आत्माओं से बातें

हल्की नीली, कुछ आसमानी सी ही थी उसकी साडी, खुले बाल लम्बे लम्बे तेज़ हवा में उसके चहरे को ढँक रहे थे। कभी हल्की सी एक आँख नजर आती कभी दूसरी, सब हवा पर निर्भर था, जैसे चाहे उसकी जुल्फों से खेल रहीं थी हवाएँ, दोनों हाथों में साड़ी से ही मेल खाती नीले रंग की चूड़ियाँ, जुल्फो के बीच से झांकती वो आसमानी आँखे उसके साँवले रंग पर सुंदर लग रही थी। खिड़की के बाहर खड़ी थी मुझे बोला रही थी...शीतल-शीतल...तभी अचानक हैप्पी बर्थडे टू यू ..हैप्पी बर्थडे डियर, शीतल उठो यार कब से जाग रहा हूँ तुम्हे विश करने को और तुम भी मानो घोड़े बेच के सो रही हो।ओ सॉरी अवि...मैंने सीधे खिड़की की तरफ नजर डाली पर कोई ना था, शायद सपना था। शीतल बचपन से ही कहानी, कविता लेखन में रूचि रखती,निडर, निर्भीक, भूत प्रेतों को कतई ना मानती, पर कहानी लेखन में उसके पसन्दीदा विषय ये ही रहते, रहस्यमय,भूत प्रेतों की कहानियों वाले, उसे बचपन से ही इस तरह के किस्से, कहानी सुनना बेहद पसन्द था। अपनी दादी से वो इसी तरह की कहानियो सुनती। धीरे धीरे समय निकलता गया और शीतल का लेखन और बचपन दोनों ही पीछे छूटते गये, शीतल पढाई लिखाई के बीच कम ही अपने लेखन पर ध्यान दे पाती, इस बीच शीतल की पढाई पूरी हो गई, और उसका विवाह हो गया। शीतल के पति अविनाश बैंगलोर की किसी कम्पनी में काम करते। ज्यादातर समय शीतल का अकेले ही घर पर गुजरता, शीतल ने पुनः अपना लेखन कार्य शुरू किया नये सिरे से उसके पति ने भी उसका पूर्ण उत्साहवर्धन किया और लेखन हेतु प्रेरित किया। उसकी पसन्दीदा विधा शुरू से ही कहानी लेखन थी उसने प्रेत आत्माओ की ढेरों कहानियो लिखी।

