बसु आज आईने के सामने खड़ी ही खुद को बड़े गौर से देखती और एक असहनीय पीड़ा उसकी आँखों में उतर जाती है ।

उसका वीभत्स झुलसा हुआ चेहरा बार - बार उसे उस कभी न ख़त्म होने वाली पीड़ा की याद दिलाता है । जिसने उसके जीवन के रुख को मोड़ एक महत्वकांक्षी लड़की को निरीह सी बना दिया।

वसुंधरा जिसे घर वाले व दोस्त प्यार से वसु कहते थे ।

वसु एक स्वछंद हवा के झोंके सी जहाँ से गुजरती अपनी ठंडक देती हुई जाती , ज़मी से आसमान तक उड़ने के उसके खुबाब

पर कहते है न खुबाबो को नज़र बहुत जल्दी लगती है ।

वसु ने फैशन डिजाइनर बनने की ठानी और इस लिए वो मुम्बई जैसे महानगर में आ गई ।

फैशब डिज़ाइनिंगके कोर्स के दौरान उसकी मुलाकात देव से होती है , दोनों की यही दोस्ती धीरे धीरे प्यार में बदल जाती है ।देव

वसु का सीनियर था तो वो एक प्रोजेक्ट को पूरा करने में वसु की हर संभव मदद कर दिया करता था ।

देखने और व्यवहार में एक दम सीधा और हंसमुख , घर से दूर जैसे वसु को कोई बहुत अपना मिल गया । दोनों काफी टाइम एक साथ बिताते , इधर वसु की लगन और उसके काम से खुश हो कर इंस्टीट्यूट के हैड ने डिजाइन ड्रैस करने का कार्य सौंपा वसु इस कार्य के सिलसिले में रूपेश के संपर्क में आती है जो की इस इवेंट का कर्ता धर्ता सब था ।

काम के दौरान वो देव को वख्त नहीं दे पा रही थी

जिस वजह से देव कुछ खिंचा खिंचा सा रहने लाहा था । दोनों की कभी कभार कहा सुनी हो जाती थी , पर वसु हर बार उसको समझ कर मन लेती है । एक दिन अचानक देव वसु के सामने शादी का प्रस्ताव रखता है । जिसको सुन कर वसु कुछ असहज सी हो जाती है और देव को स्क़मझाती है ।

देखो देव मैं तुमको बहुत पसंद करती हूँ पर मैं शादी कर के अभी कैद नहीं होना चाहती मैं बहुत आगे जाना चाहती हूँ ।

सुन कर देव कुछ भड़क सा जाता है , और गुस्से में कुछ अपशब्द भी कह देता है जिनको सुन कर वसु वहां से चली जाती है ।

उधर देव मन ही मन एक फैसला सा कर लेता है । दो दिन बाद अबकी बार वसु को फोन कर अपने किए की माफ़ी मांगता है । और वसु उसकी बातों में आ जाती है । देव वसु को मिलने के लिए कहता है तो वसु अगले दिन रात को डिनर रैस्टोरैंट में साथ करने को कहती है । और अगले दिन ठीक 7.30 पर वसु वाहा पहुँच जाती है जहाँ देव पहले से ही उसका इन्तजार कर रहा होता है वसु को देख वो चिर परिचित सी मुस्कान देता है उसको देख वसु का गुस्सा भी जाने कहा खो जाता है । वो दोनों घंटो बाते करते है और साथ में डिनर भी । वसु देव से कहती है रात काफी हो गई अब चलना चाहिए देव उसको उसके घर तक छोड़ने जाता है । जैसे ही वो लोग घर पहुँचते है वसु गाडी से उतर देव को अलविदा कहने के लिए झुकती है और जोर से चींख पड़ती है कोई जलती हुई चीज़ उसको अपने चेहरे पर महसूस होती है और वो बुरी तरह से तड़पने लगती है । देव वहाँ से रफूचक्कर हो चूका होता है । वसु की आवाज़ सुन आस पास भीड़ इकठ्ठी हो जाती है और वसु बेहोश ।

अचानक वसु वापस दर्पण की तरफ देखती है और बुदबुदाती है क्यों देव क्या गलती थी मेरी बस यही न की मैं खुले आकाश में उड़ना चाहती थी , जीना चाहती थी क्या आज भी औरत को अपनी जिंदगी जीने के अधिकार नहीं क्यों आदमी अपने अहम् में इतना क्रूर इतना हैवान बन जाता है ।

पर मैं हार नहीं मानुगी तुम जैसे शैतानो को जड़ से खत्म करुँगी ।

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