चुनांचे आए दिन पांडेय जी के जीवन में कुछ न कुछ घटता रहता हैं।कभी कुछ खट्टा तो कभी कुछ मीठा।

पांडेय जी अपने इलाके के बड़े जाने-माने लेखक थे।खूब पैरोडी करते।लोग वाह-वाह भी करते।अपने हुनर का लोहा मनवाने में वे बड़े पक्के थे।

पूजा पाठ भी करते।तुलसी के पौधे में जल अभिषेक करते।माथे पर चन्दन का टीका लगाते।मंदिर भी तभी जाते जब उनके ऊपर कोई संकट मंडरा रहा होता।

वैसे शादी -शुदा थे,पर आम आदमी की तरह थोड़े दिल फैंक भी थे।अब दिल है तो जाहिर है किसी पर भी आ सकता है।आखिर जोर थोड़े ही हैं,क़ि रोक के रखे।

पांडेय जी खुश तब हुए,जब उनके नाम से कहीं से पत्र आया क़ि आपको एक साहित्य महोत्सव में शामिल होना हैं।किर्पया अपना मेल आई डी बतला दें,अपना परिचय और फोटो मेल कर दें।फिर क्या था,पुरे इलाके में खबर आग की तरह फैल गई,पांडेय जी को सरकार की तरफ से निमंत्रण।कई देशों के लेखक कई भाषाओं में एक जगह एकत्रित होंगे।कुछ अपने मन की कहेंगे,कुछ अपने मन की सुनेंगे।

बहरहाल महल्ले की बिल्लो से विलायती राम पांडेय ने अपना ईमेल आईडी बनवा लिया।अपना परिचय शिक्षक रामवतार त्यागी से तैयार करवा लिया।वे सब बातें अपने परिचय में लिखवा लीं,जन्म से लेकर देहाती शिक्षा तक।सम्मानों का जिक्र,अपनी दो पुस्तकों का नाम।माता-पिता का नाम।

रामप्यारी ने आलमारी से निकाल कर सिल्क वाले कुर्ते में इस्त्री कर दीं।सिल्क का कुर्ता उनकी थुल थुली देह पर दमकने लगा।फोटो खींच कर टीटू ने अपने समार्ट फोन से उनको भी फोटोशॉप में जा कर स्मार्ट बना दिया था।

परिचय सम्बन्धित कार्यलय में भिजवा दिया।तय समय के भीतर हवाई जहाज की टिकट भी आ गई।अब तो पांडेय फूले न समाए।मन खुश।तन खुश।ऐसे इतराने लगे जैसे किसी नवयौवना को जवानी की हवा कुछ देर पहले लगी हो।

पत्नी उनका इतराना भांप चुकी थीं।कहने लगी-देखो जी!

बाहर की कोई आलतू फ़ालतू चीज मत खाना।आप का पेट चल जाता हैं।अपनी दवाई शुगर की भी रख लो और पीली गोली का पत्ता भी,जाने कौन घड़ी काम आ जाए।

आवश्यक निर्देश और पत्नी का दिशा उद्बोधन प्राप्त कर विलातयी राम पांडेय विमान में सवार हो गंतव्य की और उड़ चले।शुद्ध शाकाहारी थे।सुन्दर सी विमान परिचारिका आते जाते निहार लेती।पांडेय जी इसी गलत फहमी में बैठे रहे,शायद यह कोई पिछले जन्म का कोई कनेक्शन निकाल रही हो,जबकि उन्हें यह नहीं पता था कि उनको यह ट्रेनिग दी जाती है कि अपने कस्टमर्स के साथ मुस्कराते हुए पेश आया जाए।

नाश्ते के बाद जब पांडेय जी लघुशंका को उत्सुक हुए।मामला उन्हें दीर्घ शंका का महसूस हुआ।मन में बुद बुदाते रहें।ऐसा न हो,वैसा न हो।मौसम सम्भल गया।उधर परिचारिकाओं की आदत होती हैं,पांच दस पैसेंजर लघुशंका को उठे नहीं क़ि उनकी बैचेनी अधीर हो जाती हैं।तुरंत उनके हाथ में माइक आ जाता है-सभी यात्रियों से अनुरोध हैं,बाहर का मौसम खराब हो गया,सब से अनुरोध है कि अपनी सीट की बेल्ट बाँध लें और टॉयलेट का प्रयोग न करे।

