एक मनहूसियत सी फैली थी उस कमरे में, मौत की मनहूसियत.

'तुम्हारे बिना मेरा कोई वजूद नहीं' कमरे की सन्नाटे को तोड़ती टिक टिक की आवाज़ कुछ पल को आयी. और फिर वही सन्नाटा. वो सन्नाटा उस कमरे के पुरे वजूद को निगल लेना चाहती थी.

“हा हा हा, तुम्हे लगता है तुम मुझसे दूर हो गयी हो, नहीं कभी नहीं, तुम मेरे भीतर हो. मेरे अस्तित्व में तुम्हारा अस्तित्व कैद है, मेरे बिना तुम कुछ नहीं कुछ भी नहीं" - करीब पांच मिनट बाद फिर वही टिक टिक.

एक हाथ में बियर की बोतल पकड़े और दूसरे हाथ से सिगरेट की कश खींचते हुए वो कमरे में चहल कदमी करने लगा. उसकी चाल उसका हाल बयां कर रही थी. लैपटॉप से आती मद्धम नीली प्रकाश के अलावा, रोशनी का और कोई निशान नहीं था वहां, या शायद जरुरत भी नहीं थी. और चारों तरफ फैली थी सिगरेट और शराब का दमघोंटू बदबू.

एक बेतरतीब सा बिस्तर एक कोने में परा हुआ था. जिसकी चद्दर गन्दगी में सन कर कबका अपना रंग खो चुकी थी. नारंगी फूलों वाली पिली चद्दर, जो वो पिछली बार ले कर आयी थी. पिछली बार नहीं, आखिरी बार. वो चद्दर जिसपर उसने लाल पेन से अपना और उसका नाम लिखा था, 'कोमल लव्स सौरभ'. वो पिली चादर, वो नारंगी फूल और वो लाल शब्द सब उस काली रात की कालिमा ओढ़े हुई थी.

वो एक बार फिर से उस चादर पर उन शब्दों को ढूंढने की कोशिश करता है. मगर उस मद्धम रोशनी में कुछ ठीक से दिखाई नहीं देता. वो लाइट जलाने के लिए हाथ बढ़ाता है, मगर फिर रुक जाता है. शायद डर रहा है की लाइट जलाये और वो शब्द न मिले तो? अभी कम से कम उनके होने की आशा तो है. मगर रोशनी में कहीं वो खो न जाएँ. वैसे ही, जैसे एक दिन अचानक, कोमल खो गयी थी. इंसानी दिमाग भी अजीब है, किसी के होने से ज्यादा कीमती उसके होने का एहसास लगता है.

अब बस यादें थीं, चारों तरफ बिखरी यादें. यादें, कोमल की, उन लम्हों की, वो खूबसूरत दिन जो कोमल के हाथों को थामे हुए गुजारे थे, और वो मदहोश रातें जो कोमल के बाँहों में बिताये थे. जो यादें कभी तनहा रातों में भी उसके दिल को सुकून दे जाते थे, अब उन यादों के साथ, रात नागफनी का बिस्तर सरीखा हो गया था. जिसके नुकीले कांटे उसके दिल को चीरते हुए उसके बदन के आर पार हो जाते. कोमल को गए आज चार महीने बीत गए थे.

……………………


कोमल से सौरभ दो साल पहले एक सोशल नेटवर्किंग की वेबसाइट पर मिला था. एक ग्रुप ज्वाइन करने का नोटिफिकेशन था. पेज खोलकर कर देखा, 'मुस्कुराहटों का खिलखिलाने दो'- कुछ दिल्ली वाले लोगों का ग्रुप जो खाली समय में, गरीब झुग्गी झोपड़ियों के बच्चों को मुफ्त में पढ़ाती थी. कोमल भी इसकी एक सदस्या थी.

सौरभ का ध्यान गया, कोमल की तस्वीर की तरफ. एक कपड़े में पूरी तरह कैद एक चेहरा, जिसमे से सिर्फ दो मासूम काली-काली ऑंखें झांक रही थी., जैसे कि बाकि चेहरे को दुनिया से दूर रहने की सजा सुना दी गयी हो. वो दूसरी बैंडिट क्वीन ही लग रही थी, बस बन्दूक और गंदे कपड़ों की कमी खल रही थी.

