पहली नज़र

कॉलेज के पुस्तकालय में रखे हुए कंप्यूटर महोदय को पहली बार चलते हुए देखा । यह एक प्रकार से आश्चर्य की बात थी । क्योंकि इतने सालों में आजतक वो कंप्यूटर कभी बकबक नहीं करता था । आज अचानक दो मुलायम हाथों की वजह से कंप्यूटर के कीबोर्ड पर खट-खट की आवाज पुस्तकालय में पसरे सन्नाटे को चीरती हुई मेरे कर्णपटल पर आकर अवशोषित होकर सम्मानित हो रही थी । बीच-बीच मे वह आवाज एकाध बार रुक भी जाती थी ताकि कंप्यूटर के सामने बैठी मोहतरमा जी अपनी ज़ुल्फें संवार सके और रजिस्टर में कुछ देखकर फिर से सन्नाटे को चीर सके ।

मैंने पहली बार उस चेहरे को इतनी ग़ौर से देखा था । उस चेहरे की सादगी को भुला पाना शायद किसी आशिक़ के बस की बात नहीं हैं

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