भूत की लंगोट

‘भागते भूत की लंगोटी भली!’ यह कहावत बहुत ही कही-सुनी जाती है पर वह लंगोट पहना भूत अभी तक मुझे नहीं दिखा। काफी दिनों से इस फेरा में हूँ कि कहीं वह भूत दिख जाए और वह भी भागते हुए, और वह भी अपनी लंगोटी को छोड़कर। कब ऐसा होगा? खैर अभी तो मन में, इस कहावत के अर्थ से, मतलब से नहीं अपितु इस बात से कौतुहल उत्पन्न हो रही है, शंका उत्पन्न हो रही है कि अगर यह लंगोट किसी भूत की थी तो वह पहना क्यों नहीं था, क्या किसी दरजी से अभी नया-नया सिलवाया था और हाथ में लिए जा रहा था, तभी किसी कारण बस भागने लगा और लंगोट हाथ से छूटकर गिर गई? क्या है इस लंगोट का माजरा? आखिर क्यों बनी ऐसी कहावत, क्यों बनी यह लोकोक्ति? पर कभी न कभी किसी ने जरूर किसी भूत की लंगोट देखी होगी! हो सकता है कि उस व्यक्ति को जब इस भागते भूत की लंगोट मिली होगी तो शायद इस लंगोट के दम पर उसने कुछ भूतिया, मायावी कारनामे दिखाए होंगे और मन ही मन प्रसन्न हो गया होगा कि चलो, भागते भूत की लंगोटी भली। हो सकता है कि जिस किसी को यह लंगोट मिली हो, वह भागते भूत से लंगोटी भली कहकर कुछ और कहना चाहता हो पर बाद में यह कहावत खिस्से के रूप में आगे बढ़ते हुए आज के अर्थ में रूढ़ हो गई हो। खैर यह कहावत वाली लंगोटी चाहें जिस भूत की हो और वह इस कहावत से चाहें जो कुछ कहना चाहा हो, इस पचड़े में न पड़ते हुए मैं एक दूसरे भूत की बात करता हूँ और साथ ही साथ उस भूत के लंगोट की भी।

हमारे जवार में एक पंडित-कुमार थे, कहा जाता है कि इनके पास एक लंगोट थी, जो किसी ऐरे-गैरे भूत ने नहीं बलुक एक सिद्ध भूत ने, पूजनीय भूत ने, ब्रह्मचारी भूत ने, पहलवान भूत ने इन्हें प्रसन्न होकर दी थी और उस लंगोट के चलते, उस पंडीजी के पुत्र ने कई रोचक, अद्भुत, रोमांचकारी, अलौकिक कार्यों को, घटनाओं को अंजाम दिया था। कुछ ऐसी घटनाएँ जिन्हें सुनकर रोंगते खड़े हो जाते हैं, शरीर पसीने से नहा जाती है, दिल की धड़कन तेज हो जाती है और कमजोर दिलवाले तो धोती गीली कर देते हैं। हो सकता है कि यह कहानी आपको बनावटी लगे, काल्पनिक लगे पर कुछ तो बात है ही इस कहानी में, जो भूत-प्रेत के अस्तित्व को पुख्ता करते हुए नजर आती है। वैसे भी यह कहानी मैंने अपने जवार-पथार के लोगों से सुनी है और सिर्फ सुनी है तो इसकी सत्यता पर मैं मुहर नहीं लगा सकता। क्योंकि बहुत सारी कहानियाँ गढ़ ली जाती हैं पर कुछ बुजुर्ग लोग, पुरनिया लोग इस घटना को एकदम सत्य मानते थे और उन्हें किसी भी तरह से इस घटना की, कहानी की सत्यता पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं था। खैर आइए, इन सब बातों से दूर हमलोग कहानी का आनंद उठाते हैं।

