डोना पाउला

मौसम बदल रहा है. हवा में कुछ नया है जो बहुत पुराना है. गोवा में जाड़ा मैदानोँ जैसा नहीँ पडता, मगर हवा पशमीने की तरह लगती है. ठंडी, मुलायम! आसमान का रंग भी बदल जाता है. साथ में समंदर का. बारिश का मटमैला पानी धीरे-धीरे नीला से गहरा नीला होता जाता है. ऐसे में क्षितिज पर आकाश-ज़मीन एक-दूसरे से गूंथी हुई-सी लगती है. जब कभी धुआँते नील में अनायास किसी जहाज का काला बिंदु उभरता है, ज़मीन की हद का पता चलता है. आकाश ठीक उसके ऊपर औंधा बिछा होता है- अछोर तक! इन सब के बीच झरझराती रेत और हवा... फिज़ाँ दूर तक धुंधलायी रहती है. जैसे झींसी पड रही हो.

यहाँ आ कर पहली बार उसने मौन के कोलाहल को इस शिद्दत से महसूस किया था. हरहराते समंदर, हवा और नारियल के सघन झुंड के बीच थमका हुआ मौन, पहाडियोँ पर दूर तक पसरा और ढलानों पर धीमी चाल उतरता हुआ... जब सब कुछ चुप हो जाता है, शोर अधिक मुखर हो उठता है. भीतर और बाहर भी. किसी प्राचीन मंदिर के अंधकार भरे गर्भ गृह में मंडराती धूप-गंध की तरह... धीमे मंत्रोच्चार की तरह... जो देह के रगो-रेश में गुंजारित तो हो मगर सुनाई ना पडे! इस मौन से वह प्यार कर बैठा है. हाँ, वही वर्जित प्यार!

बाघातोर समुद्र तट के पास उसने एक रिशाट में कमरा किराये पर लिया है. तीन महीने हो गये. साधारण-सा कमरा मगर समंदर के बहुत करीब. खिडकियाँ खोलते ही समंदर कमरे में उमड-सा आता है. हवा में सूखी मछली, खरपतवार और नमक की गंध. ऊमस में देह भीगी रहती है. सूरज जब तक माथे पर रहता है, दिन गर्म होता है- गर्म और चमकीला! वह सारी दोपहर खुले बरामदे में एक आराम कुर्सी पर बैठ कर उर्राक पीता है, लिम्का मिला कर. पीने वाले सफाई देते हैँ, उर्राक शरीर को ठंडा रखता है, फेनी गर्म करके पीने से सर्दी ठीक हो जाती है. यानी हर मर्ज़ का एक ईलाज- शराब! अब उसे भी लगता है, उसके मर्ज़ का भी एक ही ईलाज है- फेनी! उर्राक... यह सोच अब उसे पहले की तरह आतंकित नहीँ करती. एक दूरी पर खडे हो कर उसने खुद को देखना सीख लिया है. बहुत कोशिश के बाद यह सध सका है उससे. अपनी यायावरी के दौरान विगत पांच सालोँ में हर क्षण अपने आप से एक युद्ध में है वह! घात भी उसका और प्रतिघात भी. जय, पराजय भी... इस तरह दुख और खुशी के बीच की विभाजक रेखा जाने कब मिट गई है! लोग कहते हैँ वह भयावह रुप से असम्पृक्त हो गया है, मगर उसे यह रास आ रहा है. उसके इर्द-गिर्द जो है, जो घट रहा है, एक अर्सा हुआ, वह सब अपना माने खो चुका है. वह चाहता है, बस किसी तरह समय बीत जाये. मगर ये बीतता नहीँ! हाँ कट ज़रुर रहा है... पांच साल... कम तो नहीँ होते- वह उंगलियोँ के पोरोँ पर गिनता है, चेहरे की सलवटोँ पर भी... कहाँ-कहाँ...

चौबीस घंटे उसके आसपास हवा और जल पंछियोँ का शोर मंडराता रहता है. सूखे नारियल पत्तोँ की मड़ैया से धूप की बूँदे रिस-रिस कर सीमेंट की लाल फर्श पर चढते हुये दिन के साथ फैलती जाती है. गर्म, वाष्पित धूप में मोगरे की बासी गंध होती है. नवम्बर आ गया मगर बारिश अब भी पूरी तरह गई नहीँ है. रुक-रुक कर होती रहती है. लोग कहते हैँ यहाँ दिसम्बर तक भी बारिश हो जाती है. पहाडियोँ पर मखमल के टुकडोँ की तरह यहाँ-वहाँ फैली हरियाली की तरफ देखते हुये वह सोचता है, इसी को ज़िंदगी कहते हैँ. ज़िंदगी के और भी चेहरे होंगे मगर अब उसे याद नहीँ. बहुत मुश्किल से उसने अपने और अपनी स्मृतियोँ के बीच यह दीवार उठाई है. इस दीवार के जींस में है अनवरत यायावरी, फोटो जर्नलिज्म और... यही- शराब! इसके एक तरफ वह और उसका अथाह सन्नाटा है और दूसरी तरफ एक पूरी दुनिया. हमेशा की तरह उमगती हुई! जाने वह अपने जख्मोँ का क्या करती है!... उसी दुनिया से निर्वासन लिया है उसने. देखे कब तक रहा जाता है... किसी कांटे से उलझ गये कपडे की तरह वह अपना मन स्मृतियोँ की उंगली से छुडाता है- इनसे रिहाई के लिये कितनी दूर जाना पडेगा! कितनी यात्रायेँ करनी पडेंगी... सफर में पांव से ज़्यादा हौसले काम आते हैँ... जाने किसने कहा था, मगर... कितना सच कहा था!

“अगर ज़िंदगी इसी तरह की हो तो यह सौ साल की हो...” मैल्कम फेनी की मौज में मुस्कुराता है. उसकी आंखोँ में दिन की आखिरी रोशनी में समंदर का चढता ज्बार है - फेनी आनी सीत-सुंगटा करी... पूरे! आनी माका काय नाका सायबा!(1) गर्म धूप और नमकीन हवा ने मैल्कम की खाल को रेत की तरह सूखी और खुरदरी बना दिया है. वह हंसता है तो उसका चेहरा सैकडोँ रेखाओँ में दरक उठता है, मुँह से शराब के भभाके उडते हैँ. उसकी एक्कीस पैबंद लगी टोपी कार्निवाल की तरह रंगीन दिखती है. वह अकड कर कहता है, यह रंगुन की टोपी है. पहले सैकडोँ गोवानिज़ की तरह वह भी एक विख्यात कूक था और जहाज के साथ रंगुन, वर्मा तक हो आया है. उसके पास सोमाली के समुद्री लुटेरोँ की भी खूब सारी कहानियाँ थीँ. कहते हैँ एक बार उसके हाथ का बिबिंका और फिश रेसियाद खा कर लुटेरे इतने खुश हुये कि ईनाम में बंधक बनाये हुये सारे जहाज कर्मियोँ को छोड दिया. बात पुर्तगाल के राजा तक पहुंची और उसे पुरस्कार में ‘सुपर शेफ’ की उपाधि मिली. इतनी कहानी सुनकर एक दिन उसने भी उसके हाथ की बनी फिश रेशियाद खायी थी और तीन दिन तक बिस्तर पर पडा रहा था.

