नन्हा फरिश्ता

ठाठें मारता समन्दर सामने हिचकोले ले रहा था। लहरें मानो आँख - मिचौली का खेल खेलतीं गम्भीर सागर के सीने में नटखट बच्चों सी धमाचौकड़ी मचा रही थीं। विशाल समन्दर मानो किसी सफेद बालों और झुर्रियों वाले बूढ़े सा इन चंचल लहरों की शरारतें देख उपेक्षा से कभी सिर हिला देता और कभी कोफ्त होकर उन्हें घुड़क देता तो कभी - कभी अपनी उम्र भूलकर उनके खेल में खुद भी रम जाता। तब और अधिक उत्साह से लबरेज ये लहरें शोर मचाती तेजी से दौड़ती हुई तट पर दूर तक दौड़ लगा देतीं और फिर वापस हँसती हुईं उसकी गोद में फिर से समा जातीं। बूढ़ा सागर मुसकरा कर उन्हें पुचकार देता। उनका ये खेल चलता ही रहता बिना थके रात - दिन, हर पल, हर क्षण। हाँ, रफ्तार कभी तेज, बहुत तेज और कभी धीमी हो जाती। मानो संसार का नियम निभाने का भार उसी की बेचैन छाती पर लदा हो।

आभा तट पर बैठी न जाने कब से मानो चुपचाप सागर के बहाने संसार की गति समझने की कोशिश में लगी थी। अचानक उसका मन बहुत उदास हो गया। ऐसे ही कितनी शामें समन्दर के किनारे यूँ ही घंटों बैठे - बैठे उसने और वैभव ने गुजारी थीं। ऐसे में वे न के बराबर कुछ बोलते थे। लगता था जैसे उनके मौन में ही वह सब कुछ कहा - सुना जा सकता है जो शब्दों में बयान करना संभव नहीं। वैसे भी ये सागर, ये लहरें वो सब बोल देते जो वो सुनना चाहते थे, महसूसना चाहते थे। जब वह मुम्बई के एक प्रसिद्ध कॉलेज से एम.बी.ए. कर रहे थे और दोस्ती की कच्ची डोर प्रेम की डोर में पक रही थी, तब वे अकसर यहाँ आते थे पर आज आभा अकेली थी। इन लहरों सा ही लगातार कुछ अन्दर उमड़ रहा था, फिर झटके में टूटकर बिखर रहा था। वह टूट रही थी टुकड़े - टुकड़े, बिखर रही थी बूँद - बूँद। उसका मन कर रहा था इन्हीं सागर की लहरों में समाकर सदा - सदा के लिए उन्हीं का हिस्सा बन जाने का।

आज सुबह से ही एक के बाद एक घटी घटनाएँ उसका मूड बहुत खराब कर चुकी थीं। न चाहते हुए भी शाम तक वह गहरे अवसाद में थी। आज बच्चों के स्कूल की अचानक छुट्टी हो गई थी, कल रात ही मेड को उसने जल्दी घर आने को कहा था और ठीक से समझाया था कि उसे दफ्तर हर हाल में समय पर पहुँचना था जिससे कि कई दिन पहले शेड्यूलड जरूरी मीटिंग वह अटेंड कर सके।

'मैं बिलकुल टेम पर पहुँच जाएगी मेडम, आप चिन्ता न करो!'

आभा को तसल्ली थी क्योंकि मीना ने कभी अब तक ऐन मौके पर धोखा नहीं दिया था पर आज होनी थी तो हुआ ही। ऐन मौके पर उसका बच्चा सीढियों से गिरकर बुरी तरह घायल हो गया। जैसे - तैसे मरहम पट्टी कराकर वह एक घंटे लेट घर आई। उसकी हालत देख आभा उसे कुछ कह भी नहीं पाई। आठ साल की रिद्धि और पाँच साल के आधार को उसके हवाले कर वह दफ्तर भागी पर मुम्बई में पाँच मिनट की देरी होने का मतलब था कि ट्रैफिक की कृपा से घंटों की देरी। उससे बचने के लिए आभा ने मेट्रो का सहारा लिया और हर जतन करके भी गिरते - पड़ते मीटिंग में एक घण्टा लेट पहुँची। वहाँ पहुँचकर देखा कि हड़बड़ी में काम की फाइल घर पर ही छूट गई और गलती से दूसरी फाइल उठा लाई थी। किसी तरह पेन ड्राइव में स्टोर डेटा से काम चलाया। पर मीटिंग में बॉस ने सबके सामने ही जिनमें उसके अधीनस्थ भी थे, उसे वह सब कह दिया जिसे सुनकर वह कटकर रह गई। उसने सफाई देने की कोशिश की तो उन्होंने सुना दिया,

