दिल्ली जैसे शहर में जमने के लिए शुरुआत में किसी न किसी की मदद की जरूरत ही होती है। रागिनी मेरी बचपन की दोस्त है। मेरी पहली नौकरी दिल्ली में लगी है, जब इसकी सूचना रागिनी को दी, तो वह खुशी से उछल पड़ी। पढ़ाई के लिए हम अलग-अलग शहर चले गए थे। कई सालों बाद दिल्ली ने फिर से हमें एक साथ समय बिताने का मौका दिया है।
रागिनी ने मेरे आने से लेकर रहने तक की पूरी प्लानिंग कर ली थी। हालांकि, मैं थोड़ा हिचक भी रही थी कि कहीं वो मेरी वजह से डिस्टर्ब न हो। मेरे आने की तारीख निश्चित हो गई थी, वो गिन-गिन कर दिन काट रही थी। तभी अचानक रागिनी को ऑफिस के काम से सात दिनों के लिए बाहर जाना पड़ा। उसने टालने की बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं टल पाया, जिसको लेकर वो परेशान भी थी। मैंने उसे समझाया कि अपनी लैंडलेडी को चाबी दे देना। मैं सब ढूढ़ लूंगी, तू परेशान मत हो। काम खत्म कर वापस आ फिर हम मिलते हैं। इसके बाद उसने थोड़ी राहत की सांस ली थी।
आज मैं दिल्ली आ पहुंच गई थी। मेरे कहे मुताबिक रागिनी अपनी अपनी लैंडलेडी को चाबी देकर गईं थी। मैंने रागिनी की लैंडलेडी से चाबी लेकर उसके फ्लैट का ताला खोला। उसके घर में घुसते ही बड़ी खुशा हुई। रागिनी ने अपने कमरे के हर एक कोने को बड़े ही करीने से संवारा था। एक-एक सामान को ऐसा रखा था जैसा इस कमरे को बनाया ही इस समान के हिसाब से गया हो..।
मुझे आए पूरे चार घंटे हो चुके थे। रागिनी ने फोन पर ही सब बता दिया था। बाकी जरूरत के सामान का जायजा अब तक मैं ले चुकी थी। अब जब तक रागिनी नहीं है, तब तक टीवी और किताबों से ही काम चालाना होगा। यही सोच रागिनी की सेल्फ से निकालकर कुछ बुक्स पढ़नी लगी। घड़ी पर नजर डाली तो याद आया रात के 1:30 बजे हैं। सोचा कल भी कोई काम नहीं है पढ़ना ही सो किताब वापस सेल्फ में रखने लगी। तभी मेरी नजर उस डायरी पर गई जो मैंने रागिनी के जन्मदिन पर गिफ्ट की थी। देखकर बड़ी खुशी हुई झट से खींच ली अरे वाह रग्गो अब तक डायरी को सहेज कर रखा है। यूं किसी की डायरी पढ़ना अच्छी बात नहीं होती है, लेकिन मेरी रग्गो (रागिनी को प्यार से मैं बुलाती हूं) डायरी लिखने की नहीं सजाने की आदत थी। इसलिए रग्गो की डायरी के पन्ने पलटने कर देखने लगी। रग्गों ने डायरी को बिल्कुल खुद की तरह ही खूबसूरत बना दिया था। हम दोनों के रंग-बिरंगे फ़ोटो के अलावा फैमिली और कुछ दोस्तों की फ़ोटो कटिंग कर के लगाया था ...।।
मैं डायरी के पन्नों निहारती हुई पलट रही थी। साथ ही उसकी क्रिएटिविटी को देखकर खुश हो रही थी। लास्ट पेज पर ब्लू पेन से पूरा तीन पेज का एक आर्टिकल देख कर बरबस नजरें ठहर गई....
वो नहीं रहा अब मेरे साथ। चार महीने हो गए बांहों में सोए। कराहती हूं रातों को। हाथ ढूढ़ते हैं उसको। उसकी छांव में सोने की आदत जो गई थी, इसलिए नींद ने भी मुझसे रिश्‍ता तोड़ लिया है। याद आती है हररोज, आंसू बहते हैं रात के काले सन्नाटे में और फिर थकी हुई लाल और सूजी आंखे सुबह दिखाई देती हैं, जिन्हें छिपाने के लिए चश्‍मा पहनना पड़ता है। ये कोई सात दिन, सात महीने, सात साल बस किसी की इतनी बुरी आदत लगेगी कि गुलाम बनाकर छोड़ेगी कभी सोचा नहीं था। हम तभी जुड़ गए थे, जब मैंने उस पर भरोसा किया और उसने मेरे भरोसे को थामा था, मुझे थामा था। उससे जुड़ी हर छोटी-छोटी याद को समेटे कोने में बैठी हूं डर है कि कहीं खड़ी हुई तो यादें भी बिखर न जाएं। जीने का सहारा छूट न जाए। हर दिन हर रात उसकी हंसी - ठिठोली। एक और भी चीज थी पता नहीं उसको क्या कहते हैं, जिसमें मैं हर पल महफूज रहती थी, शायद कोई खतरा नहीं था, कुछ भीतर से जुड़ा हुआ था वो घर सा अहसास था उसके साथ। और अचानक से एक दिन पता चला कि सब बिखर गया। जानने पर पता चला कि कभी कुछ था ही नहीं बस जानने में थोड़ी सी देर हो गई। मेरी तरह वो भी किसी को तरस रहा था इस दौरान। उसके लिए मैं कभी आई ही नहीं थी उसकी जिंदगी में!! कभी - कभी उसके बर्ताव से लगता था जैसे मैं उसे कभी दिखी ही नहीं। वो जिसके लिए तरसता था वो पा लिया उसने। जो मैंने चाहा वो सबकुछ किसी और ने पाया मैंने नहीं। प्यार करने वालों के कायदे से मुझे भी खुश होना चाहिए था क्योंकि मैंने पूरी कोशिश की थी, लेकिन अंदर खुशी नहीं सिर्फ और सिर्फ अकेलापन और घुटन है।