उसने मैल्कम को कभी होश में नहीँ देखा था. वह सुबह की चाय में शराब मिला कर पीता था और रात को स्थानीय बेकरी से लाये गर्म पाव भी शराब में डूबो कर खाता था. पूछने पर कहता था- जीने के लिये पीता है सायबा! नहीँ पिया तो उसी दिन खलास हो जायेगा. कभी-कभी मूड में रहता है तो सरमन भी झाडने लगता है- हम दारु नहीँ पीता मैन, दारु हमको पीता है. हमारे बॉडी में ब्लड नहीँ, लिकर भरा है! माचिश लगा कर देखना मांगता है कभी, एकदम स्ट्रा के माफिक जल जायेंगा...

उसे मैल्कम की हालत देख कर दया आती है. अंजुना में रात के सैटरडे बाज़ार में वह उसे मिला था. चड्डी में खाली बदन बैठा अपनी फटी-पुरानी जींस बेचने की कोशिश कर रहा था. किसी से इटालियन तो किसी से जर्मन में बातेँ कर रहा था. जब किसी सैलानी को वह अपने वाक्जाल में फंसाने में असमर्थ होता तो उसे पीछे से कोंकणी में गाली देता. वह यह सब कुछ देर से देख रहा था. अब वह भी थोडा बहुत कोंकणी समझने लगा था. एक समय के बाद जा कर उसने भी उसके बदबूदार जींस की कीमत पूछी थी और आगे बढ गया था. उसके आगे बढते ही मैल्कम ने उसे गाली दी थी. गाली सुन कर वह मुडा था और उसे भी कोंकणी में गाली दी थी. गाली सुना कर मैल्कम कुछ देर के लिये हक्का-बक्का रह गया था और फिर ठठा कर हंस पडा था- तू आमचो गोयकार मरे!(2) और इस तरह उन्हीँ कुछ गाली-गलौज से उनकी दोस्ती की शुरुआत हुई. थी. आज मैल्कम और गोवा को वह अलग!-अलग करके देख नहीँ पाता. जैसा समंदर,जैसी फेनी वैसा ही मैलकम! सुसेकाद(3) और बिंदास!

मैल्कम की माँ पुर्तगाली थी. मैल्कम कई बार अपनी मैली खाल रगड कर उसे अपनी गोरी नस्ल का सबूत दे चुका है. अधिक पत्ती पड गई दूध की चाय-सी उसकी रंगत है. कहता है, यहा का नमक सिर्फ लोगोँ के गले में गोइटर(4) की पोटली ही नहीँ बाँध देता, खाल से सारी नमी भी सोख लेता है. रंग का तो पूछो मत. पक्का दुश्मन! उसका दावा है कि वह गोवा का आखिरी पुर्तगाली है. कमर में रस्सी बांध कर वह नारियल के ऊंचे पेड पर बंदर की तरह चढते हुये अपनी अंतहीन कहानी ज़ारी रखता है- मेरा ग्रैंड फादर जेलर था मैन! आगुआदा फोर्ट में उसने एक से एक नैटिव को दुरुस्त किया था! उसे रोज़ एक नया रुलर मांगता था नैटिव लोग का हड्डी तोडने के वास्ते! इनका जान बहुत घट्ट होता है, मालूम...

मैल्कम की बातोँ पर उसे गुस्सा नहीँ आता. दया आती है. बिचारा इस पूरे देश की तरह अपने पास्ट ग्लोरी में जी रहा है. वर्तमान शून्य है और भविष्य... मैल्कम की पीली, घुलघुली आँखोँ में उसका पराजित अतीत और दिशाहारा वर्तमान है. वह सब को गाली देता है क्योंकि वह थोडा अच्छा महसूस करना चाहता है. उसे समय ने रीढ से तोड दिया है. रेंगते हुये वह सर उठा कर ऊपर देखने की कोशिश करता है और फिर-फिर आहत होता है. उसकी गोरी चमडी और अतीत किसी बेताल की तरह उस पर सवार है. वह अपना पेट पाले या इन्हेँ पोसे? इनसे निस्तार तो नहीँ, बस थोडी-सी राहत की कोशिश... वह बकने देता है मैल्कम को. भीतर का मवाद बह जाय! वह मैल्कम से पूछ चुका है, उसकी पुर्तगाली माँ ने एक नैटिब से कैसे शादी की थी जबकि सुना है, पुर्तगाली बडे अहिष्णु और नस्लवादी हुआ करते थे. इस प्रश्न पर मैल्कम नर्म पड गया था – “लव में सब कुछ होने को सकता मैन! मेरे माम ने मेरे डैड के साथ ट्रू वाला लव किया...

मैल्कम का आहत अहम, कुँठित बातेँ उसे मैक्लूस्कीगंज के एंग्लो-इंडियनोँ की याद दिलाती हैं- आज़ादी के बाद बचे रह गये कुछ लोग, अतीत और वर्तमान के बीच पिसते हुये, अपनी पहचान और अस्मिता के सवालोँ से घिरे. ना यहाँ के ना वहाँ के... उनके पास कहने-सुनने के लिये सिर्फ अतीत के अच्छे दिन और वर्तमान के अपरिमित दुख थे- इंडिया में गर्मी है, इंडिया में मच्छ्ड है... मगर जीना-मरना यही है! जिनसे वफा की, खिदमत की, वे विदेशी आका देश छोर कर जाते हुये पीछे मुड कर नहीँ देखा. रह गये अकेले वे यहाँ पर, नैटिवोँ का गुस्सा और उपहास झेलने के लिये. कोलकाता में बचे रह गये ऐंगलो-इंडियनोँ की भी बहुत बुरी गत हुई. शुरु-शुरु के दिन बहुत दुख के थे. लोग पकड कर जबरन वंदे मातरम बुलवाते थे. ‘बांडे माटारम’ बोलने पर हंसी-टिटकारी... सही उच्चारण की कोशिश कर-कर के जीभ में बल पड गये थे. नैटिबोँ की जुलूस देखते ही आतंक में हाथ खडे कर देते- आमी बांडे माटाराम! आमी बांडेमाटारम! यहाँ की उबड-खाबड, कच्ची सडकोँ पर ऊंची एडी वाली सैंडल पहन कर चलने की कोशिश करती हुयी महिलाये छतरी के नीचे पके आडू की तरह गुलाबी दिखती थीँ, मर्द सूट के भीतर गल कर मोम!