'क्या आपका चेहरा देख सकता हूँ' उसने मैसेज किया।

ऐसा अजीब मैसेज क्यों किया उसे भी नहीं पता था. बातचीत की शुरुवात ऐसी तो नहीं होती, होनी भी नहीं चाहिए, वो भी किसी अजनबी लड़की से पहली बातचीत. मगर शायद उसके मन में यही था, जो सीधे सीधे उसके शब्दों में उतर आया था. उधर से कोई जवाब तो नहीं आया, मगर एक नोटिफिकेशन आया की कोमल ने अपनी प्रोफाइल फोटो बदली है.

तस्वीर देखते ही सौरभ अपने होश खो बैठा. बहुत सी खूबसूरत लड़कियां देखि थी उसने, मगर इस तस्वीर में एक अजीब सा आकर्षण था. इस चेहरे में एक सौम्यता थी, एक ताजगी था. बड़ी-बड़ी काली, पनइली ऑंखें, पतली सुतवा नाक, मोठे गुलाबी होंठ, और होठों के ऊपर एक मोटा काला तिल. शायद ऐसे ही चेहरे के लिए कहा गया है कि- 'कुदरत ने बड़ी फुर्सत में बनाया है'. सौरभ को तो एक ही नजर में उस तस्वीर से प्यार हो गया. और हो भी क्यों नहीं, गालों पे बिखर आये, लटों के बीच उसकी तस्वीर ऐसी ही लग रही थी, जैसे अजंता की मूरत रंगीन लिबास पहन कर आयी हो.

सौरभ तो इस तस्वीर को ही दिल दे बैठा, मगर तस्वीर वाली के साथ बात आगे कैसे बढे? ना तो उनके बीच कोई कॉमन फ्रेंड था, न ही कोई कॉमन इंटरेस्ट. दोनों के शहर भी अलग अलग; कहाँ सौरभ बैंगलोर में था तो कोमल दिल्ली में. सौरभ जहाँ इंजीनियर था तो कोमल साहित्य की छात्रा. ले दे कर एक ही कड़ी बचती थी दोनों के बिच में, समाज के लिए कुछ करने का जज्बा, और इसका रास्ता था उस ग्रुप से होकर. अतः सौरभ ने ग्रुप ज्वाइन कर लिया.

ग्रुप में अपना इंटरेस्ट जताते हुए उसने एक छोटा सा सन्देश टाइप किया-

"इस ग्रुप के द्वारा आप लोगों की कोशिश ये दर्शाती है कि, बिना हथियार उठाये या बिना असेम्बलीज़ में गए भी, अपने देश और समाज के लिए हम बहुत कुछ कर सकते हैं. मेरा सौभाग्य होगा यदि इस महान कार्य में मेरा भी कुछ योगदान हो. जैसा की कंप्यूटर चलाना आज एक आवश्यकता बन गयी है, और मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, अतः इस दिशा में मैं अपना योगदान रखने की हार्दिक इच्छा रखता हूँ.”

सौरभ ने सन्देश को एक बार पढ़ा, दो बार पढ़ा, बार बार पढ़ा; शब्दों को अदल-बदल कर ठीक किया. ये एक छोटा सा सन्देश लिखने में उसे करीब दस मिनट लगे. वैसे तो वो हर दिन एक-दो मेल जरूर लिखता था, कभी क्लाइंट को तो कभी मैनेजर को. बनावटी शब्दों से सामने वाले को उलझाने में तो वो माहिर था. लेकिन आज एक वाक्य लिखना इतना मुश्किल हो रहा था जैसे कि माशूका को पहला प्रेम पत्र लिख रहा हो. वैसे ये प्रेम पत्र से कम भी न था. आखिर प्रेम का आगाज़ हो रहा था, भले ही सिर्फ एक तरफ से.

उस दिन संदेश का कोई उत्तर न आया, और सौरभ को रात इंतज़ार और सिगरेट के साथ ही बिताना पड़ा. अगले दिन ऑफिस पहुँच कर कंप्यूटर ऑन किया और सबसे पहले अपन अकाउंट देखा.


