मूल तेलुगु कहानी : सम्मेटा उमादेवी

मूल तेलुगु कहानी : सम्मेटा उमादेवी

"देखो मां आसमान कितना सुन्दर है ! तारे ऐसे लगते जैसे किसीने दीये टांग दिए हों. वहां जाकर कुछ तारे तोडकर लाएं और अपनी झोंपडी में टांग दें तो कितना अच्छा लगेगा न मां? यहां भी रोशनी हो जाएगी!" इमली के पेड के नीचे फटी पुरानी गुदडी पर अपने छोटे भाइयों और मां के साथ लेटी साल्की की आंखें अंधेरे में भी चमक रही थीं.
" तो जाओ ना , जाकर तोड लाओ उन्हें! कुछ ज्यादा लाना फिर झोंपडी के चारों ओर टांग देंगे," भाई मंगीलाल बोला.
"न जाने क्यों भगवान ने इन्हें इतनी ऊंचाई पर टांग दिया. जरा पहुंच के अंदर होते तो कितनी असानी से तोड लेते और मैं तो हर झोंपडी में जाकर उन्हें टांग आती!सब अपने घरों में रोशनी हो जाने से कितने खुश हो जाते,नईं?"साल्की की आंखों में तारों की चमक जैसे उतर आई .
" हां, मैं अपने दोस्तों को बुलाकर उस रोशनी में हिसाब के सवाल हल कर लेता और पाठशाला में टीचर की मार से बच जाता,"दूसरे भाई बाबूलाल ने कहा.उनकी मां सोमी बच्चों की बातें सुन सुनकर खुश हो रही थी.खाट पर लेटा हरिया मुस्कुराने लगा.
" वह अंग्रेजी तो मेरे पल्ले बिल्कुल नहीं पडती.टीचर ने कहा अगर कल कक्षा में कविता बिना देखे नहीं सुनाई तो सौ बार उठक बैठक कराएंगी.एक तो पाठशाला से तीन मील चलकर आओ, और फिर काम पर जाकर थकी मांदी घर लौटने वाली मां की मदद करने केलिए खाना बनाकर कुएं से पानी लाकर बर्तन मांजने तक रात हो जाती है.पढने बैठते ही मां कहती है तेल मुश्किल से मिलता है बेटी , बत्ती बुझा दे . और बापू उधर से टोकते अब किताबें बंद कर और सोजा ," साल्की ने कहा .
"बापू क्या हमरे घर में कभी बिजली नहीं आएगी?हमारी पठशाला में दूसरे गांवों से भी बच्चे आते हैं वहां तो बिजली है !बत्तियां जलती हैं पंखॅ चलते हैं!" साल्की ने पिता के पास बैठते हुए पूछा.
" हां वे तो टीवी भी देखते हैं.रोज रोज उसमें फिल्लम और गाने देखते हैं..." मंगीलाल बोला.
" चलो अब बातें बंद करो और जल्दी से सो जाओ.सुबह जल्दी उठकर पढ लेना," हरिया ने कहा.
"वह तो करेंगे ...पर बापू यह तो बताओ हमारे कबीले में बिजली कब आएगी...?"साल्की ने जानना चाहा.
"हां हां आएगी क्यों नहीं... यह भी कोई कबीला है भला? इधर एक ,उधर एक झोंपडी ... कुल मिलाकर पचास घर भी नहीं हैं.गांव से इतनी दूर हमारी झोंपडियां हैं. गांव से हमारी झोंपडियों तक खंबे लगाना, तार जोडना यह सब करने की किसको पडी है?अब ये सब बातें बंद करो और सो जाओ.बिजली को सपने में देखना और खुश हो जाना..." सोमी ने विरक्त भाव से कहा.
पर साल्की सचमुच उखडी उखडी नींद में बिजली के सपने देखने लगी.बिजली के खंभे गाडे जा रहे हैं...तार जोडे जा रहे हैं घर घर में बिजली की बत्तियां चकाचौंध बिखेरने लगीं ...पंखे फुर्र की आवाज से चल रहे हैं...बस ये ही सपने देखकर वह नींद में खुश हुई जा रही थी.
" उठ बेटी, स्कूल जाना है न, उठ जा जल्दी," पिता का प्यार उसकी आवाज में उमड पडा. नन्ही सी बच्ची ,तीन मील पैदल चलकर जाएगी यही बात पिता को दुखी कर रही थी . पर उसकी लाडली बेटी उठने का नाम ही नहीं ले रही थी,करवट बदल बदलकर लेटी ही रही. हरिया ने फिर उसे उठाने की कोशिश की.