मैल्कम से मैक्लूस्कीगंज की बात करते हुये वह अक्सर कहता था, फेनी की टक्कर का अगर कुछ है दुनिया में तो वह है महुआ! सच पूछो तो महुआ का नशा उसके भीतर से कभी गया नहीँ. पूरे चांद की रातोँ में अब भी उसे लगता है, दूर जंगलोँ से मांदल के साथ आदिवासियोँ के सम्वेत स्वर में गाने की आवाज़ आ रही है. कई बार स्वप्न और जीवन में फर्क करना कठिन हो जाता है. स्वप्न से भी अधिक खुश रंग होता है जीवन का कोई कोना. छींट भर सुख भी सौ दुखोँ को हल्का कर देता है.

अब इन्हीँ सुखोँ, स्मृतियोँ का सम्बल है. वह कैमरे की लेंस से दुनिया को देखता है. वही पुरानी दुनिया, मगर इसे अपनी नज़र से देखने का सुख है. उतने पर ही फोकस करेँ जितना आपको अच्छा लगे. बाकी को जाने देँ. वह अनगढ दुनिया के समतल कोनोँ को ढूंढता है, चुन-चुन कर उन्हेँ अपनी दुनिया का हिस्सा बनाता है. उसकी दुनिया उसके हिसाब से है. मन मुताबिक. यहाँ हर क्षण का एक अपना सौंदर्य है, अपनी प्रासंगिकता. इस बेतरतीव दुनिया से तरह-तरह के टुकड़े इकट्ठा करके उसने एक कोलाज की दुनिया बनायी है. इसमें वह सब है जो एक अच्छी दुनिया में होना चाहिये. फिर भी क्या इसे वह एक मुकम्मल दुनिया कह सकता है? अगर मुकम्मल होती तो वह आज भी रोज़ कैमरा ले कर किस चीज़ की तलाश में निकलता है! वह अपने सवालोँ से पीछा छुडाना चाहता है. थक गया है खुद से भाग-भाग कर...

शुक्रबार की शामें वह अक्सर आरपोरा के ‘हे स्टेक’ रेस्तरा में बिताता है. इस दिन रेमो फर्नानडिस यहाँ गाना गाता है. बांसुरी भी बजाता है. पिछले फुल मून नाईट को रेस्तरा की सारी बत्तियाँ बुझा कर बांसुरी बजाई थी. धप-धप चांदनी, स्तब्ध रात और हवा में तैरती बांसुरी की धुन! पूरा माहौल सम्मोहन में डूब गया था जैसे. बांसूरी के थमने के बाद भी देर तक चुप्पी छाई रही थी. उस दिन उसने महसूस किया था, संगीत थमने के बाद भी बजता रहता है. पूरी रात बांसूरी की वह धुन उसके जेहन में गूंजती रही थी.

इस बार की बारिश में वह मैल्कम और रिशाट के ड्राइवर के साथ खेतोँ में मछलियाँ पकडने जाता रहा था. बारिश में उफनती नदियोँ के पानी के साथ मछलियाँ भी खेतोँ में घुस आती हैँ. साथ ही कछुये भी. मैल्कम को मेढक सबसे ज़्यादा पसंद है. उन्हेँ पकड कर बडी तार में माला के फूलोँ की तरह बिंध कर ले आता है. खुली आग में भून कर नमक के साथ खाता है. बोलता है, ट्राय करो मैन! एकदम चिकन का माफिक! उसे बुरा लगता है जब मैल्कम कोयल खाता है. यहाँ बहुत से लोग कोयल खाते हैँ. ऐसा उसने पहले कहीँ नहीँ देखा. हाँ छोटानागपुर में आदिवासियोँ को बगुला मार कर खाते हुये ज़रुर देखा था. शादी या किसी और दावत के मौके पर घोँसलोँ से निकाल कर उन्हेँ बोरोँ में भर कर ले जाते थे. एक बार घोँसलोँ से गिरे हुये छोटे-छोटे बच्चोँ और फूटे हुये असंख्य अंडोँ को देख कर उसे बहुत दुख हुआ था. पिछली बार जब मैल्कम ने उसे मोर के शिकार पर चलने के लिये कहा था, उसने मना कर दिया था. मोर एक आरक्षित पंछी है मगर यहाँ के कई होटलोँ में धडल्ले से बिकते हैँ. कितने अनरोमांटिक हो सकते हैँ लोग जो कोयल, मोर जैसे पंछियोँ को खा जाते हैँ... उसकी बात सुन कर मैल्कम ठठा कर हंसता है – “ओ गाड! तुम पोएट लोग का माफिक बात करता है मैन! इतना नहीँ सोचने का, खाने-पीने का, मस्त रहने का, क्या?”

मैल्कम की एक आँटी चोराओ आयलैंड में रहती है. नब्बे साल की. उसके घर वह कई बार मैल्कम के साथ आ चुकी है. बारिश से पहले वह अपने बंगले के पीछे बनी छोटी-सी कोठरी में समंदर का नमक जमा करके रखती है. साथ ही सूखी मछली, गुच्छे में बंधे प्याज, सुखायी हुई तीखी लाल मिर्च, कोकम(5) आदि भी. बारिश के दिनोँ में समंदर में मछुआरों की नाव नहीँ उतरती. तब ताज़ी मछली की किल्लत होती है. लोग सूखी मछली से काम चलाते हैँ.

मैल्कम की आंटी पत्थर के बडे-से ओखलीनुमा सिल पर लोढ़े से घुमा-घुमाकर देर तक मसाले पिसती हैँ. कहती है सिलबट्टे में ना पिसने पर नारियल की करी स्वादिष्ट नहीँ होती. लाल, मोटे चाबल के साथ झिंगा-करी और आम के नमक में भिगोये टिकोरे... वाकई अद्भुत स्वाद है आंटी के हाथोँ के बनाये हुये खाने में. वह दो-दो प्लेट चाबल खा जाता है. मैल्कम कहता है, इधर की एक छोकरी से शादी बनाओ मैन! तुम्हारा लाइफ बन जायेंगा! वह हंसकर रह जाता है. उसकी तो लाइफ कब की बन चुकी है...

