जिन्दगी --- रेल की समानान्तर पटरी

इस छोटे से स्ठेशन पर- जिसक्रेे दोनो सिरे पर स्थापित पत्थर की नाम पट्टिकाओं को बारूद से उड़ा दिया गया लगता था और बाकी नाम पट्टिकाओं पर तारकोल पोत कर विकृत और अपठनीय बना दिया गया था, राजधानी एक्सप्रेस के रूकने के बाद जब तीन घन्टे बीत गये तो लम्बी प्रतीक्षा से ऊबे हुये शेष तीस चालीस यात्री ट्रे्न से उतर कर स्टेशन मास्टर पर लगभग चढ़ ही गये। मगर लम्बी डयूटी की थकान से पस्त, कुछ हालात से डरे और अकेलेपन से ऊबे तथा एक ही प्रष्न कि गाड़ी आगे के लिये कब रवाना होगी को बारबार पूछे जाने से चिढ़े हुये स्टेशन मास्टर ने इस बार बडी तीखी आवाज में बताया कि उनसे चाहे जितनी बार यह प्रष्न पूछा जाये, उनके पास एक ही जबाब है कि इस स्टेशन से चार किलोमीटर आगे करीब एक किलोमीटर लम्बी रेल्वे लाइन को नक्सलवादियों ने विस्फोटकों से उड़ा दिया है इसलिये ट्रे्क की मरम्मत हो जाने के बाद ही ट्रे्न रवाना होगी। इसमें कितना समय लगेगा, इसकी कोई निश्चित अवधि तय नहीं है। मतलब साफ था कि अब बह इस बारे में दुबारा बात करने के लिये तैयार नही थे।

बैसे बोकारो से ट्रैैैन रबाना होने से कुछ समय बाद ही अति आधुनिक संचार सुविधाओं से सम्पन्न मोबाइल फोन धारको को आगे की यात्रा मंें आसन्न खतरो की चेतावनी षायद मिल चुकी थी, इसलिये अपनी सुबिधा और सुरक्षा का ध्यान करते यात्रियों ने इस नानस्टाप सुपरफास्ट ट्रे्न को तीन चार बार चेन पुलिंग करके सुुविधाजनक निकटतम दूरी पर आश्रय और सुरक्षा प्राप्त कर पाने के लिये रोका था और भारी संख्या में लोग यात्रा स्थगित करके पलायन कर गये थे।

स्टेशन मास्टर का जबाब पाकर लम्बी प्रतीक्षा से थके, ऊबे और नक्सलबादियों के नाम से भयभीत यात्री सुरक्षा के लिये संगठित हो कर सलाह मषबरा कर रहे थे तभी स्टेषन के बाहर चाय की थड़ी पर बैठे एक स्थानीय नेतानुमा व्यक्ति ने यह सलाह दी कि स्टेषन से पांच छःकिलोमीटर दूर पर ही नेशनल हाइवे है। यात्री यंहा उपलब्ध किसी भी वाहन से वंहा पहंुंच कर अपनी सुरक्षा और गन्तव्य तक यात्रा का प्रबन्ध कर सकते है। इस व्यक्ति ने बड़ी सहृदयता का परिचय देते हुये स्टेशन के बाहर खडे़ एक ट्रेक्टर ट्रॅ्ाली चालक -(जिसे यह व्यक्ति अबष्य ही पहले से ही समझाइष करके लाया था,) से लोगों को मिलबा भी दिया और आड़े समय में आदमी को आदमी के काम आना चाहिये का सदाचरण का पाठ पढ़ाते हुये के सौ रूपये प्रति यात्री की दर से भाड़ा भी तय करबा दिया तो आनन फानन में लगभग सभी यात्री ट्रॅाली में आलू के बोरो की तरह लद कर रवाना हो गये और मैं इस तमाम व्यवस्था का लाभ लेने न लेने की सोचता तटस्थ दर्षक मात्र बना ही रह गया।

