निम्मो की ननद आई हुई थी। माँ बेटी दोनों बैठ कर दिन भर तेरी मेरी में लगी रहतीं।निम्मो काम के बोझ से ज़्यादा इन दोनों के तानों से परेशान थी।उधर दिन भर दामाद गिरी करवाने वाले ननदोई की उपस्थिति ही उसे असहज कर देती थी।

पति सबकुछ जानते हुए भी अनदेखा कर रहा था।निम्मो को जवाब न देना पड़े इस लिए घर से गायब रहता।

निम्मो की शादी को डेढ़ साल हुआ था।गाँव के स्कूल में पति की नौकरी थी। निम्मो जब से शादी हो कर आई उसे हर उस घर मे भेज दिया जाता जहाँ किसी काम करने वाली की ज़रूरत हो।कभी पति के पास कभी मौसी सास के घर कभी ननद के घर। उसकी औकात बाई से ज़्यादा न थी।

ननद और सास भरपेट खा लेतीं, बची हुई अच्छी सब्ज़ी उठाकर फ्रिज में रख देतीं ताकि निम्मो रूखा सूखा कुछ खा ले।

निम्मो का दड़बे नुमा कमरा नीचे था ।मकान एक व्यस्त बाज़ार में था।मुख्य द्वार हरदम बन्द रहता था। मकान के पूरे निचले तले में मुख्य द्वार से बस एक गली दिखती थी ।पहले दुकान ,फिर गोदाम एक बाथरूम और अंत मे उसका कमरा।

निम्मो को अपने कमरे में आए दो मिनट भी नहीं हुए थे उसे लगा किसी ने दरवाज़ा धकेला है। निम्मो को अपने कमरे के शोकेस के कांच में ननदोई की छवि दिखी जो खिड़की से झांकने की कोशिश कर रहा था । वह चुप रही तभी वह सनलग्न बाथरूम में घुस गया जब निम्मो निश्चिंत हो गई तो उसने अपने कमरे का दरवाजा खोला अपने हाथ की नारियल तेल की बोतल से तेल कमरे और बाथरूम के बीच फैला ही रही थी कि वह बाहर निकल आया।

निम्मो कमरे में वापस भागी तभी वो फिसल कर गिरा बाथरूम की चौखट पर उसका सिर टकरा गया ।कुछ पल रुक कर निम्मो वापस आई ।पतली सी गली में उसे सरकाकर लांघती हुई वापस ऊपर भागी।हाथों में खून लगा था।रसोई के बेसिन में हाथ धोकर उसने ड्राइंग रूम में झाँक कर देखा सास और ननद कूलर के सामने ज़मीन पर खर्राटे मार रही थीं।

निम्मो की धड़कने बड़ी हुई थीं ।रसोई में जाकर एकबार फिर हाथ धोए कपड़ों को अच्छे से देखा कहीं खून नहीं था फिर थैली लेकर बाजार से सब्जी लेने निकल पड़ी।

एक काला साया उसके कमरे के सामने अभी भी पड़ा था।बाजार की तेज़ धूप में वो दाएँ बाएँ मुड़ मुड़कर कपड़ों को देख कर उस चरित्र हीन के खून के धब्बों की अनुपस्थिति की तस्सली कर रही थी।

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