'आप औरतों से जब काम सँभलता नहीं तो नौकरी क्यों करती हैं? भई! बच्चे ही सँभालिए, क्यों दुनिया जहान की टेंशन पाल रखी है। मेड समय पर नहीं पहुँची, यह दफ्तर की जिम्मेदारी तो है नहीं।'

आभा अपनी झल्लाहट और मजबूरी चुपचाप पी गई। जब से ये नए बॉस आए हैं, इस तरह का व्यवहार आम हो गया है और आज तो उनके पास पूरा मौका था। आज सबके सामने कैसे चूक जाते? आभा पिछले दस सालों से इस कम्पनी में काम कर रही है। उसकी मेहनत, लगन और अच्छे काम की हर कोई कद्र करता है, इसी की वजह से तेजी से तरक्की करती वह मार्केटिंग मैनेजर के पद तक पहुँच चुकी है। अब तक सीनियर्स को उसने शिकायत का मौका नहीं दिया। हर टारगेट समय से पहले पूरा पर ये नये बॉस मि. वर्मा पहले ही दिन से पता नहीं क्यों, उससे खार खाए बैठे हैं। हर बात पर नुक्ता - चीनी, टोका - टाकी। किसी भी काम से खुश नहीं। पहले आभा की पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझते हुए और उसके अच्छे काम को देखते हुए सीनियर्स उसके दफ्तर आने - जाने के समय को लेकर सख्ती नहीं बरतते थे। हालांकि आभा ने कभी मुँह खोलकर किसी से अनुनय - विनय नहीं किया। उसकी किस्मत थी कि पहले दस साल लगातार उदार और समझदार सीनियर्स मिलते रहे जिन्हें उसके काम से मतलब होता था पर अब तो जैसे पिछले दस वर्षों की कसर पूरी हो रही थी। वैभव, उसके पति, घर होकर भी नहीं होते थे। दो साल पहले उसने बेहतर ऑफर देखकर नौकरी बदल ली थी। उसका जॉब प्रोफाइल ऐसा था कि महीने में मुश्किल से आठ - दस दिन से ज़्यादा वह शहर में रह ही नहीं पाते थे। नतीजा ये था कि बच्चों और घर की पूरी जिम्मेदारी अकेली आभा के कंधों पर ही रहती थी।

कामवालियों के भरोसे घर चल रहा था, बच्चे पल रहे थे। ऐसा नहीं था कि घर - परिवार में कोई नहीं था। सास - ससुर थे, माँ - बाप थे पर आभा को किसी से कोई उम्मीद नहीं थी। किसी के पास एक सप्ताह से अधिक समय नहीं होता था। कभी आते भी तो टूरिस्ट की तरह, घूमे - फिरे, आभा की जीवनशैली और पालन - पोषण में खामियाँ गिना वापस हो लिए। उनके जाने के बाद आभा चैन की साँस लेती, पर सास की जली - कटी बातें बहुत दिनों तक उसका मन दुखाती रहतीं। माँ से तो वह साफ - साफ कुछ भी कह देती। पर सास की ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिस्पर्धा की बू से रची - बसी बातें और ताने उसकी अन्तरात्मा घायल कर जाते। वह जानती है कि उनके बेटे वैभव की पसंद आभा उन्हें कभी नहीं सुहाई, तभी तो पहली मुलाकात में ही नफरत से उसके मुँह पर ही कह दिया था, 'मेरा ही बेटा मिला था फाँसने को। सुन्दर, पढ़ा - लिखा देख कर फँसा लिया और माँ - बाप को भी लड़का ढूँढने से फुर्सत मिली, तभी तो चट से मान गए। अच्छा लड़का, कोठी, कार और क्या चाहिए उन्हें?' आभा इस अपमान के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि वैभव की माँ इतने निम्न स्तर की सोच रखती हैं। उसका मन हुआ, दूर चली जाए वैभव से, कौन झेलेगा ज़िन्दगी भर ये सब। ऐसे संबंध में प्रेम और अपनापन कहाँ? पर किसी से गहरे जुड़ गए रिश्ते को एक झटके में तोड़ना आसान नहीं होता।

