सुबह के योगा  क्लासिस ख़तम कर के जैसे ही मै वापिस आयी, घडी सात पचपन दिखा रही थी. मैं फुर्ती से उपरी माले पहुँच गई जहाँ मेरी और रूममेट्स बालकनी में जमा हुई थी. बल्कि उनमे से कोई भी १० बजे से पहले उठने वालों में से नहीं थी. मैं हल्का सा चौक गई. फिर सोचा की पक्का बाहर कुछ हुआ होगा वही देखने सब कठ्थी हुई हैं.  मै उन्ही की ओर बढ़ रही थी की मेरे कमरे के अध् खुले दरवाजे पर मेरी आँखे चली गई. खिड़कियाँ बंध होने के बावजूद मेरे कमरे में इतनी रोशनी क्यूँ है ? जहाँ दोपहर के समय भी बत्ती जलाकर रखनी पड़ती है वहा ये क्या है सब ...मैं कुछ भी समझ नहीं पा रही थी. गर्मियों  के इतने सख्त दिनों में मेरे कमरे के आधे खुले दरवाजे से आ रहे ठंडी हवा के जौके ने  मुझे और उलज़ा के रख दिया.  मैं तय नहीं कर पा रही थी की पहले बालकनी में जाऊं या मेरे रूम को देखू. बाहर देखा तो वो सब गजब ही उत्साह से बातों में उलझी हुई थी. कुछ चिंतामय भी दिख रही थी. सुबह का आठ बजे वाला शोर बकोर भी नहीं हो रहा था. ना कामवाली आई थी न कूक आया था. मैंने दो बार आवाज लगाई, जो उनको आराम से सुनाई दे रही थी फिर वह मेरी और क्यूँ नहीं देख रही थी ? क्या चल रहा है यह सब ? पिछले एक घंटे में एसा तो क्या हो गया था की सब कुछ नया सा अंजान सा लग रहा था.

तय कर के कमरे की ओर आगे बढ़ी तो आधे दरवाजे से  देखा की एक छोटी सी मकड़ी के पीछे एक चिपकली जमीन पर इधर उधर भागे जा रही है. कहीं से दूसरी चिपकली भी दीवाल से उन दोनों के बिलकुल बिच में आ गिरी. मैं धृणा और डर से कांप उठी. मेरे कमरे में चीटी तक नहीं आती है.  लेकिन फिर भी वो कमरा चहक क्यों रहा था. क्या हो रहा था!!!! मै हिम्मत जुटा कर मेरे कमरे में दाखिल हुई तो देखा की सोफे पर निराली अकेली बैठ कर दीवाल को घूर रही थी. कमरे के अन्दर आते ही एसा लगा की जैसे किसीने मुझे ड्रग्स दे दिए हो. सब कुछ दिख रहा था वो अनजान और अजीब था लेकिन मन क्यूँ का जवाब ढूंढने को हरगीज तैयार न था. मै जैसे उस नयी परिस्थति में सालों से रह रही हूँ एसा लगा. मै निराली के दाई ओर आकर बैठ गई. निराली ने मेरी ओर देखा फिर मेरे गालों को सहलाया और फिर हाथ में पेन थमा दी. वो शायद कुछ लिखने को मुझे बोल रही थी. मै ने पेन को उठा लिया बिना कुछ पूँछे जाने की क्या लिखना है किधर लिखना है. मैं ने उसके बाल जो  उसके गले के आगे बिखरे हुए थे उसको हलके से उठाकर के पीछे किया. और उसके गले के बिलकुल निचे मैं ने कुछ नंबर लिखने शुरू कर दिए. मै जो भी कर रही थी वो जैसे पहले से तय था एसा लग रहा था.

जानती थी जो कुछ भी हो रहा था लेकिन मन जैसे मोक्ष प्राप्त कर गया हो कुछ सोचना ही नहीं चाहता था!

निराली मेरे कानों की ओर खिंच सी गई और एकदम मीठी आवाज में बोली " यही वो जगह और यही वो पल है, दिव्या !!"

