गलती मेरी थी, और हमेशा रहेगी

पहली मुलाक़ात

हर रोज़ की तरह एक रूटीन सी दफ्तर वाली दोपहर थी. केबिन में एसी की ठंडी हवा के साथ कुछ ग़ज़लें तैर रही थीं और मैं ऑफिस चेयर पर लगभग लेट कर कॉफ़ी की चुस्कियां लेते अगले वीकेंड एडिशन का स्टोरी प्लान सोच रहा था.

इसी बीच केबिन के टिंटेड ग्लास डोर से देखा एक औरत बाहर सोफे पर बैठी है. सलवार सूट पहने और सर पर सनग्लासेज़ लगाये वो लड़की सरीखी औरत मेरे केबिन में रह-रह कर झाँक रही थी. उसे शायद पता नहीं था की बाहर से अन्दर भले ही न दिखता हो, अन्दर से बाहर सब दिखता है.

कुछ अलग था उसमें. एक पल वो लड़की लगती, अगले पल एक मेच्योर औरत. गेहूँआ रंग, भरा बदन और एक आकर्षक चेहरा. लेकिन चेहरे पर कांफिडेंस और बेचैनी दोनों एक साथ झलक रहे थे. अजीब सा ढीला कुरता और पटियाला सलवार में बिना दुप्पटा लिए वो या तो एक बेहद कॉंफिडेंट औरत थी, या फिर शायद ऐसा दिखने की कोशिश कर रही थी.

सलवार सूट में दुप्पटा न लेना और जींस टी-शर्ट पहन कर स्टोल या दुप्पटा लटकाना वैसे तो बड़ा पोपुलर चलन है, लेकिन समझ से परे है. सलवार कुर्ता पहन कर दुपट्टा हटा देने में शायद औरतें फ्रीडम का एहसास करती हैं और जींस टी शर्ट पर स्टोल डालने में शायद अपनी फेमिनिटी मेन्टेन करती हैं. लेकिन कुल मिला कर ये खिचड़ी हाज़मे से परे है.

खैर, क्यूंकि मीडिया के दफ्तर में फ्रीडम और फेमिनिटी और फेमिनिज्म के झंडे हर तरफ लहराते रहते हैं, कुछ देर बाद मुझे उस औरत के साथ सब नोर्मल लगा. लेकिन उसका मेरे कमरे में तांक-झाँक करना मुझे सही नहीं लग रहा था. काफी अन्नोयिंग था.

अपनी कम्फर्टेबल कुर्सी से उठने का दिल तो नहीं करा लेकिन उठाना ज़रूरी था.

मैंने चार कदम चल अपने केबिन का दरवाज़ा खोला और उसकी नज़रों में नज़रें डाल कर थोड़ी खीज से पूछा, “मैम, क्या आप किसी को ढूंढ रहीं हैं?”

“ओह येस. मुझे सिटी चीफ से मिलना है. मैंने आज ही ज्वाइन करा है. बाहर बताया गया की वो इस कमरे में बैठते हैं,” मेरे केबिन की ओर ऊँगली दिखाते हुए उसने कहा.

मुझे फ़ौरन याद आया की एडिटर साहब ने बताया तो था आज कोई नई ज्वाइनिंग है मेरी टीम में लेकिन दिमाग से एकदम उतर गया. खैर, खुद को सम्हालते हुए मैंने उससे अब थोड़ी सख्ती से पूछा, “तो अन्दर क्यूँ नहीं आयीं आप?” मेरे अंदर का बॉस न जाने क्यूँ जाग गया.

वो फ़ौरन उठ गयी और हैरान हो कर एक हल्की मुस्कान के साथ बोली,“ तो क्या आप सिटी चीफ हैं?....लेकिन आप तो इतने छोटे...आई मीन, काफी कम उम्र के लगते हैं.”

मैं ऐसा कुछ किसी जवान और अट्रैक्टिव औरत से, वो भी मेरी नई-नई सबओर्डीनेट से, सुनने को तैयार न था. उसने मुझे हैरान कर दिया था और मैं न जाने क्यूँ शर्म से लाल-लाल हो गया. और इस बीच उसके चेहरे पर एक हंसी साफ़ दिखने लगी.

और इसके पहले की मैं संभल पाता, वो मेरी ओर हाथ बढ़ा कर बोली, “हेल्लो, मेरा नाम नित्याभा है. तुम, आई मीन, आप माधव होंगे... इस अखबार के सिटी चीफ.” मैंने भी मुस्कुरा कर अपना हाथ बढ़ा दिया लेकिन महसूस करा की हाथ हिल नहीं, खिंच रहा है उसकी तरफ. मैंने फिर उसे अंदर आने का इशारा करते हुए कहा, “अंदर बैठ कर बात करते हैं.”

मेरी टेबल के सामने रखी कुर्सी पर वो बैठ गयी और कमरे की दीवारों और उन पर लगे पोस्टर देखने लगी. इस बीच मैंने म्युज़िक थोड़ा धीमा कर दिया, लेकिन उसने फ़ौरन मुझे टोका, “लेट इट बी. इट साउंड्स गुड.” मैंने उसके इंस्ट्रक्शन फ़ौरन मान लिए और साउंड बढ़ा दी वापस.

मैं जैसे ही बैठा उसने अपने कपड़े ठीक करते हुए बिना मेरी ओर देखे बेफिक्री से बोला, “वैसे माधव मुझे यकीन ही नहीं होता की आप सिटी चीफ हैं. मैं किसी बड़े को एक्स्पेक्ट कर रही थी...” ये कह कर उसने मेरी ओर देखा और सेंटेंस पूरा करते हुए खिलखिला कर बोली, “एट लीस्ट लुक्स के मामले में. बट इट्स ओके..मज़ा आएगा साथ काम कर के.” ये कहते हुए उसने अपनी हथेली से मेरी हथेली थपथपाई और मुझे असहज कर दिया फिर से.

मैं बिजली की रफ़्तार से अंदर ही अंदर सोचे जा रहा था की क्या चीज़ है ये औरत. इसे कोई लिहाज़ है ही नहीं...सीनियर से कैसे बात करते हैं और प्रोफेशनल ग्रेस क्या होती है, कुछ पता ही नहीं...कुछ भी बोले जा रही है और ऑलमोस्ट मुझसे खेल रही है. ऐसे कैसे काम हो पायेगा?

लेकिन मैं यंग ज़रूर था, इम्मेच्योर नहीं था. कोई तो वजह रही होगी जो कॉलेज ख़त्म होने से पहले ही मुझे फुलटाइम नौकरी दी गयी और साल भर के अंदर सिटी चीफ बना दिया गया. मेरे अंडर 5 रिपोर्टर थे और सभी लड़कियां और नित्याभा नई मेम्बर थी. उम्र में सभी बड़ी थीं मुझसे और सबसे छोटी भी मेरे से 2 साल बड़ी थी. शुरू में सबको कष्ट हुआ, लेकिन बाद में सब रेस्पेक्ट करने लगे और एक टीम के तौर पर बेहतरीन काम होने लगा.

लेकिन नित्यभा कुछ अलग थी. इसलिए मुझे भी कुछ अलग करना पड़ा. वैसा करना अच्छा नहीं लगता था लेकिन कभी-कभी याद दिलाना ज़रूरी होता है की बॉस कौन है.

