रेपुटेड जॉब

परसों सुबह की ट्रेन से पूर्णिमा अपने शहर वापिस आयी थी ...कोई खास अवसर नहीं था बस "इस बार की बेस्ट एम्प्लॉयी" को अपने बॉस की हामी मिल गयी तो उसकी छुट्टी मंज़ूर हो गयी ... लगभग दो साल होने को आये जब उसने काम करना शुरू किया था ... इस कम्पनी को एक सेक्रेट्री की ज़रूरत थी और तब एक छोटे से शहर की लड़की का आत्मविश्वास सो कॉल्ड कॉन्वेंट गर्ल्स पर भारी पड़ गया था ... बचपन से पढ़ाई लिखाई में औसत रहने वाली पूर्णिमा दलपत अब उस कम्पनी में काम कर रही थी ... वैसे तो वहाँ कोई समस्या नहीं थी पर घर वालों के पूर्वाग्रह और जान-पहचान वालों के "कोई रेपुटेड जॉब या कोई ढंग का काम क्यों नहीं कर लेती वो " का जवाब देना उसे कुछ ऐसा मुश्किल लगा कि आज ही फ़ुर्सत मिल पायी थी उसे - अपनों से मिल पाने की ...

घर पर सभी उससे प्यार से मिले ... उनकी सवालिया आँखों को पूर्णिमा को मिला अवार्ड बहुत कुछ बता चुका था ... हाँ ! कल तक ताने मारने वाली बहुत सी ज़ुबाँ अब उसकी तारीफ़ में कसीदे पढ़ रही थी ... उन्हें पता चल गया था कि कम्पनी अपने आने वाले किसी विदेशी प्रॉजेक्ट के लिये उसे बाहर भेजने वाली है ...

सब ख़ुश थे पर पूर्णिमा को कहीं न कहीं एक सवाल परेशान कर रहा था ... वो रह-रहकर यही सोंच रही थी कि अगर उसे ये अवार्ड नहीं मिला होता या ये मौका नहीं मिलता तो क्या तब भी लोग ये कह पाते कि वो कोई रेपुटेड जॉब कर रही है ? अपना ध्यान बार-बार इससे हटाने पर भी गाहे-बेगाहे इसकी दस्तक उसके दिल और दिमाग़ पर पड़ ही जा रही थी ...

अपने दोस्तों की तरह उसने भी सोंच रखा था कि इस बार वो भी अपने टीचर्स से मिलेगी ... उन्हें बताएगी कि वो कहाँ पहुँच गयी है ... वो बताएगी उन्हें कि कैसे उनके प्यार और कभी-कभी की डाँट के कारण वो आगे बढ़ सकी ... पर कोई संकोच उसे ऐसा करने से रोक रहा था ... उस शाम वो बाज़ार से कुछ सामान लाने निकली थी जब उसकी मुलाक़ात उसके स्कूल की शिक्षिका सुमिता मैडम से हुई ... एक बार को तो वो पूर्णिमा को पहचान ही न पायीं पर उसके ये बताने पर कि उन्होंने क्लास वन तक उसे पढ़ाया था , उसे पहचान लिया ...." वाह बेटी ! अच्छा लगता है जब तुम जैसे बच्चे आगे बढ़कर भी हमें याद रखते हैं तो ..."- मुस्कुराती हुई सुमिता जी ने कहा ...

"कल शाम को क्या कर रहीं हैं आप ? "

"कुछ ख़ास नहीं ...मेरे बच्चे भी घर आये हुए हैं ... अब तो तीन साल के पोते की दादी बन चुकी हूँ ... बस उन्हीं के साथ थोड़ा समय बिता रही हूँ "....

"ठीक है ... कल घर पे एक छोटी सी पार्टी है ... और आपको सपरिवार आना है ... मैं कल शाम को आपको पिक करने आ जाऊँगी "- कहकर पूर्णिमा घर आ गयी ...

अगली शाम सुमिता जी का पूरा परिवार पूर्णिमा के घर था ... पूछने पर पता चला कि ये सब उसने उनके लिये ही किया है ... पूर्णिमा बड़े शान से सुमिता जी के पति , बेटे और बहू को ये बता रही थी कि जिस "म" की मात्रा लिखकर उसका ऐडमिशन हुआ था वो टेस्ट सुमिता मैडम ने ही लिया था ... इसने बहुत ही ख़ास याद जुड़ी हुई है जो उसके साथ हमेशा रहेगी ...

दूसरे दिन दोपहर के ढाई बज रहे थे जब पूर्णिमा की माँ ने उसे बताया कि सुमिता मैडम उससे मिलने आयीं हैं ... मैडम के हाथ में एक गिफ़्ट था जो उन्होंने पूर्णिमा को देते हुए उसकी माँ से कहा -" आजतक लोगों को अपने उन शिक्षकों को धन्यवाद करते कहते सुना है जिन्होंने उन्हें इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाया था ... या किसी प्रोफ़ेशनल डिग्री देने वाले संस्थान में शिक्षा दी थी ....आई ए एस की तैयारी करवाने वाले शिक्षकों को भी बच्चों को सम्मान देते देखा है ... अपने स्कूल के गणित , अंग्रेज़ी या विज्ञान पढ़ाने वाले टीचर्स को भी बच्चे याद करते हैं ... अगर कोई भुला दिया जाता है तो वो हैं मेरी जैसी हिन्दी की वो शिक्षिकाएँ जिनसे बच्चों का साथ बस शुरू के एकाध साल का ही होता है ... जो वास्तव में उतनी टैलेंटेड नहीं होतीं कि ख़ुद कोई कॉम्पटीशन निकाल सकें या कोई रेपुटेड जॉब कर सकें ...जो किसी प्राईवेट स्कूल में बस इसीलिये पढ़ातीं हैं ताकि उनके परिवार की थोड़ी आर्थिक मदद जाये ... और जब ख़ुद मेरी जैसीं शिक्षिकायें भी ज़िन्दगी के इस पड़ाव तक आते-आते ये मान लेतीं हैं कि शायद बच्चों के भविष्य निर्माण में हमारी कोई भूमिका नहीं तब पूर्णिमा जैसी एक छात्रा आती है - हमें हमारा सम्मान दिलाने को ... हमें ये बतलाने को कि हमसे दूर रहकर भी कहीं कोई हमारे बारे में भी सोंचता है ...."

फ़िर पूर्णिमा की ओर देखते हुए उन्होंने कहा -" कल रात पहली बार अपने पति ,बेटे और बहू की आँखों में मुझे मेरे शिक्षिका होने पर सम्मान दिखाई दिया .... तूने तो मुझे वो तोहफ़ा दे दिया जिसका इन्तज़ार करना मैंने बरसों पहले छोड़ दिया था..."

सभी के चेहरों पर गर्व और ख़ुशी दिखाई दे रही थी... एक "रेपुटेड जॉब" करने वाली "पूर्णिमा" ने अपने "गुरु" को सबसे ख़ास जो बना दिया था ...

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