श्वेता की भरपूर लात पेट पर पड़ते ही सुगन्धा की नींद टूटी,उसने धीरे से लात कोअपने पेट से जुदा कियाऔर करवट बदल ली। दूसरी बगल से चिपटी स्मिता भी कुनमुनाई, उसने सुगन्धा की पकड़ को और भी मजबूत किया,साथ ही डाल दी अपनी नन्ही बाँह उसके गले में। अब उसका सर सुगन्धा के वक्षस्थल से रगड रहा था।

उसका मन भर आया, दो माह पहले मृत्यू के भयानक जबड़े ने उसकी बड़ी दीदी चेतना को दबोच लिया था। निर्दयी को मासूम बच्चों पर भी किंचित दया न आई.....उसने पसीज कर एक हाथ से श्वेता को सहलाया और स्मिता को चूम लिया।संवेदना से उसकी आँखे डबडबा गई।

तभी माँ की खाट चरमराई, सुगन्धा ने चादर की झिर्री से झाँका, वे चादर बदल रही थी शायद मुन्ने ने बिस्तर गीला कर दियाथा। पिताजी थोड़ा उचके और खरखराते हुये बोले-" इस बुढ़ापे में तुम्हें यह भी देखना बदा था,कस्तूरी ! " सुगन्धा ने हवा में घुलती एकगहरी सास महसूस की।

"राम जाने और क्या-क्या भुगतना होगा.....।"

पलकभर को वे रुकी, फिर मुन्ने को ढकती हुई बोली-

"मुझे तो आपके गिरते स्वास्थ्य की अधिक चिन्ता खा रही है।" निराशा से टूटी, दुश्चिंताओं से खिन्नयुक्त माँ की शिथिल वाणी सुगन्धा के अन्दर तक अवसाद सा घोल गई। पिताजी अपनी ही धुन में बोले-" सोच रहा हूँ -

पेन्शन में कैसे चलेगा ....विशु ने भी खत का कोई जबाब नही दिया।"कराहट भरी भुरभुरी पिता श्री की आवाज गर्म उसांसो में दब गई।न जाने क्यों सुगन्धा को अनायास ही 'सैलडाऊन'होने पर ट्रांजिस्टर की उखडी-उखडी, मोटी-पतली ध्वनियों का ध्यान हो आया। वह काँपी.....पिताजी का भरभराता स्वर अजानी दुराशाओ में खींच ले गया।उसकी दृष्टि में घूम गया दोपहर को आया पोस्ट-कार्ड जो अब दोहरा -चोहरा,मुड़ा-तुड़ाउसकी ब्लाउज में खुंसा पड़ा था।यंत्र वत उसने ब्लाउज को टटोला,खड़खड़ का स्वर उसे सांत्वना दे गया। शब्दों की शहतीर पर पिता के झोझरेपन को टिकाकर भैया की नाकारता का रहस्य उसके सीने में अभी भी सुरक्षित था।

छल के अहसास ने कटाक्ष किया-- "सत्य को कहाँतक झुठलाओगी,सुगन्धा ! " निरूत्तर सुगन्धा ने पैर सिकौड़े,पीठ से चिपटी श्वेता को टटोला , उसे तख्त की चौड़ाई कम लगने लगी।अपने दाॅये-बाॅय किसकी बच्चियो को कुछ और अपने से जोड़ा,उनके गिरने की सद्भावना से वह गड़बड़ा गई।उसने सोचा सुबह होते ही वह तख्त को दीवार से सटा देगी, कम से कम एक छोर तो सुरक्षित हो जायेगा। सहसा उसे हँसी आई अपने सुरक्षा विकल्प परतत्क्षण ही वह सोच में डूब गई।भैया की चिट्ठी छिपाकर पिता की टूट का विकल्प भी तो इतना ही पंगु है। वह खिन्न हुई,इस विकल्प को वह कितने दिन सहज सकेगी वह। उसकी विचारमग्नता भंग हुई ,माँ कह रही थी-

"सुगन्धा का विवाह भी तो करीब आ रहा है......। " सरसराती हवा का झोंका उसे गुदगुदा गया, बन्द पलकों में मुस्कुराने लगा अनूप का आकर्षक बिम्ब...