“मेरे साथ काम करोगी तो समझ जाओगी की मैं कितना यंग हूँ और क्यों मुझे सिटी चीफ बनाया गया है. अब अगर कम्फ़र्टेबल हो गयी हों आप तो कल के एडिशन के लिए कोई स्टोरी आईडिया बताइए, और अगर नहीं हैं आईडिया तो जाइये अगले तीस मिनट में वापस आइये और तब बताइए. ध्यान रहे, अखबार की दुनिया में डेडलाइन बेहद इम्पोर्टेन्ट होती हैं,” मैंने पूरी सख्ती और रूखेपन से कहा और असर दिख भी गया. नित्याभा के चेहरे का रंग बदल गया था. वो एक्स्पेक्ट नहीं कर रही थी ऐसा कुछ.

“श्योर माधव. मैं ३० मिनट में बताती हूँ,” कह कर वो उठ कड़ी हुई बाहर जाने को और तभी मैंने कहा, “एक चीज़ और...हम सब जर्नलिस्ट हैं...और जर्नलिस्ट किसी के बारे में ऐसे अज़म्प्शन नहीं बनाते और न चीज़ों को अपने हिसाब से इन्टरप्रेट करते हैं. जर्नलिस्ट सिर्फ खबरें रिपोर्ट करते हैं.”

मेरी ओर देख कर नित्याभा होंठ दबा कर मुस्कुराई और गर्दन हिला कर बोली, “आई गोट योर पॉइंट, सर.”

मेसेज पास ऑन हो गया था.

लेकिन मैंने फ़ौरन कहा, “ सर कहने की ज़रुरत नहीं है. मुझे यहाँ सभी या तो माधव बोलते हैं, या माधव जी. दोनों में से जो ठीक लगे बोल लीजियेगा.”

“ओके माधव,” कह कर वो केबिन से निकल गयी.

हालाँकि उसकी टोन में इस बार फिर शरारत थी, लेकिन मैंने फ़ौरन एक चैन की सांस ली और लगा मानो कोई जंग जीत ली हो.

कम उम्र में नौकरी शुरू करना और अपने से उम्र में बड़े लोगों की टीम को हैंडल करना शुरू में मुश्किल होता है, लेकिन धीरे-धीरे मैनेज करने के तरीके आप सीख जाते हैं.

खैर, बीस मिनट बाद मेरे एक्सटेंशन पर उसका फ़ोन आया. बोली, “माधव, व्हाट इज़ योर मेल आई डी? स्टोरी आईडिया भेजना है.” मुझे ताज्जुब हुआ ये सोच कर की अगर ये मेरा एक्सटेंशन किसी से पूछ सकती है तो मेरी मेल आईडी क्यों नहीं पूछ पायी. लगा सिर्फ बात करने के लिए कॉल करी हो उसने. मैंने इग्नोर करा और बताई अपनी मेल आई डी, लेकिन ठीक उसके बाद बोली, “अपना सेल नंबर प्लीज़ बताइए. ज़रुरत पड़ सकती है मुझे.” मैंने सोचा ठीक ही कह रही है, ज़रुरत पड़ सकती है फील्ड पर इसलिए दे दिया.

लेकिन वो इस पर नहीं रुकी. फ़ौरन बोली, “आपकी टेबल पर दो फोन देखे थे. दूसरा नम्बर भी दे दीजिये.”

मुझे समझ ही नहीं आ रहा था की क्या हो रहा है ये. नौकरी के पहले ही दिन कोई इतना लाउड कैसे हो सकता है? मैंने झल्ला कर कहा, “वो मेरा पर्सनल नम्बर है. ये वाला काफी है और फिर मेरा लैंडलाइन भी है आपके पास.”

“ओके ओके...रिलैक्स माधव...और हाँ..आप मुझे आप मत बोलिए...नित्या बोल सकते हैं,” उसने मुझे समझाते हुए कहा. मैंने बिना कुछ कहे फोन रख दिया और चपरासी के लिए घंटी बजा दी. मुझे कॉफ़ी या चाय जैसा कुछ चाहिए था.

ऑफिस लाइफ

उसकी पर्सनालिटी ऐसी थी की मैं समझ गया था की उससे अलग ही तरह से डील करना पड़ेगा. वो बहुत लाउड ओर वोकल थी और कभी भी कुछ भी बोल सकती थी. उससे मिल कर मैंने जाना बेलौस और बेबाक होना क्या होता है. इसलिए मैं दफ्तर में हमेशा उसको ले कर कांश्य्स रहता था.

लेकिन अच्छी बात ये थी की वो अपने काम में बहुत अच्छी थी. नेटवर्क बना कर खबर निकालना और उसे सटीक अंदाज़ में लिखना उसे बखूबी आता था. प्रोफेशनली, उसके टीम लीडर के तौर पर मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी और वो एक अहम हिस्सा बन गयी थी टीम का.

उस वक़्त उम्र कम थी और जोश ज़्यादा इसलिए मैं भी ऑफिस में मस्त रहता था. सबसे दोस्ती थी और बॉस के रोल में बस तभी आता था जब कोर्स करेक्शन की ज़रुरत होती थी. सब लड़कियां थी और उम्र में थोड़ी बड़ी थी इसलिए ज़्यादा तेज़ी दिखा नहीं सकता था और दोस्ती कर के काम अच्छे से हो ही रहा था, इसलिए कोई प्रॉब्लम थी नहीं ऐज़ सच.

इस बीच नित्या से भी फ्रेंडली रिलेशन हो गए थे और उसने भी मुझे अपने बॉस के रूप में एक्सेप्ट कर लिया था. वो ये भी समझ गयी थी की मेरी सिर्फ उम्र कम थी, तजुर्बा नहीं.

एक सुस्त दोपहर मैं केबिन में कुछ लिख रहा था की एकदम से नित्या कमरे में आ धमकी. न नॉक करा न कुछ पुछा, बस सीधे आ कर बैठ गयी. उसकी इन सब हरकतों का मैं आदी हो रहा था इसलिए उसे कनखियों से एक बार देख कर वापस अपने काम में बिज़ी हो गया. लेकिन मैं समझ गया था की कुछ समस्या है इन्हें इसलिए पूछा, “क्या हुआ मैडम...सब ठीक ठाक?”

“हाँ सब ठीक है. मैं कुछ देर के लिए एक अर्जेंट काम से बाहर जाना चाहती हूँ माधव. परमीशन लेने आई हूँ,” उसने हडबडाते हुए बोल दिया. मुझे लगा कुछ गड़बड़ है इसलिए पूछा, “ऑफकोर्स यू मे गो. लेकिन आई होप आल इज़ वेल.” वो मुस्कुरा कर बोली, “हाँ सब ठीक है. मुझे ज़रा बेटी को लेने स्कूल जाना है. आज उसकी बस खराब हो गयी है.”

वो एक बेटी की माँ है, ये समझते ही मैं हैरान हो गया और मेरे चेहरे पर शायद हैरानी झलक भी गयी. और मानो चेहरे ने बचपना कम करा हो, मैंने बच्चों की तरह पूछ भी लिया, “यू हैव अ डॉटर?”