बड़े ही सुंदर हिंदी शब्दों का प्रयोग कर धन्यवाद देते हुए, मदद की पेशकश के लिए कृतज्ञता जताई गयी थी.

धन्यवाद व माफ़ कीजिये, दो ऐसे जादुई शब्द हैं की, मुस्कुराते होठों से निकले और सामने वाला आपका कायल. और यदि कहने वाले होठ किसी खूबसूरत महिला के हों व सुनने वाले कान किसी पुरुष के तो सुनने वाला कायल नहीं अपितु घायल हो जाता है.

पहले ग्रुप का परिचय, फिर कोमल जी का परिचय, पहले काम की बातें, फिर होते होते निजी बातें. और इस तरह वे दोनों भी उस काल्पनिक लोक के वासी हो गए, जहाँ सबकुछ रंगीन और खूबसूरत है. बड़ी बड़ी मायावी बातों के जाल, कौन सच्चा और कौन झूठा, समझाना बड़ा मुश्किल. मगर फिर भी सब दौड़ रहे इस मायावी दुनिया में अपनी छाप बनाने के पीछे. जानते बूझते की ये काल्पनिक दुनिया है, बहुत से आवरण ओढ़े, चेहरों पे चेहरे, मगर फिर भी सब खुश हैं, इसका हिस्सा बन कर. शायद यही इस दुनिया की पहचान है, ढेर साड़ी हंसी-ख़ुशी और खिलखिलाहट, चाहे असली या फिर नकली, परवाह किसे है.

और इसी तरह उस काल्पनिक दुनिया में दो भौतिक जीवों की दोस्ती शुरू हो गयी. और जब दोस्ती दो जवान, विपरीत लिंगधारी के बीच हो, तो पूरी कायनात इस तमाशे का लुफ्त उठाने में लग जाती है.

……………………


इनकी मित्रता, मित्रता के विभिन पायदानों को चढ़ती हुई, प्रगाढ़ मित्रता से होती हुई, प्रेम की मंजिल पर जाकर ही रुकी. मगर साड़ी समस्या तो यही है, की प्रेम की किस्मत में मंज़िल ही तो नहीं होती. और जो मंज़िल पा लिया, तो फिर प्रेम नहीं रह जाता है. प्रेम तो अनवरत और अनंतकाल तक बस चलते चले जाना है. खैर कोमल और शौरभ भी प्रेम नाम की ऐसी ही एक माया में लिप्त हो चुके थे.

प्रेम के इस हिंडोले में झूलते एक वर्ष कैसे व्यतीत हुए, इसका उन्हें आभाष भी न हुआ. अभी तक उनकी साड़ी बातें संदेशों एवं फ़ोन के माध्यम से ही होती थी. लगभग २००० किलोमीटर की दूरी व कोमल का अत्यधिक मर्यादा परायण होना, दो सबसे महत्वपूर्ण कारण थे, जिसने इस स्थिति को अभी तक कायम रखा था. सौरभ तो कबसे तड़प रहा था उस चाँद का दीदार अपनी आँखों से करने को, मगर कोमल कोई न कोई बहाना कर हमेसा मना करती रही. दो बार तो सौरभ के हवाई यात्रा के पैसे भी बेकार हो गए, तब जा कर उसे अकल आयी की उसने देशी चिड़िया फँसायी है, इतनी जल्दी हाथ न डालने देगी.


मगर चूँकि ये उनके प्रेम की प्रथम साल गिरह थी, और प्यार का खुमार भी जोरों पर था, सो, इस बार उसने प्यार की ऐसी दुहाई दी कि, कोमल का कठोर ह्रदय भी मोम की तरह पिघल गया. वो मिलने को राजी तो हो गयी, मगर शर्त ये कि वो आएगी सौरभ के शहर, उसके घर. वैसे सौरभ नहीं चाहता था, की कोमल इतनी दूर अकेले आये. मगर दिल की मुराद पूरी करने के लिए थोड़ा रिस्क तो लेना ही परता है. और प्यार तो खेल ही है रिस्क का. कुड़ी पटाने से लेकट घरवालों को मानाने तक, जितनी मशकत ये प्यार करवाता है, उतनी मेहनत करके तो लोग ओलम्पिक में स्वर्ण पदक ले आएं. सो आखिरकार सौरभ मान गया.

