' आ रहे हो यशवंत? '
" हा भइया, आ रहे है "
ये फोन मुझे रोज आता है ताकि उस कहानी में बस सकूँ जिसका मैं दो साल से हिस्सा हूँ।
ये कहानी किसी भी इतिहास में दर्ज नहीं है और शायद यह कहानी उतना महत्वपूर्ण है भी नहीं लेकिन इस इश्क़ की जो दास्ताँ हैं वो हमेशा दिल में जिंदा रहेगी .... मेरे, आपके और हर उस व्यक्ति के जिसने जीवन में इश्क़ किया है।
एक लड़का था, बीएचयु में।
किसी संकाय का छात्र। मन में उम्मीद और दिमाग में उमंग लेकर वो जीवन के पास आया था।
कद थोड़ा कम है लेकिन जज्बात के ऊंचाइयों ने उसे मिस्टर फ्रेसर्स तक बना दिया। उसका उसके संकाय सदस्यों में अलग ही रौला था।
जवान रिसर्चर को एकटक देखकर सुर्ती मलना, हमेशा अकड़ में चलना क्योंकि CHS की गर्मी थी।
हास्टल के छत पर रोज अकेले बैठे मां पिता से घंटों बात किया करता था वो। आंखों में सपने कभी खुद के नहीं थे लेकिन वह फिर भी उन्हें पूरा करना चाहता था।
दिल का दर्द अधिकतर लौंडो की तरह सामनेघाट के 25 ₹ के गांजा के साथ सीने में दब जाता था।
उसे और कुछ नहीं चाहिए था जीवन में,
सबकुछ था। दिल के दर्द अगर कलम पकड़ ले तो लेखक कौन और साथी कौन ?
वो लड़का धीरे धीरे आगे बढ़ने लगा, जीवन बीतता गया और द्वितीय वर्ष में उसने भाषा में डिप्लोमा कोर्स शुरू किया।
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अब हर दिन का नियम हो गया था।
शाम में आंखें जबतक लाल ना हो जाए तबतक गांजा पीना और क्लास में जाना।
इस समस्या का कोई भी व्यक्ति निराकरण नहीं कर सकता है।
एक दिन पोलिश वाली मैम ने पूछ लिया
' बेटा, जरा इस वाक्य का पोलिश अनुवाद बताओ तो? '
वो अलसाये से फूलों की सेज की तरह उठने लगा, मन में भोले भक्ति की तरंगें माथे पर पसीने के रुप में आने लगी थी। यह सवाल सुनंदा के मामले से ज्यादा पेचीदा समझ आ रहा था,
वहां तो गलत करने के लिए थरुर ा था ..... इहा तो चिलम रुपी महादेव का प्रकोप था।
एक तो काशी में यह समझ नहीं आता है कि
' भोसड़ी के, हम पीना कैसे शुरू किए? ' बस सोमरस का रसोपान करते रहिए।
जैसा कि देश की छात्र रुपी जनता कुछ ना आने पर अपने अग्रज के सामने मुंह झुका लेता है, उसने भी जमीन खोदना ही सही समझा।
तभी पीछे से एक कोमल सा हाथ उसके कमर पर लगा
' सुनो , ‎Czytałem na uniwersytecie बोलते है मैं विश्वविद्यालय में पढ़ता हूँ को '
वो अभी पीछे मुड़ने ही वाला था कि मैम ने देख लिया।
सब खत्म .... यह सवाल ' कटप्पा ' के सवाल जैसा ही है कि क्यों ऐसे प्यार में रोडे आते है।
सबकुछ हो जाने देना चाहिए।
क्लास खत्म हो गई और
गैलरी में आखिर वो दिख गई। सब कुछ मानों धीरे धीरे हो रहा हो।
लड़के धीरे धीरे ही चल रहे थे,
सूर्य की किरणों से बालों के रेशे चमक रहे थे और चेहरे पर वो मुस्कुराहट थी जो मणिकर्णिका को भी खुशहाल बना दे।
