मन की बात बताएँ क्या?

तुम को भी समझाएँ क्या?

जो कुछ भी गुजरी है हम पर ,उस पर अश्क बहाएँ क्या?
कल क्या था ,अब कल क्या होगा ,इसका गणित लगाए क्या?

मन की बात बताएँ क्या?

तुम को भी, समझाएँ क्या?

आज सुबह जब सूरज निकला, नया नवेला लगता था,

पर मानों खामोश ढल गया, उसका शोक मनाए क्या?

मन की बात बताएँ क्या?

तुम को भी ,समझाएँ क्या?

हिचकोले लेता यह जीवन कब से यूं ही भटक रहा,

कभी तो इस को थाँह मिलेगी,ऐसी सोच जिलाए क्या?

मन की बात बताएँ क्या?

तुम को भी, समझाएँ क्या?

फिर से एक उम्मीद जगी है, अपना भी कल आएगा।

अपना भी सूरज चमकेगा, अपनापन मिल जाएगा।

इसी सोच में आज संभल कर कर्म किया कर लेती हूँ।

मेरा भी कल बेहतर होगा, संयम से जी लेती हूँ।

मंजिल क्या है,मौहलत क्या है,

सब को ये बतलाऐं क्या ?

मन की बात बताएँ क्या?

तुम को भी, समझाएँ क्या?

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