.गोरा-चट्टा, लम्बा-छरहरा, हँसता हसाता,सजीला-सजीला, वह अपने आप में शरमा गई।

"हुँ.....ऊँ...!" चिन्ता से लिपटी हूँ..ऊँ की खैंच ने उसे फिर अपने तख्त के कठोर तल पर पटक दिया।

" आखिर .... सुगन्धा के विवाह की इतनी जल्दी क्या पड़़ी थी ,आपको! " मन ही मन सुगन्धा ने माँ की हाँ में हाँ मिलाई-सचमुच इतनी जल्दी भी क्या आन पड़ी थी पिताजी को। चेतना दीदी और सुनन्दा दी तो विवाह से पहले ही एम.ए. कर चुकी थी और वो तो अभी बी.ए. में ही पढ़ रही है ।

"तुम तो जानती हो, कस्तूरी ! रूपया हवा लगते ही हवा में उड़ने लगता है । मैने इसीलिए प्रोविडेंट-फण्ड को अभीतक नही छुया।..अगर छीज गया तो मरते दम तक भी बेटी को डोली में न बिठा सकूँगा।"पिता जी की बात को बल देती सी माँ दीर्घ नि:श्वास के साथ बोली-" सो तो ठीक है..... विशू इन्हीं रूपयों के न देने पर मुँह बना गया था....और....।" न जाने क्या सोचकर उन्होंने आगे की बात अधूरी ही छोड़ दी,जिसे सुगन्धा के मन ने पूरी की-छोटे जीजाजी भी पखवाड़े पहले इसी बात पर जी खटा गए थे, पिता जी की साफ "न" का असंतोष भी उनसे पचा न था पर पिताजी किंचित भी न डिगे ,उन्होंने स्पष्टकहदिया, 'प्रमोद भैया ! तुम्हारी जरूरत तो बैंकभी पूरी कर देगा ,.......बात केवल ब्याज भरने भर की है...मेरी सुगन्धा के ब्याह के केवल दो माह बचे हैं ......मैं ऐसा-वैसा कोई रिस्क नही लेना चाहता । भगवान न करें वक्त पर तुमसे रकम न जुडी़ तो ........ ।"पिता जी इस ,"

तो " पर ऐसे चिपके कि जीजाजी की हजार दलीलें भी उन्हें उससे तुडा़ न सकी।

" अनूप। अच्छा लड़का है..... ।" माँ ने सहजभाव से कहा।

"हाँ....आँ....हाँ।" पिताजी भी सोच से उबरते से पुलके।

माता-पिता की पुलक से वह भीजी, उसकी आँखों में उभर आये वे मादक क्षण जब अनूप-परिवार देखनी के साथ ही अंगूठी की रस्म पूरी कर गया था ।उनके जाने के बाद ही चेतना दीदी ने उमंगकर उसको कौली में भरकर न जाने कितनी बार चूमा था। लहककर सुगन्धा अगल-बगल सोई श्वेता-स्मिता को जकड़कर दीदी के चुम्बनों को प्रत्युत्तर देने लगी।

सुगन्धा के बाद इन तीन बच्चों को मैं कैसे संभालूगी ? माँ के थके स्वर ने सुगन्धा की पुलक को झटका।"

"सो तो है......,पर.....।असमर्थ भरी "पर "

ने माँ की जुबान पर ताला डाल दिया।उन्हें चुप देखकर

वे ही बोले," जमाता के घर से भी बच्चों की बुलाहट नही आई " आवाज फिर चिन्ता से खरखराई ।

"अरे, वे अब नही बुलायेगें.......जमाता जी के दूसरे ब्याह का सन्देश भले ही आ जाये।" चुभते स्वर में माँ ने अपना पैना अन्दाज उगला। पिता जी सोचते से रह गए ,सुगन्धा ने चोर - दृष्टि से माँ की तरफ झाँका।वे मुन्ने को थपथपा रही थी।कई मूक क्षणों के बाद जमाता के दूसरे विवाह से समझौता करते से वे बोले , "हाँ अभी उम्र ही क्या है अरुण जीकी...वक्त काटनेके लिये साथी तो चाहिए ही....फिर बच्चों को जनानी हो अच्छे से समेट सकती है, सुगन्धा की मां !"मां चुप रही,पिताजी ही रेतीली धरती पर आशा का पौधा जमाते से उमगे , "तुम "आशा रखों....... अरुण अधिक दिन बच्चें छोड़ने वाला नही है ।"

