चौदह नवां छबिल से .......... चीखते चिल्लाते शोर मचाते बच्चे, तालियाँ बजाते आनंद से सराबोर बाल मंडली एक नयी नवेली या नवयौवना तो नहीं कह सकते पर मिट्टी से सनी सूरज से पोषण प्राप्त सुंदर औरत के पीछे भाग रहे थे। वो भी कमर मटकाती गालियां निकालती बीच बीच में बेना ले लो डलिया ले लो सूप दौरी बँधवा लो का हांक लगाती गाव का फेरा लगा रही थी। बच्चों को सूप दौरी से कुछ लेना देना न था सिर्फ उसकी गालियों में आशीर्वाद छुपा था उसी को लेने वो उसके पीछे लग जाते। छबीली उन्हे उलाहने उछालती जाकर अपनी माँ बहन को छबीली बोलो न । बच्चे फिर चिल्ला उठते भिंडी के तरकारी और रेलवैया इत्यादि। छबीली के गाव में आने का पता उसके हांक से कम बच्चों के चील्ह पों से ज्यादा पता चलता। यूं भी छबीली हांक कम और गालियां ज्यादे उछालती थी। घर घर से लोग बाग टूटे फूटे सूप दौरी छबीली के आंगे कर देते और उसके चपल हाथ बास के फराटियों के सहारे उन्हे सिलने लगते। महिलाएं जहां उसे सहानुभूति से देखतीं तो पुरुष भी ऊपरी सहानुभूति से अपने कामुकता को छिपाने का असफल प्रयास कर रहे होते।

छबीली पड़ोस के डोम टोली की रहने वाली थी। ऐसा नहीं कि उसकी पैदाइश इसी टोली में हुयी हो। वो पैदा हुयी थी इस टोली से 15 किलोमीटर पूरब के एक और डोम टोली में। उसके बाप राधेया के पास बारह पुरवों का मलिकारा था। इन बारह पुरवों में पाँच गाँव ठाकुरों का और चार पाँच गाव बाम्हनों का। मरनी जियनी में डोम राजा बनकर जय बोलने का हक उसे ही था। ऐसे भले हीं सबको पाप पुण्य का अर्थ बाम्हन समझाएँ पर अस्सी बीघे के काश्तकार रामलगावन पाड़े मरे थे तब भी बोलो बोलो रामलगावन मलिकार की जय बोलकर इहलोक परलोक रन बन बियाबाँ में रामलगावन पाड़े के आत्मा को मुक्त करने का कार्य छबीली के बाप राधेया ने हीं किया था। लेने देने में ठाकुरों की कोई सानी नहीं थी उसके जजमानी में कोई ठाकुर मरे तो बाप के साथ छबीली उसके भाई बहन सब अलग अलग थाली छिपा लेकर जाते थे। अरे मालिक हमारा के तनी दम दिहीन हमका पूरिया दिहीन ये मलिकार। उसीमें ठाकुरों का कोई नया नुआ जवान हुआ लड़का बोली लगता कारे राधेया ई तोर लड़की हीय कारे ई त एकदम छबीली होई छबीली। वैसे ई तोर लागत नईखे। राधेया हाथ जोड़कर कहता सब आपे सब के कृपा बा महाराज। 500 रुपये और कुछ धोतियों से ज्यादा खुशी पुड़ियों के वजन से होता। खुद के पेट से ज्यादा सूअरों को पुड़ियाँ बाटने की चिंता लगी रहती। छबीली अपने प्यारे सूअरा के सामने पुड़ियाँ उलट देती। वैसे ठाकुरों के लड़कों की नजर को छबीली की माँ सुंदरी ताड़ लेती। उसे बेटी के जवान होने की चिंता होती। होनी अनहोनी की चिंता होती पर करती क्या ? शादी के लिए लड़के की जरूरत दो चार सूअर भी तैयार होने चाहिए बारात के आवभगत के लिए । घर में भले कुछ न हो पर शादी तो रीति रिवाज से होनी चाहिए। उसने राधेया से बात की और राधेया ने सुरंगी मौसी के टोले में रंजितवा से छबीली का बियाह तय कर दिया। पूरे शानो शौकत से छबीली का बारात आया रंजितवा दूल्हा बना हुआ था सुंदरी पैसा लूटा रही थी महुए के दारू से मत्त डोम नाचे जा रहे थे। सूअर के गोश्त और चावल का भोज हुआ जम के ताड़ी पिया गया नशे में लठियाँ चलीं और खून खराबे से युक्त छबीली की शादी पूरी हुयी। और इस तरह छबीली अगले दिन अपने टोले में आ गयी थी।

