10वी की रिया और नौंवी में पढ़ने वाला विनय पड़ोसी तो थे ही साथ ही गहरे दोस्त भी बन गए थे। वो दोनों रोज़ शाम दोनों के घरों के छत के बीच की बनी छोटी दीवार पर घंटों बिताया करते।

“रिया, तेरे साथ हुआ है कभी?”

“क्या”

“बचपन वाला सेक्स?”

“क्या बकवास कर रहा है? ये गंदी बात होती है, हमे ऐसी बातें नही करनी चाहिये।”

‘अरे, सारे लड़के तो पता नहीं क्या क्या बात करते हैं! तुझसे कुछ कहो तो बस चिढ़ जाती है।”

“हम छोटे हैं, इन विषयों पर बात करने की उम्र नही है हमारी और वैसे भी मुझे इस तरह की बातें बिल्कुल पसंद नहीं।”रिया ने चिढ़ते हए जवाब दिया।

“तो क्यों दोस्त बनी फिरती है। नहीं, वैसे हम बेस्ट फ्रंड्स हैं, वैसे तुझसे कोई बात नहीं कर सकते।”

“ अच्छा बोल, पर मुझे कुछ बुरा लगा ना मैं सच बोल रही हूं पीट दूँगी तुझे।”

“हाँ, मैं तो तुझसे ही तो गंदी बात करने आया हूँ, पागल। यार बस दोस्त जैसे बात कर रहा हूँ, तू होगी ज्यादा समझदार पर यार मेरे हिसाब से न दोस्ती में सब कहा सुना जा सकता है।”,विनय ने जानबुझकर रिया को छेड़ा।

“ अच्छा अब डायलॉग मत मार, बोल क्या बोल रहा था। और हाँ सबके साथ नही होता”

“रहने दे सबके साथ होता है “ विनय ने अपने शब्दों पर और ज़ोर देते हुए कहा

“पागल है तू ये सब गलत है, आमिर वाला शो नही देखा बेड टच”?

“टीवी में तो कुछ भी दिखाते हैं, असल जिंदगी में बहुत सारी चीज़ें होती रहती हैं।”

“जी नही, ये असल मे बिल्कुल नही होता मेरे साथ तो कभी नही हुआ।”

“हे हे। बेटा सबकी बताने की हिम्मत नही होती।”

“क्या हेहे, कह तो रहीं हुँ, नहीं हुआ। तू मान या मत मान मुझे फर्क नहीं पड़ता”

“ चल तेरे साथ नही हुआ होगा बाकी होता है सबके साथ।”

“मतलब तेरे साथ? ये गलत है तुझे अपने मम्मी पापा से बात करनी चाहिए।” रिया ने अपना स्यानापन दिखाते हुए कहा।

“सबको पता होता है कि सबके साथ होता है, नहीं तो बचपन से अब तक मुझे आकाश भैया के पास सोने देते? और कह देने से भी कुछ नही होगा सारे भाई बहनो में मज़ाक बनेगा सिर्फ, तू बेस्ट फ्रेंड है तो बता दिया और पता है मुझे तू किसी को बोलेगी भी नहीं।”

विनय के संयुक्त परिवार में घर का सबसे बड़ा लड़का आकाश था। कोई भी आसानी से उसका विरोध नहीं करता था। वह विनय को बहुत छोटी उम्र से ही साथ ही सुलाता था। किसी को नहीं पता था कि स्नेह के पर्दे के पीछे गलत इरादे भी हो सकते हैं।

पर रिया को कहाँ समझना था वो तो अड़ गए थी इस सब को रोकने के लिए। बहुत देर तक बहस हुई, रिया ने जितनी भी बड़ी बड़ी बातें सुनी थी सब सुना विनय से गुस्सा हो गई।