वो मूंह पर हथेली रख खिलखिला कर हंसने लगी और बोली, “एक नहीं दो हैं. बड़ी वाली आठवीं में हैं, छोटी फिफ्थ में. और अब मैं चलती हूँ. बिटिया इंतज़ार कर रही होगी.”

वो ये कह कर कमरे से निकल गयी और मैंने अपना सर पकड़ लिया. कुछ सेकंड ही हुए होंगे की वो फिर कमरे का दरवाज़ा आधा खोल के लटकते हुए बोली, “अच्छा सुनिए, मेरे साथ कॉफ़ी पीने चलेंगे. न मत करियेगा. मुझे पता है आपको कॉफ़ी पसंद है.”

नित्या का कुछ नहीं किया जा सकता था. मैंने हथियार डालते हुए मुस्कराहट के साथ कहा, “ठीक है लेकिन पहले जाओ और बेटी को पिक करो.”

कुछ देर के लिए शायद मेरी प्रोफेशनल पर्सनालिटी पर मेरी उम्र हावी हो गयी थी. मुझे न जाने क्यों उसका दो बच्चों की माँ होना सरप्राईज़िंग लगा. वो लगती ही नहीं थी मैरिड, माँ होना तो दूर की बात. और यहाँ तो वो दो बड़े बच्चों की माँ थी. मेरा ये कतई मानना नहीं की एक माँ को माँ लगना ज़रूरी है, लेकिन उस वक़्त उस उम्र में उतनी ही समझ थी और सोच भी वैसी ही थी.

दो घंटे बाद वो आई और सीधे मेरे कमरे में आ कर बैठ गयी. उसे देख कर मैंने औपचारिकता में पुछा, “ले आयीं बेटी को?”

उसने सवाल का जवाब देने के बजाये आँखें मटकाते हुए मुझे छेड़ने की टोन में मुस्कुरा कर पुछा, “तो माधव आपको लगता था मैं सिंगल हूँ.”

उसे पता था मैं बचपना कर चुका था और एडवांटेज उसके पास थी. लेकिन शब्दों की बाज़ीगरी हमें भी आती थी. “हाँ, बिलकुल लगा. कभी बताया नहीं तुमने इसलिए ताज्जुब हुआ. शायद ऑफिस में किसी को नहीं मालूम की तुम मैरिड हो.”

मेरी बात नकारने के लिए नाक सिकोड़ते हुए बोली, “जी नहीं, सबको पता है. सिर्फ आपको नहीं मालूम. मालूम भी कैसे होगा आपको. आपके पास फुर्सत कहाँ हमसे बात करने की.”

मैंने मुस्कुरा कर कहा, “नित्या, मैं सबसे बात करता हूँ. हाँ, घरेलु बातें नहीं करता.”

“नहीं बॉस. यू डोंट टॉक तो गर्ल्स. इन फैक्ट सब तो आपको पसंद करती हैं. प्रिया तो कुछ ज़्यादा ही. आप समझ रहे हैं न मेरी बात,” नित्या ने ऐसी अदा में कहा की मैं सच में ब्लश करने लगा.

टोपिक चेंज करने के लिए मैंने कॉल बेल बजाते हुए कहा, “तुम्हें कॉफ़ी पीनी थी न. वही मांगा रहा हूँ.” चपरासी आया और मेरी दो उँगलियाँ देख कर इशारा समझ गया. उसके जाते ही मैंने पीठ कुर्सी पर टिका कर नित्या से कहा, “एक बात बोलूँ. मुझे समझ नहीं आता तुमसे कैसे बात करूं. तुम्हारे दिमाग में क्या-क्या चलता है मैं कसम से नहीं समझ पाता. और जिस बेफिक्री से तुम बात करती हो लगता है मानो बरसों से मुझे जानती हो. तुमने कभी मेरी डिसरेस्पेक्ट नहीं करी, लेकिन तुम्हारा बिहेवियर अजीब है.” मैंने एक सांस में सब बोल दिया. इस बीच चपरासी कॉफ़ी रख गया था.

नित्या अब भी मुस्कुरा रही थी लेकिन उसकी निगाहें अब कॉफ़ी के मग पर थीं और एक ऊँगली को वो कप के रिम पर घुमा रही थी. एक दम से उसने कप से एक चुस्की ली और मेरी ओर देख कर बोला, “अगर मैं कहूं मैं तुम्हें पसंद करती हूँ तो क्या कहोगे माधव?”

उसकी नज़रों से समझ आ रहा था की वो सच बोल रही है लेकिन मैंने फिर भी बोला, “व्हाट रब्बिश, नित्या. टॉक सेन्स.”

“आई एम टॉकिंग सेन्स, माधव,” कॉफ़ी पीते हुए नित्या बोली. और इससे पहले मैं कुछ बोलता, उसने मुस्कुरा कर कहा, “मैं सच में तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ. और तुम्हारा मुझसे 6-7 साल छोटा होना या मेरा मैरिड होना या हमारी प्रोफेशनल रिलेशनशिप — ये सब इर्रेलेवेंट है. मैं जेनुइनेली तुम्हें पसंद करती हूँ इसलिए बेझिझक बात करती हूँ तुमसे.”

मैंने फ़ौरन कहा, “देखो नित्या ये अच्छी बात है की तुम मुझे पसंद करती हो लेकिन सच बोल रहा हूँ, मैं अब इस नज़रिए से किसी भी लड़की को पसंद नहीं करता.”

“अब नहीं करते...? मगर क्यों भला?” नित्या ने उम्मीद के मुताबिक सवाल करा.

न जाने क्यों मुझे लगा की मुझे उसे अपनी वजहें बता देनी चाहिए. शायद ऐसा इसलिए लगा क्यूंकि वो मुझे पसंद करती है और उसकी फीलिंग्ज़ की रेस्पेक्ट करते हुए मुझे उसे बता देना चाहिए. मैंने एक गहरी सांस ले कर उसे अपनी अधूरी मोहब्बत की पूरी कहानी बता दी और बता दिया की तब से मुझे किसी रिलेशनशिप में जाने का ख़याल ही बड़ा बुरा लगता है और इसी वजह से मैं लड़कियों से एक डिस्टेंस बना कर रखता हूँ. मेरी मोहब्बत ने भले ही किसी और को चुन लिया और दुनिया बना ली अलग, लेकिन मुझे आज भी लगता है की मैं किसी रिलेशनशिप में जाऊंगा तो उसके साथ धोखा करूंगा. इसिलए किसी भी तरह की रिलेशनशिप के लिए मैं तैयार ही नहीं. कोई चाहे बेवकूफ समझे या कुछ भी.

खैर, उसके आगे दिल का हाल रखने पर एक अजीब सा सुकून मिला, लेकिन नित्या कुछ अनीज़ी हो गयी और उसकी आँखों के किनारे पर एक आंसू छलक आया. इतने दिनों में पहली बार वो जज्बाती तौर पर कुछ कमज़ोर सी लगी.

आँखें पोंछते हुए एक फीकी मुस्कराहट के साथ बोली, “कोई सोच भी नहीं सकता की तुम इतने इमोशनल हो. यहाँ सबको लगता है की तुम बस शर्मीले हो.”

