दिल का मेरे दर्द बढाने

बात तुम्हारी कतरा - कतरा

इन बेरंग क्षणो मे जाने

याद तुम्हारी क्यु आती है।


चिड़ियो की वो चहक जगाने

डूबते सूरज की लाली जलाने

मेरे तन-मन को तड़पाने

याद तुम्हारी क्यूँ आती है।


रिमझिम-रिमझिम सी बारिश की

बूँदे जब गिरती धरती पर

चले हवा जब ये पुरवाई

याद तुम्हारी क्यूँ आती है।


सावन की इस हरियाली मे

कभी झूला-झूले थे डाली पे

उन पलो का एहसास कराने

याद तुम्हारी क्यूँ आती है।


जब तू मेरे पास नही है

तुझे दूरी का एहसास नही है

फिर यूँ रातभर मुझे रूलाने

याद तुम्हारी क्यूँ आती है


जब रूठू मुझे ख्वाबो मे मनाने

दिल मे मेरे प्रीत बसाने

जब मुझसे तुझे मिलना नही फिर

याद तुम्हारी क्यूँ आती है ।

-नीरज कुमार "रमन"



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