हमारे जवार में रमदेना नामक एक गाँव था जो एक नदी किनारे बसा हुआ था। इस गाँव में ग्वालों की अधिकता थी और सभी ग्वालों के पास खूब खेती-बारी थी और साथ ही सबके दरवाजे पर 10-20 गाए-बैल बँधे हुए दिख जाते थे। इस गाँव में मात्र एक घर रमेसर नामक पंडीजी का था। रमेसर पंडीजी पूजा-पाठ करके, कथा-पोथी बाँचकर अपने घर का खर्च चलाते थे। गाँव-जवार में उनका काफी सम्मान था, वे भले धनी नहीं थे पर गाँव-जवार का हर धनाढ्य भी उन्हें सम्मान की नजरों से देखता था। आज तो इस गाँव का अस्तित्व समाप्त हो गया है क्योंकि कालांतर में यह गाँव नदी में समा गया था और इस गाँव के लोग आस-पास के गाँवों में बस गए थे। इस गाँव में एक बहुत धनी-मानी ननकू नामक ग्वाला थे जिन्हें गाँवभर सम्मान से चौधरीजी, चौधरीजी कहा करता था। चौधरी जी के पास काफी खेती-बारी थी और काफी अच्छा अनाज भी उगता था। साथ ही चौधरीजी के घोठे पर 4-5 जोड़ी बैल और एक लेहड़ा अच्छी गाए भी थीं। चौधरीजी बहुत ही सुलझे हुए व्यक्ति भी थे। सबकी परवाह करते तथा जरूरतमंदों की मदद भी पर चौधरी जी के 4 बेटों में से मझला बेटा काफी घमंडी था। उसे अपने घन-बल का बहुत अभिमान था। वह गाँव के लोगों को हीन नजरों से देखता था और रह-रहकर कमजोरों पर जुल्म भी किया करता था।

समय कब करवट बदल दे, कब कौन सी घटना घट जाए, कहा नहीं जा सकता। समय राजा को रंक तो रंक को राजा बना देता है। एक बार की बात है कि पंडीजी किसी जरूरी काम से अपने किसी रिस्तेदारी में जाने वाले थे। उसी दिन चौधरीजी के वहाँ सत्यनारायण की कथा होनी थी। चौधरानी ने अपने मझले बेटे से कहा कि जाकर पंडीजी को बुला लाओ। चौधरी का मझला बेटा अकड़ते हुए पंडीजी के दरवाजे पर पहुँचा और दरवाजे पर से ही पंडीजी, पंडीजी कहकर हाँक लगाया। पंडीजी घर में से बाहर निकले और जानना चाहे कि क्या बात है। चौधरी के उस मझले बेटे ने कहा कि अभी उन्हें उसके साथ उसके घर पर चलना है क्योंकि सत्यनारायण की कथा कहनी है। पंडीजी ने अपनी अस्मर्थता जताई और कहा कि आज तो वे एक जरूरी काम से एक रिस्तेदारी में जा रहे हैं। हाँ, कल सुबह-सुबह वे कथा बाँचने के लिए जरूर पहुँच जाएंगे। पंडीजी की अस्मर्थता सुनकर वह चौधरी पुत्र गुस्से में आ गया और कहा कि उन्हें हर हालत में कथा बाँचने चलना ही होगा। पंडीजी जितनी बार अपनी अस्मर्थता जताते, उतना ही वह चौधरी पुत्र गुस्से से भर जाता। उसने पंडीजी की मनहाई को अपने सम्मान का प्रश्न बना लिया था। अंत में तैस में आकर उस चौधरी पुत्र ने पंडीजी को भला-बुरा भी कहा। साथ ही यह भी कहा कि देखता हूँ आप किस रास्ते से जाते हैं, मारकर आपका हाथ-पैर तोड़ दूँगा। गाँव के कुछ और लोग इकट्ठे हो गए और चौधरी पुत्र को शांत कराने लगे पर वह बोलता ही रहा। इतने में पंडीजी का पुत्र जो लगभग 16-18 साल का था, घर में से निकला और उस चौधरी पुत्र को उलटा-पुलटा बोलने से रोकने लगा। अब क्या, देखते ही देखते उस चौधरीपुत्र का गुस्सा और बढ़ गया और उसने आव देखा न ताव और उस ब्राह्मण कुमार को वहीं पटककर बहुत मारा। पंडीजी हाथ-पैर जोड़ते रहे, मिन्नतें करते रहे पर उस चौधरी कुमार ने ब्राह्मणकुमार को पीटना जारी रखा। बाद में गाँववालों के मान-मनौवल से झगड़ा शांत हुआ। पंडीजी रिस्तेदारी में न जाकर उस चौधरी के वहाँ गए और बेमन से सत्यनारायण भगवान की कथा बांची। चौधरी जी ने थोड़ा अपने पुत्र को डाँटा पर पंडीजी से भी कहा कि उन्हें भी एक ही बुलावे पर कथा बाँचने आ जाना चाहिए था। इधर पंडीजी के पुत्र को काफी चोटें आई थी, उसे काफी भीतरघाव लगा था और उसने खटिया पकड़ ली थी। उसे महीनों तक खाट पर पड़े रहना पड़ा और दूध में हल्दी डालकर पीना पड़ा। इस घटना के बाद से पंडीजी काफी टूट चुके थे और उदास रहा करते थे। अब तो उनके घरेलू कामों में उनका लड़का भी हाथ नहीं बँटा पा रहा था और अधिक समय आराम ही करता रहता था क्योंकि अब वह काफी कमजोर जैसा हो गया था।