केम्पेगौडा हवाई अड्डा - काफी खूबसूरत और चहल-पहल से भरा. सौरभ तीन घंटे पहले ही पहुँच गया था, और क्यों नहीं, आज उसके जान की जान जो आनेवाली थी.

सौरभ की बेचैनी जितनी बढती जा रही थी, घडी की सुई उसी अनुपात में धीमे हुई जा रही थी, जैसे की उसका उपहास कर रही हो. सिगरेट, मैगज़ीन, इंटरनेट, धीरे धीरे सबने हार मन ली, मगर कम्बखत इंतज़ार था की ख़तम होने का नाम ही नहीं ले रहा था. और आखिर वो इंतज़ार, इनाम बन कर सामने आयी. और जब आयी तब समझ में आया कि इंतज़ार का फल मीठा का तो पता नहीं, मगर बेहद खूबसूरत जरूर होता है. ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया भर की सुंदरता बस उस पांच फुट छह इंच के कद में आकर सिमट गयी हो.

पीली सूट पहने, चेहरे पर आ रही लटों को कान के पीछे टांकते हुए, और होठों पर दुनिया जहाँ की सारी मुस्कराहट समेटे, वो उसके सामने खड़ी थी. सौरभ का मन तो हुआ कि जोर से उसे गले लगा ले और अपनी बाँहों में छुपा ले, ताकि पूरी दुनिया की नजर से छुप जाये उसकी कोमल. मगर वहां की भीड़ और भारतीय संस्कारों ने प्रेमी की इच्छा को दबोचे रखने में बढ़िया काम किया.

……………………


कोमल का स्वागत, अपने घर में सौरभ ने वैसे ही किया जैसे एक नववधू का, ससुराल में, पहली बार, पदार्पण पर किया जाता है. कोमल को बिस्तर पर बिठा, उसके सामने घुटनो पर बैठकर सौरभ ने अपने प्यार का इज़हार किया-

"कोमल मैं तुम्हे हमेसा के लिए पाना चाहता हूँ, एक प्रेमिका की तरह नहीं, बल्कि मेरी जीवनसंगिनी के रूप में. क्या मैं इस लायक हूँ की मेरी अर्धांगिनी बन कर तुम मुझे पूरा करोगी. “

कोमल कुछ बोल न सकी, बस उसके आँखों से टपकते गरम गरम बूँद मौन स्वीकृति दे रहे थे. कोमल ने अपना सर सौरभ के कंधे पर टिका दिया, और सौरभ ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया. और धीरे धीरे उनका वजूद एक दूसरे में समता चला गया.

उनके प्रेम में वासना न थी, बल्कि पूजा था; अधिकार न थी, बल्कि समर्पण था. उनका प्रेम तो सदाबहार फूल की तरह था, जिसे बस छू दो और वो एक दूसरे के पैरों में बिछ जायं। प्रेम दो आत्माओं का सर्वश्रेष्ठ व सुन्दरतम मिलन, जिसमे दो प्रेमी एक दूसरे में खुद को खो देते हैं. वो प्रेम नूर ही था जो राधा के रूप लावण्य को दमकाता था, तो वहीँ वो प्रेम ही था जो मीरा के स्वर में जादू सा भर जाता था. प्रेम योगी का तेज तो उसके ललाट को सूर्य किरणों सा दमकता है.

……………………


देखते देखते इस खूबसूरत रिश्ते को एक बरस और लग गया, मगर कहते हैं न खूबसूरती को नज़र लग जाती है. और सौरभ के प्यार पे तो किसी ने गिद्ध की नजर डाल रखी थी.

वो शुक्रवार की रात थी, जब मनहूसियत ने सौरभ के किस्मत पर दस्तक दी थी. वो मनहूसियत जिसने धीरे धीरे उसके पुरे वजूद को खुद में दफ़न कर लिया. सौरभ उस दिन बहुत खुश था. “अगले दो दिन छुट्टी, आज पूरी रात कोमल से बातें करूँगा.” घर में घुसते ही उसने कोमल को फ़ोन लगाया, रिंग तो जा रही थी, मगर कोमल ने फ़ोन नहीं उठाया.