" बापू ,क्या हमारे घरों में बिजली कभी नहीं आएगी?" आंखें खोले बिना ही साल्की ने पूछा.
" क्यों नहीं आएगी?चार माह पहले रामकाका के कबीले में बिजली आई थी कि नहीं? राजूमामा के यहां भी आई,फिर हमारे यहां क्यों नहीं आएगी? आएगी बेटी,पर तू उठ तो सही?"
"खाक आएगी ! उनके घर सडक के पास हैं.वहां जमींदारों के खेत हैं , जमीनें हैं तो उन्हें बिजली की जरूरत पडी तो बिजली लगवा ली. हमारे यहां क्या है? यहां तो वह आने से रही.अब बकवास बंद कर और जल्दी उठकर तैयार हो जा," सोमी ने झिडक दिया . जैसे ही साल्की चटाई और गुदडी उठाकर अंदर आई ,सोमी बाहर झाडू लगाने लगी.साल्की भी जल्दी से तैयार हो गई .
हरिया ने बडे प्यार से किताबों का बस्ता उठाकर भाइयों के साथ जाती साल्की को नजर भर देखते हुए कहा," देखा सोमी, मेरी बेटी जबसे बडी कक्षा में गई उसे पढाई की लत सी लग गई.और अच्छी तरह पढने केलिए ही वह बार बार बिजली की बात करती है.देखना एक दिन खूब पढ लिखकर जरूर एक बडी अफ्सर बनेगी ."
मिट्टी की उस सडक पर हरे कपडों में बच्चे साथ साथ निकल पडे.उन्हें देखकर ऐसा लगा जैसे तोते झुंड बनाकर चल रहे हों.खेतों के बीच की वह पगडंडी बच्चों के नन्हे पैरों के छुअन से मानों पुलकित हो उठी थी.घने पेड़ों पर खिले फूल ख़ुशबू बिखेर रहे थे . मौसमी फलों के पेड़ वहां हर साल बच्चों को फल खिलाते .खाने की कोई कमी नहीं थी.खेतों में ख़ूब फसल होती और सबको पेट भर खाना मिल जाता.जब स्कूल की छुट्टी होती तो खेतों में घुस जाते,या महुआ के फूल और चूल्हे केलिए लकड़ियां बीनने जंगल के अंदर चले जाते.बच्चों की दुनिया से बड़ों की दुनिया अलग होती थी.पर जबसे बच्चे स्कूल जाने लगे, पढ़ाई ने स्कूल को बड़ों से जोड़ दिया.
साल्की बहुत खुश हुई जा रही थी कि वह बड़ी कक्षा में पहुंच गई है.उसका पूरा ध्यान किताबों पर था.पिछली गरमी की छुट्टियों में अपनी बड़ी मौसी के गांव गई थी,तबसे पढ़ाई में ज़्यादा मन लगाने लगी.वहां अपने भाइयों और बहनों को देखकर वह हैरान रह गई.उनके घर भले ही छोटे हों पर हर जगह किताबें ही किताबें नज़र आती थीं,पढ़ाई में इतना ध्यान देते थे.पढ़ाई की वजह से वहां के लोगों के जीवन में आए बदलाव भी साल्की ने देखे.पढ़ाई करने केलिए उनके पास एक किराए का कंप्यूटर भी था,जिसे देखकर वह भौंचक रह गई.उसकी दीदी ने कंप्यूटर चलाने की विधि और उसके उपयोगों के बारे में समझाया तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा.
" दीदी ,हम भी इसे खरीद सकते हैं ना?" उसने पूछा.
"कंप्यूटर से काम करने केलिए बिजली का होना ज़रूरी है साल्की," कहकर वह मुसकुरा दी.
साल्की का उतरा मुंह देखकर वह फिर बोली," यह बहुत महंगा है.हम कहां ख़रीद सकते हैं?और फिर पहले सीखना भी तो ज़रूरी है?तुम अब बड़ी कक्षा में आ गई हो ना,स्कूल में ही तुझे सिखाएंगे."