खैर धीरे-धीरे करके 4-5 महीने बीत गए। पंडीजी के मन का घाव थोड़ा कम हो गया था और वे कथा-पोथी बाँचने के लिए फिर से गाँव-जवार में जाने लगे थे और साथ ही साथ उनके पास जो थोड़ी सी खेती-बाड़ी थी, उसे भी मेहनत से करने लगे थे। एकबार की बात है कि आषाढ़ का महीना था और पंडीजी भिनसहरे गाँव से दूर एक बगीचे के पास बियाड़ में पहुँच कर रोपनी के लिए बिया उखाड़ रहे थे। बिया उखाड़ते समय उन्हें सुर्ती (तंबाकू) खाने की इच्छा हुई। उन्होंने चुनौती निकाली और सुर्ती बनाने लगे। सुर्ती बनाने के बाद, खाने से पहले उन्होंने थोड़ी सी सुर्ती वहीं बगीचे में रहने वाले लंगोटिया बाबा को चढ़ा दी। (दरअसल पास के उस बगीचे में आम, महुआ और पीपल के कई सारे पेड़ थे। इन्हीं पेड़ों के बीच में एक श्रीफल का पेड़ भी था जो लंगोटिया बाबा का स्थान (थान) माना जाता था और गाँव के लोग समय-समय पर इस श्रीफल के पेड़ पर रहने वाले लंगोटिया बाबा की सेवा में जेवनार, जनेऊ आदि चढ़ाया करते थे और साथ ही गाँव-जवार के कुछ लोग, कुछ मनौती पूरा होने पर या मनौती पूरा होने के लिए इस श्रीफल के पेड़ पर लाल लंगोट बाँध दिया करते थे। ये लंगोटिया बाबा बहुत ही जगता माने जाते थे।) सुर्ती चढ़ाकर खाने के बाद पंडीजी फिर से बिया उखाड़ने में लग गए। कमजोर शरीर के चलते वे बिया उखाड़ते-उखाड़ते हाँफने लग जाते और बार-बार आराम करने के लिए बियाड़ से निकलकर मेड़ पर बैठ जाते।

एक बार मेड़ पर बैठकर पंडीजी सोचने लगे कि कास, उनके लड़के की तबियत-पानी ठीक होती तो उन्हें यह बिया नहीं उखाड़ना पड़ता क्योंकि उनका लड़का यह सब काम खुद ही कर दिया करता था पर जब से उसे चौधरी के मझले बेटे ने मारा था बेचारा बहुत ही कमजोर हो गया था। अभी पंडीजी मेड़ पर बैठे उदास मन से यही सब सोच रहे थे कि उनके सामने लाल लंगोट पहने हुई और कांधे पर मोटा जनेऊ लटकाए हुई, एक नौ फुट्टा दिव्य आत्मा प्रकट हो गई। उस आत्मा के शरीर से निकलती अद्वितीय आभा बहुत ही आकर्षक और दिव्य थी पर उस आत्मा को देखते ही पंडीजी थोड़ा डर गए। पंडीजी को समझ में नहीं आया कि क्या करें? बियाड़ के पानी से भीगे पंडीजी की शरीर पसीने से और भी भीग गई। वे मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ करने लगे। अचानक उस दिव्य आत्मा की आवाज गूँजी, “पंडित! डर मत। मैं तो लंगोटिया बाबा हूँ। तेरी सुर्ती खाने आ गया था। तेरे दुख से मैं भी बहुत दुखी हूँ। तेरा लड़का मेरा बहुत बड़ा भक्त था। प्रतिदिन मेरे थान की साफ-सफाई करता था। उसके साथ जो भी हुआ अच्छा नहीं हुआ पर तूँ अब निश्चिंत हो जा। मैं तेरी पूरी सहायता करूँगा।” इतना कहने के साथ ही उस दिव्य आत्मा ने वहीं खड़े-खड़े कहा कि, चलो जी, तुम लोग देखते क्या हो, बिया उखाड़ों और जल्द से जल्द इस पंडीजी के खेत में लेव आदि लगाकर रोपिया कर दो। पंडीजी तो अवाक होकर मेड़ पर ही बैठे रहे तभी क्या देखते हैं कि कुछ सदृश्य आत्माएँ, विकराल आत्माएँ जो भूत-प्रेत थीं, वहाँ प्रकट हो गईं और देखते ही देखते बिया उखाड़कर पंडीजी के खेत में लेव आदि लगाकर रोपनी भी कर दीं। इन सब कामों में 10 मिनट भी नहीं लगे। पंडीजी हैरान-परेसान यह सब देख रहे थे। दरअसल कुछ भूत-प्रेत ही बैल बनकर हल खींच रहे थे तो कुछ हरवाह बनकर खेत में लेव लगा रहे थे। अजीब नजारा था। यह सब करने के बाद भूत-प्रेत गायब हो गए और साथ ही लंगोटिया बाबा भी।