पूरी दोपहर बंगले के बरामदे में चटाई बिछा कर वह गिरती हुई बारिश देखता है. साथ मैल्कम या उसकी महा बातूनी आंटी की बातेँ चलती रहती हैँ. वह सुनता है मगर नहीँ सुनता. टूट कर बरसता पानी जाने उसे क्या याद दिलाता है- कोई स्लेटी, भीगा, उदास दिन, आषाढ़ की अनवरत झरती सांझ... उन सांझोँ में जाने किसके पदचाप थे जो आज भी उसे रह-रह कर सुनाई देते हैँ. उसे अनमन देख कर मैल्कम उसे छेडता है- क्या मैन, तुमको किसी का याद आता है? आंटी रोज़ टी का कप उसे थमाती हुई हंसती है- हमको मालूम, पाउस का दिन मेमोरी का दिन होता है. हमको भी तुम्हारा अंकल याद आता है. पच्चीस साल हो गया ग्रेब में लेटा है. पता नहीँ गाड हमको कब अपने पास बुलायेगा... बात के अंत में आते-आते आंटी की आवाज़ भर आती है. सब अपने –अपने हिस्से के दर्द में जीते हैँ, सबके भीतर यादोँ का एक स्याह कोना होता है! अपनी जलती आंखोँ को भींचते हुये वह मुस्कराने की कोशिश करता है. आंटी उसके हाथ पर अपने हाथ रखती हैँ- इट्स ओके! कभी-कभी रो लेना मांगता है बॉय! अच्छा फील होता है! वह निरुत्तर रह जाता है. पीडा की भी एक भाषा होती है, मूक मगर सब कुछ बोल ही देती है...

मैल्कम के साथ वह दिन-दिन भर पहाडोँ, जंगलोँ में भटकता फिरता है अच्छे दृश्य की तलाश में. यहाँ के वर्ड सेंक्चुआरी, बोंडला फारेस्ट, दूध सागर जल प्रपात, बडी-बडी नदियाँ- जुआरी, मांडवी, खांडेपारकर- हर जगह जा कर उसने फोटोग्राफी की है. मैंनग्रोव तथा पारम्परिक गांव उसे फोटोग्राफी के लिये विशेष रुप से प्रिय हैँ. इन चीज़ोँ में दिन बीत जाते हैँ मगर रातेँ किसी आसेब की तरह उतरती है उसके इर्द-गिर्द! उसे दहशत होती है अपने आप में होने में. क्योँ नहीँ वह खुद को भुला बैठता...

मैल्कम कहता है- मैन! क्या झाड, पहाड का फोटो लेता रहता है. कभी गोवा की रुह को भी अपने कैमरे की लेंस में कैपचर करो. सुन कर वह हंसता है- गोवा की आत्मा! अच्छा! वह किसमें है? मैल्कम संजीदगी से जवाब देता है- गोवा का आत्मा तिडाकल के फोर्ट में है जहाँ पुर्तगाली आर्मी से लडते हुये सैकडोँ नैटिव मरे, काबो राज निवास के कब्रिस्तान में हैँ जहाँ हज़ारोँ अंग्रेज़ सैनिक अपने कंट्री से दूर मिट्टी में दबे पडे शायद आज भी अपने घर लौटने का सपना देख रहे हैँ... कहते हुये मैल्कम की कीचड भरी आंखेँ डबडबा आती है. देख कर जाने क्योँ उसकी भी आंखेँ जलने लगती हैँ. जिस ज़मीन पर कभी इसने कदम नहीँ रखा, उसी ज़मीन की खुशबू उसकी सांसोँ में बसी है. मगर विडम्बना यह कि गोवा भी नहीँ छूटता! पूछो तो झेंप कर कहेगा- बोले तो गोवा अपुन का स्वीट हार्ट है. एक दिल का रिश्ता, एक खून का... किसी को छोडने को नहीँ सकता! खुद को सयंत करते हुये कुछ देर बाद मैल्कम कहता है- किसी फुल मून नाइट में, जब समंदर ज्बार में उफन रहा हो, लहरोँ से धीरे-धीरे निकलती हुई डोना पाउला की तस्वीर लेना... उसके गले में मोतियोँ की एक माला होती है, और बस, आक्खा बॉडी में और कुछ नहीँ. उसे मैल्कम की बातेँ दिलचस्प लगती हैँ- समंदर से निकलती हुई डोना... उसके गले में पडे मोतियोँ के हार में कैद अनगिनत चांद... वह गूगल में डोना को ढूंढता है- पाउला अमाराल अनतोनिओ दी सौटो मानिओर- श्री लंका के जाफानापाटनाम में पुर्तगाल के वाइसराय की बेटी. गोवा आई और 1655 में स्पैन के डोम अंटोनिओ सौटो मानिओर से शादी की. डोना का पति बहुत अमीर था. गोवा का एक बहुत बडा हिस्सा उनकी जागीर में शामिल था. मगर अपनी जागीर से भी बडा डोना का दिल था. वह दोनोँ हाथोँ से गरीबोँ की मदद करती थी. उसकी मौत के बाद ओडावेल गांव के निवासियोँ ने उसकी याद में अपने गांव का नाम डोना पाउला रख लिया. एक स्थानीय मिथक के अनुसार, पूरे चांद की रातोँ में, जब ज्बार भाटा में समंदर उफनता है, आज भी कभी-कभी विवस्त्र डोना लहरोँ के बीच से निकलती हुई दिखती है. उसके गले में मोतियोँ की माला होती है और उस माले में होते हैँ आकाश के हज़ारोँ नक्षत्र... उसकी एक झलक पाने के लिये पूर्णिमा की रात सैलानी डोना पाउला में भीड लगा कर खडे रहते हैँ. मैल्कम ने अगले पूर्णिमा की रात उससे पूछा- तुम देखने को चलेगा सायबा? तो उसने मुस्कुरा कर अपना कैमरा उठा लिया. मगर निकलने से ऐन पहले मैल्कम लुढक गया. आज उसने कुछ ज़्यादा ही पी ली थी.

डोना पाउला की सफेद मूर्तियाँ चांदनी में संगमरमर की तरह दिख रही थी. पूरा चांद आकाश के बीचो-बीच जा पहुंचा था. समंदर अशांत था. ‘सी पेबेल’ रेस्तरा के खुले अहाते में बैठे सैलानियोँ पर अब ऊंची लहरोँ की छींटे पडने लगी थीँ. वह बीयर का गिलास लेकर देर तक बैठा यहाँ से दिखतीँ डोना पाउला की आकृतियोँ की तरफ देखता रहा था, नीले आकाश की पृष्ठभूमि में सफेद, धुआँ-धुआँ... एक पहाडी की तलहटी में बना था यह रेस्तरा. ऊपर मुख्य सडक से घुमावदार सीढियोँ के सहारे नीचे उतरना पडता है. इसी पहाडी की छोटी-सी गुफा में रेस्तरा का रिशेप्सन है. मेज़-कुर्सियाँ लगी हैँ बिल्कुल समुद्र तट पर. यहाँ वह पहली बार आ रहा था. वैसे इस रेस्तरा का नाम वह काफी सुन चुका था. यहाँ का ‘क्रैब केक’ काफी मशहूर है. खाने में उसने चिकन काफरियल, प्राइड मसल्स के साथ क्रैब केक भी मंगवाया था. पुर्तगाली व्यंजनोँ के साथ हवा में शराब की गंध तेज़ थी. साथ में हर तरफ मंडराता सिगरेट का धुआँ. दूर कोई शराबी चढते ज्बार से बेखबर पत्थर पर लेटा गा रहा था. पूरे माहौल में एक अजीब-सी रुमानियत तारी थी.