रंजितवा तो जैसे पागल हो गया था। डोम होकर भी उसे ठाकुर बाम्हनों जैसी सुंदर दिखने वाली बीबी जो मिली थी। वो उसे सात तहों के अंदर छिपा के रखना चाहा था। उसकी हरेक इच्छा पूरा करना चाहता था। छबीली भी कुछ कम नहीं थी बास के पास जाते ही उसकी उँगलियाँ जादूगरानी की तरह चलतीं इतनी महीन बुनाई की रंजितवा के यहाँ बने बेना सूप दौरी चटाई लेने लोग दूर दूर से आते। रंजितवा भी कभी छबीली को सूअर वाले काम पर नहीं लगाता। बस बास लाकर घर के सामने रख देता छबीली उसे बनाती । लोग कुछ समान लेने कुछ छबीली के हुस्न का दीदार करने चले आते। कुछ कला के कद्रदार थे तो कुछ कलाकार के। एक दिन रंजितवा का तबीयत कुछ ठीक नहीं था। छबीली भूखे सूअरों को देख बर्दाश्त नहीं कर पायी सो उनके बाड़ों को खोल दिया और उनके पीछे पीछे चल दी। अनुभव हीन होने के कारण सूअरों के झुंड को काबू नहीं कर पायी और दो चार सूअर पास के बड़े में घुस गए। उसने देखा तो ही हा हा करते वो उधर ही दौड़ी। अंदर भिंडी की खेती थी। अच्छी भिंडी लगी थी। उसने भिंडी की एक फली को छूया। रोयेंदार भिंडी उसे बरबस ही आकृष्ट कर रहा था। उसे लगा कि कैसा लगाता होगा यह भिंडी । उसने बचपन से आजतक भिंडी नहीं चखा था। ताबतक रोबदार आवाज उसके कानों तक पहुंची कौन है रे और ये किसके सूअर बाड़े में घुस आए हैं रे मादर... । वो घबरा गयी तब तक आवाज लगाने वाला उसके सम्मुख आ चुका था। छबीली को देखते हीं उसने आवाज बदल लिया था। तुमने भिंडी के बाड़े को अशुद्ध किया है छबीली और तुम फलियों को भी छु रही थी। तुम्हें प्रायश्चित करना पड़ेगा। क्या तुम्हें नहीं पता की तुम डोम हो। खैर छोड़ो अब छु ही दिया है तो बताओ भिंडी खाना चाहती हो क्या तो आओ इधर। वो उसे चेम्बर में बुलाने लगा था कुछ डर कुछ भिंडी का लालच छबीली चेम्बर में गयी । भिंडी तो उसे मिल गया पर उसे छूया गया। वो बेहद डर गयी थी उसे अंदाजा था कि अगर उसने शोर मचाया तो उलटा उसपर आरोप आएगा साथ में रंजितवा का भी गाव में रहना दूभर हो जाएगा। सो उसने कोई विरोध नहीं किया भिंडी के बाड़े में आने का प्रायश्चित उसे अपने देह से करना पड़ा। भिंडी के फलियों के बदले उसे नोचा गया खसोटा गया। पहली बार उसे लगा कि अगर पुरुष स्त्री को प्यार से न छूए तो कमवासना से अंधा पुरुष स्त्री के देह में प्रेम का स्राव पैदा नहीं कर सकता। वो दर्द से सिसकते हुये सूअरों को बटोर वापस बाड़े के तरफ चल दी थी। भिंडी की फलियाँ आँचल में दबाये एक पराजित स्त्री की तरह। शाम को वो पश्चाताप में जल रही थी। पर भिंडी के उन कीमती फलियों को वो फेंक नहीं सकती थी। जो उसने देह मोल देकर खरीदा था। शाम को बड़े मनोवेग से भिंडी काटी धोयी और लिबलिबाती भिंडी को छौंक मारा। भिंडी की लिबलिबाहट बढ़ती ही गयी। इससे बढ़िया तो पथरी का साग होता है। कैसे खाते हैं सब भिंडी। ई त बाम्हनों के खाने लायक चीज है क्या इसी लिबलिबाहट के लिए आज मैं खुद को न्योछावर कर आई थी। उसे बहुत गुस्सा आ रहा था। उधर भिंडी के बदले छबीली का लिज्जत पाया जवान अपने मर्दानगी को पूरे गाव में बयान कर रहे थे। गाव के बाकी लोग भी छबीली को भिंडी खिलाने का ख्वाब सँजोने लगे थे। छबीली पूरी रात सो नहीं सकी। रंजितवा का हालत कुछ ठीक था। छबीली भी ऊपर से पूरी तरह ठीक थी पर अंदर से पूरी तरह से टूट रही थी। रात में छबीली ने देखा रंजितवा जब गहरी नींद में सोया था तभी भिंडी की लिबलिबाहट उसके अंग प्रत्यंग को ढके जा रही थी। अगला दो चार दिन छबीली का दर्द बढ़ता ही गया। बात रंजितवा को भी पता चल गया था। वो भी व्यथित था। कई बाम्हन ठाकुर कुर्मी के लौंडे आकर छबीली को ताड़ रहे थे। अगले दिन ठाकुर साहब ने अपने नौकर से भिंडी भेजवाई थी। छबीली ने उसे लौटा दिया कि भिंडी की लिबलिबाहट उनही को मुबारक। उससे नहीं रहा गया । उससे रंजीत के आँखों से टपकते प्रश्न का जवाब देते नहीं बना । वो घर छोड़कर भाग गयी ये सोंचकर कि रंजितवा दूसरी मेहर ले आएगा सुख चैन से दिन तो काटेगा। घर से कुछ ही दूर पर टेशन था वहाँ रेलवई खड़ी थी वो बिना सोचे समझे उसमें बैठ गई। सांझ का बेला था। उसने सोचा दूर शहर जाएंगे और मांग के खा पी लेंगे नहीं तो नदी नाले में कूदकर जान ड़े देंगे।