उसके दिन रात चहक उठे, जब वो हंसता मुझे अच्छा लगता वजह चाहें जो भी हो। अब उसको मेरी जरूरत नहीं थी, नहीं यह कहना गलत होगा - पहले थी ?? या वहम था मेरा?? दिल में हजारों सवालों का सैलाब आता है। मेरा सब कुछ छिन चुका और उसे जरा सा भी फर्क ना पड़ा ? दुखी होऊं या खुश होऊं समझ नहीं पा रही हूं। लोगों ने प्यार में बलिदान को इतना बड़ा दरजा जो दे रखा है, तो कैसे उससे अपने हक में सवाल करूं। सवाल करूंगी तो स्वार्थी कहलाऊंगी। मान लिया मैंने कि वहम था मेरा। टूटती गई मैं जैसे -जैसे दिन चल पड़े, हर दिन थोड़ा-थोड़ा। उम्मीद थी कि शायद वो बोलेगा, आज नहीं तो कल बोलेगा, मेरे बारे में कुछ सोचेगा क्‍योंकि वो जानता था कि मेरी दुनिया उस तक ही सिमटी हुई है। पर वो नहीं बोला। मैंने समझने की कोशिश की, बातें छेड़ी उससे पूछा, लेकिन जब-जब पूछा खुद को ही कोसा। हर बार पूछने पर कुछ ऐसा जाना कि सुलग जाती थी मैं पर मुंह नहीं खोला। वैसे जब सोचती हूं मैं खुद को उसकी जगह रखकर मैं समझ पाती हूं उसकी चिड़चिड़हाट - जब बरसों तक चाहे प्यार का एहसास साथ में हो और कोई ऐसे परेशान करे तो शायद मैं भी उसकी तरह ही चिढ़ती।
एक रोज उसने मुंह खोला - बताया कि कोई दूसरा होता तो छोड़ के जा चुका होता। बात सही है प्यार करने वालों के कायदों से। जिसने मन मारा, रास्ता दे दिया, वह पूजे गए, गीत-गजलें लिखी गईं। लेकिन जो पूजे गए वो या ये कहो कि हम जैसे मुर्दों को भी कुछ कहने का मन था ये कोई नहीं समझ पाया। क्योंकि उसकी खिलखिलाहट के पीछे मेरी हजारों सिसकियां छिपी हैं, उसके संवरते कल के साथ मेरी शाम का दिया बुझ रहा है। आगे लंबी रात खड़ी है सन्नाटों से भरी। किसको डर नहीं लगता और मैं तो हूं ही डरपोक। कोशिश की इस डर से भागने की। और उठा कर एक बार में ही आठ - दस नींद की गोलियां पानी के साथ गटक ली। लेकिन .... लेकिन क्या हुआ दो दिन बिस्तर पर रही आंखें खोली तो डॉक्‍टर के पास पाया। क्या हुआ और क्यों हुआ ये सब न किसी ने जानने की कोशिश की और न मैंने बताने की। पैरेंट्स ने पूछा तो बस इतना बोल पाई कि शायद दवाई की डेट एक्सपायर हो गयी थी।
जब दिल नहीं माना, जवाब नहीं मिले, एक दिन पूंछ ही लिया कि तुम मुझे लेकर इतने अंधे क्यों हो गए? तुम भी तो गुजरे हो इस दर्द से फिर ऐसे पत्थर दिल क्यों? तब जो जवाब मिला उससे अब तक सहमी हुई हूं। खुद को पैरों तले कुचला और रौंदा सा पाया है, मैंने मान लिया। जहन में एक भी सवाल न रहा अब। तब से अंदर से कुछ आया ही नहीं। वो सच यह था - ‘‘कि मैं गिल्ट फील करता हूं, तुम्हारी वजह से उसकी नजरों में खुद को कभी-कभी लॉयल साबित नहीं कर पाता हूं। तुम्हारी वजहे से मेरा रिश्‍ता भविष्य में कहीं संकट में न आ जाए। उसके अलावा मुझे कोई नजर नहीं आता, उसके लिए मैंने बहुत मेहनत की है।’’ मिल गए मुझे मेरे जवाब। आज इतनी भीड़ में होकर भी खुद को जंगलों के बीच राह में भटके मुसाफिर सा पाती हूं। शायद वो भूल गया कि इतना बड़ा सफर मैं कैसे तय करूंगी अकेले। मेरी दुनिया तो सिर्फ उसके इर्द गिर्द ही थी अब कहां जाऊं मैं? और वो .... वो गलत नहीं है क्योंकि वो तो कभी गलत हो ही नहीं सकता।
डायरी पढ़ने के बाद मैं अब तक निशब्द हूं ... कुछ सोचूं इतना भी दिमाग काम नहीं कर रहा था। बस जल्दी से रागिनी को देख लेना चाहती थी कि वो ठीक तो है.....। रग्गो अपने अंदर इस तूफान को छिपाए कैसे जी रही है और उसने कभी बताया तक नहीं।

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