एक बार, दो बार, तीन बार, फिर एक घंटे, दो घंटे तीन घंटे... फिर कब सौरभ की आंख लग गयी, उसे पता ही नहीं चला. सुबह ऑफिस के कपड़ों में ही, फ़ोन हाथ में लिए सोफे पर से उठा, और फिर रात का सिलसिला सुरु हुआ. सौरभ फ़ोन लगाता रहा, और उधर रिंग जाती रही. सौरभ को किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी, मगर वो अपने मन को तसल्ली देता रहा. कई सन्देश भी छोड़े, मोबाइल पर, उसके अकाउंट पर; मगर उस तरफ से कोई जवाब न आया.

सबसे बड़ी परेशानी ये थी की, कोमल सौरभ के जिंदगी में एक रहस्य की तरह थी. उसे ये तो पता था की वो पंजाब से है, और दिल्ली में पढाई करती है, मगर इसके अलावा उसके पास ऐसी कोई जानकारी न थी, जिससे वो कोमल तक पहुँच सके. इंटरनेट की रहस्यमयी दुनिया सा बन गया था सौरभ का प्यार भी. वो अचानक आयी, इतना प्यार दिया और अचानक ही चली गयी.

क्या वो सचमुच प्यार था, या सब एक छलावा था. क्या वो उसके दिल से, उसके प्यार से खेल रही थी, और जब उसका मन इस खेल से भर गया, तो उसके दिल को पुराने खिलोने की तरह छोर गयी. या अब इस खेल में उसने, अपना साथी खिलाडी बदल लिया था. सौरभ को कुछ समझ तो नहीं आ रहा था, बस इतना पता था की, अब वो दिल की दुनिया का लुटा हुआ फ़कीर है.

……………………


कोमल को गए आज चार महीने बीत गए थे. चार महीने में भी सौरभ कोमल के धोखे से बाहर न आ सका. बल्कि हर बीतते दिन के साथ वो इस गर्त में और गिरता चला जा रहा था. वो कोमल से नफरत करना चाहता था, उसे सजा देना चाहता था, उसे भूल जाना चाहता था, मगर वो जितना कोशिश करता, उसके दिल के एहसास अजगर की भांति उसे और कसते चले जाते.

खाने पिने से ले कर जीने तक अब कोई चाह नहीं बची थी. दिन- रात बराबर ही दारू की बोतल और सिगरेट के छल्लों के नाम हो गए थें. उसे देख कर लगता जैसे कबसे बीमार हो. पीला चेहरा, धंसी हुई ऑंखें, बढ़ी हुई दाढ़ी। दिल की बेतरतीबी दिमाग पर चढ़ी जा रही थी, गन्दी नाली के गंदे पानी की तरह उमड़-उमड़ कर उसके पुरे जीवन को नरक बना रही थी.

देर रात तक शराब पीकर जैसे तैसे सोता, सुबह अगर समय पर उठ पता तो, रात के ही कपड़ों में ऑफिस चला जाता. ऑफिस जाकर भी कोई काम तो उसे हो नहीं पता था, बस दूसरों के लिए चटपटी खबर बनकर रह जाता.

प्रेम को पाना जितना सुखद है, उसका चले जाना उससे बहुत ज्यादा दुखद. अगर सफल रहा तो अमृत, और यदि विफल रहा तो ये वो हलाहल बन जाता है जिसे संभालना स्वयं शिवजी के बस की भी बात नहीं, तो एक तुच्छ मानव की औकात ही क्या है. मगर फिर भी, फिर भी... सब जानते-समझते हम इसकी चंगुल में फंस जाते हैं. कभी कभी तो लगता है, बड़े कुटिल और निर्दय हैं ये प्रेम-देव.

सौरभ भी बुरी तरह से छटपटा रहा था, इस हलाहल के असर से. हालत ऐसी की यदि जान चली जाय, तो शायद थोड़ी चैन आय. और आज की रात शायद उसकी ये इच्छा पूरी ही कर दे.

