मेट्रो ट्रैवलर।

आज वो एक नीली (नहीं नहीं थोड़ा आसमानी सा रंग था वो) शर्ट पहने मेट्रो में नज़र आये, मटमैले से रंग की पैंट, आँखों पे ऐनक, सीधे  हाथ  में कुछ किताबे और कंधे पे एक बैग जो अपनी क्षमता से अधिक भरा हुआ लग रहा था| हर थोड़ी देर पे उत्सुक आँखों से अपने चारो तरफ देखते फिर निराश होकर सामने खिड़की से शहर के नज़ारे देखने लगते, शायद बैठने के लिए सीट की  तलाश में यूँ बार बार इधर उधर देख रहे थे|
जैसे ही किसी स्टेशन पे मेट्रो रूकती तो उतरने वाले यात्री उन्हें अपने साथ गेट तक ले जाते और अंदर आने वाली भीड़ उन्हें वापस उसी जगह ला खड़ा देती (पर थोड़ा अवयवस्थित सा) और वो खिन्न होकर कुछ बुदबुदाते फिर अपने बैग को ठीक से अपने कंधे पे चढ़ाते और किताबों को ज़रा और ज़ोर से पकड़ लेते , कभी कभी जब रेल (मेट्रो) स्पीड पकड़ती तो डगमगाते कदमो को संभालने की कोशिश करते हुए साथ खड़े सहयात्री के कंधो का सहारा ले लेते और एक दिखावटी फीकी मुस्कान से  धन्यवाद कर देते या शायद तक्कल्लुफ़ के लिए मुआफी मांग लेते थे | 
और फिर शम्मी नारंग और रिनी खन्ना की  चिर परिचित आवाज़ में उनके स्टेशन आने की घोषणा हुई वो और दरवाजे  की तरफ बढने  ज़द्दो-ज़हद करने लगे, दरवाज़ों के खुलते ही उनके उतरने की कोशिश से भी पहले उन्होंने खुद को प्लेटफॉर्म पे पाया ,हाँ बस ऐनक आँखों से थोड़ी ऊपर माथे तक पहुँच गयी थी, शर्ट ज़रा ढीली लग रही थी, बाल कुछ बिखर गए थे (वैसे तो ये चलन है आजकल) हाँ किसी तरह किताबों को सही सलामत सीने से चिपकाए हुए ले आये थे......

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