साल्की के मन में अनगिनत आशाएं जाग उठीं.सोचा, बड़ी कक्षा में जाते ही सबसे पहले कंप्यूटर सीखूंगी.फिर क्या था स्कूल खुलने की देर थी, बस जब भी मौक़ा मिलता कंप्यूटर के कमरे के आसपास ही मंडराती रहती थी.छः महीने कंप्यूटर का कमरा अध्यापकों और बच्चों से भरा रहा,और साल्की की इच्छा इस तरह पूरी हुई.साल्की उस कमरे में जाने के बहाने ढूंढती रहती.कंप्यूटर की खिडकी में से दिखाई देनेवाली दुनिय को चाव से देखती.'उस चूहे की पीठ सहलाने की देरी है,तुम्हें कितने सारे संसार दिखाई द जाएंगे', अध्यापक कहते और वह फौरन चूहे की पीठ सहलाती.फुर्ती से कीपैड पर उंगलियां नचाते हुए माउस का उपयोग करना सीख गई.हफ़्ते में एक दिन कंप्यूटर क्लास होती थी और साल्की उसके लिए पूरा हफ़्ता इंतज़ार करती.स्कूल के बच्चों केलिए कंप्यूटर में कुछ खास कार्यक्रम डाउन लोड किए गए थे , जानवर,जंगल,रेगिस्तान,समंदर,पक्षी , इस तरह जो भी देखना हो वह परदे पर प्रकट हो जाता था.उन सबके बारे में विवरण भी दिए जाते थे.

* * *
पर यह ख़ुशी ज़्यादा समय तक नहीं रही.अचानक कंप्यूटर क्लास रोक दिए गए.किसीने कहा ,कंप्यूटरों की मरम्मत की जा रही है,और किसीने कहा बिजली काट दी गई.कुल मिलाकर नतीजा यह हुआ कि कंप्यूटर क्लास पूरी तरह से बंद हो गई.कंप्यूटर का कमरा भी बंद कर दिया गया.कंप्यूटर पढ़ानेवाले टीचर गणित या अंग्रेज़ी पढ़ाने लगे या उन कक्षाओं में जाने लगे जिनके अध्यापक छुट्टी पर चले जाते.साल्की उदास होकर इसी आशा में कि वह कभी खुल जाए ,उस कमरे के पास दिन में एक बार ज़रूर हो आती.दूसरे स्कूल के बच्चे कभी मिलते तो वह उनसे बस एक ही सवाल करती,' क्या तुम्हारे स्कूल में बिजली है? कंप्यूटर सिखाते हैं?' और सबके पास लगभग यही जवाब होता ' नहीं'! लाखों रुपये खर्च करके कंप्यूटर तो खरीदे गए पर उनसे मिलनेवाली शिक्षा बच्चों तक पहुंच नहीं पाती.इसके बारे में किससे बात करनी है, यह भी मालूम न होने की वजह से साल्की उदास रहने लगी.
साल्की बाकी बच्चों पर अपनी धाक जमाती और कहती," अभी बताए देती हूं,सब जल्दी घर जाओ.इम्तहान पास आ गए.घर जाते वक्त रास्ते में इधर उधर घूमना, पेड़ से गिरे फल बीनना सब बंद,समझे?खेल कूद बाद में ,पहले मन लगाकर पढ़ो सब."घर पहुंचकर दोनों भाइयों को नहाने भेजकर इमली के पेड़ के नीचे उसने चटाई बिछा दी.सूर्यास्त तक दोनों को सबक याद करवाए.फिर अंदर जाकर तीनों दीये की रोशनी में पढ़ने लगे.
मां ने खाने केलिए बुलाया तो दौड़ पड़े और खाना खाने के बाद साल्की फिर पढ़ने बैठ गई.थोड़ी देर पढ़ने के बाद वह हाथ की उंगलियों को मोड़ते हुए दीवार पर तरह तरह के चित्र बनाते हुए कहने लगी," देखो... यहां दीवार की ओर देखो...यह रहा हिरण,यह मंदिर ... और यह बापूजी ...देखा? और देखो बंदर , बकरी...". साल्की के मां बाप और भाई उसकी इस करामात को देखकर हैरान रह गए.
मंगीलाल ने हंसते हुए कहा," देखा दीदी, दीये की रोशनी में ही तुम यह सब कर सकती हो,बिजली हमें नहीं चाहिए, फिर ये सारे चित्र तुम कैसे बनाओगी?"
"देख मंगी तू मुझसे मार खाएगा...रुक कहां भागता है?" कहती हुई साल्की उसके पीछे दौड़ पड़ी.इतने में बाहर किसीके चिल्लाने की आवाज़ और फिर लोगों का शोर सुनाई दिया.