आज की रात कुछ ज्यादा ही गहरी थी, और उतनी ही गहरी उसकी तड़प. वो एक बार उसे देखना चाहता था, उससे पूछना चाहता था की आखिर उसने ऐसा क्यों किया।

"तुम कहीं भी रहो, मुझसे भाग नहीं सकती... मुझसे खुद को अलग नहीं कर सकती, मेरा बिना तुम अधूरी हो... आधी हो तुम बस आधी... और अधूरी” उसने फिर से कोमल के अकाउंट में मैसेज भेजा.


कोमल के जाने के बाद कुछ समय तक तो वो कोमल को सन्देश भेजता रहा, इस इंतज़ार में की शायद जवाब आये. मगर जब उसे कोमल के धोखे का यकीन हो गया तो उसने मैसेज करना बंद कर दिया. मगर आज इतने समय के बाद जाने क्या सोच कर वो अपने मन की बातें कोमल के अकाउंट पर लिखता गया...

और तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी उसने कल्पना तो नहीं की थी, मगर चाह जरूर रखता था. कोमल के अकाउंट पर जवाब आया.

सौरभ को तो अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था. उसे समझ नहीं आ रहा था, जो इतने दिन से उसके साथ हो रहा वो सपना था या जो अब हो रहा है वो सपना है. मगर सच हो या सपना, सौरभ के लिए दुनिया के सुन्दरतम चीजों से भी सुन्दर था वो पल. वो तो चाहता था की बस उसकी सांसें थम जय, और इस पल के बाद और कोई भी पल उसकी जिंदगी में न आय.

सन्देश में लिखा था-

"सौरभ, ये नाम मेरे लिए बस नाम नहीं, बल्कि मेरी पहचान बन चुकी है, मेरा वजूद बन चूका है. भले दुनिया को न पता हो मगर तुम तो जानते हो तुम्हारे वाम भाग में मेरा ही स्थान है.

मुझे माफ़ करना जो मैं इतने दिन तुमसे दूर रही. मगर मेरे प्रेम को कभी गलत न समझना। मेरा प्रेम सच्चा है, ये रिश्ता पवित्र है. लेकिन तुम्हारी कोमल न अब खूबसूरत रही न ही पवित्र. उन गंदी नज़रों ने मेरे तन को भीतर तक नंगा कर दिया, उन गंदे हाथों ने मेरे अंग-अंग को नोच डाला, और उन लपटों में चेहरे के साथ मेरे सपनो और मेरी खुशियों को भी जला डाला.

जिस चहरे का तुम दीवाने हुआ करते थे, तेज़ाब की लपटों ने उसका वो हाल किया की अगर कोई एक बार देख ले तो, सपने में भी उसकी रूह कांप जाय. अब तो मैं तुम्हारे कदमो में बिछने के लायक भी न रही, फिर तुम्हारी बाँहों में सोने के सपने कैसे देख सकती हूँ.

मैं जहाँ भी रहूं, तुम्हारा प्यार हमेशा मेरे साथ रहेगा। मगर कृपा करके तुम मुझे ढूंढने की कोशिश न करना. मैं तुम्हारा सामना न कर पाऊँगी. किस्मत के इस सितम को तो मैं झेल गयी, मगर तुम्हारी नज़रों में अपने लिए प्यार की जगह दया न देख पाऊँगी.

मेरी तुमसे बस एक ही गुजारिश है, हमेसा खुश रहो, क्युकी तुम्हारी ख़ुशी ही कल भी मेरी सबसे बड़ी चाह थी और आज भी है. मेरी ख़ुशी और मेरे प्यार की खातिर तुम जिंदगी में आगे बढ़ना.

तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी.”

सौरभ सर पकड़ कर बैठ गया. पूरा कमरा उसके चरों तरफ घूमने लगा. और उसके कानो में कोमल की चीत्कार. दर्द भरी चीत्कार और छटपटाहट गूंजने लगी.

"ये सब कैसे हुआ? कब हुआ? तुमने कुछ बताया क्यों नहीं?"