उसने अब तक अपने माँ - पिता के यहाँ एक मस्तमौला ज़िन्दगी जी थी। कभी उसे लड़की होने के कारण हेय या किसी से कम नहीं आँका गया था। हमेशा ये घुट्टी पिलाई गई कि खूब पढ़ो - लिखो, लायक बनो। तो वह पढ़ती गई और अब उस लायक बन गई थी कि माँ - पिता गौरान्वित थे। पर शायद भगवान हर बात में संतुलन बना कर चलते हैं। माँ - पिता ने उसे अगर अब तक समाज में लड़की होने का मतलब समाज में दोयम दर्जा होने का एहसास नहीं कराया था तो यह कसर शादी के बाद पूरी होनी थी। सास कदम - कदम पर उसे एहसास दिलाती कि वह एक औरत है और इसलिए कितना भी पढ़ - लिख जाए, ऊँचे ओहदे पर पहुँच जाए, है तो वह पैर की जूती ही। वह बेटे की माँ हैं तो उनका अधिकार है कि वह उसे और उसके माँ - बाप को किसी भी बात पर अपमानित करें। वह साफ कहतीं,

'होगी ऊँचे पद पर! मेरी तो बहू है! मेरे आगे क्या बिसात! हमने बेटा पैदाकर २५ बरस तक ऐसे ही नहीं पाला!!'

आभा के लिए ऐसी बातें, ऐसा व्यवहार नया अनुभव था। उसे समझ में नहीं आता था कि यह सब बोलना तो दूर कोई सोच भी क्यों रहा है? क्या वह पैदा नहीं हुई, उसे नहीं पाला गया? उसकी पढ़ाई-लिखाई में नहीं खर्च किया गया? पर यहाँ ऐसी सोच वाली औरत से कुछ कहना ही बेकार था, कुछ कहा नहीं कि पूरा आसमान सिर पर उठा लिया गया, फिर तो धाराप्रवाह ऐसी - ऐसी बातें सुनने को मिलतीं जो उसे किसी अजूबे से कम नहीं लगतीं। यहाँ बोलने का अधिकार नहीं था, बहू बनते ही औरत बुद्धिहीन, मूर्ख और बेवकूफ की श्रेणी में आ जाती थी जिसकी योग्यता का पैमाना केवल खाना बनाना और नौकरानी बन घर सँभालना था बस। घर - बार सँभालना आभा को कभी बुरा काम नहीं लगा बल्कि एक बेहद जरूरी जिम्मेदारी लगती थी पर इस तरह अपमानजनक तरीके से यह बात थोपना उसे सचमुच नागवार गुजरता। उसे समझ में नहीं आता था, वह उसके साथ कौन सी फ्रस्टेशन निकालतीं हैं। इतनी नफरत थी तो शादी के लिए साफ मना कर देतीं। पर दुनिया में दिखाने के लिए हाँ कर ही दी है तो नफरत का बीज क्यों पाल - पोस रही हैं। इन सब बातों से कई - कई दिन वह गहरे अवसाद में डूब जाती। वैभव से कुछ कहने का कोई लाभ नहीं था, पहले तो वह कुछ सुनने को तैयार नहीं होता और अगर सुन भी लेता तो कह देता कि उसे एडजस्ट करना चाहिए। उसे लगता, वह कहाँ फँस गई? कई बार उसके दिमाग में विचार आया कि वैभव को तलाक दे दे, फुरसत मिले इन सबसे। जरूरत क्या है ये सब झेलने की? यही सब झेलना है, कदम - कदम पर अपमानित होना है तो क्या फायदा पढ़ - लिखकर अपने पैरों पर खड़े होकर।