”रिया हम बच्चे समाज के समुद्र में तले में पड़े रेत के कण के बराबर हैं, इतना अथाह पानी का वजन है हम पर, चाह कर भी अपनी जगह से हिल भी नही सकते। मान जा तुझे मेरी कसम, जैसा चल रहा है चलने दे।”

विनय ने बहस के अंत मे ये कहा और फिर दोनों चुपचाप वहीं कुछ और देर बैठे रहे। थोड़ी ही देर में साँझ की ठंडक ने दोनों के दिमाग शान्त कर इस लायक बना दिये कि वह एक दूसरे की बातों को सोख सकें।

अगले दिन स्कूल, होमवर्क का पूरा चक्कर लगा वही शाम को छत की दीवार पर पहुंच गए दोनों। दोनों को जो खुशी मिलती थी एक दूसरे को छत पर पाकर, कभी तो लगता जैसे बाकी का पुरा दिन इसी समय के इंतज़ार में बिता देते हैं। जब वो जो कुछ भी कहेगा, वो सुनेगी और रिया जो कुछ भी कहेगी वो सुनेगा। भले ही समझदारी की, काम की एक बात न हो पर बातें थी असंख्य।

“ ओये होये, क्या बात। आज तो लड़को को देखे मैंने तेरे लिए गाना गाते हुए।”

“क्या कब, कुछ भी।”

“जी नही, जब स्कूल से लौट रही थी मैं किनारे की ठेल से आलू खरीद रहा था।”

“हाँ तो इसमें को सी बड़ी बात है, लड़के तो होते ही छिछोरे हैं।”

“पता नहीं है तू कितनी अक्खड़ है। तुझे लड़की समझ रहे हैं वो हा हा हा”

“हो गया, बोल लिया, और कुछ बाकी हो तो बोल ले। अपने लिए तो बोला जाता नहीं।”

“क्या, तुझे कुछ बताओ तो वो बात गाना हो गयी, रोज गायेगी उसे। मैं तो सोच कर आया था हल्के से बात शुरू करूँगा,पूछूँगा की कोई दिक्कत तो नहीं। मुझे लगता है लड़की होना बहुत मुश्किल है, अजनबी भी कुछ भी बोल देते हैं, सड़क पर सबके सामने। बुरा तो लगता होगा ना?”

“किस किस का बुरा मानें? छत्तीस मिलते हैं, इग्नोर करना बेस्ट है।

बस शुरू शुरू में डर लगता था।” अंतिम वाक्य कहते हुए रिया थोड़ी सहम सी गयी।

उसे याद आने लगा कि किस तरह उसकी ट्यूशन की लड़कियों ने एक आदमी के बारे में बताया था। जो अक्सर उसकी सारी सखियों को उसी रास्ते पर मिल रहा था। वह कल रिया को भी दिखा, मंदबुद्धि सा एक आदमी पैंट की ज़िप खोले खड़ा था।

वह बुरी तरह डर गयी थी, जिस दहशत को पिछले कुछ दिनों से वो सुन रही थी, वह महसूस भी की थी आज।

विनय को उसकी डरी सी आँखे और चुप्पी देख लगा कुछ तो गलत है।

“देख कभी भी कोई बात हो न तो तू मुझे बता सकती है। चाहे तो मुझे साथ ले जाना।”

“ओये, डेढ़ पसली। तू क्या किसी से लड़ेगा।”

“देख यार, पीट लूँगा यह वादा तो नहीं है पर तेरे लिए पिट लूँगा, कुछ भी करके तुझे बचा कर भाग दूँगा, चाहे जो हो जाये।”

यूँ तो भरे पूरे परिवार थे दोनों के पर सबसे अलग मिला यह वक्त उनकी अभिव्यक्ति को अलग जगह देता था। दोनों खुलकर अपनी कमजोरियों को झूठी बहादुरी और झूठी प्रशंसा में लपेट कर परोसा करते थे।