मैंने आँखे उठाकर अपने आसपास देखा तो सब चीज़े हवा में पाई. सारी चीज़े जैसे सालों से काम कर के एकदम से मुक्त हो रही थी. पानी की बोतल गमले से टकरा रही थी और मेरे चश्मे किताबों से. लेकिन टकराने की आवाजें नहीं आ रही थी. बचपन में जब तैरना सिख रही थी और कुछ पलों के लिए डूब गई थी तब भी एसा ही लगा था. दीवालों पर मकड़ियाँ रंगीन  जालें १०० गुनी तेजी से बुने जा रही थी. मन कर रहा था उनका गोला बनाकर अलमारी में रख दूँ. बुढिया के बाल जैसे में सबसे छिपाकर के रख देती हूँ. पर क्या ये जालियां भी उतनी ही मीठी होगी? जैसे जैसे समय बीत रहा था मैं और भी ज्यादा खुल रही थी और समझ रही थी. मैं ने सोफे से उठने पैर जमीन पर रखे तो फर्श पर बहुत सी सौगादे बिखरी पड़ी थी. वो वही सब कुछ था जो मै बरसों से पाना चाहती थी लेकिन न मिलने पर भूल गई थी. जैसे लिखाई में सुगंध देने वाली 'ज़ि पेन'... जैसे पर्ल का नेकलेस... जैसे महेंदी का कोन... रिचीरिच की किताबें ...जैसे अद्वैत की टी-शर्ट जो उसने मुझे पहनाई थी...अद्वैत को मै बहुत प्यार करती हूँ, मैंने बताया भी था उसे , लेकिन वो नहीं करता. 

अचानक से लगा की कोई मेरे बालों को सहला रहा है जैसे दीदी सहलाती थी हररोज रात को जब तक मै सो न जाऊ.  मैं ने मुड कर देखा तो अद्वैत खड़ा था. मेरी ख़ुशी मेरे मुहं पर साफ़ दिखाई दे रही थी. मैं ने अद्वैत से पूछना चाहा की हम कहाँ है? यह सब क्या चल रहा है? मै पूछ ही तो रही थी लेकिन वो बस हँसे जा रहा था. मै दौड़कर के उसकी  बाँहों में समा जाना चाहती थी. लेकिन तब मेरी आँखों के सामने से एक गुब्बारा गुजरा. जिस पर लिखा था -' क्या तुम हररोज आओगी यहाँ ?' मै पूछ रही हूँ " कहाँ ?"  तो चिपकलियाँ हंस पड़ी. फिर से मै सोफे में जा कर के बैठ गई. निराली को मैंने पूछा " तुम तो फिफ्थ स्टैण्डर्ड में हुआ करती थी मेरे साथ वही हो ना?" वो बोली" हाँ, लेकिन आज तू बस में क्यू नहीं दिखी ? मैने आज भी तेरे लिए जगह बचाकर के रखी थी"....उतने मे मम्मी की आवाज सुनाई दी " आज ही अगर असैन्मेंट ख़तम कर लेगी तो शाम को कुरकुरे ला कर के दूंगी "....अद्वैत की ओर  देखा  मैंने. जो मुझे कभी न देखता था, वो करीब एक घंटे से इस कमरे में मेरी और देखकर हँसे जा रहा था. उसने मुझे चूमा भी... मै ने जब आँखे बंध कर ली तो उसने मुझे उसके कसिले सिने में जकड लिया. मै यहाँ से कही और जाना न चाहती थी की पैरों के गिले होने का अहसास हुआ. देखा तो सेंडी पैरो को चाट रहा था. मैं ने उससे कुछ न पूछा, क्यूंकि कोई कुछ जवाब ही नहीं दे रहा था!!!  पर वह बारह साल में जरा भी बड़ा न हुआ था. 

" इसका जवाब लिख यहाँ " किसी भारी आवाज ने मेरा ध्यान बटोरा. मै १९ की गिनती याद क्यों नहीं कर पा रही थी. मै ने मुँह फेर लिया. अद्वैत होता तो यूँ जवाब दे देता. इतना इंटलीजंत वो कैसे हो सकता है ? मन करता है मै भी उसके जैसी बन जाऊ.  

" दिव्या, तू हमेशा लडकों के साथ ही क्यू रहती है, क्या सहेली मिलना इतना मुश्किल है ?" यह तो अनुराधा आंटी की आवाज थी पक्का.

" फिर से विमान को देख कर मेरे पास भागी आई , दिव्या तू पाईलट बन जा ....." 

" कितनी बार बोला है की अँधेरे में भगवान जी सो रहे होते है...पता नहीं इतना क्यू डरती हो ?" 

" इतना पढेगी तो एकदिन सर फट जायेगा...कम सोचा कर " 

"अकेले रहने से डरती क्यू हो इतना, बड़ा हो जाने पर सबको अकेला हो जाना है"

बस्स्सस्स्स्सस्स्स...................................

अब और नहीं......................................

मै कुछ करू उससे पहले ही कामवाली ने पूछा " मैडम, दूध उबलना है ? और गीज़र भी ऑन कर दूँ ?

जान में जान आई.  पलट कर घडी देखी तो ८ बह रहे थे.......................................

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