बदनाम बेचारे

बदनाम बेचारे

कहते हैं कि कुछ पेशे और लोग सिर्फ बदनाम होने के लिए ही बने होते हैं। जैसे कि पुलिस और वकील, ये अपना काम कितनी भी ईमानदारी से करले, लोग इन्हें बेईमान ही बताएंगे। हमने ऐसे ऐसे लोग देखें हैं जिनके धन से लेकर मन तक सब काला होता है लेकिन सबसे ज्यादा सफेदपोश बने वही लोग घूमते हैं।


खैर बात दिसम्बर के आखिरी सप्ताह की है। जैसा कि सभी जानते हैं जो संघर्षशील कवि या कलाकार होते हैं वो दिन रात, गर्मी सर्दी, धूप छाँव ,कुछ भी देखे बिना कहीं ना कहीं अपनी कला का प्रदर्शन करने पहुँच ही जाते हैं। सो रविन्द्र भी कभी नहीं चूकता था ।


जैसे और जहाँ भी मौका मिलता कवि सम्मेलनों में जा कूदता था। कहीं कहीं तो मंच पर जगह भी नही मिल पाती थी और श्रोताओं के बीच से ही बड़े बड़े कवियों की कविताओं पर ताली पीटकर आ जाता और कहीं कहीं एक युवा कवि के तौर पर कुछेक पंक्तियाँ सुनाने का मौका मिल जाता तो पैसे तो कोई देता नहीं था कुछेक तालियां और वाहवाही बटोर कर वापस कूच कर आता था।
दिसम्बर की कड़कड़ाती ठण्ड और मालूम पड़ा की पास ही के कस्बे में , जोकि रविन्द्र के गांव से 10 मील की दुरी पर था, 25 दिसम्बर को एक कवि सम्मेलन का आयोजन है ; जिसमें हिन्दी व उर्दू के मशहूर कवि और शायर शिरकत करने वाले हैं। जनाब करके अपनी ड्यूटी खत्म और शाम को सीधे सम्मेलन में पहुँच गये।


बड़े बड़े नामों वाले कवि और शायर आए हुए थे, बड़े माने मद्रासियों की तरह लम्बाई में बड़े नाम नहीं, वो नाम जो केवल मशहूर किताबों या पत्रिकाओं में छपे दिखते थे आज रविन्द्र उन नाम वाले व्यक्तियों को समक्ष मंचन करते हुए देख रहा था। मजे मजे में कब रात के 2 बज गए पता ही नहीं चला। 2 बजे कार्यक्रम का भी समापन हो गया। अब समस्या थी कि रुका कहाँ जाए। सोचा अब कहीं किसी के पास रुकूँगा भी तो सुबह जल्दी निकलना पड़ेगा क्यों ना अभी निकल कर घर पहुँच जाता हूँ। वहाँ से पैदल ही निकलकर उसके गाँव की तरफ ,जोकि एक स्टेट हाइवे पर था, जाने वाले चौक पर जाकर खड़ा हो गया। अब रात में ढाई बजे कौन बस मिलने वाली थी उसको। आते जाते ट्रक वालों को रुकने का इशारा करने लगा। एक ट्रक वाले ने तरस खाकर ट्रक रोक लिया और पूछा कहाँ तक जाओगे। रविन्द्र ने गॉंव का नाम बोला और ट्रक वाले ने उसको बिठा लिया।


दिसम्बर की ठंड और रात के ढाई बजे का समय , रविन्द्र ठंड से ठिठुरा जा रहा था। ट्रक वाले ने पूछा, भाईसाब बीड़ी पिओगे क्या? रविन्द्र ने मना कर दिया, ट्रक वाले ने अपनी बीड़ी जला ली और अपनी मस्ती में ट्रक चलाता रहा। रविन्द्र ने पूछा, भाई जी कहाँ से आ रहे हो। उसने बताया कि वो दिल्ली से राजस्थान गुजरात के रास्ते दिल्ली से बॉम्बे माल ढोते हैं। बातों बातों में पता चला कि घर पर दो बच्ची और बीवी के अलावा बूढी माँ है। और 8 हजार रूपये महीना तनख्वाह में ही घर का गुजारा चलता है।


धुंध काफी बढ़ गयी थी और दृश्यता काफी कम हो गयी थी मगर ड्राइवर बड़ी सावधानी से ट्रक चला रहा था। तभी अचानक एक खरगोश का बच्चा सड़क पर भागता दिखाई दिया। ट्रक वाले ने तुरंत गति कम करके हेडलाइट को बंद कर दिया। खरगोश के बच्चे के सड़क से खेतों की तरफ भाग जाने पर ही उसने वापस हेडलाइट जलाई। मैंने पूछा तो बताया कि भाईसाब ये जानवर भी तो किसी के बच्चे किसी के रिश्ते में लगते हैं, जैसे हम इंसान अपने परिजनों का इंतजार करते हैं ये और इनके परिजन भी इनका इंतजार करते होंगे। उसने बताया कि ट्रक वाले जान बूझकर एक बिल्ली के बच्चे तक को भी कभी नही मारते।


रविन्द्र के गाँव आने में 5-6 किलोमीटर ही बचे थे। सामने से एक गाडी आती दिखाई पड़ी। काफी तेज गति से आती प्रतीत हो रही थी। एकदम से कोई नीलगाय सड़क पर आ गयी । गाडी की गति काफी तेज थी सो वो सम्भल नहीं पाई और सड़क से नीचे उतर गई। ट्रक वाले ने तुरंत गाडी रोकी। देखा तो गाडी सड़क से नीचे खाई में गिर चुकी थी। तब तक पीछे से पुलिस पेट्रोल की गाड़ी आती दिखाई दी। पुलिस को देखते ही ड्राइवर बोला साब जल्दी से बैठो चलना पड़ेगा वर्ना बेवजह लफड़े में फंस जाएंगे। रविन्द्र ने भी यही उचित समझा और गाडी में बैठ लिया। गाँव आने पर उसका धन्यवाद करके रविन्द्र उतर लिया।


घर तो पहुँच गया मगर रात भर सो न सका। अगले दिन ऑफिस चला गया और शाम को वापस घर आ गया। मगर पिछली रात की कहानी दिमाग में ही घूमती रही। अगले दिन सुबह सुबह अख़बार देखा। उसमे उस रात वाले दुर्घटनाकर्म को छापा गया था ।
मगर ये क्या, इसकी तो हेडलाइन कुछ और ही लिखी थी।


मोठे मोठे अक्षरों में छपा था

"अज्ञात ट्रक वाले ने कार को टक्कर मारी, मौके से हुआ फरार"


रविन्द्र मन ही मन सोच रहा था। जो लोग बेचारे एक खरगोश के बच्चे तक को बचाने के लिए खुद की हेडलाइट बंद कर लेते हैं हमारा समाज उनको इस कटघरे में रखता है। चाहे जो भी हो मगर कुछ पेशे और लोग तो वजह बेवजह बदनाम होने के लिए ही बने हैं। 'बदनाम बेचारे'........


सन्दीप दुल्हेड़ा

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