नई पहल


मन में संकोच था आज राज को ,बहुत देर मन ही मन भूमिका बना कर आखिर उसने हिम्मत जुटाई और बोला --बेटा विकास तुम से कुछ कहना है,तभी प्रिया चाय का प्याला लिए आई..विकास बोला-डैडी आप कुछ कह रहे थे?क्यों कोई परेशानी है आपको,तबियत तो ठीक है ना आपकी ?रात को नींद तो आई ना आपको?उफ्फ्फ…….उसने इतने प्रश्न सुन मैं अपनी बात के लिए ही भ्रमित हो गया….. फिर एक नजर राज ने प्रिया पर फेरी तो विकास ने बोला बोलिये तो सही….ये भी अपनी ही है डैडी..

बेटा मैं जो बोलूँगा उसको बिना समझे कुछ भी मत बोलना ,देख बेटा जब तुम 5 साल के तभी रजनी (विकास की माँ)हमारी जिंदगी से चली गई थी,तब तुम्हारी परवरिश में मैंने माँ-पिता दोनों की भूमिका निभाई,आज तुम्हारी माँ जब तुम्हे ऊपर से देखती होगी तो चैन की सास लेती होगी, डैडी क्या हुआ आपको आज ….हमसे कोई गलती हुए ….आप कहना क्या चाहते है…..विकास चिंतित हो बोला…

बेटा अब मै एक साथी चाहता हूँ, उम्र के इस पड़ाव में बहुत अकेलापन लगता है,तुम और प्रिया मेरा बहुत खयाल रखते हो,पर अगले साल तुम दोनों 3 साल के लिए जर्मनी जा रहे हो..और मैं फिर अकेला हो जाऊँगा….

विकास सुन कर निशब्द हो गया…कभी मन सहमत/असहमत में होता ….रहा, फिर बोला पर ये क्या संभव है डैडी?तभी प्रिया बीच में बोल पड़ी-डैडी जी बिलकुल सही कह रहे है विकास ,हम क्यू ना इस बारे में सोचे …और वार्तालाप थम गया,

कुछ 1 माह तक इस पर कोई चर्चा नही यथावत दिनचर्या चलती रही ।तभी प्रिया के दूर के रिश्ते की बुआजी(दिव्या) का फोन आया की वो भी इस शहर में मकान खरीदना चाहती है वो (बाल विधवा है वो),नोकरी से रिटायर्ड हो चूंकि है,तब प्रिया ने उन्हें अपने घर पर ही बुला लिया और उन्हें मदद करने का आश्वासन दिया..

कुछ दिन में वो आई विकास और प्रिया अपने काम पर जाते ,राज ,और दिव्या मकान देखने जाने लगे,दिव्या उनका ख्याल रखती समय पर दवाई जूस दोपहर की चाय सब करती और राज और दिव्या के बीच एक परिपक्व दोस्ती हो गई, राज को भी मन में नई दोस्ती की उमंग थी,दिव्या को राज में अपनेपन का अहसास होने लगा,समय बीतता गया, 2 महीने हो गए।

जब काम से लौट कर प्रिया घर आती तो उसे एक खुशनुमा वातावरण मिलने लगा, और कुछ आहट भी हुई उसके मन में, डैडी और बुआजी की दोस्ती को नए रूप देने का विचार मन में घर करने लगा… विकास के आते ही उसने अपने मन की बात बताई …विकास सोच में पड़ गया बोला देखते है यार….

विकास रात को ठीक से सो नही पाया सोचता रहा …..सुबह जब डैडी को बुआजी के लिए चाय बनाते देख और फिर उनके बीच स्वस्थ वार्तालाप सुन कर उसने अपने निर्णय पर मन ही मन मोहर लगा दी और गुनगुनाता हुआ बाथरूम की और चल दिया।

ऑफिस जाते विकास ने कहा डैडी आज मुझे आपसे कुछ कहना है…राज बोले-बोलो बेटा ..आपने मुझे अकेलेपन के लिए मुझ से कहा था, मुझे लगता है अब हमें इस विषय पर बात करनी चाहिए?बुआजी की ओर इंगित कर होले से मुस्कुरा दिया,डैडी भी छुईमुई जैसे हो आँखे मिला न सके,दिव्या भी मन ही मन सारी बात समझ गई, प्रिया तो फ़्रिज से मिठाई ले आई और मिनटों में सब हो गया ,

आज विकास प्रिया ने अपने डैडी को एक हमसफ़र दे कर बेहद शांति महसूस कर रहे थे।

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