नदी किनारे एक दरख्त था | उस पर कई कौए रहते थे | जब भी शेर पानी पीने के लिए नदी में आता कौए अपनी पंखों में चोंच छुपा पत्तों के साए में छुप जाते | लेकिन जब कभी शेरनी पानी पीने के लिए आती वे काँव - काँव का शोर मचाते थे | शेरनी बिना उनकी तरफ देखे चुपचाप पानी पी कर चली जाती | नदी में रहने वाला मगरमच्छ रोज यह देखता था | एक दिन उससे नहीं रहा गया तो उसने शेरनी से पूछा - " तुम्हारी एक दहाड़ ही इन कौओं को चुप कराने के लिए काफी है | फिर भी तुम इनकी काँव - काँव क्यों झेलती हो ?"
शेरनी - " भाई जिसकी जितनी क्षमता रहती वह उतना ही कर सकता है | ये कौए हैं काँव - काँव के अलावा और कुछ नहीं कर सकते | इस जंगल की रानी होने के नाते मेरे पास बहुत सारे अधिक महत्व के काम हैं | मुझे कभी इनकी काँव - काँव सुनाई भी नहीं देती | बल्कि तुम्हारे कहने पर मुझे इन बेचारों पर दया आ रही है कि ये काँव - काँव में ही अपना जीवन व्यर्थ कर रहे हैं | अच्छा चलती हूँ मेरे पास अब समय नहीं है |"
इतना कहकर शेरनी अपने रास्ते चली गई और कौवों के झुण्ड का मुंह लटक गया |

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