कई बार उसे लगता, उसका उच्चशिक्षित होना, काबिल होना एक बहुत बड़ा अवगुण है जो उसकी सास के मन में अनावश्यक जलन और प्रतिस्पर्धा पैदा कर उन्हें उसका अपमान करने, नीचा दिखाने के लिए बार - बार उकसाता है। वह सामान्य पढ़ी - लिखी, सामान्य लड़की होती तो शायद उनके अहंकार और उच्च भाव का आसानी से तुष्टिकरण हो जाता। वह उन्हें समझने की कोशिश करती पर ऐसे लोगों को समझना - समझाना इतना आसान नहीं और वैसे भी उनके नियम कानून अपने और बेटियों के लिए कुछ और बहू आभा के लिए कुछ और थे। खुद वह अपने भाई - बहनों, नाते - रिश्तेदारों से घिरी रहतीं और चाहती कि आभा उन सबके पैरों पर गिरी रहे पर कभी भूल से भी उसके माता - पिता या भाई - बहनों का जिक्र आ जाए तो उनका मुँह टेढ़ा हो जाता जैसे वह अनाथ पैदा हुई, पली - बढ़ी हो। उम्मीद बिल्कुल एक पुरातनपंथी सास के जैसी की, वह मुँह - अँधेरे उठकर हर काम कर डाले। गाहे - बगाहे वह अपने कार्य - कौशल का बखान करती रहतीं और उसे नीचा दिखाने का कोई अवसर नहीं चूकतीं। हर समय उसके चलने, बैठने, खाने, कोई काम करने पर उनकी तीखी निगाह टिकी रहती जैसे वह कोई चिड़ियाघर का जानवर हो।

उस दमघोटूँ वातावरण से वह अन्दर ही अन्दर टूटने लगी थी, उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगा था। इस सबका असर उसके और वैभव के रिश्ते पर पड़ने लगा था। उसे लगता, उसकी यह स्थिति वैभव के कारण ही है। न वह उससे शादी करती, न ऐसे नकारात्मक लोग उसके जीवन में आते। उसे अब समझ में आने लगा था कि औरत को ही औरत का दुश्मन क्यों कहा जाता है। वह सोचती, अगर सास ही शादी के बाद असली माँ का झूठा दम्भ भरने के बजाय बहू को बहू और सामान्य इंसान समझ ले न कि अपनी सनक और बदला निकालने का जरिया तो औरतों के हालात में बहुत हद तक सुधार की संभावना बनी रहे। पर यहाँ तो कमोबेश हर घर में यही हाल है जो उसकी सास उसे दम्भ से कहतीं हैं,

'साँप में तो एक ही ‘स’ होता है पर सास में तो दो - दो ‘स’ होते हैं।'

इस ब्रह्म वाक्य को इतने गर्व से दुहराते रहने का निहितार्थ समझना अब उसे मुश्किल नहीं लगता था। एक स्वतंत्र विचारों वाली आत्मनिर्भर स्त्री सबसे पहले औरतों की ही आँख में किरकिरी बन चुभती है।

उसे राहत तब मिली जब उसे और वैभव दोनों को एक साथ मुम्बई में एक ही कम्पनी में अच्छी जॉब के ऑफर मिल गए। वे दोनों ही जल्द से जल्द दिल्ली से मुंबई शिफ्ट कर गए। ये अच्छा ही हुआ वरना उनके मजबूत रिश्ते में कब की तीखी दरार पड़ चुकी थी जो धीरे - धीरे गहराती जा रही थी। ये उनके टूटते रिश्ते को सँभालने का अच्छा अवसर था। इस मामले में आभा ने सास के पैंतरों पर बहुत सफाई से बचाव कर लिया। उनकी तिकड़में कि 'तुझे यहीं जॉब करनी चाहिए, घर - परिवार की सेवा करनी चाहिए, वैभव बीच - बीच में आता - जाता रहेगा', असफल रहीं।