बिल चुकाने के बाद मेज़ पर रखे लैम्प के अंदर जलती मोमबत्ती से वह अपनी चौथी सिगरेट सुलगा कर सीढियाँ चढ कर ऊपर सडक पर आ जाता है. सडकोँ पर अब भीड कम हो चली है. होटलोँ के बाहर टूरिस्ट टैक्सियोँ की भीड है, अंदर से लोगोँ की बातोँ, हंसी की आवाज़ आ रही है. दूर कहीँ संगीत बज रहा है. वह टहलते हुये समंदर के किनारे लगी रेलिंग के पास आ कर खडा हो जाता है. समंदर के ऊपर डोना पाउला की छोटी-सी पहाडी तक जाने के लिये पुल-सा बांध दिया गया है. लम्बाई और चौडाई में बहुत दूर तक फैला हुआ. इस पर रेलिंग के किनारे-किनारे बहुत-सी बेंचे बिछी हैँ. नीचे पुल के खंभोँ से निरंतर टकराते पानी की छल-छल आवाज़. यहाँ पुल के साये में पानी का रंग एकदम काला है. देखने में भयावह लग रहा है. देह में एक सिहरन-सी महसूस करते हुये अपनी नज़र उठा कर अब वह डोना पाउला की पहाडी की ओर देखता है. सफेद चाँदनी में मूर्तियाँ स्तब्ध खडी हैं. उसके पीछे की तीखी खाई से समंदर का गर्जन सुनाई पड रहा है. चांद अब मूर्तियोँ के पीछे की ओर जाने लगा है. शायद अब डोना के आने का समय हो गया है... मैल्कम के शब्द याद करते हुये उसे हंसी आती है. लोगोँ की कल्पना शक्ति भी अद्भुत होती है. अपना कैमरा सम्हाल कर कोई ऐसी जगह ढूंढते हुये जहाँ से डोना पाउला की मूर्तियाँ और बगल का समंदर एक साथ दिखे, वह एक पत्थर पर आ खडा हुआ था- परफेक्ट! काली चट्टानोँ के बीच सफेद झागोँ में बिफरते समन्दर की पृष्ठभूमि में खडी डोना पाउला और उसके माथे पर दूर तक फैला आकाश का नीला शून्य. इससे परे, बहुत दूर वास्को-डा-गामा शहर की रोशनियाँ...

नाईट मूड में कैमरा सेट करके दृश्य पर फोकस करते हुये उसने फ्रेम एडजस्ट किया था और फिर जैसे ही फोटो खींचने गया था, उसके कैमरे के फ्रेम में अचानक एक चेहरा आ गया था. उसने चौंक कर कैमरा हटाया था. सामने प्रांजल खडी थी. हाँ, प्रांजल. इतने समय के बाद भी उसने उसे एक नज़र में पहचान लिया था. समुद्र के ढेर सारे झागोँ के बीच, उन्हीँ में से जन्मी वीनस-सी! दुधिया और पारदर्शी! चांदनी जैसे उसके रगो-रेश से हो कर गुज़र रही थी. वह थरथरा कर रह गया था. प्रांजल भी उसे पहचान चुकी थी. तभी तो इस तरह से सामने आ खडी हुई थी. “नहीँ, एकदम से तो नहीँ, मगर लगा ज़रुर था. तब से तुम्हेँ देख रही थी. रहा नहीँ गया तो होटल के कमरे से निकल आई...” प्रांजल कहते हुये एक बेंच पर बैठ गई थी- कैसा संजोग है, हम यहाँ इस तरह से... वह उसकी बातेँ सुनता रहा था, चुपचाप. अभी तक सकते में था जैसे. प्रांजल ने उसकी मन:स्थिति समझी थी शायद. अचानक थम कर कहा था, बैठ जाओ! वह चुपचाप बैठ गया था. कुछ सोचने-समझने में वह अब भी खुद को अक्षम पा रहा था. दुनिया सचमुच छोटी है. गोल भी. जिस अतीत से भागते हुये वह अपने हिसाब से दुनिया के दूसरे छोर पर पहुंच गया था, वही एकदम से ऐसे सामने आ खडी हुई थी जैसे कहीँ कभी गई ही ना हो! उसके बगल में बैठ कर उसे अनायास प्रतीत हुआ था, वास्तव में वह कभी कहीँ गई ही नहीँ थी. वह अब तक एक भ्रम में जी रहा था. भ्रम कि प्रांजल अब उसके जीवन में नहीँ है. हज़ारोँ मील की यात्रा कर वह उसे पीछे छोर आया है... पीछे छूटते हैँ सामान, घर-असबाब, जगहेँ... मगर अपना आप नहीँ! आग की बूंद-सी यह सच्चाई अपनी पूरी हरारत के साथ उतर कर उसे भीतर तक तरल कर गई थी. जन्म भर की थकावट ने जैसे उसे एक पल में आ घेरा था. बीच के पांच साल, इसकी तमाम कोशिशेँ, यंत्रणा- सब पल में गया! रह गया तो बस वही वह और प्रांजल! अपनी तमाम सम्वेदनाओँ के साथ, सर से पांव तक पिघलते हुये, पानी की धार में पडी कागज़ की नाव की तरह... क्योँ इतना विवश हो जाता है वह! अर्से से तटबंध पर जमाये पत्थर, रेत की मोटी तहेँ यूँ भरभरा कर गिरती हैँ... अपनी पराजय में वह आज बिल्कुल डिफेंसलेस है, वलनरेवल... देख रहा है प्रांजल को, चांद के विपुल ऐश्वर्य में...

“तुम बिल्कुल नहीँ बदली प्रांजल! वही...”

“वही...?” प्रांजल जानती है, वह क्या कहना चाहता है, मगर फिर-फिर सुनना चाहती है. इन सब से जी कब भरा!

“वही...” वह ठिठकते हुये आगे बढता है- “तुम्हेँ मिलना बीत गये समय में लौट जाने जैसा है...” फिर एक पल की चुप्पी के बाद वह शब्द ढूंढता-सा बोलता है – “हमारे परिचय के वे पहले-पहले के दिन... तब तुमने किसी दूसरे शहर से आ कर हमारे कालेज में नाम लिखवाया ही था... उन दिनोँ मुझे लगता था, तुम धूप पहनती हो. कितनी उजली दिखती थी! ठीक जैसे सूरजमुखी...”