मैंने माहौल को हल्का करने के लिए इतराते हुए कहा, “मैं सच में बहुत शर्मीला हूँ.” लेकिन नित्या तो आखिर नित्या थी. मुझे आँख मार कर बोली, “मैं तुम्हारी सारी शर्म हवा कर दूँगी.”

वो आप से तुम पर आ गयी थी और मुझे बुरा भी नहीं लगा. मैंने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा, “मैडम यू आर टू मच. अब जाओ जल्दी से अपनी स्टोरी फाइल करो. अगर एडिटर ने मुझसे एडिशन डिले होने की वजह पूछी तो आई विल पुल यू उप.”

“प्लीज़ पुल मी उप, माधव,” नित्या ने फिर आँख से शरारती इशारा करा और कमरे से हाथ हिलाते हुए निकल गयी. मेरे गले में मानो एक बर्फ का टुकड़ा अटक गया हो. कुछ बोल ही नहीं पाया.

अगले बीस मिनट में उसकी स्टोरी मेरे इनबॉक्स में आ गयी थी. शी वाज़ गुड.

लेकिन उसकी ऐसी खुली ज़बान और लाउड कंडक्ट से मैं सोचने में पड़ गया की आखिर वो ऐसी कैसे है और क्यूँ है.

गनीमत है मेरी पहली मोहब्बत ऐसी नहीं थी. वो तो नित्या की एकदम ओपोज़िट थी. शांत, सौम्य, और गंभीर. एक्सप्रेसिव होने का अगर कोई स्पेक्ट्रम होता तो दोनों एक्सट्रीम होतीं उस स्पेक्ट्रम की.

उसका कार-ओ-बार, उसकी कहानी

सर्दियाँ अपने शबाब पर थीं और गालों पर हवा के सर्द थपेड़े एक खुशनुमा एहसास दे रहे थे. ऐसे ही एक खुशनुमा दिन मैं ऑफिस के बाहर शाम को कार पार्किंग के पास टहल रहा था. पार्किंग क्या एक पूरी सड़क थी जिसके दोनों ओर घने पेड़ थे और उन पेड़ों के नीचे हमारे दफ्तर की कारें पार्क होती थी.

जेब में हाथ डाले मैं सर्दियों का मज़ा लेते हुए टहल ही रहा था की कंधे पर किसी ने हाथ थपथपाया. गर्दन मोड़कर कंधे के ऊपर से देखा तो नित्या का मुस्कुराता चेहरा दिखा.

“तुम? तुम इस वक़्त यहाँ क्या कर रही हो? घर नहीं जाना क्या आज? ऑफिस तो ओवर हो चुका,” मैंने एक साथ कई सवाल दाग दिए और जवाब में उसने हथेली हवा में हाई फाइव करने को उठा दी और बोली, “माधव, बोलो...दारू पियोगे?”

अब नित्या के ऐसे सवालों से हैरान नहीं होता था. चाहें एडिटोरियल मीटिंग के दौरान एकदम से फ्लेवर्ड कॉन्डम की रेल्वेंस पूछना हो या न्यूज़ रूम में तारीफ मिलने के बाद ख़ुशी के मारे मुझे अच्छे से गले लगाना हो, वो सब कुछ कर चुकी थी. मैंने उसे उस तरह एक्सेप्ट कर लिया था.

तो उसके इस शराब वाले सवाल ने भी हैरान नहीं करा मुझे. आदी हो चुका था इसलिए मैंने भी हथेली उठा कर हाई फाइव कर दिया.

मैं शराबी न तब था, न अब हूँ, लेकिन शराब एन्जॉय ज़रूर करता हूँ. किसी ने तब बताया था की शराब ग़म भुलाने के काम आता है तो मैंने पीना शुरू करा था. भूल तो कुछ नहीं पाया, लेकिन हाँ, शराब ने कुछ बेहतरीन संजीदा दारुबाज़ दोस्तों से मिलवा दिया. सभी के कोई न कोई ग़म थे लेकिन सभी को मालूम था की शराब से हासिल कुछ नहीं हो रहा. फिर भी सिर्फ उसके सुरूर के लिए पी लेते थे. कुछ शराबी बन गए, कुछ मेरी तरह कण्ट्रोल में रह गए.

लेकिन शराब कभी किसी लड़की के साथ नहीं पी थी अब तक. नित्या ने वो मौका भी दे दिया. मैंने फ़ौरन हामी भर दी और बोला, “ठीक है, लेकिन पहले बॉस को एक फोन कर दूं की मैं निकल रहा हूँ आज के लिए...लेकिन ये बताओ, चलें कहाँ? किसी पब या प्रेस क्लब?”

नित्या नें अपनी जैकेट की जेब से कार की चाभी निकाली और अपनी कार की ओर बढ़ते हुए मुझसे बोली, “तुम बॉस को फोन कर के आओ कार में, फिर बताते हैं क्या करना है.”

मैंने फ़ौरन कॉल करी और पांच मिनट बाद उसकी काली मारुती की पिछली सीट में उसके साथ बैठा था. देखा अगली सीट पर उसकी जैकेट पड़ी थी और पिछली सीट पर वो गर्मी मनाती, एक लूज़ फिटिंग वाला सलवार कुरता पहने बैठी थी. बाहर के मुकाबले अंदर सर्दी काफी कम थी और कार काफी कोज़ी थी.

लेकिन वो कार नहीं कार-ओ-बार थी. अगली सीट के पीछे ट्रे टेबल लग हुई थी और सीट के नीचे चार बोतलें झाँक रहीं थी. एक व्हिस्की और तीन रम. साइड पॉकेट में सिगरेट और कप होल्डर में सोडे की बोतल. करों में तब सीडी प्लेयर हुआ करते थे. नित्या की कार के माहौल ने और सीडी पर बजते गुलाम अली ने मुझे अपने पाश में जकड़ लिया था. लग रहा था इससे बेहतर माहौल हो नहीं सकता किसी शाम का.

“मैं तो बस रम पीती हूँ...तुम कहो तो व्हिस्की निकालूँ तुम्हारे लिए,” नित्या ने बैक पॉकेट से चिप्स का पैकेट निकलते हुए पूछा.

“मैं भी रम ही पीता हूँ. जल्दी चढ़ती है जल्दी उतरती है,” मैंने मुस्कुरा कर कहा.

“अरे यहाँ उतारने की किसे जल्दी है. हाँ जल्दी से चढ़ जाए, इतना काफी है,” मेरी जांघ पर अपनी हथेली थपथपाते हुए वो बोली.

फिर किसी तजुर्बेदार बार टेंडर की तरह उसने दो लार्ज पेग बनाये. और मुझे मेरा ग्लास दे दिया और अपना ग्लास दोनों जाँघों के बीच में दबा लिया और फिर ढूँढने लगी कुछ.

“क्या ढूंढ रही हो,” मैंने पूछा. सीट के नीचे हाथ डाल कर कुछ टटोलते हुए बोली, “सिगरेट.”

जब वो झुकी तो उसके कुर्ते का गला काफी कुछ दिखा गया. मेरी नज़र अनायास ही उधर पड़ी और मैं एक आध सेकंड देखता रह गया. फिर मूंह फेर लिया. नित्या समझ गयी थी की मुझे क्या दिख गया.