मुम्बई में ज़िन्दगी आसान नहीं थी। पर अब वो और वैभव साथ थे। दफ्तर एक ही था, बस विभाग अलग थे। वे साथ ही आते – जाते। घर के काम भी मिल - जुलकर निपटाते। बिना बात कोई टोका - टाकी करने वाला, उनके रिश्ते, बात - व्यवहार पर गिद्ध की तरह नजर टिकाए रखने वाला भी कोई नहीं था। उनके प्रेम की सूख रही बेल चंद दिनों में ही फिर लहलहा उठी। वहाँ संकोच में या माँ के भय से वह उसकी सहायता करने से बचता रहता था पर यहाँ हर काम, हर बात में उसका सहयोगपूर्ण साथ हमेशा बना रहता। वैभव का यह रूप देखकर वह निहाल थी। तमाम परेशानियों के बीच भी ज़िन्दगी खुशहाल थी। फिर जल्द ही एक के बाद एक रिद्धि और आधार उनकी ज़िंदगी में नई खुशियों और नई जिम्मेदारियों के साथ जुड़ गये। आभा और वैभव मिल - बाँट कर यह जिम्मेदारी भी निभाते रहे। वैभव भी अपनी माँ का स्वभाव समझते हुए अपनी परेशानियों में उन लोगों की सहायता लेने से पूरी तरह से बचता। हालांकि उसने आभा से कभी कुछ नहीं कहा पर वह भली - भाँति समझता था कि उन लोगों का १० - १५ दिन का आगमन भी कोई सहायता तो भला क्या पर घर के वातावरण में अजीब तनाव और घुटन फैला जाता और उन दोनों में झगड़े शुरू हो जाते। उसे घर के काम निपटाते देख माँ कुढ़ कर आभा को तानें मारतीं,

'वैभव के पापा ने तो कभी एक गिलास पानी भी खुद लेकर नहीं पिया और वैभव तो तेरे बाथरूम में पड़े कपड़े भी धो देता है। सचमुच क्या जमाना आ गया है।'

ऐसी ही अनर्गल बातों से उनके सामंजस्य की लचीली दीवार पर करारी चोटें पड़नी शुरू हो जातीं। उससे बेहतर था कि वो दोनों बारी - बारी से छुट्टी लेकर बच्चों की बीमारी और जरूरतों को खुद ही सँभालते रहें। दोनों की सैलरी अच्छी थी तो अलग - अलग शिफ्टों में एक - एक मेड भी उन्होंने रख ली थी। सब ठीक ही चल रहा था। एक - दूसरे के सहयोग से घर - दफ्तर दोनों ने बखूबी सँभाल रखा था। समस्या दो साल पहले अच्छे पैकेज के लालच में वैभव के नौकरी बदलने से शुरू हुई थी। अब अधिकतर समय वह शहर से बाहर होता और चाह कर भी पहले की तरह आभा का हाथ नहीं बँटा पाता। आभा घर - दफ्तर में अकेले उलझी चिड़चिड़ी होती जा रही थी। अब उनके अकसर झगड़े होते।

'मैडम! भेलपूरी ले लो!'

किसी ने लगभग उसके कान में चीखते हुए कहा। उसकी सोच की रफ्तार पर किसी के इस तरह अनायास दखल से वह चिढ़ गई और आवाज की दिशा में देखे बिना ही झल्लाकर कहा,

'नहीं चाहिए!'

'ले लो न, मैडम! थोड़ा सा…! आपके लिए ताजा - ताजा बना देता हूँ !'

'अरे कहा न, नहीं चाहिए! जाओ यहाँ से! परेशान मत करो!'

