अपनी ज़मीन

“मत भूल तू एक लड़की है। एक दिन पराए घर जाएगी। इतना जोर-जोर से मत हँस ....” दादी ने कहा। दादा जी ने बंदिशें लगाते हुए कहा, अरे! इसे इतनी दूर लड़कों के स्कूल में पढ़ने भेजोगे? लड़की है ....यहीं पास के गर्ल्स कालेज में दाखिला करवा दो । भाई ने कहा, तू मेरे संग नहीं जाएगी, क्योंकि लड़की है। पापा ने कहा, इतने छोटे कपड़े पहनकर बाहर मत जा, क्योंकि तू एक लड़की है। माँ ने भी एक दिन रसोई में कहा मीना, बड़ी हो गई है अब खाना बनाना सीख ले क्योंकि लड़की है वर्ना लोग क्या कहेंगे? इसे खाना बनाना भी नहीं आता।

वह इन व्यंग्य-वाणों से बचपन से ही बिंधती आई है पर वह सुना-अनसुना कर देती। उसका लक्ष्य तो आसमान की ऊंचाइयां नापना था। उसे फर्क नहीं पड़ता था कि लोग क्या कहेंगे....उसे फुर्सत नहीं है ये सब सोचने की। वह क्या कर रही है ..क्या पहन रही है ..किससे बात कर रही है ...कहां जा रही ..कहाँ से आ रही है, उसे परवाह नहीं है लोगों की पीछा करती निगाहों का ..... । कदम –दर- कदम वह बढ़ रही है अपनी मंजिल की ओर .....एवियेशन का एक साल और फिर वह दिखा देगी दुनिया को .....हाँ वह एक लड़की है और किसी से काम नहीं है।

पुरुष आधिपत्य वाले समझे जाने वाले भारतीय सेना के फाइटर पायलट के उसके सपने ने मानो घर भर में हलचल मचा दी थी मगर उसके अदम्य साहस और हौसले के आगे सबको हार माननी पड़ी। “लोग क्या कहेंगे तू एक लड़की है , इन बातों ने उसका मनोबल गिराया नहीं बल्कि और ऊँचा कर दिया। उसने जीभर कर पढ़ाई की ,खूब मन लगाकर मेहनत की। दिन-रात एक कर दिया यह सोच कर कि सारे जग को दिखा देना है कि लड़की को क्यों कमजोर समझा जाता है, वह नहीं है कमजोर,....उसे कमजोर बनाया जाता है। कभी कांच की चूड़ी पहनाकर तो कभी “ लोग क्या कहेंगे “ की बेड़ी जकड़ कर।

एक दिन उसने अपनी माँ से पूछ ही लिया “ अच्छा माँ ये बताओ कि कौन हैं ये लोग? क्या अधिकार है इन्हें यह कहने का कि तू एक लड़की है? माँ सोच में पड़ गई थी, सच ही तो है – ये हैं कौन लोग? वह भी बचपन से सुनती आई थी वही उसने आगे अपनी बेटी को सीख देनी चाही मगर उसकी मंशा में कोई खोट नहीं ...वह तो अपनी बेटी को समाज के भेडियों से बस बचाना चाहती है और कुछ नहीं .... । वह भी बोल उठी - जा पा ले अपनी मंजिल, कोई नहीं रोकेगा तुझे आगे बढ़ने से ... मैं देख लूंगी सब ...और वह अपने पंख तलाश करने निकल पड़ी।

आज उसका सम्मान समारोह है। आज आधिकारिक तौर पर भारतीय वायु सेना में वह फाइटर पायलट बन जाएगी। सभी घर वाले भी आए हैं। “लड़की'' के कमजोर होने का अहसास कराने वाले दादा जी भी हैं। पर आज गर्व से उनकी छाती चौड़ी हो गई है। अपने चार मित्रों को संग लाए हैं, जब वे कहते हैं भई, ये है लड़की.. इसने कमाल कर दिया, थारा नाम रोशन कर दिया है। किशन सिंह थारे खानदान में तो कोई छोरा भी पायलट न बना और इव देख ..हम तो शुरू ते ही कहा करे थे भई ये छोरी थारी पढ़ाई में भोत तेज से , ज़रूर आगे जावेगी , और वाही हुआ .... भई बहोत- बहोत बधाई होवे..... तो दादा जी हंसके कहते हैं – भई पोती किसकी है ...

समाचारों की सुर्खियाँ दिखाते हुए दिवाकर जी अपनी पत्नी विमलेश देवी को बोले –“ आज तो हमारी लाडो ने हमारा सिर ऊँचा कर दिया।”विमलेश मुस्कुरा भर दी। उसे पता है बेटी के यहाँ तक पहुँचने में कितना संघर्ष लगा है क्योंकि वह लड़की है.....। बधाई देने वालों का भी तांता घर पर लगा है, फ़ोन पर फ़ोन आ रहे हैं। खुशियाँ पूरे घर से संभले नहीं संभल रहीं। सब बहुत खुश हैं। बड़ी दिलचस्प बात है कि आज भी वह चर्चा के केंद्र में है ... लड़की होने के कारण ...और जिसने पुरुषों जैसा हौसला दिखाया है ....

वह सोच रही थी कि कब एक हिम्मती बाला या वीरांगना से दूसरी बहादुर वीरांगना की तुलना की जाएगी? यहाँ भी पुरुष बाजी मारने को उद्धत है...पर वह पुरुष से होड़ नहीं कर रही है, बस 'अपनी जमीन' तलाश रही है ....

© डॉ. बीना राघव ‘वीणा’















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