कुछ दिनों बाद, कुछ अजीबो- गरीब घटित हुआ उसके साथ रात में उसको सपने में कुछ आत्माएं मिलने आती और अपनी कहानी सुनाती, शीतल सुबह उठते ही उनकी कहानियों को अपनी डायरी में लिख लेती।वो आत्माएं शीतल को अपनी जीवन की कहानी कहती, और उनकी अधूरी कहानी को पूर्ण करने को शीतल से आग्रह करती। उसनेे ये सब अपने पति अविनाश को बताया वो हँसकर बात को हवा में उड़ाता पर शीतल को हर रोज ऐसे सपने आते और वो चुपचाप अपनी डायरी में लिख लेती।शीतल ने अविनाश को फिर सब बताया, अविनाश शीतल पर खींझ उठा 'ये फालतू की बकवास मत करो यार शीतल ये महज एक वहम है तुम्हारा, तुम ये उल्टे सीधे विषयों पर लिखना छोडो समझी' शीतल को भी अविनाश की बात ठीक लगी और कुछ दिनों उसने कुछ ना लिखा। एक रात फिर उसे सपना आया एक लड़की का सपना उसने अपनी पूरी कहानी शीतल को सुनाई, दर्दनाक कहानी उसका नाम नेहा था, मासूम सी सूरत, नीली आँखे, सांवल सा रंग उसने आत्माहत्या की थी। समाज की नज़रों में, पर सच तो ये था उसे मारा गया था, वो भी चरित्रहीन बताकर उसके पति ने एक दूसरी औरत के साथ मिलकर जो उसकी प्रेमिका थी।नेहा जो मर चुकी थी, इस दाग के साथ की वो चरित्रहीन थी, इस लिए आत्महत्या करने को मजबूर हुई वो इंसाफ चाहती थी, क्योंकि ऐसा ना था। शीतल के इस सपने ने उसे अंदर तक झंकझोर दिया था। पर शीतल ने ये कहानी ना लिखी क्योंकि कुछ दिनों से कहानी लेखन से विराम सा ले रखा था उसने, पर उस सपने की रात वाली तारीख अच्छे से याद थी उसे क्योंकी उस दिन जन्मदिन था शीतल का, कुछ दिनों बाद उसने डायरी खुली तो ये क्या? चौक पड़ी, अचानक ये क्या देख रही थी? वो उस रात की कहानी उसकी डायरी में लिखी हुई थी, वो भी लेखनी उसकी ना थी, कहानी के अंत में लिखा था 'तुम्हारी सहेली नेहा' ये क्या घटित हो रहा था? शीतल ने अविनाश को सब बताया, अविनाश कैसे विश्वास करता, सहजता से विशवास करने वाली बात भी तो ना थी। उसने बात को फिर हवा में उड़ाया। शीतल ने भी बात को भुलाने की कोशिश की पर हर रोज कुछ अजीब होता शीतल के साथ डायरी खुली मिलती उसी लिखी हुई कहानी के पेज पर। हर रात नेहा उसके सपने में आती उसकीे आसमान के रंग जैसी आँखे शीतल का मानो हर समय पीछा करती और अब तो हद हो गई नेहा जब भी शीतल को अकेला पाती शीतल से बात करती ..तेज हवाओ के संग आती और पलक झपकते ही गायब..शीतल शांत रहने लगी एक दम से उस खिल खिलाती शीतल में स्थिरता आने लगी बस हर घड़ी नेहा की नीली आँखे उसका पीछा करती, न्याय के लिये तरसती। अविनाश ने शीतल की हालत देख शीतल को मनोचकित्सक के पास चलने को कहा। अविनाश बड़ी मुश्किल से उसे तैयार कर पाया। पर शीतल ने एक शर्त रखी, उसे नेहा ने जो पता दिया था उस पते पर चलने को कहा। अविनाश से उसने वादा किया की उसके बाद जो अविनाश कहेगा वो वही करेगी, अविनाश मान गया। वो नेहा के बताये पते पर गया छान बीन के बाद मालूम हुआ की नेहा की सारी बातें सही निकली। अब नेहा शीतल की दोस्त बन चुकी थी, नेहा के स्वाभिमान की लड़ाई उसे जीतनी थी।नेहा ने कुछ ऐसे सबूतों के बारे में शीतल को बताया की आसानी से वो नेहा को न्याय दिला पाती..पर एक मरी हुई सहेली की मदद करना इतना आसान ना था, उसने नेहा के कहने पर उसके मायके वालो का साथ माँगा और सारी बातें बताई, काफी जद्दोजहद के बाद वो तैयार हो गये और उन्होंने शीतल का साथ दीया। शीतल और उसके पति को काफ़ी कोर्ट कचहरी के चक्कर खाने पड़े, पर अंत में नेहा का स्वाभिमान, उसकी इज्जत की जीत हुई, और उसके चरित्र पर लगा दाग धुल गया। और वो नीली आँखों वाली लड़की नीले आसमान में जा मिली। शीतल, नेहा का काम पूरा कर अविनाश के साथ वापस आ गई और अविनाश ने शीतल से एक वादा माँगा की वो कहानी लेखन बिलकुल छोड़ देगी, क्योंकि वो समझ गया था की शीतल मानसिक तौर पर बिलकुल ठीक है ये सब उसके साथ सच में हो रहा था, आत्माएं उससे बातें कर रहीं थी। शीतल ने भी नेहा की अधूरी कहानी को पूरा कर कहानी लेखन से सन्यास ले लिया।अविनाश से वादा कर, की वो कहानी नही लिखेगी।

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