"कोमल तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो? तुम आज भी उतनी ही पवित्र और उतनी ही खूबसूरत हो, मेरी आँखों से देखो"

"तुम्हारे बिना मैं जी नहीं पाऊँगी, दया करके तुम मेरे पास आ जाओ.”

"मेरे लिए मेरे पास आ जाओ कोमल, अपने सौरभ के लिए मेरे पास आ जाओ.”

"तुम्हे तो मैंने अर्धांगिनी बनाया था, जीवनसंगिनी हो तुम मेरी, फिर आज मुझे अधूरा करके तुम कैसे जा सकती हो?"

"एक बार मेरे पास आ जाओ की मैं तुम्हे बता सकूँ, तुम्हारे बिना मैं कुछ नहीं, कुछ भी नहीं"

सौरभ एक के बाद एक मैसेज भेजता रहा, मगर कोमल फिर पहले की तरह चुप हो गयी थी. शायद हमेशा के लिए. सौरभ का मन हाहाकार कर रहा था. 'उफ़ इतना दर्द, इतनी तकलीफ... उसने कैसी उठाये होंगे. जब उसे मेरी इतनी जरुरत थी, तो मैं अपनी ही झूठी दुनिया में डूबा रहा, उसे कोसता रहा.

खुशियां संग बाँटें, मगर उसका दर्द न बाँट सका." सौरभ पागल हुए जा रहा था, कभी कोमल के दर्द में डूब जाता तो कभी उसके साथ ये सब करने वाले की सोच कर मन आक्रोश से भर उठता.

"नहीं, मैं ऐसे ही चुप नहीं बैठ सकता. मुझे कुछ करना होगा. मगर क्या करूँ? कैसे बदला लूँ कोमल की इस हालत का, कैसे कम करूँ उसका दर्द?" उसका मन हो रहा था की पूरी दुनिया को आग लगा दे. अचानक ही वो हर किसी को इन सबका जिम्मेद्दार मानने लगा था, हर किसी से नफरत सा करने लगा था. मगर उसे समझ में नहीं आ रहा था की वो क्या करे. कितना बेबस और छोटा महसूस कर रहा था वो उस समय. कोमल ने उसे धोखा दिया ये सोच कर शायद वो कभी तसल्ली भी कर लेता, मगर अब इस तरह सबकुछ जानते हुए. सच में कितना कमज़ोर है इंसान परिस्थितियों के आगे, क्या उसके बस में कुछ भी नहीं?

कोमल का चेहरा उसकी आँखों के सामने गोल-गोल घूम रहा था, खूबसूरत, खिलखिलाता चेहरा, फिर अचानक वो चेहरा धु-धु कर जलने लगा, चिल्लाने लगा, कितना दर्द था उन आँखों में. फिर खूबसूरत चेहरा और जला चेहरा एक दूसरे में घुसने लगे, फिर और बहुत सारे जले हुए चेहरे, पिघलते, खून रिसते, घाव से भरे चेहरे, कभी दर्द से चिल्लाते, कभी सिसकते, कभी लाल-पिली आँखों से घूरते.

सौरभ को लगा वो पागल हो जायेगा। एक के बाद एक बियर की छह बोतलें उसने खाली कर दी, मगर वो चहरे उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहे थें. सचमुच आज की रात बहुत मनहूस थी, शायद उसकी जान ले कर ही मानेगी.

……………………


कमरे में पहुंचते ही सौरभ अपने बिस्तर पर जा गिरा. बाहें खोल कर एक लम्बी साँस ली, और उस कमरे की हवा को अपनी सांसों में भर लिया.

कोमल को गए तीन साल बीत चुके थे. मगर इस कमरे में आज भी उसकी खुशबू फैली हुई थी. सौरभ के लिए तो ये कल की ही बात थी, जब कोमल इसी बिस्तर पर उसके सीने पर सर रख कर लेटा करती थी, या खिड़की के सामने खड़ी हो, चाय सुड़ुपते हुए बड़ी बड़ी आँखों से उससे घूरा करती थी.

इस कमरे में कोमल की यादों को वैसे ही सहेज कर रखा गया था, जैसा वो छोर गयी थी. और ये कमरा सौरभ का मंदिर था, जहाँ आकर उसे सुकून मिलता, ख़ुशी मिलती, और आगे बढ़ने व अपनी कोमल के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिलती.