दोनों को ही लगता था कि दुनिया से सीधे सामना करने लायक वो कभी बनेंगे ही नहीं। उनके होने न होने से दुनिया को कोई फर्क नही पड़ता, इसलिए वो खुद दुनिया से बचना चाहते थे और एक दूसरे को बचाना भी।

इसी जुगाड़ में देर साँझ ट्यूशन से अकेली लौटती रिया को रास्ते से ही विनय मिल जाता, कभी सब्जी खरीदने, कभी कुछ सामान लाने कभी घूमते फिरते। अक्सर

धीरे धीरे उनके साथ का समय बढ़ने लगा। अब वह रात का खाना खा कर भी छत पर पहुँच जाया करते। और छत पर ही इतनी देर करने की कोशिश होती कि आकाश भाई आएं और सो जाएं।

पर ड्रामा कितने दिन चलता, आकाश भाई उसे सोने के लिए आवाज़ दे कर बुलाने लगे। वह एक दो बार टालता भी पर पिट जाने के डर से जाना पड़ता।

वहीं कम नम्बर आने की वजह से घर वालों ने विनय का ट्यूशन पड़ोस में ही लगवा दिया गया। 6 बजे विनय का ट्यूशन खत्म होता, वह सर के उठते ही साइकिल ले भागता। पर रिया कभी घर मे घुसते दिखती, कभी गली के मोड़ तक आ चुकी होती।

वह कोशिश भी करता,बहाने भी बनाता किसी तरह जल्दी से जल्दी ट्यूशन खत्म हो जाये, कई बार सज़ा भी मिली, पर अगर रिया का साथ उस डरावने रास्ते पर दे पाता तो उसके आगे हर सज़ा कम महसूस होती थी।

पर फिर भी कुछ था जो अब दोनों को अंदर से खाली करता जा रहा था। दोनों शाम को मिलते, चुपचाप बैठते और जल्दी ही जाने लगे।

कल तो रिया ने हाय तक भी नहीं किया, बस 5,10 मीनट बैठी और चली गई।

विनय ने ठान लिया कि वो रिया को अकेले ट्यूशन से नहीं आने देगा। पर वह जानता था कि किसी भी तरह रिया को पता चला कि ट्यूशन उसकी वजह से छोड़ा तो वह बहुत लड़ेगी, हंगामा करेगी। इसलिए चुपचाप ही कुछ करना होगा। वह यही सोचते सोचते आकाश के सोने के बाद भी देर रात तक जागता रहा।

अगली सुबह ही देखा तो रिया अपने घर की छत पर सूट सलवार में चहक रही थी। वह बाहर आया तो आंखों से प्रश्नात्मक इशारा भी किया। रिया उड़ती, लहलहाती सी बस हँसी भी पर कोई जवाब नहीं दिया। रिया के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। अजीब सा मुहँ बिचका कर अपने घर मे नीचे चली गई।

विनय भी बिना सोचे जैसे उसके पीछे गया हो,” नमस्ते आंटी जी।”

“ अरे विनय सुबह सुबह। स्कूल नही जाना क्या आज?”

“हाँ जाना है आंटी, टेस्ट है तो एकदो सवाल समझने थे रिया से।”

“रिया, रिया, चल जल्दी से बता दे इसको, फिर जल्दी निकलना है। गुरु जी का समय 10 बजे का है।”

रिया बहुत नखरे में आकर वहां बैठ गयी, “ बोल क्या है, किताब, कॉपी लाया नही।”

विनय ने दबे स्वर में बोल, “ओहो, सूट!”