उसने बिना उसे देखे ही उपेक्षा से कहा।

आज मीटिंग के बाद वैभव से उसका बहुत तेज झगड़ा हो गया था। मीटिंग में हुए अपमान से वह बुरी तरह बौखलाई हुई थी। बहुत कोशिश करके भी वह आज आपे में नहीं थी। उस पर उसी समय वैभव का फोन आ गया।

'बिजली का बिल जमा करवाया? कल लास्ट डेट है।'

उसे अचानक याद आया कि एक सप्ताह से एक तो नन्हें आधार के बुखार और इसी मीटिंग की तैयारी के चक्कर में वह रोज बिल जमा करवाना भूल जा रही थी। आज के लिए सोचा था और अफरा - तफरी में आज फिर रह गया। अब कल लास्ट डेट है।

'क्या करती हो यार, तुम? ये एक छोटा सा काम तुमसे नहीं होता। करना क्या था तुम्हें, बस बिल और पैसे मनोहर को पकड़ा देने थे, वह जमा कर देता। उसे समझा रखा है मैंने। पर तुमसे इतना भी नहीं होता। कब से कह रहा हूँ। कमाल करती हो यार, तुम।' उसने झल्लाकर कहा। बस आभा के सब्र का बाँध टूट गया और वह फट पड़ी,

'हाँ!! मैं कुछ नहीं करती और कुछ करूँगी भी नहीं। भाड़ में जाए बिजली का बिल। भाड़ में जाए नौकरी। भाड़ में जाओ तुम सब।'

उसने गुस्से में फोन काटकर स्विच ऑफ कर दिया और बिना किसी से कुछ कहे चुपचाप ऑफिस से बाहर निकल आई। उस समय शाम के लगभग चार बजे थे। बाहर आकर उसने टैक्सी ली और यहाँ बीच पर चली आई। हमेशा की तरह इस समय भी यहाँ भीड़ थी, इसलिए वह भीड़ - भाड़ से थोड़ी दूर इस कोने में आकर चुपचाप बैठ गई थी, जहाँ उसे कोई परेशान न करे। लहरों को ताकती आभा के मन में बार - बार खयाल आ रहा था कि वह भी भाग कर इन लहरों में गुम हो जाए।

'मैडम! भेलपूरी ले लो न!'

इस बार अनुनय करती हुई उस आवाज की ओर झल्लाकर उसने देखा।

'हद है! कौन है ये जो पीछे ही पड़ गया है।'

सामने ११ – १२ बरस का एक लड़का गले में भेलपूरी के सामान से भरी एक छोटी टोकरीनुमा लटकाए खड़ा था। उसके भोले चेहरे को देखकर उसे पहले अपना झिड़कना याद आ गया। इसलिए इस बार थोड़ा नरम होकर उसने कहा,

'नहीं चाहिए!' फिर आगे जोड़ा,

'वहाँ भीड़ में जाकर बेचो, यहाँ तो लोग नहीं हैं।'

'आप तो हैं! आप ही ले लो न!' उसने चिरौरी की।

आभा ने लड़के को ध्यान से देखा। मासूम से चेहरे वाला, काले रंग की निकर और पीली मटमैली शर्ट और पुरानी - घिसी नीली चप्पल पहने उस लड़के का बायाँ हाथ कोहनी से कटा था। उसके चेहरे पर आशा भरी मुसकान थी। अपनी हालत भूलकर आभा जैसे वर्तमान में लौट आई। लड़के की हालत पर उसे एकदम दया आ गई।

बोली, 'ठीक है, एक बना दो।'

लड़का खुश होकर धप्प से सामान उसके पास ही रखकर बैठ गया और मगन होकर अपने एक सलामत हाथ से भेलपूरी बनाने लगा। वह थोड़ी देर चुपचाप उसे देखती रही। बच्चे पर उसे बरबस ही स्नेह उमड़ पड़ा। सुबह से कोई तो मिला था जो प्यार से उसे कुछ खिलाने की व्यवस्था कर रहा था। बरबस ही बातचीत शुरू करते हुए उसने पूछा,

'तुम यहाँ के तो नहीं लगते, कहाँ के हो?'

'लखनऊ के! आप कैसे जान गईं?'

'तुम्हारी बोली से!'

'यहाँ इतनी दूर कैसे आ गए?' उसने पूछा।

'चाचा ले आए यहाँ!'

'चाचा...! तुम्हारे माँ-बाप...? वो कहाँ हैं?'