"सांप...सांप...चिन्नीलाल को सांप ने डस लिया..."कोई चिल्लाया और फिर किसीके ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनाई दी.
" अरे सब आओ रे,मेरे बच्चे को सांप डस गया रे...हाय यह क्या हो गया..." चिन्नीलाल की मां चिल्ला रही थी और रो रही थी.
हरिया का परिवार भी बाक़ी लोगों के साथ बाहर आया.सब चंद्री और पापानायक की झोंपड़ी की ओर दौड़ पड़े.उनका बड़ा बेटा खेत में काम करता है पर छोटा , चिन्नीलाल का मन पढ़ाई में ज़्यादा लगता था. वह सातवीं कक्षा में था .सांप के डसने से बेहोश चिन्नीलाल के मुंह से झाग निकलने लगा.उसे घेरकर खड़े सब लोग ज़ोर ज़ोर से रोने लगे.सांप का ज़हर उतारने केलिए मंत्र फूंकनेवाले भद्रु को ढूंढते हुए कुछ लोग निकल पड़े.पहले डाक्टर के पास ले जाएंगे यह सोचकर उसे खाट पर डालकर निकलने को थे ,इतने में चिन्नीलाल का सिर एक तरफ़ को लुढ़क गया.
कबीले के लोगों के विलाप से सारा माहौल शोकाकुल हो गया.रात सबने जागकर काटी.आस पास के कबीले के लोग भी आ पहुंचे.पौ फटी और धूप निकलने के बाद लाश को उठाया गया.पर ऐसा लगा कि दिन के उजाले में भी वहां शोक का अंधेरा यूं ही छाया रहा.
"कलम खराब हो गई ,लिख नहीं रही थी.आले में दूसरी कलम ढूंढने लगा था चिन्नू . अंधेरे में उसे दिखाई नहीं दिया शायद, सांप ने परों से लिपटकर डस लिया," पापानायक का यह बताते हुए बिलख बिलखकर रोने की आवाज़ अब भी साल्की के कानों में गूंज रही थी.
चिन्नीलाल बड़ा ही हंसमुख और स्नेहिल स्वभाव का लड़का था.स्कूल जाने के रास्ते में चुटकुले सुनाकर दूसरे बच्चों को खूब हंसाता था.किताबों का बस्ता पेड़ के नीचे रखकर तालाब में तैरने लगता और बाहर निकलता तो हाथ में कमल के फूल लेकर.उन फूलों को बच्चों में बांट देता.कभी इमली के पेड़ पर चढ़ जाता और फल तोड़कर जेबों में भर लेता और रास्ते भर अपने साथियों को तरसा तरसाकर उन्हें देता रहता.लकड़ियां बटोरकर आग जलाता और भुट्टे भूनकर सबको खिलाता.अपनी इन हरकतों से सबका मन जीतनेवाले चिन्नीलाल के बिना स्कूल जाने का किसी भी बच्चे का मन नहीं करता था.सब बहुत उदास थे.
बड़ों के डांटने पर चौथे दिन बच्चे स्कूल केलिए निकल पड़े.पर सबका मन भारी था. रास्ते भर आंखें पोंछते ही रहे.कोई भी बात नहीं कर रहा था.उन्हें ऐसा लगा जैसे तालाब की लहरें और हवा में हिलती पेड़ों की डालियां पूछ रही हों , चिन्नीलाल कहां है? पत्तियों से गिरती ओस की बूंदें पेड़ के आंसू जैसे दिखाई दे रही थीं.
* * *

उस रोज़ टीचर ने चुनावों से संबंधित पाठ पढ़ाया.उसमें लिखा था भारत में ऐसा एक पोलिंग बूथ है जहां सिर्फ़ तीन ही मतदाता हैं.जनतंत्र का महत्व बताने केलिए टीचर ने समझाया कि उन तीन मतदाताओं से वोट डलवाने केलिए नौ कर्मचारी काम करते हैं.यह सुनकर साल्की की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.पाठ ख़त्म होते ही उठ खडी हुई और बोली," हमारे दो तीन कबीलों को मिलाकर हम कुल तीन सौ लोग हैं.तो क्या हमारे कबीले और इतने सारे लोगों के वोट कोई मायने नहीं रखते? हम सरकार की नजर में मतदाता नहीं हैं?देश केलिए हम ज़रूरी नहीं?"