आप ही सहेज रखो अपनी आशा, मुझे तो भरोसा नही है।" मां ने तिक्त विक्य के एक ही झटकेसे

पिताजी के आष का पौधा जड़ से उखाड़ फेंका। पिताजी चुप रह गयें, मां ने नजदीक रखे स्टूल पर रखा टेबिल लैम्प ऑफ किया और लेट गई कमरा धुंधला गया।

मां की तिक्तता को भीतर ढकेल कर पिताजी अतीत को उधेड़ते से बोले --हम फिर बीस साल पीछे लौट आए हैं," कस्तूरी ! " स्वर की उदासी ने सुगन्धा को छुआ ,उसे लगा धुंधलाए कमरे का अन्धेरा सघन हो रहा है।

हाँ.., तब चेतना , सुनन्दा और विशु इन्हीं बच्चों की उम्र के ही होंगे ।" सुगन्धा का नाम उन्होंने छोड़ दिया ।वह अनमनी सी हँसी, विशु भैया के कई वर्ष बाद अचानक ही वह टपक पडी़ थी वह इस परिवार में। ... स्वयं मां ने आस-पडोस ,सखी -सहेलियों के बीच सलज्जता से कई बार इस बात को स्वीकारा भी था। अतिभारता का बोध हमेशा ही उसे सालता रहा है।वह अपनी अगणना पर आज फिर दुखी हुई . पर उसकी कातर क्षुब्धता अधिक देर तक निमग्न न रह सकी।पिताजी वर्षों पहले के धुंधलाए छवि चित्र को शब्दों का रंग दे रहें थे.... तब तुम्हारें बाल कितने घने ,लम्बे और स्याह चमकदार थे।" स्वर की चहक से मां भी उमगी--"आप क्या ऐसे ही थे.....।

लक्षणा में मां ने पिताजी को दर्पण सा दिखाया। शब्द --मुकर में झाँकते पिताजी हँसकर बोले.."तब मेरा कमर लठ्ठ की तरह मजबूत थी ,और....... अचानक उनका स्वर अतीत के छवि-चित्रोँ में गुम हो गया। शायद मां भी वहीं - कहीं थी । निमिष भर के लिये सुगन्धा भी बचपन के साथ खेलते-खेलते सशक्त पिता की पीठपर बैठकर हवा में नकली चाबुक चलाने लगी। सहसा उसकी एकाग्रता भँग हुई,शायद किसी अपरचित आहट पर गली का देसी - कुत्ता भौंका,चिहुंककर आस-पास के कुत्तों ने भी अपनी "भौ" उसकी भौ-भौ में मिला दी ..... बच्चियों के ख्बाब काँपे, वे सहमकर सुगन्धा से और कस गई।कुछ देर बाद ही कुत्तों का शोर थक गया, वातावरण में

पहले जैसी स्तब्धता छा गई ।

पिताजी का गहरा सोच धीरे- धीरे ऊँचे उठते खर्राटों में घुलने लगा। मां की आशंकित श्वांसे भी हलकी-हलकी सीटियाँ बजा रही थी, उसे लगा,रात की

खामोशी निस्वर नही ।

वह जागने की बात भूलकर सोना चाहती ,पर मन चेतनाकी सतह पर उन्हीं विसंगतियों के बीच खींचता रहा।क्या होगा मातृविहीन इन बच्चों का कल ? ..अति विषादता से अन्तस का क्षोभ उफना,जीवनभर का साथ निबाहने का वचनबद्व पति पत्नी की मृत्यु के साथ ही बन्धन मुक्त हो जाता है, परन्तु अपनी प्रणय परिणितिओं से तो निर्बन्ध नही। फिर मृतक पत्नी के परिवार पर उसकी सन्तान के दायित्व की भारता को लादने का औचित्य ? ऐसे कर्त्तव्यच्युत व्यक्ति के लिये प्रतिकार अथवा प्रताड़ना का कोई सामाजिक विधान नही ?? वह हर पत्नी की मृत्यु के बाद नये सिरे से अपनी कहानी शुरू कर सकता है...... उनकी उपेक्षित, अपूर्ण कृतियों के उपसंहार कीकिसी को कोई चिन्ता नही...... उनका कोई वैधानिक प्रश्रय नही। उसका तनाव बढ़ रहा था पुरुष की इस अविराम स्वच्छंदता की कोई प्रतिरोध -रेखा तक किसलिये नही खींची गई।

