दो भाई थे. मोटु और छोटु. उनकी मा अब ईस दुनिया में नहीं थी. बाप था, पर उसे अपने कामधंधे की पडी थी.

दोनो बच्चो में छोटा लडका, छोटु हर समय अपने पिता की उपेक्षा सहता रहता था. कभी कभी तो उसे मार भी पडती थी. लेकिन वह बेचारा सब कुछ सह लेता था.
एक दिन दोनो को सोने की मुहरे देकर पिताजी ने मेले में भेजा और कहा, ‘मुझे यह देखना है कि तुम दोनो यह पैसो से क्या खरीद कर लाते हो ?’
मोटु पहुंचा मेले में, और अपने मौजशौक के लिए सारे पैसा उडा दिये.
छोटु मेले में जाने के लिए नीकला. रास्ते में जंगल पडता था. उसे जंगल में घुमना और खासकर पंछीओ को देखना, उनसे बातें करना अच्छा लगता था. उसे पंछीओ की भाषा की थोडी बहुत जानकारी थी लेकिन वह हंमेशा सोचता था कि अगर उसे पंछीओ की पूरी भाषा सीखने को मिले तो...और एसा मौका उसे अब मिला तो छोटु ने पिताजी ने दिये हुए पैसो से पंछीओ की भाषा जानने वाले एक विद्वान से पंछीओं की भाषा ठीकठाक तरह से सीख ली.
जैसे ही वह पिताजी से मिलने पहुंचा उन्होने छोटु के मेले के अनुभव के बारे में कुछ नहीं पूछा. स्वभावगत सीधे ही छोटु पर गरज पडे.
जब छोटु ने उनसे कहा, ‘पिताजी, मै पक्षीओ की भाषा सीख कर आया हूं.’
जैसे ही यह शब्द सुने की वह गुस्से में ही बोल पडे, ‘मूर्ख बनाने के लिए कोई और नहीं मिला था, क्या? कोई पक्षोओ की भाषा सीख शक्ता है क्या, बडे ?’ उन्होने बडे बेटे से पूछा.
‘जी नहीं, पिताजी. जैसे पशुओ की भाषा कोई नहीं सिख सक्ता एसे ही पंछीओ की भाषा भी कोई नहीं सीख सक्ता.’ बडा तो हरहंमेश छोटे के खिलाफ खडे होने में ही गर्व महसूस करता था.
‘सुना ? बडे ने क्या कहा.? देख यह तेरा बडा भाई, मेले में गया, कुछ नहीं खरीदा तो कोई बात नहीं ! लेकिन मेले में आनंदप्रमोद तो कर के लौटा.’
‘पिताजी एसा नहीं है. मैंने सही में पंछीओं की भाषा सीखी है. ’
‘अच्छा..तो चल बता ! सामने पेड पर बैठा वह पक्षी क्या बोल रहा है..? बता, बता...सीखा है तो..! झिझकता क्यूं है ?’
‘पिताजी, मुझे न पूछे तो अच्छा. क्योंकि अभी में सच भी बोलूंगा फिर भी आप उसे सच नहीं मानेंगे.’
और अभी छोटु बोल ही रहा था कि पिताजी ने सोटी उठाई और उसे लगा दी. सट्टाक...सट्टाक...एक बार नहीं, दो बार.
तभी, मार खाने से पंछी जो बात कर रहा है वह बोल देना अच्छा, एसा सोचकर छोटु बोला, ‘रूको पिताजी, बताता हूं.’
पिताजी की सोटी वहीं अटक गई. छोटु ने बताया की पंछी क्या बोल रहे थे..
‘पंछी बात कर रहे है की एक दिन छोटु राजा बनेगा और मोटु उसके राज्य में नौकरी करेगा. उस के पिता छोटु के लिए हाथ में पानी और तौलिया लेकर खडे रहेंगे छोटु की सेवा में.’
अपने बारे में ऐसी अनापसनाप बात सुनकर कौन बाप होगा जो आग बबूला न होगा.! जो सोटी रूक गई थी वह फिर चल पडी. पिताजीने छोटु को ईतना पीटा, ईतना पीटा की जब तक वह अपनी सुधबुध न खो बैठा, तब तक पीटते ही रहे.
पिताजी को लगा कि इन दोनो को किसी और के पास ही व्यापार के लिए प्रशिक्षित करवाना होगा. उन्हो ने दोनो को बुलाया और समजाकर अपने दोस्त व्यापारी के वहां भेजा. साथ में एक चिठ्ठी अपने दोस्त व्यापारी के नाम लिख दी.
दोनो भाई व्यापारी के यहां पहुंचे. व्यापारीने उन्हे जमीन खुदाई के सामान के साथ पहाडी पर भेजा. काम था, वहां से मिट्टी लाने का. साथ मे लालच भी दी की एक गमला मिट्टी की एक सोने की मुहर मिलेगी.