अब तो पंडीजी को अपनी खेती-बारी का कोई काम करना नहीं पड़ता। लंगोटिया बाबा भूत-प्रेतों से उनका सारा काम करवा देते थे। कहा तो यह भी जाता है कि भूत-प्रेत मनुष्य रूप में आकर दिन-रात पंडीजी के घर का काम भी कर देते थे। गाँव वालों को बहुत ही ताज्जुब होता कि जवार-पथार के बहुत सारे लोग पंडीजी के घर-गृहस्थी के कामों में हाथ बँटा रहे हैं। दरअसल ये भूत-प्रेत जवार के, आस-पास के गाँव के किसी व्यक्ति के रूप में आते थे। अब तो पंडीजी का लड़का भी थोड़ा तगड़ा होने लगा था और पंडीजी के कहने पर फिर से धीरे-धीरे लाठी के सहारे लंगोटिया बाबा के थान पर जाने लगा था।

नागपंचमी का दिन था और पंडीजी का लड़का सुबह-सुबह ही दूध-लावा चढ़ाने के लिए अपने खेतों के साथ ही लंगोटिया बाबा के थान पर पहुँचा। अचानक उसे चक्कर आ गया और वह लंगोटिया बाबा के थान के पास ही गिर गया। कुछ समय बाद उसे होश आया तो क्या देखता है कि एक दिव्य आत्मा (लंगोटिया बाबा) उसके पास बैठी हुई है। फिर क्या था, लंगोटिया बाबा ने उसे निडर बनने को कहा तथा साथ ही उस श्रीफल के पेड़ पर टंगे लंगोटों में से एक लंगोट भी उतारकर दिया तथा कहा कि बेटा आज घर जाकर तूँ इस लंगोट को पहन। उस ब्राह्मण कुमार ने लंगोटिया बाबा का धन्यवाद किया और घर पर आ गया। घर पर आने के बाद वह नमस्कार करके लंगोट पहना और फिर उसे पता नहीं क्या सूझा कि गाँव-घर के लोगों के साथ वह गाँव के बाहर के मैदान में चिक्का-कबड्डी खेलने के लिए चल पड़ा। उस मैदान में कुश्ती का आयोजन भी किया गया था। गाँव के वे ही चौधरीजी एक काठ-कुर्सी पर विराजमान थे और साथ ही उनके लड़के भी लंगोट पहने हुए अखाड़े की मिट्टी को अपने शरीर पर मल रहे थे। कुश्ती शुरू हुई और पहली कुश्ती के लिए चौधरी का मझला लड़का ही अखाड़े में जा खड़ा हुआ। उसकी कठ-काठी इतनी अच्छी थी कि किसी गाँववाले की हिम्मत ही नहीं होती थी कि उससे दो-दो हाथ कर ले। वह सांड़ की तरह अखाड़े में घूमता रहा और खुला चैलेंज देता रहा। इधर कठ-कुर्सी पर बैठे चौधरीजी मुस्कुराते हुए अपनी सफेद मूछों पर ताव देते रहे। अचानक वहाँ दर्शक बनी भीड़ को एक कौतुहल वाली घटना देखने को मिली। पंडीजी का वह घवाह, कमजोर लड़का अखाड़े में पहुँचकर चौधरीपुत्र से दो-दो हाथ करने के लिए बेताब नजर आ रहा था। अरे यह क्या, गाँव के कुछ लोगों के साथ ही चौधरीजी ने मना किया कि बेटा बाहर आ जाव। कुश्ती लड़ना तेरे बस की बात नहीं है। तूँ बहुत ही कमजोर है। बेकार के जोश में होश मत खोओ। पर वह पंडित कुमार मानने को तैयार ही नहीं था, सेर की तरह गुर्रा उठा कि अब तो इस अखाड़ें से दो-दो हाथ करने के बाद ही निकलूँगा।

