सूरज मद्धिम सा
आसमान कोरा है
किरने सजा रही रूप घनेरा है
लाली रंग पंख लिए
मेहंदी का पहरा है


रिश्तो पर बर्फ उगी
प्यार के ओले गिरे
खुशबुओं का सेहरा है
धरती को पंख लगे
गगन भी उकेरा है

रूप की नई परिभाषा
प्यार का चेहरा है
भाव हुए अपाहिज तन का ही मोहरा है
बियाबान गलियां है आसमान बहरा है


जात पात हुए मुखर हैं
बादलों ने चाँद ओढ़ा है
मनचली हवाओं का रास्ता ही बसेरा है

शीत अब आ गया
लिए बरसात का चेहरा है
गरीब अलाव ताप रहे
छप्पर बहुतेरा है
मौसम सा जादूगर भी
बेवक्त घनेरा है।

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