“बकवास न कर। आज गुरु जी के पास जा रहे हैं। माँ कहती हैं गुरु जी सब जानते हैं, बिना कहे भी वो सारी परेशानियों के हल निकाल सकते हैं। फिर तो हम दोनों की भी…”

“मुझे कोई परेशानी नहीं है...।”बीच मे ही विनय ने टोका।

“हाँ तो मुझसे कौनसा है हुँह। गुरु जी देखते ही सब कुछ समझ जाते हैं। अब सब वो संभाल लेंगे मुझे क्या चिंता।”

“चल ठीक है फिर, स्कूल जाना है। वैसे लड़की बनके अच्छी लगेगी तू।”, चलते चलते विनय ने फिर छेड़ा।

“बकवास न कर।”दोनों हँसते हुए अलग अलग चले गए।

विनय स्कूल से लौटा तो दूर से ही छत पर रिया नज़र आई। उसका चेहरा देख कब वह आँगन में ही साइकिल पटक, बिना बैग उतारे छत पर पहुंच गया उसे खुद पता नहीं चला।

वो हाँफता हुआ छत पर पहुँचा तो पहला सवाल रिया ने किया, “क्या हुआ तुझे? घबराया हुआ क्यों है?”

“मुझे क्या होगा। तो बता अकेली धूप में छत पर, क्या चल रहा है दिमाग मे?”

“आज गुरु जी के पास गए थे न, वहां भी वो आदमी था। गुरु जी का खास। कुछ नहीं जानते, समझते गुरु जी, वो किसी की क्या संभालेंगे।” कहते कहते रिया की आवाज़ डगमगा गयी।

विनय को खुद पर लगी चोट जैसा दर्द हुआ पर वो क्या कर सकता है उसे समझ नहीं आया। “तू अपने भैया को बोल के देख।”

“बोल दिया सब। उन्होंने घर मे ड्रामा कर दिया है, माँ पापा को कभी भी गुरु जी के पास न जाने का बोल दिया है।”

“हाँ तो पागल खुश हो ना”

“वो मुझे आश्रम में नहीं रास्ते मे रोज मिलता है। और आश्रम से उसे मेरी डिटेल्स भी मिल गयी होंगी। मुझे दिखा कर एंट्री वाले गेट से उसने कुछ नोट किया था।”

“अब?”

विनय को महसूस हुआ कि अभी लगी चोट का दर्द कम होते ही किसी ने उसे फिर ज़ोर से दबा दिया हो। वह कुछ करने के लिए छटपटा रहा था।

वहीं रिया आगे बोलती गयी,” अभी देखा उसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आयी हुई है एफबी पर, अदर बॉक्स में मैसेज हैं।”

“देख अब बात ज्यादा हो गयी है अब तुझे बचना ही होगा, इग्नोर करने से काम नहीं चलेगा। लड़के तो कुत्ते होते हैं,तू खुद को बचा कैसे भी।”विनय ने रिया को चेताते हुए कहा।

उसी शाम से ही कुछ दिन तक रिया का भाई उसे ट्यूशन छोड़ने गया भी, फिर बात पुरानी हो गयी और कभी कभी कुछ काम निकल आता। इधर विनय ने ट्यूशन में ड्रामा कर कर के खुद को ट्यूशन से निकलवा लिया।

आज रिया ट्यूशन से वापस अकेली लौट रही थी कि वही आदमी मोटर साईकिल पर बैठा उसकी तरफ बढ़ रहा था। रिया घबरा गई, जैसे ही मोटर साइकिल बिल्कुल करीब आयी रिया ने आंखे बंद कर लीं। उसकी अपनी साइकिल उसके हाथों से छूट गयी, वह सड़क पर गिर गयी।

मोटर साइकिल वाला जो थोड़ा आगे निकल गया था,वह वापस आया और रिया को उठाने के बहाने यहाँ वहाँ छूने लगा

तभी वहाँ विनय पहुँचा, उसने अपने पूरे दम से उस आदमी को जोरदार धक्का दिया। रिया जो रोने को ही थी विनय को देख थोड़ी संभल गई।

वो आदमी विनय को बच्चा समझ उसे आँखों से ही डराने की कोशिश कर ही रह था कि संयोगवश रिया के भाई भी वहाँ पहुंच गए।