उसकी बात सुन कर प्रांजल हंसती है, आसपास वींड चाइम-सा बजता है- हल्की, मीठी ठुनक, रह-रह कर... वह भूला-भूला-सा उसकी तरफ देखता है – “तुम हंस रही हो? याद है, तुम्हारे आसपास अक्सर तितलियाँ मंडरा आती थीँ. मुझे लगता था, तुम फूलोँ की तरह महकती भी होगी.”

“मैँ मानवी हूँ सत्य, कोई फेयरी नहीँ...” उजली चांदनी में प्रांजल के चेहरे का रंग दब गया था. वह सायास दूसरी तरफ देख रही थी. उन आंखोँ में क्या था, उसमें अब यह जानने का दु:साहस नहीँ था, फिर भी कह गया था - “तुम सच थी, मगर मिथक प्रतीत होती थी. इतना खूबसूरत भी कोई हो सकता है क्या!”

“हूँ, मैँ सच थी मगर तुमने मुझे मिथक बना कर रख दिया... जानते हो, सांस लेने वालोँ को शिला बनकर जीना कैसा लगता है, धमनियोँ में ठहरा हुआ लहू, पसलियोँ में पथराया दिल...” यकायक आवेग से बोलते हुये प्रांजल उठ खडी हुई थी और फिर बैठ गई थी. चांदनी में चमकते उसके कंधे थोडा और झुक आये थे -

“नींद से बाहर आओ सत्य! बीत गये वे दिन, नदियोँ में ढेर-सा पानी बह गया. समय भी. रेत की आंधियाँ नहीँ देखतीँ, किसके पांव में महावर रचे हैँ, कौन निकला है अपनी स्वप्न यात्रा पर... सबको समान हिंसा से मिटा देती है.”

प्रांजल की बात सुन कर वह देर तक मौन रहा था. उसकी बातोँ में समय का सच है. मगर हर सच के साथ जिया नहीँ जाता. दूर पहाडियोँ में कोई टिटहरी रह-रह कर बोल रही थी. चांद पश्चिम की ओर कुछ और झुक गया था. लहरोँ से उलझती काली चट्टानोँ की बेडौल परछइयाँ नीचे रेत पर बेतरतीव फैल गई थीँ. एक समय बाद वह उठ कर खडा हो गया था और धीरे-धीरे चहलकदमी करने लगा था – “ज़ाहिर रुप से मैँ तुमसे दूर भाग रहा था प्रांजल, उस तारीख में पूरी दुनिया ने भी जैसे एक साजिश रची थी. साजिश कि हमें एक नहीँ होने देना है! हालात ने मुझे हर बार निर्ममता से मिटा दिया... मगर... मैँ फिर-फिर उभरा! मैँ किसी तरह तुम्हारी तरफ जानेवाली यात्रा को स्थगित नहीँ कर सकता था. बाहर से इतर ये मेरी अंदरुनी यात्रा थी. इस यात्रा का अंतिम पडाव तुम थी!”

इतना कहने में ही जैसे चूक-सा गया था वह. कितनी ऊर्जा लगी थी इन कुछ शब्दोँ को उचारने में. सीने का सारा लहू निचुड़ गया था जैसे. हज़ार झूठ के साथ जिया जा सकता है, मगर एक सच... वह रेलिंग के सहारे खडा-खडा थरथराता रहता है. पीछे निर्वाक खडी प्रांजल की साडी का आंचल सरसरा रहा था. हवा में उसकी हल्की देह गंध... एक गहरी सांस... वह क्षण जादू का था, विलक्षण! उसने मुड़कर प्रांजल को देखा था – “आओ, मर जायेँ...”

प्रांजल उसे सोती आंखोँ से देखती रही थी, बिना कुछ बोले. इस समय उसके सूने माथे पर चांद चमक रहा था. उसके नीचे बिछी आंखोँ की गहरी उदासी- ठीक इस पछाड खाते समंदर की तरह. एफ्रोदिती- वीनस इतनी उदास अच्छी नहीँ लगती! उसकी ये उदासी सारी दुनिया के सौंदर्य, प्रेम को लील जायेगी. फिर क्या बचेगा यहाँ? मांस-बोटी का पुतला इंसान, आदमखोर या ये ईंट-पत्थरोँ के ढेर...! एक अमूर्त यातना में भर कर वह उसकी तरफ बढा था – “सच जानो, ये जीवन का सबसे सुंदर क्षण है... इसके बाद और कुछ नहीँ बचता जीने के लिये!”

“सुंदरतम क्षण तुम्हारे लिये होगा सत्य. तुमने अपने तई पा लिया इस दुनिया को, मुझे, मगर मेरा क्या?” एक छोटे-से पल में प्रांजल मोम से आग में तब्दील होती-सी प्रतीत हुई थी. उसके भीतर शिकायतोँ का जखीरा है. वह बढ़ कर प्रांजल को बाँहोँ से थाम लेता है, इस समय को यूँ बिखर जाने नहीँ देना है – “कोई पाना कभी पूर्ण नहीँ होता प्रांजल! बस एक नयी कामना की शुरुआत भर होती है. आज कंफेस करूँ तो तुम्हेँ पाना मेरे भीतर एक नयी भूख रच गया था. मैँ तुम्हेँ कभी पूरी तरह पाना ही नहीँ चाहता था. थोडी भूख, प्यास, लालसा बचाये रखना चाहता था ताकि जीवित रह सकूँ.”

प्रांजल निर्वाक थी. चारोँ तरफ हवा और समुद्र का शोर था और इसके परे बस, थरथराता सन्नाटा! उसे बहुत कुछ पूछना है. इन्हीँ पलोँ के लिये शायद वह अब तक जीती रही थी. मगर अब सब गडमड हो रहा है. वह समझना चाहती है प्रेम को. प्रेम जो उसे सिरे से उजाड गया फिर भी उसीमें आज तक बना हुआ है. कभी सत्य कहता था, प्रेम में तर्क? इससे बडा कोई कुतर्क नहीँ! मैँ तुम्हारे प्रेम में हूँ कि नहीँ यह मुझे कभी खुद से पूछना नहीँ पडा. तुम मेरे भीतर स्पंदित हो जीवन की तरह, सांस लेती हो! प्यार में होने के उन दिनोँ में तो उसे भी लगता था, उसकी देह से सुगंध उठ रही है. वह महक रही है चमेली की तरह... क्या था वह सब? वो पागल बातेँ... दिन भर, रात-रात – “तुम्हारी उजली हथेलियोँ की ओर देखते हुये कई बार मेरी इच्छा हुई है, उनमें एक लकीर अपने नाम की डाल दूँ,” “तुम्हेँ सोचता हूँ क्योँकि तुम्हेँ सोचना मेरा सबसे बडा सुख है...” अपने उसी सुख से इस तरह पीछा छुडा आना! प्रांजल रुंधे गले से कुछ कह नहीँ पा रही. इस दुनिया को वह क्या समझे! एक बूंद आग उसकी पलकोँ की कोर से नसोँ की आखिरी छोर तक जाती है. एक दिन बिना कुछ कहे सत्य उसकी ज़िंदगी से चला गया था. पीछे बची थी वह और उसका वह जीवन जिसका क्या करना है वह आज भी नहीँ जानती. सालोँ घुरे की आग की तरह वह भीतर ही भीतर धीमी आंच में सुलगती रही थी. इस यंत्रणा को किसी शब्द में व्यंजित नहीँ किया जा सकता.