नयनों के अक्ष किसी को घायल करने हेतु पर्याप्त थे। होठो के ऊपर वो एक छोटा सा दाग ' जिसे बिना इश्क़ वाले तिल कहते है वो शोभा बढ़ा रही थी।
दंतुरित मुस्कुराहट सुरक्षित रहे, यही वो लड़का सोच रहा था।
समय बीतता गया और सारे लड़के धीरे धीरे कम होते गए लेकिन नयनपरी वहीं खड़ी रही।
इश्क़ के मामलात जल्द ही खुल जाते है, पता चला कि वह लड़की रोज अपने सहेली का इंतजार करती है।
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अब यह रोज का क्रम हो गया था। वह लड़का रोज क्लास खत्म करने के बाद गलियारे में खड़ा हो जाता था, बिल्कुल उस लड़की के बगल में।
गांजे के नशे में धुत , जीवन के बगल में जीवन से दूर।
कभी कोई बात नहीं बस एक दूसरे के पास रहकर महसूस करते थे।
कई दिनों तक यह सिलसिला चलता रहा .... वो देखते है, मुस्कुराते थे और खुश रहते थे।
एक साल बाद जब परीक्षा शुरू हुआ तो लड़के को कुछ नहीं आता था या यू कहें कि वो नशे का गुलाम बन चुका था। लड़की ने उसे पूरा परीक्षा पास कराया, दिन उसे देखने की आस में और रात ताबड़तोड़ गांजे में बीतने लगा।
लड़का बहुत प्यार करता था लेकिन कभी बता नहीं पाया। रोज क्लास खत्म होने के बाद दोनों फैक्लटी से महिला महाविद्यालय की 1.5 किमी की दूरी पैदल तय करने लगे। सबकुछ बढ़िया था बस इजहार नहीं था।
लड़की समय बिताने के लिए बेताब रहती थी लेकिन लड़के ने हर बार गांजे को ज्यादा तवज्जो दिया।
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परीक्षा के आखिरी दिनों में सबको पता था कि अब महामना बहुत कम दिनों तक हमें अपने छत्रछाया में रखेंगे।
लड़के ने तय किया कि वह आखिरी परीक्षा के दिन लड़की को इजहार करेगा।
परीक्षा में दोनों का दो अलग कमरा था । उसने तय किया कि वह परीक्षा खत्म करके उसे जाकर बता देगा दिल की बात।
पूरे परीक्षा बस ध्यान में वो रास्ते थे जिनपर वो चला करते थे। वो भेलपुरी की खट्टी मिठ्ठी यादें। वो युही बिना जाने अंगुलियों का आपस मे उलझना। वो गलती से गले लगाना।
परीक्षा खत्म होते ही वह भाग कर उसके कमरे के बाहर गया और इंतजार करने लगा। घंटी बजी और घंटे बीत गए ..... वो नहीं दिखी।
पता चला कि वो बहुत पहले निकल गई ..... वो अवारा बेबस सड़क पर भागने लगा। वो कहीं नहीं दिखीं।
उसे उम्मीद था कि वह आएगी।
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मैं लंका पहुंच गया। वो लड़का कौन था मैं नहीं बताऊंगा। बस जाते ही पुछ दिया
' अब भी? '
" यशवंत दो साल होने को है, मैं रोज यहां आता हूँ और बस तुम्हें पता है क्यु"
' भइया लेकिन वो नहीं आएगी '
" मैं इंतजार तो कर सकता हूँ न , मैं इस भीड़ में अकेले होकर इंतजार करता हूँ तो लगता है कि वो पीछे से आकर बोलेगी , मैं आ गई"
मैं रोज की तरह सुनकर सिगरेट जलाकर सोचने लगा।
इतने दिन , अभी भी इंतजार।
क्या यही है जिंदगी और यही है प्यार .....

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