आन्तरिक भावावेश से उसकी सम्पूर्ण देह जल उठी, उसनें तप कर चादर को अपने ऊपर से सरकाया ।पलकभर बाद ही सुगंधा की चादर से उघड़ी देह पर ढेर सारे मच्छरों ने एक साथ झपट्टा मारा, जैसे पहरों से भूखे वे इसी टोह मे खलबला रहे थे,उसने घबराकर अपनेआपको ढका और बच्चियों को भी उसी में समेट लिया।बच्चियों के स्पर्श से मन की ममता फिर पिघलने लगी।वह शायद सोच रही थी मातृविहीन निराश्रित जीवन को आश्रय देना संसार में सबसे कठिन है, प्यार की आवयश्कता उनको जितनी अधिक होती है उससे अधिक उनके लिए प्यार की बाधाएं जटिल हैं.

काश ! वह उनके लिये कुछ कर पाती। अब वह स्वयं को माप रही थी,यदि वह सदा के लिये यहींं रह जाए ....विवाह के बाद भी ....चाह की असम्भावना पर वह खीजी ,मन समाज की असंगति पर खौला,.. कन्या ही विदा होकर, क्यों दूसरों के घर जाए...वर को ही वधु के घर रहना चाहिए, वधु के घरवाले ही तो मर-खपकर उसकी कीमत चुकाते हैं। सोच टूटा , मुन्ना जोर से चीखा था,उसे याद आया, उसी की तरह मच्छरों ने मुन्ने पर भी धावा बोला होगा, उसने चादर को तनिक सा हटाकर देखा,मां ने लेटे-लेटे ही लैम्प जलाया।बच्चे को ओढ़ना ठीक किया और उसे सहलाने लगी। मुन्ना बराबर हाथ-पैर पटक रहा था, उन्होंने हारकर पिताजी की खाट का पाया टकोरते हुए कहा- " जरा संभालना ..... शायद भूखा है.....उठो न ....पकड़ो ....बड़ा बिलख रहा है .....मैं इसका दूध बना लाती हूँ।

पिताजी के उठने में दो-चार सैकिण्डलगे,मां भी कमर थामे धीरे-धीरे उठी,मुन्ने का स्वर बढ़ता गया।तब तेजी से लपककर पिताजी ने उसे गोद में उठाया और हिला-हिलाकर तेज-तेज आवाज करने लगे।श्वेता -स्मिता भी उठकर बैठ गई सुगन्धा ने हँसकर देख मुन्ना उनकी गोद में हाथ-पैर पटक रहा था ,उससे रहा नही गया, उसने उठकर पिता से मुन्ने को ले लिया और खड़ी-खड़ी धीरे-धीरे सहलाकर सुलाने लगी।

गिरती उठती लयबद्ध हथेलियों की थपक के साथ ,गूंजती चूडियों की खनक में मुन्ना रोना भूलगया।

पिताजी चारपाई पर बैठकर सुगन्धा को अपलक निहारते हुए सोचने लगे- नारी में मातृत्व का ये गुण जन्मजात है, इसके लिये कन्या को किसी दीक्षा की अपेक्षा नही ।

अपनी ओर पिता को एकटक देखते हुए सुगन्धा न जाने क्यों शरमा सी गई।श्वेता ने स्मिता को मुंह बनाए देखकर पूछा- " नाली पर चलोगी " ?