"क्यों नहीं?तुम्हारे कबीलों में भी मतदाताओं के नाम दर्ज़ किए जाते होंगे, मतदान का मौका दिया जाता होगा?"
" जी,मतदान तो करते हैं ,पर सरकार हमारे इलाके में सडकें क्यों नहीं बनाती?बिजली का कनेक्शन क्यों नहीं देती? दवाखाना क्यों नहीं खोलती? और यह तो बताइए , हमारे यहां बिजली का कनेक्शन लगवाने केलिए किससे बात करनी होगी?"साल्की ने सावाल पर सवाल करके टीचर को हक्काबक्का कर दिया.
"अगर कबीले में बिजली होती तो चिन्नीलाल को सांप नहीं काटता ना?" यह कहकर घर जाते वक़्त साल्की दुखी होती रही.्ढि बरी के सामने बैठ तो गई पर पढ़ाई में मन नहीं लगा.चार दिन पहले चिन्नीलाल की मौत के बाद भिक्कू काका ने सबको बिठाकर बहुत सी बातें बताईं.वे अब उसे याद आने लगीं.
" पहले यहां नहीं ,भद्राचलम की तरफ़ हमारा कबीला रहता था.जानते हो यहां क्यों चले आए? पांच साल पहले की बात है.गरमी के दिन थे,हम परेशान थे कि करने को कोई काम नहीं मिल रहा था.तभी साधूराम मामा ने अंधेरे में न देख पाने की वजह से मिट्टी के तेल के दिये से टकराकर उसे उंडेल दिया.सारा तेल ज़मीन पर फैल गया और उसमे आग लग गयी। पहले चादरों ने आग पकड़ ली,फिर वह झोंपड़ी में फैलने लगी.बस देखते ही देखते आसपास की सारी झोंपड़ियां उस आग की चपेट में आ गईं.हम बुझाने का काम शुरू करते इससे पहले सबकुछ जलकर राख हो गया.पास पानी बहुत कम था.नहर से पानी लाने तक जो नुकसान होना था हो गया.हमारी आंखों के सामने डेढ सौ झोंपड़ियां राख हो गईं और हम असहाय देखते रह गए.मवेशी भागने लगे,हम भी भागे पर तबतक कुछ लोगों के हाथ पैर जल गए...बस जान हथेली पर रखकर भागने लगे.सबकुछ गंवा देने के बाद फिर से छोटे मोटे काम करके पेट पालने लगे और यहां पहुंचकर फिर से झोंपड़ियां डालकर बस गए.यहां के ज़मींदारों के खेतों में काम करने लगे.जिस दिन वहां काम नहीं होता उस दिन पेट की ख़ातिर मज़दूर का काम करते..."
उस रोज़ टीचर ने चुनावों से संबंधित पाठ पढ़ाया.उसमें लिखा था भारत में ऐसा एक पोलिंग बूथ है जहां सिर्फ़ तीन ही मतदाता हैं.जनतंत्र का महत्व बताने केलिए टीचर ने समझाया कि उन तीन मतदाताओं से वोट डलवाने केलिए नौ कर्मचारी काम करते हैं.यह सुनकर साल्की की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.पाठ ख़त्म होते ही उठ खडी हुई और बोली," हमारे दो तीन कबीलों को मिलाकर हम कुल तीन सौ लोग हैं.तो क्या हमारे कबीले और इतने सारे लोगों के वोट कोई मायने नहीं रखते? हम सरकार की नजर में मतदाता नहीं हैं?देश केलिए हम ज़रूरी नहीं?"
"क्यों नहीं?तुम्हारे कबीलों में भी मतदाताओं के नाम दर्ज़ किए जाते होंगे, मतदान का मौका दिया जाता होगा?"
" जी,मतदान तो करते हैं ,पर सरकार हमारे इलाके में सडकें क्यों नहीं बनाती?बिजली का कनेक्शन क्यों नहीं देती? दवाखाना क्यों नहीं खोलती? और यह तो बताइए , हमारे यहां बिजली का कनेक्शन लगवाने केलिए किससे बात करनी होगी?"साल्की ने सावाल पर सवाल करके टीचर को हक्काबक्का कर दिया.