'मर गए... एक साल पहले एक सड़क दुर्घटना में ! हमारा बायाँ हाथ... ये उसी में कट गया। चाचा हमें और छोटी बहन को यहाँ ले आए।' उसने सपाट भाव से जवाब दिया।

'ओह...!' वह कुछ नहीं कह पाई... इतनी छोटी वय में कुछ ज्यादा ही देख लिया है इसने, उसने सोचा।

'बहन कहाँ है?' उसने पूछा।

'मर गई...! पिछले महीने... बीमार थी...!'

इस बार उसकी आवाज काँप गई। घाव ताजा था। वह चुप हो गई। समझ में नही आया, क्या कहे। बेचारा ज़रा सा बच्चा और इतना कुछ...। उसके जीवन में तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, फिर वह ऐसे क्यों हार रही है, वह सोचने लगी। बात बदलते हुए उसने पूछा,

'तुम्हारा नाम क्या है?'

लड़के ने थोड़ा सहज होकर कहा,

'असलम!'

'पढने जाते हो?'

उसने नहीं में सिर हिलाया, फिर बोला,

'लखनऊ में पढने जाते थे। पाँचवी तक पढ़े हैं।'

'पढना अच्छा लगता है?'

'हाँ! बहुत... पर अब कैसे पढ़े? चाचा के पास इतने पैसे नहीं हैं।'

'आगे पढना चाहते हो?'

लड़के ने मुसकरा कर हाँ में सिर हिलाया पर उसकी आँखों में मायूसी उतर आई। वह उसे प्यार से देखते हुए मुसकरा दी। लड़के ने भेलपूरी कागज के टोंगे में उसे पकड़ाते हुए कहा,

'मैडम! आप यहाँ इतनी देर से अकेले बैठकर क्या सोच रही हैं। ऐसे यहाँ मत बैठा करिए।'

'क्यों?'

उसने हैरानी से पूछा, फिर सोचा कि यह कब से उस पर नज़र रख रहा था।

'यहाँ पर ऐसे बैठना ठीक नहीं।'

फिर रुककर सहमते हुए बोला,

'कुछ दिन पहले एक मैडम ऐसे ही यहाँ बैठी थीं, फिर जाकर समन्दर में डूबकर मर गईं।'

उसने अटकते हुए अपनी बात पूरी की। आभा ठिठक कर लड़के का मुँह देखने लगी। फिर धीरे से बोली,

'तुम्हें लगा, मैं भी...'

लड़के ने धीरे से हाँ में सिर हिलाया। फिर उदास होकर बोला,

'ज़िन्दगी बहुत कीमती होती है, कोई भी मुसीबत ज़िन्दगी से बड़ी नहीं हो सकती। जो मर जाते हैं, उनके पीछे छूटे लोगों का कितना दिल दुखता है...। पहले हम भी इस समन्दर को देखते हुए सोचते थे कि जाकर मर जाएँ। अम्मी - अब्बू और बहन के पास चले जाएँ पर हमें पता है, यह सोचना भी गुनाह है। ज़िन्दगी तो अल्लाह ने दी है, हम इसे कैसे खतम कर दें। लाख मुसीबत सही, ज़िन्दगी बहुत प्यारी है, खूबसूरत है।'

'हम तो हर हाल में इसीलिए खुश रहते हैं।'

'कितनी छोटी उम्र में कितना सयाना बच्चा है ये!' आभा ने सोचा। फिर उसके बाल सहलाकर प्यार से कहा,

'इतनी बड़ी - बड़ी बातें…। नहीं, हम मरने नहीं जा रहे थे…!'

उसने बच्चे को गौर से देखते हुए तसल्ली दी। नन्हा सा बच्चा कोमल फूल सा, जिसके ठीक से अभी अखुए भी नहीं फूटे, बार - बार पाला मार रही, सर्द जीवन की बर्फीली आंधी में जाने कैसे वसंत की गुनगुनी धुप बटोर ले रहा है और हर तूफ़ान झेलकर भी बार - बार धरती का सीना चीरकर, जीने की आस लिए नन्हें पौधे सा लहलहाने लग रहा है, झूमने लग रहा है। एक वो है जो मजबूत, ज़मीन में गहरी धंसी जड़ों वाले बरगद सी होकर भी एक तेज़ हवा के झोंके से घबरा कर जड़ - सहित उखड़ने को तैयार बैठी है। वह आखिर किस बात से हार रही है, इस बच्चे के जैसा तो कुछ भी नहीं देखा उसने अपने पूरे जीवन में। फिर? फिर ये अवसाद क्यों? पल में रंग बदल चुके अपने ही मन की झिड़कियों से बचने के लिए उसने बच्चे से पूछा,

'तुम रोज यहाँ आते हो?'