दोनो भाई जैसे तैसे पहाडी की चोटी तक पहुंचे. लेकिन वहां खुदाई करते तो भी कैसे करते..?..वहां तो जगह जगह पर पंछीओ के घोंसले थे.! उन में से कुछ में उनके अंडे भी थे और कुछ में छोटेछोटे बच्चे.
उसी समय कही से वहां पर अचानक एक चिडीया आ गई. उसने अपनी भाषा में चीं..चीं..चीं..करके चहकना शुरू कर दिया. चिडीया की चहक सुन कर छोटुने बडे भाई मोटु को खुदाई करने से मना कर दिया. लेकिन बडा एसे थोडी मानता छोटे की बात..?
मोटु बोल पडा, ‘अरे कैसी मूर्खताभरी बात कर रहा है रे तु..? तुं अपना काम कर, मुझे अपना काम करने दे. सोने की मुहर मिलनेवाली है, समजा ! चिडीया अपना घोंसला कहीं और बना लेगी, उसे कहां किराया देना है जगह का..हम्म. और उस के अंडे तूटे या उसके बच्चे मरे, उससे हमें क्या लेनेदेना, भाई..हमें तो अपने काम से काम.’
लेकिन छोटुने तो समज ली थी पंछी की बातें. वह तुरन्त ही सब कुछ वहीं छोडकर नीकल पडा, समुद्र की ओर. मोटुने उसे रोकने की कोशिश न की, और नहीं छोटु ने अपने साथे मोटु को चले आने की जीद.
समुद्र के किनारे एक बडा सा जहाज खडा था. छोटु उस के कप्तान से मिला और कुछ काम मांगा. छोटु को यहां अब अपना भविष्य नहीं दिखाई दे रहा था. उसे कहीं ओर जाकर अपना किस्मत आजमाना था. कप्तान के पास एक नाविक भी खडा था. उसने छोटु को पहचाना और उसका परिचय देते हुए कप्तान को कहा, ‘यह छोटु है, वह पंछीओ की भाषा भी जानता है कप्तान जी ! सफर में उसे साथ रख लें. हमे बीच समुद्र में काफी मददगार सिद्ध होगा.’
और एसा ही हुआ. बीच समुद्र में जब भी जहाज अपने रास्ते से भटक जाता था तो छोटु अपनी पंछीओ की भाषा जानने की विशेष योग्यता से यह पता कर लेता था कि किस तरफ जाना बहेतर है. कप्तान भी उस पर खुश था.
समय का चक्र घुमता रहा. छोटु अपनी समुद्री सफर तय करने के बाद वापिस वहीं आया जहां से पहाडी की खुदाई छोडकर वह भाग गया था. उस राज्य का राजा बहुत ही शक्तिशाली एवं संपत्तिवान था. लेकिन कौंओ की धमाल से वह परेशान हो चूका था.
तीन कौंए का एक गेंग था, जो कि हररोज राजा के आसपास मंडराता रहता था...और अपने अंदाज में संगीत के सूर छेडता रहता था..उनकी कांव..कांव..से राजा समेत उसके सभी सुरक्षाकर्मी भी परेशान हो चूके थे. कौए ईतने शातिर थे कि राजा की पूरी दिनचर्या का उन्हे ठीकठीक पता था. जैसे ही राजा की आंख लगती थी या फिर वह थोडा आराम करने के लिए जाता था, तभी तीनो कौंए धाबा बोल देते थे. रात को भी राजा के शयनकक्ष के पास आकर कौंए कोहराम मचा देते थे. कौंओ की पसंद के खाने से लेकर अपने शक्तिशाली सैन्य बल के प्रयोग से उन्हे भगाने के सभी उपाय राजा कर चूका था लेकिन परिणाम उस के हित में नही आया था.
तभी किसी समजदार मंत्रीने सुझाव दिया की ‘राजाजी, क्यों न वह कहानीओं में आता है वह उपाय किया जाय..?’
‘कौन सा कहानीओंवाला उपाय ? मंत्रीजी,...पहेलीयां न बुजाईये.! कितने दिनो से में चैन की निंद नहीं सोया हूं...वक्त कम है..एसा ही चलता रहा तो बिना निंद लिए हम गहरी नींद में सो जायेगे. बताए, बेजिजक बताये..क्या है उपाय ? वह कहानीओवाला !’
‘राजाजी, जब भी किसी कहानी में एसी मुश्कील समस्या आती थी तो कहानी में एक शर्त रखी जाती थी. जो भी समस्या को हल करेगा उस के साथ राजकुंवरी की शादी कि जायेगी और उसे राजगद्दी का वारिस भी घोषित किय़ा जायेगा.’ एक सांस में मंत्रीजी ने अपना सुझाव पेश कर दिया.