चौधरी पुत्र हँसा और गर्व से बोला कि 4-5 महीने पहले ही तो तूझे घिसरा-घिसरा कर मारा था। क्या वह सब तूँ भूल गया और अब मरने के लिए अखाड़े में आ गया? ब्राह्मण कुमार कुछ नहीं बोला और ताल ठोंकने लगा। देखते ही देखते कुश्ती शुरू हो गई। कुश्ती शुरू होते ही ब्राह्मणकुमार में गजब की फुर्ती दिखने लगी। ऐसा लगने लगा कि वह कोई बहुत बड़ा, नामी, निपुण पहलवान हो। चौधरीपुत्र तो उसके सामने एकदम बौने नजर आने लगे क्योंकि 2-3 मिनट में ही ब्राह्मण कुमार की शरीर लंबी-चौड़ी हो गई थी। उसके मटमैले, पसीने से तर शरीर से गजब की आभा निकल रही थी। देखते ही देखते वह चौधरी पुत्र को पटककर उसकी छाती पर जा चढ़ा और गर्जन करने लगा। अरे यह क्या वह तो चौधरी कुमार को छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। अब क्या अखाड़ें में चौधरी के बाकी तीन पुत्र भी कूद पड़े और गाली देते हुए उस ब्राह्मण कुमार पर टूट पड़े। अरे क्या हो गया था उस ब्राह्मणकुमार को। मिनटों भी नहीं लगे और चौधरी के चारों पुत्रों को लसाड़ते हुए एक के ऊपर एक गाँजकर ब्राह्मण कुमार एकदम ऊपर बैठकर फिर चित्कारने लगा। अब तो वहाँ भयावह, भागदौड़ की स्थिति बन गई. कुछ कमजोर दिल वाले वहां से भाग भी चले। त्राहिमाम मच चुका था वहाँ। गाँववाले कितना भी अनुनय-विनय कर रहे थे पर ब्राह्मण कुमार उन चौधरी कुमारों को छोड़ ही नहीं रहा था और चारों चौधरी कुमार अधमरा हो गए थे। फिर क्या था, चौधरी के कहने पर कोई व्यक्ति गाँव की ओर दौड़कर पंडीजी को बुला लाया और फिर पंडीजी के सामने चौधरीजी गिड़गिड़ाने लगे। फिर पंडीजी के कहने पर ब्राह्मण कुमार ने चौधरी कुमारों को छोड़ा।

कहा जाता है कि इस घटना के बाद कई महीनों तक चौधरी के उन चारों कुमारों को बदाम-छोहारा खाना पड़ा था तथा हल्दीवाला दूध पीना पड़ा था। उस ब्राह्मण कुमार ने बुरी तरह से चौधरी कुमारों को तोड़कर रख दिया था। इस घटना के बाद से उस ब्राह्मण कुमार की गणना जवार-जिले के नामी पहेलवानों में होने लगी थी और वे उस लंगोट को पहनकर अच्छे-अच्छे पहेलवानों को धूल चटा दिया करते थे। उन्हें कई सारे पुरस्कारों से नवाजा गया और वे पहलवान शिरोमणि के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे आजीवन कुश्ती लड़ते रहे और कभी भी परास्त नहीं हुए। हाँ, पर साथ ही वे आजीवन उस लँगोटिया बाबा के थान की साफ-सफाई करने के साथ ही उनकी पूजा करते रहे। कहा तो यह भी जाता है कि इस पंडीजी के कई पुश्तों की सेवा भूत-प्रेत करते रहे और लंगोटिया बाबा की कृपा सदा इस परिवार पर, इस पंडीजी के वंश पर, कुल पर बनी रही। जय-जय।

-पं. प्रभाकर पांडेय गोपालपुरिया


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