लड़कियों के पास ये सब नोटिस करने का बहुत सेन्स होता है. शायद सर के चरों ओर आँखें लगी होती हैं. किसी भी एंगल से उन्हें देख लो उन्हें पता चल जाता है.

लेकिन और लड़कियों की तरह नित्या ने अपने कपडे फ़ौरन एडजस्ट नहीं करे, बल्कि वैसे ही रहने दिए. इन फैक्ट कम जगह में आगे झुक कर मुश्किल से सिगरेट निकालने में उसके ढीले कुर्ते की फिटिंग बिगड़ गयी थी और उसका भरपूर क्लीवेज और ब्लैक इनर वियर अब दिख रहा था. लेकिन उसे फिक्र नहीं थी.

चियर्स करने के लिए इशारा करते हुए बोली, “चियर्स माधव. मैंने कहा था न, तुम्हारी शर्म निकाल दूँगी.” फिर अपनी बॉडी की ओर पॉइंट करते हुए बोली, “देख तो लिया ही तुमने की दो बच्चे हैं फिर भी फिगर मेरा इतना बुरा नहीं. ठीक से देख पाए की नहीं?”

मैंने मुस्कुरा कर ग्लास से ग्लास टकराया और चियर्स बोलते हुए उसे एक बार फिर से देखा. इस बार ऊपर से नीचे और पहली बार इतने गौर से. वाकई बहुत अट्रैक्टिव थी. चुप रह कर निहारना गलत होता इसलिए फ़ौरन बोला, “ये जाम खुशियों के नाम.”

मुझे सिगरेट की डिब्बी ऑफ़र करते हुए नित्या बोली, “तुम्हारी खुशियों के बारे में तो श्योर हूँ, अपना पता नहीं.” मैंने सिगरेट नहीं ली तो उसने होठों से सीधे एक निकाल ली और लाइटर से जला ली. एक्सपीरिएंस दिख रहा था.

“तुम कब से सिगरेट शराब ले रही हो?” मैंने पुछा. “जब से मेरी शादी हुई है, तब से,” उसने फेक स्माइल के साथ कहा.

अपनी खुशियों के बारे में श्योर न होने के उसके डायलाग को सुन कर मैं समझ गया था की कुछ है उसके दिल में जो वो चाह रही है मैं पूछूं. मैंने पुछा, “मैंने तो अपने ब्रेकअप के बाद डिप्रेशन से बचने के लिए शराब लेना शुरू करा था, लेकिन तुमने शादी के बाद क्यों?”

उसने एक बार मुझे देखा और धीरे से मेरा हाथ अपनी ओर खींचा और उसे तकिया समझते हुए उससे लिपट गयी. उसकी पूरी अपर बॉडी मैं अपनी पूरी बांह पर अब फील कर रहा था. और साथ ही उसने अपना सर मेरे कंधे पर टिका लिया.

बुरा तो नहीं कहूँगा लेकिन बड़ा अजीब लग रहा था उसके इतने करीब होकर. वो एक बहुत अट्रैक्टिव औरत थी और वो रह-रह कर मेरे अंदर के मर्द को बहुत नज़दीक से छू लेती थी. लेकिन मुझे पता था की इसका इलाज सिर्फ सेल्फ रिस्ट्रेंट है.

हालाँकि एक २३-२४ साल के लड़के के लिए मुश्किल होता है, लेकिन मैंने कण्ट्रोल करा.

“क्या हुआ? ये एक दम से तुम ऐसे क्यों बीहेव कर रही हो,” मैंने पुछा.

“तुमने सवाल ही ऐसा करा था,” वो बोली.

उसकी आवाज़ से लगा वो शायद रो रही है, मैंने थोड़ा आगे झुक कर देखा तो वाकई उसकी आँखों में आंसू थे. अँधेरा ढल चुका था लेकिन सड़क पर निकलती गाड़ियों की लाइट से उसका रोता हुआ मासूम चेहरा और अपीलिंग लग रहा था.

उसने देखा की मैंने उसे रोता देख लिया तो फ़ौरन सीधे बैठ गयी और आंसू पोछते हुए बोली, “आई एम फाइन, माधव. लेट्स एन्जॉय द ड्रिंक”.

मैं और कुछ बोलता उससे पहले मुस्कुरा कर मुझे देखते हुए बोली, “माधव, तुम्हें लगता है न की मैं कितनी बदचलन हूँ...मर्दों के साथ बेफिक्र हो कर सिगरेट शराब पीने वाली एक आवारा औरत हूँ...और कैसे बिंदास तुम्हें हिंट देती हूँ अपने साथ रिलेशनशिप बनाने के लिए...है न? लेकिन पता है, मैं सच में तुम्हें पसंद करती हूँ और बहुत कम्फर्टेबल फील करती हूँ तुम्हारे साथ. लगता है कोई वक्युम तुम फिल कर रहे हो...”

मैंने फ़ौरन उसे रोका और पुछा, “नित्या, ये सब क्या है यार? यू आर हैप्पिली मैरिड एंड हैव टू यंग किडज़. तुम्हें क्यों लगता है की तुम्हारी लाइफ में कोई वैक्यूम है? और मैंने तो तुम्हें कहा न की मुझे ऐसी कोई रिलेशनशिप नहीं चाहिए, तो फिर क्यूँ ये सब हरकतें करती हो? अपनी इज्ज़त अपने हाथ होती है...बार बार इस तरह की बात कर के क्यूँ एक अच्छी खासी ऑफिस रिलेशनशिप को खराब कर रही हो?”

नित्या सीरियस हो गयी और एक बार में पूरा पेग ख़त्म कर के खिड़की के बाहर देखने लगी. फिर कुछ सेकंड की शांति को भंग करते हुए बोली, “ड्रिंक फिनिश करो तो दूसरा बनाऊं.” मैंने झल्ला के बोला, “इस तरह से अवॉयड मत करा करो और टॉपिक चेंज मत किया करो...मैंने सीरियसली पूछा तो सीरियसली जवाब दो.” बोल कर मैंने भी गुस्से में पूरा पेग ख़त्म कर ग्लास उसकी ओर बढ़ा दिया.

उसने मेरे हाथ से ग्लास लिया और पेग बनाते हुए बोली, “मेरी सिर्फ नाम को शादी हुई थी. अट्ठारह की बस हुई ही थी की अपने से उम्र में 10 साल बड़े एक पुलिस अफसर से शादी कर दी गयी थी. इसलिए कर दी गयी क्यूंकि मुझे एक मुस्लमान लड़के से मोहब्बत हो गयी थी और मेरे पेरेंट्स को डर लग गया की कहीं मैं उसके साथ भाग न जाऊं.” ये कह कर उसने दूसरा पेग मेरी तरफ बढ़ा दिया और सिगरेट फिर से ऑफ़र करी. इस बार मैंने ले ली और उसके लिए भी सुलगाई एक. मेरे गले से आवाज़ नहीं निकल पा रही थी अब. कुछ बोलने को नहीं था. और शायद नित्या भी सिर्फ सुनाना चाहती थी, सुनना नहीं. मैं चुप रहा.