एक पुलिस की पेट्रोलिंग जीप सामने आकर खडी हुई थी. एक अफसर ने उनसे आकर पूछ-ताछ की थी. आसपास बैठे कुछ और लोगोँ से भी. इसके बाद जीप चली गई थी. “काफी देर हो गई...” उसने अपनी घडी देखी थी. “देर तो वाकई बहुत हो गई...” प्रांजल ने अनमन भाव से कहा था – “अब चलेँ...?” “कहाँ?” पूछते हुये वह जाने क्योँ ठिठक गया था. कुछ प्रश्न हमेशा अप्रासंगिक होते हैँ. उन्हेँ पूछना खुद को जवाबदेही के दायित्व के घेरे में लाना है. प्रांजल को कहाँ जाना है, यह तय करना उसकी सांझी जिम्मेदारी होनी चाहिये.

“गोवा घूमने आयी हो या...?” सिगरेट का पैकेट टटोलते हुये उसने पूछा था. एक ही सिगरेट बची थी. लाईटर से आखिरी सिगरेट सुलगा कर उसने धुएँ का छल्ला हवा में उछाला था. “नहीँ! एक एन जी ओ के साथ यहाँ बच्चोँ के साथ हो रहे योन शोषण के खिलाफ काम कर रही हूँ. यह मेरे शोध का भी विषय है. टुरिज़्म का यह एक भयानक नतीजा है...”

“अच्छा! लौटोगी कब?” पूछते हुये वह फिर असहज हो आया था.

“लौट तो जायेँ मगर कहां!” प्रांजल ने जाने किससे पूछा था. और फिर अचानक दूसरा सवाल कर दिया था - “बिना कुछ कहे एक दिन तुम मुझे अचानक छोड आये थे, क्योँ? मुझे जानने का हक है.”

“अब यह सवाल रहने दो...” वह परेशान हो उठा था –“जख्मोँ की पपडियाँ खुरचने से क्या फायदा! जो बीत गया सो बीत गया.”

“”कुछ चीज़ेँ कभी नहीँ बीतती सत्य! रह जाती है हमारी अंदरुनी दुनिया का हिस्सा बन कर. किसी शापित यक्षिणी की तरह हो कर रह गयी हूँ. देव लोक, मृत्यु लोक की संधि पर. ना यहाँ की ना वहाँ की... इस यंत्रणा को समझते हो?”

वह डोना पाउला की मूर्तियोँ की ओर देखता रहा था. जिस प्रश्न से वह वर्षोँ भागता रहा था वह आज यहाँ इस तरह से उसके सामने आकर खडा हो जायेगा, उसने सोचा नहीँ था. अब? पलायन का कोई रास्ता नहीँ. सब बंद हो चुके हैँ.

“मैँ तुम्हारे जवाब के इंतज़ार मे हूँ सत्य!” प्रांजल की आवाज़ अब बहती हवा-सी ठंडी थी.

“तुम ठीक कहती हो. तुम्हारे साथ के उन छूटे हुये पलोँ में मेरा सारा सुख था, आगे की लम्बी, उदास ज़िंदगी ने मुझे यह बार-बार समझाया है. मैँ भागता रहा, मगर तुम्हारी यादोँ से कभी पीछा छुडा नहीँ सका. तुम, तुम्हारी याद, अहसास हर चीज़ में था- जानती हो, काफी की गंध तक मुझे तुम्हारी याद दिलाती थी- ठंडी हवा में उठती खुशबू की गर्म लपटेँ... तुम वैसी ही खुमार भरी हो, किसी कत्थई, भीगी शाम की तरह! कितना कुछ हमारे मिलने के उन शुरु-शुरु के दिनोँ में, जब अनायास तुम्हारे एक पल की संक्षिप्त छुअन ने दावानल रचा था मेरे भीतर... एक आदिम संवेग में पागल होता रहा था. मेरे भीतर पलाश का एक रक्तिम वन था. आंच का दिपदिपाता कुंड... तुम होम हो जाओगी, मेरे करीब मत आना... कहना चाह कर भी कह नहीँ सका था. एक लम्बे अर्से तक त्वचा का वह छोटा-सा हिस्सा जलता रहा था. एक क्षणिक स्पर्श में कल्पोँ की तृष्णा सम्प्रेषित हो सकती है, उन्हीँ दिनोँ जाना था.”

आह! वही जादू भरे शब्द, तिलस्म का सुनहरा जाल... मगर नहीँ! अब और नहीँ! प्रांजल उठ खडी हुई थी –“तो फिर? क्या हुआ उस प्यार का, उन... उन... उसके आगे के शब्द गर्म आंसुओँ में डूब गये थे. वह रोना नहीँ चाहती थी, मगर वही कर गई- रोती रही! स्वीकारोक्ति का क्षण दुर्बलता का भी क्षण होता है, साहस के साथ-साथ.

“मैँ एक दिन तुम्हेँ छोड कर चला आया था, यह सच है मगर इसके अलावा और कुछ नहीँ. प्यार पर शक मत करो. जिस क्षण में प्रेम घटता है वह क्षण बहते हुये काल का एक ठहरा हुआ हिस्सा होता है. वह हिस्सा जीवन-मृत्यु से परे होता है, शाश्वत! वहाँ अपनी दुनियादारी मत ढूँढो...”

“सुन रही हूँ...” प्रांजल ने यकायक शांत हो कर कहा था.

“मैँ जा कर भी कहीँ नहीँ गया प्रांजल! तुम्हारे पास ही रहा. एक अभिशप्त यक्ष जो तुम्हारे विरह में अपने दुख रचता फिरता है सारे संसार में... देखती नहीँ, कैसी धूसर होती हैँ शामें, नदी मौन बहती है, हवा...” वह कहते-कहते लडखडाया था. प्रांजल ने उसे एक बार फिर निर्ममता से कुरेदा था – “आगे...”

“आगे...” वह थका-सा अपने घुटनोँ में रखे हुये हाथोँ की ओर देखता रहा था – “आगे... तुम भूली नहीँ होगी वह भीषण दुर्घटना... मैँ तीन महीने तक अस्पताल में पडा रहा था और एक दिन वही से गायब हो गया था.”

“हूँ!”

“डाक्टर ने बताया था, अब मैँ कभी पिता नहीँ बन सकूंगा! मुझे पता था, तुम किस शिद्दत से माँ बनने के इंतज़ार में हो... तो...””

