हिन्दी कविता आज कितनी समकालीन है और अपनी चेतना में किस हद तक प्रतिरोधी, इसके लिए हमें एक तरफ सामाजिक-संस्कृति की समकालीन आबो-हवा में व्यक्ति और समाज के संबंध सूत्रों के सापेक्ष निर्मित हो रहे संकटों की पहचान करनी होगी, वहीं दूसरी तरफ हिन्दी कविता के उन समकालीन इलाकों की शिनाख्त करनी होगी जहां कवियों की चेतना किन स्रोतों की ऊर्जा से अपना आकार-प्रकार निर्मित कर रही है।

अगर हम पहले मुद्दे का आलोचनात्मक आकलन समकालीन परिप्रेक्ष्य में करते हैं तो हमारे सामने सामाजिक संस्कृति के नाम पर बहुआयामी संकट के बहुआयामी दृश्य अनायास ही साक्षात् हो उठते हैं कभी किताबों की दुनिया में कभी उनसे बाहर की दुनिया में। उनकी समाप्ति की जड़ें राजनीति, पूंजी, धर्म और उपभोग की आकांक्षा के विकृत गठजोड़ से जुड़ी हुई हैं। उन्हीं की वजह से वर्ग-वर्ण और संप्रदायगत तनाव, जनसंख्या विस्फोट, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी जैसी समस्याएं तो भयावह महामारी का रूप तो धारण कर ही चुकी है, उनके भीतर से जन्मी हत्या, आत्महत्या, लूट, बलात्कार जैसी अत्यंत जटिल किस्म की खौफनाक समस्याएं भी अपना हाइपर रूप दिखा रही है। इससे इतर वे लोग जो येन-केन-प्रकरेण आर्थिक आत्मनिर्भरता और जीवनगत सुरक्षा के तमाम कवचों से धीरे, मानव विकास सूचकांक की सूची में शामिल हुए हैं, उनका भी न तो मनो जगत सुलझा हुआ है और न ही बाह्य जगत को सुरक्षित समझते हैं। ऐसे राजनीतिज्ञों, पूंजीपतियों, सरकारी/गैर सरकारी नौकरशाहों की सुविधा व दुविधा दोनों किसी न किसी संकट को ही जन्म देती है। इस प्रकार से ‘संकट’ शब्द की व्याख्या मनुष्य के विभिन्न स्वरूपों व स्वभावों के चलते सामाजिक संस्कृति के विभिन्न अवयवों और ऑर्गेनिक स्वरूप के संदर्भों में अंतर्विरोध युक्त जटिल धारणाओं को उत्पन्न करती है।

दूसरा मुद्दा साहित्य से जुड़ा हुआ है। जब हम किसी हिन्दी साहित्य और उसमें भी हिन्दी कविता के समकालीन इलाके में प्रवेश करते हैं तो हमें विद्रोह, क्रूरता, संशयात्मा, बच्चे काम पर जा रहे हैं, गोली दागो पोस्टर, सुनो ब्राह्मण जैसी कविताएं यह साबित करती हैं कि कवियों द्वारा उन वर्जित इलाकों से काव्य वस्तु और रूप को ग्रहण किया और गढ़ा जा रहा है जो सामाजिक संस्कृति के पारंपरिक और समकालीन संकटों से संबंधित है। इससे यह धारणा पुष्ट हो जाती है कि समकालीन कवियों की चेतना सामाजिक संस्कृति के संकटग्रस्त इलाकों से भी अपनी ऊर्जा ग्रहण कर रही है। इसीलिए समकालीन काव्य चेतना सामाजिक गतिरोधों के प्रति प्रतिरोधी चेतना से युक्त है। लेकिन इससे आगे ये प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि काव्य चेतना के समकालीन स्वरूप में निहित इस युक्ति में संकटों की पहचान और मुक्ति से उसका रिश्ता व रुख किस प्रकार का है? इसे समझने पर ही समकालीन कवियों की काव्य चेतना में प्रतिरोधी क्षमता के स्वरूप और स्वभाव का आकलन किया जा सकता है।

इस संदर्भ में नामवर सिंह के आलोचनात्मक विचारों को भी देखा जा सकता है। वे भी सबसे पहले इस बात पर बल देते हैं कि –“जो अपने आसपास का वस्तुगत यथार्थ दिखाई पड़ता है, उसके साथ कवि का क्या रिश्ता है? किस हद तक वो कवि उस यथार्थ का दर्शक है, या केवल साक्षी है, या किस हद तक उसमें दखलंदाजी करता है या करने का हौसला रखता है, या उसमें हस्तक्षेप न कर पाने की विवशता का अनुभव करता है? इसी के साथ यह कि इन सारी परिस्थितियों में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते समय वो खुद अपने आपको कितनी दूर तक उस कसौटी पर रखता है कि मैं ये हूं।” (साहित्य की पहचान, नामवर सिह, पृ.155)