स्मिता ने हाँ में गरदन हिलाई। मोरी तक पहुंचते-पह़ुचते ही स्मिता ने कच्छी गीली करदी,श्वेता वहीं से ताली पीट-पीटकर -"शेम -शेम करती चीखी,स्मिता रुआंसी खड़ी थी। मुन्ने को मां को देकर सुगन्धा ने उसकी कच्छी बदली,पैर धुलाये और पौंछकर तख्त पर लिटा दिया। कुछ देरकी व्यस्तता ने सुगन्धा को काफी हलका कर दिया था,वह श्वेता को जगह देती स्वयं भी लेट गई।

मुन्ने के मुंह से शीशी लगाकर मां ने उसकी कमर को सहलाया और बैठी-ऊँघने लगी। पिताजी न लेटते हुए कहा- "सो जाओ ,कस्तूरी ! अभी तो रात्रि का डेढ़ ही बजा है.....।

आँ...हाँ...आँ ....।।"मां ने बरबस आँखे खोलते हुए हुँकारा भरा और आहिस्ता से मुन्ने की बगल में फैल गई।

" सुनो ! बिजली बुझा दो .......बडे मच्छर आरहे हैं।" पिताजी ने मुंह पर चादर ढकते हुए कहा।

"हाँ इस साल कुछ ज्यादा ही हैं।" वे उनींदे स्वर मे बोली और दाँये हाथ को लेटे-लेटेही आगे बढाकर लैम्प ऑफ किया।

विशु का मनिआर्डर आगया तो मुन्ने के लिये एक जाली खरीद लाऊँगा। " वे बोले

"अब सो भी जाओ...... ।" मां ने अनमने स्वर में बात काटी। पिता की बात से सुगन्धा फिर छिली ,उसके हाथ पुन: अपने ब्लाउज पर चले गए जहाँ पिता की आशाओं का तुषारापाती - पत्र रखा हुआ दोपहर से ही उसके मन-मस्तिष्क पर गरम-गरम पिघला काँचभर रहा था। वह कसमसाई,उसे महसूस हुआ उसकी देह पर हजारों काँटें उग आए हैं।यथार्थ से कहीं अधिक कातर कल्पना के कष्टों को वह घंटों से सह रही थी।

कमरा फिर धुंधला गया . मां, पिताजी के संयुक्त खरार्टे कमरें की निस्तब्धता को पूर्ववत: ही तोड़ने लगे। बुढ़ापे की नींद पक्षियों की नींद जैसी होती है,पल भर में खुर्राटे और दूसरे पल ऐसे बोलने लगे ,मानों सोये ही नही थे । सुगन्धा सोचने लगी - "काश ! वह भी उनकी तरह पलक झपक पाती..... कुछ देर को तो कातर- वेदना से मोक्ष मिलता । रात की स्याही के संग-संग उसके मन का सोच भी गहरा होता चला गया।

पन्द्रह पैसे के पोस्टकार्ड की खूंटी पर अपनी असमर्थता को लटका कर भैया सभी दायित्व से कन्धा छुडा़ गए।सुनन्दा दीदी परवशता का राग अलाप कर अपने में रम गई। वह भी पराई होकर पिता की संचित पूंजी डकार कर पिता के द्वारसे खूंटा छुड़ा जायेगी.... कौन बनेगा बूढ़े पिता की लाठी......? झुकती कमर के दुर्बल कन्धे कहाँ तक इस कच्ची-पक्की गृहस्थी के साथ चल पायेंगे ...... ??

नही! नही !! ... उसकी आत्मा झनझनाई । नियति के भरोसे अनिश्चन्ता के बीच इन सबको छोड़कर वह कहीँ नहीं जायेगी......... उसे ही कुछ करना होगा । वह निर्णयात्मक भाव से मन ही मन बुदबुदाई । कु छ करने के संकल्प ने उसके सोच को बदला। अब वह स्थिर -बुद्धि से अपने परिवार की टूट का विकल्प एक अन्वेषक की भाँति खोज रही थी।

अनायास ही उसे विचार आया, चेतना दीदी की रिक्त-पूर्ति इन सभी विषमताओं को पी सकती है।

अँधेरी दृष्टि में जुगनूं सा चमका वह प्रकाश में नहा गई। उसने व्यक्तिगत चाहों को परे धकेला ,मन- मुकुर से अनूप के बिम्ब को खरौचा और उस पर अरुण जी का अक्स उतारने लगी ।

रात की स्याही के तल पर भोर का तारा उगा, उदासियों की उमस घटने लगी और घुलने लगी उसकी आँखों की अनिन्द्रता में मीठी तन्द्रा। अब चिर -वियोगनि मां की ममत्व-गन्ध से सुवासित हो रही थी स्मिता, श्वेता के बीच निश्चिन्त सोई सुगन्धा ●

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