"अगर कबीले में बिजली होती तो चिन्नीलाल को सांप नहीं काटता ना?" यह कह कहकर घर जाते वक़्त साल्की दुखी होती रही.्ढिबरी के सामने बैठ तो गई पर पढ़ाई में मन नहीं लगा.चार दिन पहले चिन्नीलाल की मौत के बाद भिक्कू काका ने सबको बिठाकर बहुत सी बातें बताईं.वे अब उसे याद आने लगीं.
" पर ज़मींदारों के घर बिजली कैसे है?अंधेरा तो सबको परेशान करता है, फिर हम क्यों इस परेशानी के शिकार हों? हमें बिजली कौन देगा?"तब साल्की ने पूछा.
" वे सब शहरों में रहते हैं.वहां होटल,फिलम घर,बड़ी बड़ी सड़कें,इमारतें,दफ़्तर होते हैं.वहां बिजली के बिना काम कैसे चलता ?पर हम तो कबीलेवाले हैं ,हमारे यहां बिजली कौन लगाएगा बेटी!हम कहां एक जगह बसते हैं?दर दर भटकते हैं...बस दाना पानी का इंतज़ाम हो जाए ,इसी फ़िक्र में लगे रहते हैं,है ना?्सरकारी स्कूलों में मुफ़्त खाना और किताबें मिल जाती हैं यही सोचकर बच्चों को स्कूल भेजते,वरना बड़े बच्चे सब काम करें तभी एक जून का खाना मिल पाता," उस वक़्त काका की कही बातें मन में गूंजने लगीं तो सोचते सोचते हाथ में किताब लिए ही सो गई साल्की.

* * *

उस दिन जब साल्की स्कूल से घर पहुंची तो मां ने आकर कहा," देखा साल्की, ज़मींदारों के खेतों में पानी कम पहुंचता है इसलिए मोटर लगा रहे हैं.सुनने में आया है ,उस तरफ़ के सारे खेत बडे ज़मींदारों ने खरीद लिए.वहां बोर कुएं खोदकर मोटर लगाए जाएंगे.मोटर चलाने केलिए बिजली की ज़रूरत पड़ेगी इसलिए वहां बिजली के खंबे भी लगाए जा रहे हैं.आगे से हमें पानी केलिए तालाब तक जाने की ज़रूरत नहीं होगी , खेतों के पास ही पानी मिल जाएगा!"
"नहीं मां,बिजली सिर्फ़ उन्हें मिलेगी,कबीलों में तो अंधेरा ही रहेगा," साल्की ने उदास होकर कहा.रोज़ स्कूल जाती रही.आते जाते रास्ते में ट्रकों से सिमेंट के मोटे खंडों पर लिपटे बिजली के तार उतारते मज़दूर दिखे.फिर खंबों को गाड़कर उन लोगों ने तार लगाने शुरू कर दिए.सरकार की नज़र में तीन सौ लोगों से ज़्यादा तीन भूस्वामियों की ज़रूरतें ज़्यादा मायने रखती हैं , यह अन्याय वह चुपचाप देखती रही.
सिर्फ़ दो ही महीनों में वहां के कबीलों में ऐसा बदलाव आया जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल था.आसपास ज़मींदारों के खेतों में मोटर की आवाज़ गूंजने लगी.कुछ झोंपड़ियों में टीवी भी बजने लगे.दिनभर मेहनत करके घर लौटनेवाले कबीले के लोग शाम होते ही एक तार के छोर पर कांटा बांधकर बिजली के तारों के ऊपर फेंककर फंसा रहे हैं.बस, झोंपड़ियों में बलब और पंखे ही क्या , टीवी भी चालू हो जाते.आसपास के दो तीन कबीलों में अब बत्तियां जगमगाने लगीं और टीवी मनोरंजन पहुंचाने लगे.
अपनी झोंपड़ी में पहली बार बिजली की बत्ती जली तो साल्की खुशी से नाचने लगी.भाइयों के साथ बाहर दौड़ पड़ी और उछलने लगी.बिजली की रोशनी में अब देर रात तक पढ़ सकने की खुशी ... उसे विश्वास नहीं हो रहा था यह सचमुच संभव है.सूरज ढलते ही सब बिजली के तारों पर कांटे फंसाते जैसे मछली पकड़ने केलिए पानी में कांटे डाले जाते हैं.पौ फटने से पहले वे तार निकालकर टोकरियों में छुपा देते.