लड़के ने हाँ में सिर हिलाया।

'कहाँ रहते हो? मुझे अपना पता लिखवाओ और ये मेरा विजिटिंग कार्ड रखो, कोई जरूरत हो तो बताना।'

आभा ने उसका पता नोट किया और कहा,

'मैं यहीं कुछ दिनों में तुमसे मिलने आऊँगी। अब चलती हूँ, देर हो रही है, मेरे नन्हें फरिश्ते।'

कहते हुए स्नेह से उसका गाल थपथपा दिया। लड़का शरमा कर हँस दिया,

'हम कहाँ के नन्हें फरिश्ते!' पर आभा तब तक चल पड़ी थी, मन से बिलकुल हल्की, एक झटके में सारी उदासी, सारे अवसाद उड़नछू थे और वह उसे जाते हुए चुपचाप देखता रहा।

आभा ने घर के लिए टैक्सी पकड़ी और फोन स्विच ऑन किया। इतनी सारी मिस्ड कॉलस और मैसेजेस। अधिकांश वैभव के थे। उसने मैसेजेस पढ़ना शुरू ही किया था कि वैभव का फोन आ गया। फोन उठाते ही उसकी राहत भरी आवाज आई।

'हलो! आभा! तुम ठीक हो न? सॉरी, यार! मुझे ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। तुमने फोन स्विच ऑफ कर दिया तो मैंने दफ्तर फोन किया था...। कहाँ चली गई थी…? बहुत नाराज़ है मेरी गुड़िया। मुझे मीटिंग में हुई बातें पता चलीं। खड़ूस है यार वो। गोली मारो उस सनकी को।'

वैभव एक साँस में बोले जा रहा था। वैभव के लाड़ पर उसे हँसी आ गई,

'मैं ठीक हूँ, वैभव। अच्छा, ये सब छोड़ो, सबसे पहले मुझे अंकित का नम्बर दो, मेरे इस नए फोन में सेव होने से रह गया।'

'कौन? वही वाला अंकित जो बेसहारा बच्चों की मदद करने के लिए एन.जी.ओ. चलाता है।' आभा और वैभव वर्षों से अपने एक परिचित अंकित के एक एन.जी.ओ. जो बेसहारा बच्चों की पढ़ाई - लिखाई और दूसरी तरह की मदद करती थी में यथासम्भव आर्थिक सहायता देते आ रहे थे।

'हाँ… आँ! अपना वही अंकित!'

'पर अचानक उसकी याद कैसे आ गई?'

'उसकी मदद चाहिए, एक नन्हें फरिश्ते की मदद करने के लिए।'

'नन्हा फरिश्ता?'

'मिलने पर बताऊँगी, पहले नम्बर दो।'

नम्बर बताकर वैभव ने एक हैरान कर देने वाला विस्फोट किया,

'आभा! मैंने तुम्हें बताया नहीं पर कुछ महीनों से कोशिश कर रहा था वापस अपनी पुरानी कम्पनी में ज्वाइन करने की… और जानती हो, आज मैनेजमेंट मान गई, वह भी प्रमोशन और बढ़ी सैलरी के साथ! मुझे इसकी बिलकुल उम्मीद नहीं थी। मैं तो पुराने पद और सैलरी के लिए रिक्वेस्ट कर रहा था। पर ये तो उम्मीद से कहीं ज्यादा है...! अब हम फिर साथ ही दफ्तर आएँगे - जाएँगे। तुम्हें अकेले ऐसे हलकान नहीं होना पड़ेगा।'

वैभव अत्यन्त उत्साह से अपनी ही रौ में बोलता जा रहा था और आभा मुसकराती हुई सोच रही थी, नन्हें फरिश्ते, ये तुमसे मुलाकात का ही जादू है न।

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