“और पता है, ये जो मेरा हसबेंड है न, इसी ने मेरे पेरेंट्स को मेरे अफेयर के बारे में बताया था...ये हमारी कॉलोनी में ही रहता था और हैदर भी. ये उम्र में काफी बड़ा था और उस वक़्त कॉलोनी के सभी पेरेंट्स के लिए आइडियल लड़का था. इसने मुझे हैदर के साथ देख लिया था और शायद हमारी बातें भी बन ली थीं. इसने मेरे पेरेंट्स को जाकर सब बता दिया और मेरे पेरेंट्स ने फ़ौरन उसका कमीनापन एक्सेप्ट करते हुए मुझ पर अपना सारा गुस्सा निकालना ठीक समझा. उन्हें न जाने क्यूँ लगा की अब कोई मुझसे शादी नहीं करेगा और उनके इस डर का फायदा मेरे हसबेंड ने उठाया. इसकी नई-नई पुलिस में नौकरी लगी थी और इसने मेरा हाथ उनसे मांग लिया और अपनी ऐसी इमेज बनायी मानो इससे अच्छा और शरीफ कोई और इंसान होगा ही नहीं. मेरे पेरेंट्स भी फ़ौरन मान गए क्यूंकि ये हमारी ही कम्युनिटी का था और अच्छी नौकरी में था. लेकिन इसने मुझसे शादी सिर्फ सेक्स के लिए करी थी और शायद किसी गलती की सज़ा देने के लिए. आज तक नहीं समझ पायी की किस बात का बदला ले रहा है मुझसे. मैं तो इतनी नासमझ थी की कन्फ्यूज़ थी की कैसे रियेक्ट करूं. शादी के पहले दिन से ही मुझे इससे नफरत थी. इसने मेरी ज़िन्दगी संवारने से पहले ही उजाड़ दी थी और बजाये इसके की कोई शर्मिंदगी दिखाए, इसने खुद को मुझ पर फिज़िकली असर्ट करना शुरू कर दिया. मानो मैं इसकी बीवी नहीं कोई सेक्स स्लेव हूँ. इसे तो एक अट्ठारह साल की कमसिन लड़की मिल गयी थी दिन भर अपनी हवस मिटाने को. जब मैं शादी के पहले ही साल प्रेग्नेंट हो गयी, उसके बाद से ही ये और ब्रुटल हो गया. नौ महीने मैं इसके काम की नहीं रही तो ये बाहर अपनी प्यास बुझाने लगा. और इसे कोई शर्म भी नहीं थी. मैं क्या सोचूंगी या हमारी रिलेशनशिप पर इसका क्या असर होगा. इससे कोई लेना देना नहीं था मेरे हसबेंड को.”

एक सांस में नित्या ने सब बोल डाला. मेरा पेग ख़त्म हो चुका था और उसने भी अपना ख़त्म कर लिया था. इस बार उसने ग्लास मेरी तरफ बढ़ा दिया रिफिल करने को. मैंने बिना कुछ पूछे तीसरा पेग बनाया और उसकी ओर बढ़ा दिया.

“बेटी होने से भी इसे प्रॉब्लम हुई. उसके बाद तो इसने मानो मुझसे और नफरत करना शुरू कर दिया. पुलिसिया अंदाज़ में मार देता था मुझे. एक बार तो मैं बेटी को फीड कर रही थी और इसने मुझे पानी लाने को बोला. मैंने कहा मैं अभी नहीं उठ सकती कुछ समय इसलिए या तो वेट कर ले या खुद पी ले. बस ये सुनते ही इसे इतना गुस्सा आया की मेरी पीठ पर ऐसी लात मारी की मेरी दुदमूंही बेटी मेरी गोद से ऑलमोस्ट छिटक कर गिर ही गयी थी. मैं आज भी जब याद करती हूँ की क्या-क्या ज़ुल्म सहे हैं मैंने तो मेरी रूह काँप जाती है. दूसरी बेटी जब हुई तब इसे न जाने क्या हुआ और इसका गुस्सा कुछ कम ज़रूर हुआ लेकिन बेरुखी नहीं. बात भी बहुत कम करता था और फिजिकली भी रिलेशनशिप उतनी एक्टिव नहीं थी कोई. लेकिन इसकी जेब में कॉन्डम हमेशा मिलते रहते थे मुझे और न उसे कोई फर्क पड़ता था और न मुझे. अब वो बस घर चला रहा था और मैं उसके बच्चों की माँ के तौर पर उन्हें पाल रही थी. बस, उसके सिवा कोई आइडेंटिटी नहीं थी मेरी. इतनी मेहरबानी कर दी थी की मुझे अपना ग्रेजुएशन पूरा करने दिया इसने और टोका नहीं. टोकता भी क्यों, फीस तो मेरे पेरेंट्स ने भरी थी. पेरेंट्स से याद आया, मेरे जिन माँ बाप ने मेरी तब एक न सुनी थी, मेरा हाल देख कर आज भी शर्मिंदा हैं...और इधर जब से बेटियां थोड़ी बड़ी हुईं और उन्हें एक बाप की ज़्यादा ज़रुरत हुई, तो मेरे हसबेंड ने अपनी पोस्टिंग बाहर करा ली और अब महीने-दो-महीने में एक बार आ जाता है और जितने समय बाहर रहता है बीच-बीच में बस बेटियों से फोन पर बात कर लेता है.”

अगला पेग बनाने के लिए मैंने बोतल उठाते हुए उससे खाली ग्लास माँगा और पुछा, “तुमने डायवोर्स देने की क्यों नहीं सोची? इतना सब क्यों टोल्रेट करती रहीं?”

हँसते हुए नित्या बोली, “डायवोर्स कर के क्या करूं? तुम शादी करोगे मुझसे? वैस सच बताऊँ तो मैंने अपनी अब तक की आधी मैरिड लाइफ तो डर में निकाल दी इसलिए हिम्मत ही नहीं हुई की ऐसा कुछ सोच पाती. उसके बाद लिखने की हैबिट बन गयी तो मन हल्का होने लगा. इस सब के बीच बच्चे बड़े हुए और हसबेंड से दूरियां भी बढ़ गयीं. अब हम दोनों बस एक तरह से ओकेज्न्ल कपल हैं, मतलब कभी-कभी के हसबेंड-वाईफ. और इस सबसे शादी का होने न होने का फर्क ही नहीं पता चलता. और दूसरी बात ये भी है की मैं लाइफ में अब और कोम्प्लेक्सिटीज़ नहीं चाहती. जिसे चाहते थे वो मिला नहीं और इतना सब सहने के बाद अब और कुछ चाहिए भी नहीं. जो है सब ठीक ही है. बेटियों को भी अब ऐसी लाइफ की आदत हो गयी है.”