“तो... तो इसलिये तुम मुझे...” प्रांजल काँपती हुई एकदम से उठ खडी हुई थी – “तुमने मुझे इतना कमज़ोर समझा! इतना छोटा कर दिया...!”

“मेरे वश में और क्या था...” वह थकी-थकी आवाज़ में बोलते हुये रेलिंग से नीचे झांकने लगा था- यहाँ पानी कितना गहरा होगा...! “तुम्हेँ मुझ पर यकीन करना था...” प्रांजल के नाखून उसकी दायीँ बाँह में खुब गये थे. पहले तुम्हारे बर्ताव से दुखी थी, अब अपमानित हूँ...”

“प्रांजल...!” उसने प्रांजल के हाथ अपनी मुट्ठियोँ में बांधने चाहे थे मगर प्रांजल ने उसे परे धकेल दिया था – “तो तुम्हारे चले आने से क्या हुआ? मैंने किसी और से शादी कर ली? दो-चार बच्चे जन लिये? सत्य! मैंने आजतक घर के दरवाज़े चाहे जिसके लिये भी खोले होँ, मुझे इंतज़ार सिर्फ तुम्हारा है...”

”प्रांजल!”

“हाँ! यही सच है! मेरा सबसे बडा सच! बच्चे मुझे चाहिये थे, आज भी चाहिये तभी तो दुनिया भर के बच्चोँ को मैंने अपना मान लिया है. उन्हीँ के लिये जीती-मरती हूँ. मगर तुम कभी निगोसियेबल नहीँ थे मेरे लिये सत्य, यह क्योँ नहीँ समझ सके? तुम को खो देना खुद को खो देना है. तुम मेरा हिस्सा हो, वह हिस्सा जिसमे मेरे जीवन का सारा सौंदर्य, सारा सच रखा है.” प्रांजल अनवरत रो रही है. चारोँ तरफ बाँध टूटी नदी की तरह चांदनी बह रही है, अग-जग भीग कर सफेद... वह स्तब्ध बैठा है. भीतर जाने क्या है- बहुत गाढा, सघन... यकायक वह रोना चाहता है. कितना भर गया है वह. किसी नदी के बंद मुहाने की तरह! वर्षोँ हो गये... वह अब तक यही सोचा करता था कि कुछ दर्द का कोई ईलाज नहीँ होता. उनके साथ जीना होता है, बस! फिर, वह शायद अपने दर्द को जिंदा भी रखना चाहता था. इसका होना एक तरह से जीवन में प्रांजल का होना था... अपने तई तो उसने उसे पल-पल सहेजा था- बातोँ के बीच आ गई चुप्पियाँ, दृष्टि का अनायास शून्य में ठहर जाना... इन सब में वही तो थी. स्मृतियाँ मरती नहीँ, कहीँ दबी रह जाती है, किसी सही समय के इंतज़ार में जब वे एकदम से निकल कर आपको आपाद-मस्तक ढंक कर स्तम्भित कर सके. मगर जो था और अब नहीँ है... सुख की स्मृति भी अंतत: दुख ही देती है. इसी दुख म्रँ दोनोँ भीगे थे. वह रोती हुई प्रांजल को विवश देखता रहा था. बहुत दूर रह कर भी उसे हमेशा यही लगा कि वे एक हैँ. अक्सर उसे समझ नहीँ आता, वह कहाँ खत्म होता है जहाँ से प्रांजल शुरु होती है. जितनी दूर तक वह चलता है, उसे ही पाता है. उनके सिरे ही गुम गये हैँ जैसे... कभी प्रांजल सच ही कहती थी- सपनोँ का भी एक देश होता है. उसमें भी हम उतना ही रहते हैँ जितना अपने यथार्थ में. अच्छा कभी सोचा है, ये सपने ना होते तो क्या होता? कैसे हम झेलते जीवन की अथाह कुरुपता को...? इन शब्दोँ के साथ उसकी हंसी के तलछट में नम कीचड़-सा कुछ तहें जमाने लगता था.

बहुत जी लिया सपनोँ में, स्मृतियोँ में, गलतफहमियोँ में... बुदबुदाते हुये उसने बढ कर रोती हुई प्रांजल का हाथ पकड कर उसे खडी किया था – “चलो, चलेँ!” प्रांजल बिना कुछ कहे उठ खडी हुई थी. उसका चेहरा चांदनी में गीला-गीला चमक रहा था. अपनी जेब से रुमाल निकाल कर उसकी तरफ बढ़ाते हुये वह मुस्कराया था –“पूछोगी नहीँ कहाँ चलना है?” “तुम्हारे संग चलना है, बस यही बात जानना काफी है...” प्रांजल पहली बार खुल कर मुस्कराई थी. शरद की चांदनी-सी उजली हंसी. इस समय उसके चेहरे पर पूरा चांद था. रात के बारह बज चुके थे. उसने आगे बढ़ कर बेंच पर रखा हुआ अपना कैमरा उठाते हुये पीछे मुडकर देखा था- ठांठे मारते हुये समंदर की ऊंची लहरोँ के बीच से विवस्त्र डोना पाउला निकल रही थी. उसके गले में मोतियोँ की दमकती माला थी. शरीर कुंदन-सा. एक तेज़ सिहरन उसके सारे जिस्म में फैल गई थी. उसने झटके से अपना कैमरा उठाया था और फिर कुछ सोच कर रख दिया था. प्यार के पल जादू के होते हैँ, उन्हेँ किसी फ्रेम में कैद नहीँ किया जाता. बस जिया जाता है. अपना हाथ बढा कर उसने प्रांजल का हाथ पकड लिया था- मुझे अपनी वीनस इन्हीँ लहरोँ के बीच मिल सकती थी... फिर समंदर की ओर मुडा था- थैंक्स डोना! तुम्हारे यहाँ से कोई खाली हाथ नहीँ लौटता. तुम वाकई बहुत उदार हो!

वे चलते हुये चांदनी के कोहरे में खो गये थे. पीछे पानी का एक बहुत बडा रेला उफन कर चांद की ओर बढा था और फिर सफेद झागोँ में टूट कर किनारे पर चूर-चूर हो गया था. चारोँ ओर ढेर-से मोती बिखर गये थे. यह डोना का उपहार था! उसके गले में मोतियोँ का कोई हार नहीँ था. उसने अपना सबसे बहुमूल्य गहना उन दोनों को दे दिया था और अब वह पूरी तरह विवस्त्र थी… हर छद्म, छलावे और आवरण से परे – प्रेम के वास्तविक स्वरूप में...

(1) फेनी और झिंगा करी-चावल... बस मुझे और कुछ नहीं चाहिए. (2) तू तो हमारे गोवा का है. (3) आरामप्रिय, आलसी (4) घेघा (5) तटीय प्रदेश में होनेवाला एक विशेष फल

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