इसके आगे समकालीन कवि और उसकी काव्य चेतना के संदर्भ में उनके विचार ध्यान देने लायक है? उनका कहना है कि सत्तर के दशक के आसपास के धूमिल, रघुवीर सहाय जैसे कवियों की कविताओं में एक विचित्र प्रकार का अहंकार विद्यमान है। यह राजनीतिक और गैर-राजनीतिक कविताओं में सामान्य तौर पर मिलता है, जो जनता और उसकी पक्षधरता से संबद्ध है। परंतु “इधर के दौर की कविताओं में खासकर राजनीतिक भाषापन्न कविताओं में वो अहंकार नहीं है। न जनता के पक्ष से बोलने वाला अहंकार और न जनता को जगाने और चुनौती देने वाला अहंकार, न व्यवस्था को चुनौती देने वाला अहंकार। उनमें एक अद्भुत विनयशीलता है जो अपनी सीमा की पहचान से पैदा हुई है।”(वही, पृ.155) नामवर जी के इस तर्क पर ध्यान देने पर यह बात उभर कर सामने आती है कि आज के कवि के अंदर प्रतिरोधी चेतना क्षीण हुई है और वह अपनी सीमा की पहचान के चलते विनयशील किस्म की अभिव्यक्ति करने लगा है।

एक और आलोचक सुधीश पचौरी जो अपने आप को उत्तर आधुनिक आलोचना के प्रबल पैरोकार मानते हैं। वे तो यहां तक तो जनतंत्र अगर और कुछ नहीं। मुंडियों की गणना है/तो मैं मजे ले रहा हूं/उसी की पीठ पर बैठा हुआ।” यह पूरी कविता अपने अंदर गहरी करुणा से उत्पन्न संतुलित व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति से शुरू होने के बावजूद अपने अंत में मजावादी संस्कृति के आस्वाद का अहसास करा जाती है जहां कवि भारतीय जनतंत्र और बुद्धिजीवी की नाकामी को उजागर करते हुए खुद की अभिव्यक्ति को नाकाम साबित कर बैठता है। इस तरह के उदाहरण हमें समकालीन कविता में ‘ब्लैक स्पॉट” की तरह कहीं-कहीं दिखाई दे जाते हैं।

जहां तक मेरी समझ काम करती है, उस आधार पर मैं यही कहना चाहता हूं कि समकालीन हिन्दी कविता के स्वरूप और स्वभाव का यह एक पहलू मात्र है क्योंकि 1990 के बाद ‘अस्मिता विमर्श’ से जुड़ी कविताओं का स्वर करुण स्थिति के बोध के साथ-साथ आवेग, आक्रोश और आक्रामकता लिए हुए है। इन कविताओं ने अपने अंदर से अधिक बाहरी दुनिया को जवाबदेह बनाया है। इसलिए ये हताशायुक्त विनयशीलता या ‘अंदर से और अंदर की तरफ’ नहीं बल्कि ‘अंदर से बाहर और बाहर’ की प्रक्रिया में रची जा रही हैं। सबसे पहले निलेश रघुवंशी की कविता का अंश देखिए – “कितना आसान है कहना-/जन्म देना सृष्टि का सबसे सुखद कार्य है/लेकिन कितना मुश्किल है जन्म देना/यह पीड़ा, यह कष्ट तुम क्या जानोगे/ वैसे भी अगर लड़का हुए तो जान नहीं पाओगे/कभी भी/और लड़की हुए तो कैसे सहोगे इतना कष्ट!” यह तो रहा कारुणिक स्थिति का मार्मिक बोध। अब आते हैं करुणा का उल्टा क्रोध के संदर्भ पर। इससे जुड़ा कंवल भारती की कविता का यह अंश देखिए –“जो मुक्ति संग्राम लड़ा था तुमने/जारी रहेगा उस समय तक/जब तक की हमारे/मुर्झाये पौधे के हिस्से/का कोई सूरज नहीं उग आता है” यहां कवि का आक्रोश सात्विक क्रोध की बुनियाद पर निर्मित हुआ है।

इस प्रकार अभिव्यक्त हो रहे सामाजिक गतिरोधों के प्रति चेतना सिर्फ अस्मिता विमर्श आधारित कविताओं में ही नहीं बल्कि समग्र समकालीन हिन्दी कविता पर लागू होता है। अरुण कमल जी के ये विचार कि –“कविता मनुष्य की आत्मा का सर्वाधिक प्रतिरोधी टीका है, सर्वाधिक सशक्त टीका है।” और कुंवर नारायण की कविता का यह काव्यात्मक अंश इसका पुख्ता प्रमाण –“कोई दुख/मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं/वही हारा/जो लड़ा नहीं”


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