अगले दिन गाँव से एक बुजुर्ग टहलते हुये डोम टोली के तरफ आए। रंजितवा को आवाज लगाया। रंजितवा हाथ जोड़कर खड़ा था जो अच्छा बुरा हुआ सो ठीक है पर जाकर अपनी मेहर को लेता आ कुदरा अस्पताल में पड़ी हुयी है। आज पेपर में फोटू निकाला है। किसी ने मारकर कुदरा टेशन पर फेक दिया था उसे। जो हुआ था उच नीच ठीक है पर उसे घर से क्यूँ निकाल दिया था। अब रंजितवा क्या कहे कल शाम से वो भी उसे ढूंढ रहा है। पूरा डोम टोली के लोग बोल रहे हैं कि किसी बाम्हन ठाकुर के यहाँ सो रही होगी। पर वो तो दूर निकाल गयी थी उससे। रंजितवा बस में चढ़ा लोग उससे बचते बचाते रहे कि कहीं छूया न जाए नहीं तो नहाना धोना सब बेकार वो लोगों को नजरंदाज कराते अपने मेहर को लेने जा रहा था। कुदरा हस्पताल पहुँच कार बहुत मेहनत से उसने छबीली को खोजा। छबीली उसको देखते ही चिपककर रोने लगी। अब गलती न होई रे भया। हम रेलवइया में बैठ के दूर भागत रहीं की मुदइया सब आ गैलन स। उसने अपनी पूरी व्यथा एक सास में सुना दी। किसी अफसोस में वो घर से भागी थी फिर कैसे रेलगाड़ी में अंधेरा होते ही पुलिसिया लोगों ने उससे टिकस मांगा। टिकस न होने पर उसे कुदरा टेशन पर ले गए । वहाँ कैसे दारू शराब के दौर के साथ उसे सब नोच रहे थे। फिर कैसे वो जब होश में आई तो खुद को हस्पताल में पाया। कैसे पुलिस वाले दारोगा बाबू ने उसे डरा कार यह कहलवाया कि वो चलती टरेन से उतारने के चकर में गिर गयी। दुनिया बड़ी खराब है रे भया मैं अब नहीं भगूंगी। मुझे माफ कर। रंजितवा छबीली को हिम्मत दे रहा था। डरो मत मैं तुमसे प्यार करता हूँ। मेरे लिए तुम वैसी ही हो जैसे पहले थी। मुझे माफ कर दो रे भया । मैं उन्हे जिंदा नहीं छोडुंगी। छबीली जार जार रो रही थी पास ही खड़ा शशि जो लोकल पत्रकार था उसकी बातों को रिकार्ड कर रहा था। अगले दिन पेपर में यह समाचार विस्तृत रूप से छप था। शशि ने माफी मांगते हुये छबीली को तैयार किया । अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग वाले आए । उसका बयान हुआ । पुलिस वालों पर कार्यवाही हुयी। छबीली भी पहले से मजबूत हुयी। गाव में अब कोई उसके इज्जत से खेलने का हिमाकत नहीं कर सकता । तिरछी नजरों से देखते हुये भी लोगों के मन में एक डर था। पर छबीली को इस बदलाव पर कोई गुमान नहीं था। पर उजजड्ड लड़कों का वो क्या कर सकती थी। उनके लिए रेलवैया और भिंडी की तरकारी उसे चिढ़ाने का जरिया बन गयी थी। बच्चों के ये नहीं पता था कि इसका मतलब क्या है । पर छबीली भी खुद को कुढ़ने से नहीं रोक पाती थी। उसे पता था उसके पीछे उसका अतीत चलता रहता है। वो अतीत जिसपर उसका बस नहीं था। वह अतीत जिसने उसको स्वाभिमान के साथ जीना सिखाया था। वह अतीत जिसने गाव को मसाला दिया था। वह अतीत जिसके आधार पर आज भी कई लोग कयास लगते की ये हुस्न शायद एक दिन उनके चेम्बर को आबाद करे। पर छबीली अपने तीन बच्चों रंजितवा और पंद्रह सूअरों के साथ बास की खपच्चियाँ बीनते समय अपने अतीत से आजाद हो जाती। पर गाव के फेरे लगते समय उसे अतीत जरूर याद आता पर वो लज्जित नहीं होती।

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