वो अभी अभी एक मीटिंग अटेंड कर के आया था. एक बहुत बड़ी कंपनी सौरभ के NGO 'कोमल- मुक्त सौंदर्य’ को एक बहुत बड़ी रकम देने के लिए तैयार हो गयी थी. 'कोमल- मुक्त सौंदर्य’ एक इंटरनेट बेस्ड NGO थी, जो एसिड अटैक से पीड़ित लड़कियों व उनकी मदद करने वालों को जोड़ती थी. ये एसिड अटैक से जुड़े विभिन्न सूचनाओं को लोगों तक पहुंचती, पीड़ितों को सरकारी मदद प्राप्त करने में सहायत करती. सब कुछ इंटरनेट बेस्ड था, मगर हर केस सौरभ व्यकतिगत तौर पर देखता था.


ये NGO उन लड़कियों को आत्म निर्भर होने के लिए प्रेरित करती व उनके लिए काम की, तो कुछ अन्यों के विवाह की भी व्यवस्था कर चुकी थी. इसका सबसे प्रमुख प्रयोजन उन लड़कियों को अवसाद से निकाल कर फिर से मुख्य धारा में जोड़ना व आतम निर्भर बनाना था.

लगभग तीन सालों में ये NGO ५० से अधिक लड़कियों की जिंदगी संवार चूका था, कइयों को तो मानो दूसरा जन्म ही मिला था.

सौरभ लैपटॉप खोल कर अपन मेल देखने लगा. उसके वेबसाइट पर एक नया टेस्टीमोनी आया था. जिसमे लिखा था-

"मेरी दो माँ हैं, एक जिसने मुझे जन्म दिया, दूसरी कोमल, जिसने मुझे ये नयी जिंदगी दी"

टेस्टीमोनी पढ़कर सौरभ सोचने लगा, "क्या सचमे मैं किसी को जिंदगी देने के काबिल हूँ?" अब वो किसी को क्या समझाए, कि इन लोगों में तो वो खुद की जिंदगी ढूंढता है, अपनी कोमल से मिलता है. कैसे बताये की जिंदगी तो उसे मिलती है, जब भी वो किसी एसिड पीड़िता को फिर से जिंदगी पर भरोसा दिलाता है. और शायद एक दिन अपनी कोमल को भी भरोसा दिला सके की वो उसकी जिंदगी में अहमियत नहीं रखती, बल्कि वही उसकी जिंदगी है.

कमरे में अभी भी बस लैपटॉप की मद्धिम नीली प्रकाश थी, मगर वहां जीवन का एक अनंत प्रकाश भी फैला था. दारू और सिगरेट की जगह प्रेम और सेवा की सुगन्धि फैली हुई थी. और कोने में वही बिस्तर परा था, जहाँ आज भी रोज कोमल उससे मिलने आती थी, उसके सपनो में.

फिर रोज़ की तरह आज भी सौरभ अपने दिन भर का व्योरा कोमल को मैसेज करने लगा. वो जनता था, बाकि दुनिया के साथ-साथ, इंटरनेट की ये डोर उसे एक ऐसे मशीन से भी जोड़ती है, जिसके दूसरी तरफ कोमल बैठी है. जो उसकी बातें सुन रही है, उसे महसूस कर रही है, और उसके लिए बहुत सारा प्यार भेज रही है.

हर प्रेम कहानी की पूर्णता नायक-नायिका के मिल जाने पर ही नहीं होती. कुछ प्रेम ही इतना महान होता है कि, वो अपने आप में ही पूर्णता को समेटे हुए है. ऐसे भी पा लेना प्रेम नहीं; पाने की जिद्द तो स्वार्थ के रास्ते पर ले जाती है. प्रेम तो बस एक एहसास है, जो आत्मा में बसती है, और आमरण साथ निभाती है.

सौरभ ने अपने प्यार को कभी खोने नहीं दिया। वो उसे हर दिन जीता, हर दिन अपने प्यार को प्यार करता। अब यही उसकी दुनिया थी और यही उसका सपना.

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