हर तरफ़ घना पटा है
दुख,फ़रेब का कोहरा

इसको कब,कैसे हटाऊँ
इससे निजात कैसे पाऊँ

जिस घर में माँ का ठौर नहीं
पिता का मान सम्मान नहीं

जहाँ निर्भया काण्ड हो
बहुयें अग्नि की भेंट चढ़ें

संस्कार विहीन समाज हो
जड़ों को ख़ुद ही काट रहे

अपने अपनों को डस रहे
रिश्ते भी देखो पस्त रहे

धर्म से अपने भटक रहे
नशे की लत में खटक रहे

देश को अपने बाँट रहे
काले धन से पाट रहे

कोहरे सा मंज़र मुझको
पल-पल में साल रहा

जो बीत गया सो बीत गया
यह वर्ष नया अति सुन्दर है

प्रभु इसमें जुगत करो कोई
ऐसे कोहरे को छँटने दो

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