राजा अपने चतुर मंत्रीनी बुध्धिमत्ता पर आफ्रिन हो गया. उसने भी सोचा कि अभी तो मैं जिन्दा हूं. और कौंओ की समस्या के हल के साथ अगर राजकुंवरी को अच्छा पति और राज्य को एक बहादुर बुद्धिमान शासक मिलता है तो क्या हर्ज है..!
और, राज्य में घोषणा की गई..
उसी समय अपनी समुद्रयात्रा से छोटु वापिस आया था. उसे बडा भाई मोटु भी वहीं मिला.
मोटु को लगा की जैसे जहाज के किस्से से छोटु को कीर्ति एवं एश्वर्य प्राप्त हुआ है वैसे ही यह मौका उसके लिए है. उसने कौओं को भगाने की चुनौती को स्वीकार करने की मन ही मन में ठान ली.
लेकिन उस घोषणा में एक और शर्त भी थी जो छोटुने सुनी थी लेकिन राजकुंवरी से ब्याह रचाने के ख्वाब बुन रहे मोटुने सुनी, अनसुनी कर दी थी. घोषणा में आगे यह कहा गया था कि अगर कौओ को भगाने में जो भी पूरी तरह से कामियाब न हुआ तो उसे बीच बाजार में शूली पर लटका कर मृत्युदंड दिया जायेगा.
छोटुने बडे भाई को रोकने की कोशिश तो कि थी लेकिन मोटु कहां मानता.! उसे लगा की छोटे को उस के हाथ लगी यह जैकपोट से जलन हो रही है.
मोटु ने चुनौती स्वीकार ली लेकिन वह मृत्युदंड की शर्त से अनजान था. जब काफि प्रयास करने पर भी मोटु कौओं को भगा नहीं सका तो उसने अपनी हार स्वीकार कर ली. तुरन्त ही राजा ने उसे मृत्युदंड की सजा सुना दी.
बडे भाई को मौत की सजा होने से मोटु चिंतित हो गया. उसने न चाहते हुए भी यह चुनौती को स्वीकार कर, भाई की जान बचाने का संकल्प किया. जैसे ही कौए आये छोटुने उनसे उनकी ही कांव..कांव..की भाषा में बात की. राजा भी यह देखकर, सुनकर हैरान रह गया. थोडी ही देर में तीनो कौए वहां से चले गये. राजा ने चैन की सांस ली.
राजा बेहद खुश हुआ. इनाम के उपरांत भी छोटु को कुछ मागने को कहा. छोटुने अपने बडे भाई मोटु को सजा से मुक्ति देने के लिए राजा से बिनती की. कौओं की समस्या से छुटकारा दिलानेवाले को राजा जब अपनी बेटी एव राज्य देने को राजी था तो फिर एक कैदी को छोडने में उसे क्या आपत्ति हो सक्ती थी.
लेकिन राज्य का कानून था कि यदि सजा माफ हो जाये तो फिर वह कैदी को राज्य के अस्तबल में रहकर अपना बाकी का जिवन व्यतित करना पडेगा. एसे मोटु जेल से सीधा अस्तबल में पहुंच गया. छोटु राजकुंवरी से ब्याह रचाकर राज्य का उत्तराधिकारी बन गया.
समय का चक्र फिर आगे बढा. कुछ साल बाद छोटु राजा बना. एक दिन एक वृद्ध राजदरबार में आया. उसे यह उम्र में भी अपने जिवनव्यापन के लिए कुछ काम करनेकी आवश्यकता थी. उस की हालत देखकर छोटुने अपने राजमहल में उन्हे रख लिया.
शाम को जब छोटु खाना खाने पहुंचा तो हाथ में पानी का लोटा एवं तौलिया लिए वही वृद्ध खडा था. उस की आंख में आंसु थे..तो छोटु पूछ बैठा.. ‘क्यों रो रहे है आप ? अब तो आप राजसेवा में है..कोई दुःख नहीं है ना अब ?’
‘मेरा बेटा पंछीओ की भाषा जानता था. एक दिन उसने कहा था कि वह राजा बनेगा और मैं उस को सामने पानी का लोटा और तौलिया लेकर खडा होउंगा. मैं तो वह मकाम तक पहुंच चुका हूं लेकिन मेरा बेटा...पता नहीं कहां होगा, वह राजा हुआ या नहीं...’
वृद्ध की बात सुनकर छोटु तुरन्त ही अपने आसन से उठ खडा हुआ और उनके पैर छुते हुए बोला, ‘पिताजी मैं हूं छोटु..! आपका छोटु.’
दोनो की आंखो में से अविरत अश्रुधारा बह रही थी..


-परीक्षित जोशी

(मातृभारती राष्ट्रीय कहानी स्पर्धा में विजेता कृति)

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