रिया विनय को खड़े देखा तो पूछने लगे कि क्या हुआ, रिया बताती इतने में उस आदमी ने थोड़ी दूर खड़ी विनय की साइकिल में फिर टक्कर मारी और भाग गया।

रिया के भाई ने यह देख लिया था, उन्होंने दोनों साइकिल को पास की दुकान पर सही होने और विनय और रिया को अपने साथ मोटरसाइकिल पर घर चलने को कहा।

एक साथ तीनो का बैठ पाना थोड़ा मुश्किल था, भाई ने दोनो को कहा कि दोनों तरफ पैर करके बैठे। तभी वह मोटरसाइकिल वाला फिर सामने से आता दिखा। अभी भाई के पीछे रिया बैठी ही थी कि मोटरसाइकिल वाला आदमी बहुत पास से कट मारते हुए झटके से मुड़ा, इतने में पीछे से आती बस के ड्राइवर का संतुलन मोटरसाइकिल वाले को बचाने में बिगड़ गया।

बस सड़क से उतर एक पेड़ से जा टकराई।

विनय भाग कर बस में चढ़ा, सोचा मदद के लिए भाई आएंगे पर वह तो जबरदस्ती रिया को भी ले चले गए। लोग तमाशा देख रहे थे। छोटे छोटे बच्चे लहूलुहान जो गए थे।

बस के दूसरी तरफ बाहर देखा तो बस के पिछले पहिये की चपेट में आ वो आदमी और उसकी बाइक भी पड़ी थी।

उसने आसपास भीड़ में देखा तो कई लोग घायल बच्चों का, बस का, सड़क पर पड़े आदमी का यहाँ तक कि विनय का भी वीडियो बना रहे थे।

उसने कुछ बच्चों को उठाया उतने में घायलों में से ही एक और खड़ा हो कर उसके पास आ गया।

विनय ने पूछा,”भाई बाइक पर बच्चे को पकड़ बैठ सकोगे?”

“मुझे बचा लो पहले, मुझे अस्पताल पहुँचा दो।”

“लानत है, बच्चे को पकड़ोगे तो अस्पताल तुम भी तो पहुंचोगे ना।”

विनय ने किसी तरह पास के अस्पताल पहुँच सारी घटना की जानकारी दी।

जितनी एम्बुलेंस थी वो घटना स्थल के लिए रवाना हुई बाकी कुछ घायल को विनय मोटरसाइकिल पर ही लेकर पहुँचा। उनमे से एक वो आदमी भी था।

अगले दिन वो वीडियो सभी न्यूज़ चैनलों पर थे, विनय को बाल पुरुस्कार मिलने की घोषणा हो चुकी थी।

गली, घर, आसपास के समाज मे लोग उसे पहचानने लगे, उसकी तारीफ करने लगे।

विनय को अब भी लगता था कि उसने वही किया जो वहाँ उपस्थित सभी को करना चाहिए था।

शाम को छत पर रिया ने भी खूब तारीफ की और कहा देखा, “समुद्र की रेत ने तो मछलियों की जान बचा ली।”

विनय रिया का इशारा समझ गया। वो दोनों रात तक छत पर बैठे रहे, पर तभी विनय भाई की आवाज़ आयी।

विनय नीचे गया ।

ताऊ के बड़े बेटे से किसी तरह कांपते हाथो को छुपाता वह एक बार फिर बोला,” भाई, अब मैं नही आ पाता, मेर गद्दा अलग कर दो, या एक चारपाई और ले आओ।” फिर भी न सुनते और उसकी बात का असर होते न देख उसने सबके सुनने लायक आवाज़ में कहा,” आप तय कर लो कैसे मानना है, मेरी, थाने या बाहर के किसी की।”

विनय को खुद के निकले शब्दों पर यकीन करना मुश्किल हो रहा था।

वह पीटने को खुद को तैयार कर ही रह था कि भाई बरामदे में उसके लिए एक अलग गद्दा पटक गए।

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