वो चुप हो गयी तो मैंने उससे पूछा, “फिर क्या हुआ?...मतलब और बताओ”

वो हैरान हो कर देखने लगी मुझे और कुछ सोच कर बोली, “पता है माधव, ये सेक्स बड़ी अजीब चीज़ होती है. मैं अपने हसबेंड को कभी नहीं प्यार कर पायी लेकिन उसके साथ सेक्स ज़रूर किया. और शायद एन्जॉय भी करा. सेक्स का इमोशनज़ से कोई लेना देना नहीं. सिर्फ एक ज़रुरत है और जब आप सेक्स करते हैं वो सिर्फ एक एक्सपीरिएंस होता है जिसमें पार्टनर एक ज़रिया होता है उससे ज़्यादा कुछ नहीं. लेकिन मेरे हसबेंड को लगता रहा की मैं उससे मोहब्बत करती हूँ इसलिए कुओप्रेट करती हूँ सेक्स में और वो मेरी इसी सो-कॉल्ड मोहब्बत से न जाने किस बात की दुश्मनी निकालता रहा. मैंने कभी उससे सेक्स की डिमांड नहीं करी...इन फैक्ट उसने तब ऐसी नौबत ही नहीं आने दी. और एक बात बताऊँ...वो जो उसके साथ सेक्स में एक्सपीरिएंस होता था न...शायद बस वो ही लम्हा ऐसा होता था जब मैं अपने हसबेंड से सबसे ज्यादा दूर हो पाती थी. ओर्गाज्म का वो पल ही ऐसा होता था जब मैं पूरी तरह से उसे और उसके ज़ुल्म भूल पाती थी. इसलिए मैं सेक्स से ऐतराज़ भी नहीं करती थी. और कभी आँख खोल कर उसके साथ सेक्स नहीं किया मैंने...खैर छोड़ो..मैं कहाँ से कहाँ पहुँच गयी.”

पहली बार सेक्स के बारे में ऐसे सेशन में पार्टिसिपेट कर रहा था और वो भी एक औरत के साथ और वो भी कार में शराब पीते हुए. कुछ अजब सी थ्रिल आ रही थी इसलिए और अब मुझे शराब भी हिट करने लगी थी, लेकिन फिर भी मैंने बोला, “लेट्स हैव वन लास्ट ड्रिंक फॉर दिस मेमोरेबल ईवनिंग.”

हँसते हुए नित्या बोली, “श्योर, बॉस.”

वो पेग बना रही थी और उसको लेकर मेरी जो भी ओपिनियन वो कहीं खोये जा रही थी. शायद शराब हावी थी या क्या पता उसकी कहानी हावी हो गयी थी.

जब नशा होने लगता है, तो मैं चुप होने लगता हूँ और ये मेरे लिए सिग्नल होता है की मैं अपनी लिमिट तक पहुँच चुका हूँ. आखिरी पेग हम दोनों ने ख़ामोशी में पिया. उसे शायद अभी नहीं चढ़ी थी. आदी थी वो शायद. लेकिन मुझे चढ़ने लगी थी.

लेकिन रात के नौ बज गए थे और मैं नशे में था. घर स्कूटर चला कर नहीं जा सकता था इसलिए ऑफिस की गाड़ी से घर जाने का इरादा बनाया.

“नित्या आज के लिए इतना काफी है. अब चलना चाहिए. तुम ड्राइव कर लोगी न? वरना तुम भी ऑफिस कार से चलो. तुम्हें ड्राप कराते हुए मैं घर चला जाऊंगा,” मैंने उससे पुछा.

उसने मुझे अपनी ओर खींच लिया और जी भर के मुझसे लिपटते हुए कुछ बुदबुदाई...मुझे याद नहीं क्या बोला. नशे में था. शायद किस भी कर लिया था उसने. लेकिन मैं बिना कुछ बोले उस लगभग मिनट भर की नज़दीकी से एक झटके से निकल आया और उसे बाय बोल कर कार से निकल गया और घर चला गया.

बिगिनिंग ऑफ़ द एंड

उस शाम के बाद हम दोनों महीने में एक-आध बार ऐसी दारू पार्टियाँ करने लगे. लेकिन फिर कभी उसकी पर्सनल लाइफ डिस्कस नहीं करी. और उस शाम तक मुझे लगता था की मेरी लाइफ में अगर मुझे मेरी मोहब्बत नहीं मिली तो वो दुनिया की सबसे बड़ी सज़ा है जो मुझे मिली थी, लेकिन नित्या की कहानी सुन के मुझे एहसास हुआ की मेरे साथ उससे भी बदतर हो सकता था. अपना ग़म कुछ कम लगा.
इस सब के बीच नित्या से दोस्ती हो गयी थी. उसे भी एक कंपनी चाहिए थी, और शायद मुझे भी. शराब के साथ में सुकून मिलने लगा था. लेकिन उसे सुकून मेरे साथ कार-ओ-बार में फिजिकली क्लोज़ हो कर मिलता था. मैं ऑब्जेक्ट नहीं करता था क्यूंकि उसका वो लिपटना-चिपटना बुरा नहीं लगता था और मुझे मतलब अपने ड्रिंक से होता था. उसे शायद मेरे नज़दीक बैठ कर अलग सुकून मिलता था. मुझे उससे फर्क नहीं पड़ता था क्यूंकि मुझे अपनी लिमिट पता थी और नित्या को समझाना बेकार था. वैसे वो भी शायद समझ गयी थी की उससे ज़्यादा उसे मुझसे कुछ मिलने वाला नहीं था.

लेकिन मुझे उससे काफी कुछ मिला. उसके साथ बात कर के एहसास होता था की दफ्तर में मैं भले ही ज़्यादा तजुर्बे वाला था, लेकिन दफ्तर के बाहर की ज़िन्दगी में बहुत कुछ था जो मुझे सीखना था. नित्या ने मुझे बहुत कुछ सिखाया...मर्द और औरतों की फितरतों के बारे में, नेटवर्क बनाने में, ज़िन्दगी सम्हालने में — कुल मिलाकर मैं उस पर एक तरह से इमोशनली डिपेंडेंट हो गया था. लेकिन अच्छी बात ये रही की उसने नाजायज़ फायदा नहीं उठाया और दफ्तर में हम दोनों की रिलेशनशिप को पूरी ग्रेस से निभाया.

लेकिन दफ्तर के बाहर वो मेरे सामने न जाने क्यूँ अपनी ग्रेस खो देती थी. एक बार बोली, “चलो अपने स्कूटर पर राइड कराओ...और ब्रेक खूब लगाना जिससे मुझे पता चले ब्रेक ठीक हैं की नहीं”...फिर एक बार मुझे अपने साथ बिना बताये अपने दर्जी के पास ले गयी और अपने ब्लाउज़ की नाप मेरे सामने देने लगी. मेरे लिए वो बेहद एम्बरेसिंग था. और मानो वो कम न हो, उसके बाद इतराते हुए छेड़ने के लिए बोली, “माधव अब तुम्हें तो मेरा साइज़ और शेप पता ही है, चलो लौन्जरी शोपिंग में मेरी मदद कर दो.” उसे मुझे ऐसे छेड़ने में बहुत मज़ा आता था. और मैं शायद लिहाज़ में या यूँ कहा जाए की ऐसी सिचुएश्न्ज़ के तजुर्बों की कमी की वजह से हैंडल नहीं कर पाता था उसे.

लेकिन उसको सीधा करने का भरपूर मौका मुझे दफ्तर में मिलता था जब मैं पूरी प्रोफेशनलिज्म से उसे ट्रीट करता था और वो भी सीनियर वाली पूरी इज्ज़त देती थी मुझे. इस बीच हमारे अखबार की एनिवेर्सरी आ गयी और ऐनिवेर्सरी एडिशन के लिए पूरा दफ्तर दिन रात एक कर के लग गया. रोज़ के अखबार से दोगुना होता है स्पेशल एडिशन और क्यूंकि रूटीन कुछ नहीं होता इसलिए मेहनत चौगुना लगती है उसे बनाने में.