कभी कभार दो पहियेवाली गाडियों पर बिजली विभाग के लोग आते और बिजली की चोरी के जुर्म में चार पांच लोगों को पकड़कर पांच छः सौ रुपयों का जुरमाना वसूल करते.उसके बाद कबीले के लोग सावधान हो गए.उन्हें पहले ही भनक पड़ जाती कि फलां समय बिजलीवाले आएंगे.सिवानों में मोटर बाइक दिखते ही लोगों को इत्तला कर दिया जाता.और फौरन वे अपना सामान टोकरियों में छुपाकर अंदर रख देते.
" दीदी क्या यह सच है कि हमें इस तरह चोरी की बिजली से बत्तियां नहीं जलानी चाहिए?" छोटे भाई का सवाल सुनते ही साल्की चौंक उठी.
" हां रे,नहीं जला सकते.पर हमें कोई बिजली देता भी नहीं,तो फिर क्या करें?" उसने चोरी का समर्थन करते हुए आगे कहा," यह सरकार चाहती है कि जंगल हो,खेतों में फसल हो, और उन खेतों में कमर तोड मेहनत करनेवा्ले,पहाड़ों की चट्टानों को तोड़नेवाले , मवेशी चारानेवाले हम जैसे लोग भी हों पर वही सरकार हमारी परवाह नहीं करती.हमारी ज़रूरतों को पूरा करना वह अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझती। फिर क्या करें ? मैं बिजली ज़रूर चाहती थी पर चोरी की नहीं। "
साल्की की बात सुनकर दोनों भाई सर झुकाकर चुपचाप वहां से चले गए।

* * *

सारे बच्चे पेड़ों के नीचे जमा होकर खेलने लगे. साल्की की मां ने कपड़े भिगोकर रखे थे. साल्की उन्हें धोने बैठ गई.इतने में दूर से किसी गाड़ी के आने की आवाज़ सुनाई दी.
" बिजलीवाले साहब आ रहे हैं... भागो..." कहते हुए बच्चे झोंपड़ियों के अंदर भागने लगे.पर साल्की उठी नहीं , उसने कपड़े धोने का काम जारी रखा.
बाबूलाल चिल्लाया," दीदी, बिजली के बोर्ड से तार निकाल दो...बिजलीवाले साब आ रहे हैं ! " सुबह हरिया बाहर बिजली के तार से लगा अपना तार हटाना भूल गया था.अबतक उसपर किसीका ध्यान नहीं गया.साल्की दौड़ती अंदर आई.उसने सोचा अंदर लगाया तार निकाल देने से काम हो जाएगा.कपड़े धोते धोते बीच में उठकर आई तो हाथ अभी गीले थे.जैसे हे उसने तार को छुआ इतना ज़ोर का झटका लगा कि एकदम उछलकर पीठ के बल गिर गई.
अचेत अवस्था में ज़मीन पर पड़ी साल्की को देखकर उसके भाई रोने लगे और उसे झकझोरकर उठाने की कोशिश करने लगे.
" हाय क्या हो गया रे? " चिल्लाती सोमी बाहर से भागती आई.कुछ ही मिनटों में कबीले के लोग वहां इकट्ठे हो गए.किसीने जाकर बिजली का तार खींचकर अलग कर दिया.साल्की को चित लिटाया गया.आंख के ऊपर घाव हुआ जिससे ख़ून बह रहा था.उसे मरा समझकर सोमी और हरिया छाती पीटते हुए रोने लगे.किसीने साल्की के चेहरे पर पानी छिड़का.कुछ ही पलों में वह ज़रा सी हिली.उसकी आंखें जलने लगीं. आंखें नहीं खोल पा रही थी.दर्द से कराहने लगी.सोमी ने गीले कपड़े से उसका मुंह पोंछा , हरिया ने उसे गॉड में उठाया और दोनों दवाखाना की ओर दौड़ पड़े.
* * *

हफ्ते भर बाद उसकी आंखों की पट्टियां खुलीं.डाक्टर की बात सुनकर साल्की के मां बाप अवाक रह गए.उससे लिपटकर रोने लगे.साल्की ने एक बार उनकी ओर देखा और कहा," क्यों रोते हो? भगवान ने मेरी एक आंख की रोशनी निकाल दी,पर दूसरी आंख तो है ना... आसमान के तारे देखने केलिए और पढ़ाई करने केलिए?" और खिलखिलाकर हंस पड़ी.पर हैरानी की बात यह थी कि आंसू उसकी दोनों आंखों से झर रहे थे!

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