके जीवन को दो चार शब्दों में अभिव्यक्त करने की कोशिश में न जाने कितने प्रसंग चलचित्र की तरह दिमाग मे घूम जाते और बार बार आँखें नम हो जाती थीं।

कितना अजीब चलन है।बेटियों और माता पिता में कितना भी प्यार क्यों न हो रीति रिवाज़ की लक्ष्मण रेखाएँ बेटियों को परायी होने का एहसास दिलाती रहती हैं।

मैं नम आँखों से लॉन में पापा के लगाए पेड़ पौधों को देख रही थी।मुझे बिना ओढ़नी के अजीब लग रहा था ये संस्कारों की देन थी या कोई पूर्वाभास ,मैं अंदर से ओढ़नी पहन आई।

लौटी तो गेट पर पिता के अभिन्न मित्र खड़े थे। बेहद भावुक हो उठी मैं।आँखों मे आँसू छलक आए।

उनकी आवाज़ सुन पति देव भी कंप्यूटर बन्द कर बाहर आ गए। मौसम अच्छा था सो हम बाहर कुर्सियां लगा कर बैठ गए।दिल खोल कर बातें कीं।

शाम की धूप बादलों के रंगबिरंगे पैराशूट ले क्षितिज पर उतर रही थी । तभी कुछ बच्चों की सुगबुगाहट सुनाई दी मैं ने लॉन में लगे आम के पेड़ की ओर नज़र घुमाई और देखते ही देखते एक पत्थर पेड़ की डालियों से उलझने के बाद मेरे सिर पर आ गिरा।

खून तो नहीं निकला पर घुमड़ निकल आया था सो नाश्ते के बर्तन रख कर मैं आइसपैक उठा लाई।

यह पेड़ पापा ने मेरे आंगन में लगाया था पर पेड़ एक तरफ झुक गया।आम उस तरफ ही लटकते हैं उस पड़ोस वाले मकान में जो मेरा मायका भी है जहां मेरा भाई रहता है।दोनों घरों के बीच ऊंचे ऊंचे पेड़ों ने पर्देदारी की हुई है।

काका मुझे देख कर हंसते हुए बोले -

"हर आदमी अपने बच्चों के लिए पेड़ की तरह होता है।जब बच्चों को डाँटता है उनके हर मर्ज का इलाज बनता फिरता है तो पिता नीम का पेड़ होता है।बच्चों को कड़वा लगता है।

जब पिता पैसा कमा लेता है प्रोपेर्टी बना लेता है तो आम का पेड़ बन जाता है क्योंकि आम भी देता है पत्थर भी खाता है।

जब वो बड़ा सा कुनबा सम्भालता है बच्चों से जुड़ा रहता है,अपनी छत्र छाया में बिठा कर सारे कुनबे को सुकून और आशीर्वाद देता है तो बरगद बन जाता है।"

मैं काका की सोच पर चकित थी।वे जाते जाते हंसे और अपने खास अंदाज में कह गए-

"तेरा पापा भी अपने लगाए इस आम के पेड़ की तरह था।फल दूसरों के हिस्से और पत्थर तेरे हिस्से।"काका की इस बात पर हम दोनों बच्चों की तरह हंस पड़े।

काका तो जैसे पापा की प्रेरणा से ही आए थे।उनके मज़ाक ने मुझे श्रद्धांजलि के लिए शब्द दे दिए।अब मुझे समझ आ रहा था कि वटवृक्ष की छाया में रहने के बाद अब जब मैं छाया विहीन हुई तो कैसे बेचैनी महसूस कर रही हूँ।

अब कागज़ कोरा नहीं था।थोड़ी ही देर में मैंने उसपर श्रद्धांजलि के लिए सुंदर से विचार लिख कर भाई को पहुँचा दिए।

अगले दिन हवन के समय हम सब शांत चित्त बैठे थे।पंडित जी कहते जा रहे थे अब आप सब आँखें बंद कर बाबूजी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें। उन्हें अपने मोह से मुक्त करें ताकि वे ईश्वर की शरण मे शांति पा सकें।बार बार के जीवन मरण से मुक्ति पा सकें।मैं बन्द आंखों से अविरल बहते आंसुओं से बेपरवाह बच्चों की तरह ज़िद पर अड़ी थी । मुझे पापा की मुक्ति की बात नामंज़ूर सी थी । मैं मन ही मन पापा से सम्वाद कर रही थी,गुहार लगा रही थी । पापा आप मेरे जीवन में फिर से आ जाओ ,मैं आप के बगैर बेहद दुखी और सन्तप्त हूँ।प्लीज़ पापा .....

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