खैर, मेहनत खूब हुई और निकल आया स्पेशल एडिशन. और उसी रात हुई दफ्तर की तरफ से एक ज़बरदस्त पार्टी एक हाई-फाई होटल में.

पार्टी ज़बरदस्त हुई. ड्रिंक्स, डांस, और डिनर और फिर ड्रिंक्स, डांस, और डिनर. ये सिलसिला मानो लूप में उस रात चलता रहा. जब मैंने अपनी शराब की लिमिट पूरी कर ली तो मैं बड़ी मुश्किल से डांस फ्लोर सी खिसक गया. ज्यादातर स्टाफ एन्जॉय कर रहा था खाना, पीना, डांस, तफरीह.

लेकिन मेरे किये काफी मस्ती हो चुकी थी रात के एक बजे तक और मेरा निकलने का समय हो गया था. क्यूंकि मालूम था पार्टी में शराब होगी इसलिए अपनी गाड़ी से नहीं आया. लेकिन अब रात में मुश्किल हो गयी क्यूंकि दफ्तर की गाड़ी अगर ले जाता हूँ तो लड़कियों को मुश्किल होगी गाड़ी के वापस आने तक. रात में पहला हक़ लड़कियों का है गाड़ी पर और उनमें से 6 का बॉस होने के नाते मेरा फ़र्ज़ भी था उनकी सेफ्टी का ख़याल करना.

लेकिन घर तो मुझे भी जाना था. और अगर वहाँ रुका तो और पीनी पड़ती या वही नाचना-गाना करना पड़ता. तभी नित्या पास आई और बोली, “क्या हुआ? जा रहे हो क्या? लेकिन तुम गाड़ी तो लाये नहीं होगे. मैं छोड़ दूं क्या?”

मैंने झल्ला कर बोला, “यार पागल हो क्या? रात के एक बजे मैं एक औरत से बोलूँगा की वो मुझे 10 किलोमीटर दूर घर छोड़ने चले और फिर अकेले वापस जाए? इतना एडवेंचर न सूझा करे तुम्हें, समझीं?” मेरी नाराज़गी में अपने लिए कंसर्न देख उसे न जाने क्या हुआ और मुस्कुरा कर देखने लगी और कुछ देर की चुप्पी के बाद बोली, “चलो मेरे घर चलो. पास ही में है. वहीँ सो जाना.”

मैंने कहा, “अरे नहीं यार. मुझे अपने बिस्तर पर ही नींद आती है. अपने घर ही जाऊंगा. बट थैंक्स एनीवे.”

उसने एकदम से मुझे कमर से पकड लिया और बोली, “माधव, मेरे बिस्तर पर भी नींद आ जाएगी. आई हैव बीन सेलेबेटिंग फॉर क्वाईट सम टाइम. यू वोंट रिग्रेट स्टेयिंग ऐट माय प्लेस टूनाईट. बेटियां भी आजकल अपने नाना के घर गयीं हैं.”

मैं समझ नहीं पाया की उसने क्या कहा और मैंने जवाब में बोला, “तुम सेलेब्रेट करती रहो. मैं क्या करूं? मैं अपने घर ही जाऊंगा. कुछ देर वेट कर लेता हूँ.” इतनी ही देर में पीछे से पूजा और स्मिता आ गयीं. वो भी घर जा रहीं थी. मैं उनके साथ ऑफिस की कैब में बैठ गया और उनको छोड़ते हुए अपने घर आ गया.

लेकिन रस्ते भर मेरे दिमाग में सेलेबेट और सेलेब्रेट चलता रहा. नित्या ने बोला था सेलेबेट और मैंने समझा सेलेब्रेट. मुझे सेलेबेट की उस वक़्त मीनिंग नहीं पता थी. नशे में था तो नींद जल्द ही आ गयी, लेकिन अगले दिन सुबह उठते ही फिर सेलेबेट और सेलेब्रेट याद आ गया.

अखबार उठाने से पहले अपनी डिक्शनरी खोली और मतलब देखा. जब पढ़ा की सेलेबेट का मतलब एक लम्बे अरसे से सेक्स न करना होता है, तो नित्या के साथ हुआ पिछली रात का पूरा वाक्या याद आ गया.

नित्या ने मुझे सेक्स के लिए खुला निमंत्रण दिया था. पता नहीं हैंगोवर था या इस बात से हुई झुन्झुलाहट, मेरा सर दर्द से फट रहा था और मैं फिर सोने चला गया.

मेरी जगह कोई और होता तो शायद एक मौका खोने का शोक मना रहा होता, लेकिन उसे मेरी नासमझी कही जाए या प्रायोरिटीज़—मेरे लिए गुस्से का कारण था उसका मेरे से ऐसी बात करना. मैंने मन ही मन सोचा की अच्छा हुआ मुझे उस वर्ड की मीनिंग नहीं पता थी, वरना वहीँ एक तमाचा रसीद करता उसे.

हर चीज़ की एक लिमिट होती है और नित्या ने वो लिमिट पार कर ली थी. अब सोचता हूँ तो लगता है शायद इतनी बड़ी बात नहीं थी, लेकिन तब न जाने क्यूँ मेरा खून खौला हुआ था.

उस दिन के बाद काम के सिवा कोई बात नहीं करी नित्या से. उसकी भी हिम्मत नहीं हुई की मुझसे कोई और बात करे. कई बार बिना कुछ कहे सब कुछ कहा जा सकता है. मैंने अपनी ख़ामोशी से सब कह दिया और उसने भी मेरी ख़ामोशी में सब कुछ समझ लिया.

कुछ महीने बाद ही मुझे एक दूसरी नौकरी का ऑफ़र मिल गया और मैंने इस दफ्तर से इस्तीफा दे दिया. मेरी फेयरवेल पार्टी हुई और सभी की आँखों में आंसू थे. मेरी भी आँखें भरी हुई थी. वजह भी थी.

पहली मोहब्बत हो या पहली नौकरी, हमेशा याद रहती है और बिछुड़ने का ग़म बेहिसाब होता है. इसलिए रोना वाजिब था.

खैर, पार्टी के बाद जब मैं दफ्तर को अलविदा कह कर निकलने लगा, तब देखा नित्या मेरे पास आ रही है. महीनों की ख़ामोशी के बाद मैं एक्स्पेक्ट भी कर रहा था उस दिन उसका मेरे से बात करना. जज़्बाती दिन था इसलिए सोचा बात कर ली जाए. वो पास आई तो मैं रुक गया. बोली, “माधव, आई एम सॉरी.”

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “नित्या, सॉरी तुम्हें नहीं मुझे कहना चाहिए था. आखिर तुम्हें मेरे साथ वो सब करने और कहने की लिबर्टी तो मैंने ही दी थी. गलती मेरी थी, और हमेशा रहेगी. और हाँ, थैंक्स. तुमने एक लड़के को आदमी बना दिया.” ये कह कर मैं आगे बढ़ गया.

साल भर बाद पता चला नित्या ने सुसाइड कर लिया.

पुराने कुलीग्ज़ ने बताया उसका डिप्रेशन का इलाज चल रहा था.


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