पांडेय जी ने हलकी सी सूचना हाथ धोते धोते सुन लीं थीं।प्रभु को याद करते करते अपनी सीट पर आ कर घंस गए।उनको दीर्घ शंका की शंका अब किसी और टापू में समा गई।

खेर विमान अपनी जगह पहुंचा।एयरपोर्ट पर तख्ती लिए एक व्यक्ति उनकी प्रतीक्षा में था,उसने प्रदेश के मुताबिक सम्मान करते हुए पटका और गुलदस्ता भेंट किया।पांडेय जी को ऐसे लगने लगा शायद यह वह सुनहरा अवसर है कि उनका लेखन सफल हुआ,उनके भीतर का लेखक गदगद था।भव्य होटल।जीवन में लेखक को और क्या चाहिए।वैसे लेखक जाति वह प्रजाति हैं जो अपना खर्च करने में परहेज करती हैं।पांडेय भी कौन से दूध के धुले थे।

अगले दिन भव्य कार्यक्रम में कई लेखकों से मिलने का मौका मिला।पांडेय जी हिंदी के कवि थे।उनके गले में प्रतिनिधि का बिल्ला और साथ में एक गाइड का सुख उनको ख़ास आभा प्रदान कर रहा था।

खेर समारोह में पांडेय जी ने अपनी कविताओं का पाठ किया।लोगों ने देर तक तालियां बजाई।पांडेय जी फूले न समाए।उनका गाइड उनकी हर एंगल की तस्वीर ले रहा था।पांडेय जी ने अपने उद्धबोधन में कहा-आज कविता अपने उद्देश्यों और अपनी बैचिनियों के साथ सामयिक मनोभाव की वह भूमि तैयार कर चुकी हैं,जिसके आगे व्यवस्था के प्रति विद्रोह हैं,कुठाराघात हैं।उसका डट कर सामना हमारा लेखन निश्चित ही कर रहा हैं।हमारा धर्म लेखन के प्रति प्रतिबद्ध है,हमारी चिंताएं बेहद मौलिक है जो कोई भी तरीका नहीं छोड़ना चाहती।पांडेय जी के उद्धबोधन के बाद अनेक रचनाकारों ने उनको शुभकामना प्रदान की।फोटो धड़ा धड़ खींचे गए।

अगले दिन की फ्लाइट थी।समय से एयरपोर्ट पहुंचना था।ट्रैफिक बहुत ज्यादा ट्रेरिफिक हो गया।पांडेय जी बैचेन।कहीं विमान निकल गया तो कैसे पहुंचेंगे चुनांचे कहते है,न कि संकट की घड़ी में प्रभु ही एक मात्र चिंतक और इक हितैषी की मुद्रा में होता है जो आपका निशुल्क ख्याल रखता हैं।आखिर कैशलेस के जमाने में कोई तो है जो आपका अपना हैं।एयरपोर्ट पर कार ने सही समय पर पहुंचा दिया।खुश होकर पांच सौ का नोट विलातयी राम पांडेय ने अपने गाइड को थमा दिया।गाइड ने खुश हो कर पांडेय के पाँव छु कर आशीर्वाद प्राप्त किया।पांडेय जी की इस यात्रा में महज पांच सौ रूपए खर्च हुए,पर मन की ख़ुशी जो इस साहित्य महोत्सव में मिली उसकी कोई कीमत नहीं थी।लौट आये अपने पांडेय जी।स्थानीय अखबारों के फ्रंट पेज पर पांडेय जी की उपलब्धि भरे सचित्र समाचार थे।ग्वालियर के चब्बूमल इलाके के विलातीराम पांडेय का बर्ह्मपुत्र साहित्य महोत्सव, गुहावटी में सम्मान।अख़बार पढ़ कर उनका मन बल्लियों उछलने लगा जैसे किसी प्रेमिका ने उन्हें उम्र की इस दहलीज पर आकर पुनः प्रपोज किया हो।पत्नी रामप्यारी ऐसे गले लग कर मिली जैसे विलायती राम पांडेय को पकिस्तान सरकार ने रिलिज किया हो जो चुनांचे गलती से बॉर्डर क्रॉस कर गए हो और आज विदेश मंत्रालय की मशक्कत के बाद उन्हें सशरीर मुक्त किया हो।भाग्यवान अब तो बस करो,देखो बिल्लो कैसे फोटो पे फोटो खींचे चले जा रही हैं।आप अपने हो,कोई पराए तो नहीं।फोटो शेषन जारी हैं,जारी है खुशियों का मेला।

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