सभी यात्रियों के चले जाने पर अब कुछ अकेलेपन के डर और अपने स्वंय के तुरन्त निर्णय ना ले पानेे की आदत से खिन्न मैं यूं ही प्लेट फार्म पर घूमने लगा, तभी ए.सी. कम्पार्टमेन्ट से एक महिला यात्री उतर कर प्लेट फार्म पर आई। स्टेशन की भयोत्पादक हालत और प्लेटफार्म तथा आसपास लगभग एकदम निर्जन और सुनसान देखकर हालात से भयभीत होकर वह स्टेशन मास्टर के पास जा पहंुची तो पहले से ही उद्विग्न स्टेशन मास्टर को लगा कि शायद मैने उनसे कुछ सूचना या सुविधा प्राप्त करने के लिये अपनी पत्नी को भेजा है, इसलिये वह एक दम भड़क गये। महिला को कोई सूचना या जबाब देने के बजाय वह सीधे चलते हुये मेरे पास आये और बोले-‘‘आप स्टेशन की हालत देख रहे है। यहां कोई रिटायरिंग रूम भी नहीं है और इनके साथ होते हुये भी आप इस सूनसान छोटे से स्टैषन पर इस भयानक रात को ठहरने पर अड़े हुये हैं।

उनका स्वर एकदम तिक्त था, मगर मैनंे विनम्रता से ही जबाब देना उचित समझते हुये कहा- ‘देखिये मास्साब! पहली बात तो यह है कि अब कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं और दूसरी बात है यह मेडम मेरे साथ नहीं है। यह कहते हुए मैने दोस्ताना बढ़ाने के लिये सिगरेट का पेकेट उनकी और बढ़ाया। मंहगा ब्राण्ड होने के नाते पहले तो वह थोड़ा सकुचाये फिर सिगरेट ले ली। जेब से माचिस निकाल कर पहले मेरी सिगरेट जलाई फिर अपनी। एक गहराकश लेकर उन्होंने धंुये को कुछ देर मंुह में बन्द रखा,मानों आज की तमाम घटनाओ से पैदा आक्र्रोष का दम इस धंुये में घोंट देंगें,मगर फिर षायद अपने इस प्रयास में असफल रहने के कारण पष्चाताप की एक गहरी निष्वास के साथ उसे नाक के रास्ते बाहर निकालते हुये बोले- ‘सर! मेरी तो मजबूरी है यहां ड्यूटी पर किसी भी हालत में रूके रहने की- रिलीवर के नहीं आने तक। रिटायरमेन्ट में सिर्फ दो साल बाकी है। इसलिये अगर कोई चार्ज शीट बगैरह मिल गई ये दो साल तो उसका जबाब देने और एकजोनेरेट होने में कम ही पड़ सकते हैं।

सर, तीन बच्चे है मेरे- दो लड़के और एक लड़की। दोनो लड़के पोस्ट ग्रेजुयेशन करके बेकार बैठे है। छोटे मोटे काम करके अपना जेबखर्च और नौकरियों के आबेदनपत्र और उनकी फीस का जुगाड़ करते हुये दोनो आक्रोष पूर्ण जीबन जी रहे हैं, मगर रोजाना नई नई षत्र्तो पर बढते आरक्षण से और उसके बाद बाकी बचे कोटे की सीटों के लिये पैसा, पंहुच और परिबारवाद के चलते हम सामान्यबर्ग के लोगों के बच्चों के लिये तो सरकारी नौकरी गूलर काफूल हो गई है। इतनी पूंजी मेरे पास है नही कि ाउन्हें कोई खुद का काम करवा दूं,। लड़की ने भी पोस्ट ग्रेजुऐशन कर लिया है एक प्रायव्हेट स्कूल में मात्र ढ़ाई हजार रुपये महीने में दिन भर दो शिफ्टो में पढ़ा कर घर के संचालन में मदद करते हुये अपने हाथों में मेंहदी रचने के सपनों को बदरंग होते देखकर अन्यमनस्क जी जिन्दगी जी रही है। अभी तक पैसे के अभाव में परिवार के लिये कुछ नहीं कर सका। सोचता हूं कि अगर ऐसे हालात में डयूटी करते हुये किसी नक्सली हमले बगैरह में मार दिया गया,, तो प्रोविडेन्ट फण्ड और ग्रेच्यूटी की रकम के साथ कुछ अनुग्रह राशि भी मिल ही जावेगी और एक लड़के को अनुकम्पा नियुक्ति के रूप में सरकारी नौकरी मिल जावेगी, तो परिवार सेटल्ड हो जावेगा। जीते जी तो परिवार के लिये कुछ कर नही पा रहा। कहते कहते उनका स्वर एकदम भावुक हो गया तोश्उनकी भावुकता से विचलित मैने उन्हें संात्वना देते हुए कहा- ‘मास्साब! आज की जेनरेशन हमारे विचारो से ज्यादा एडवान्स, जीनियस और केरियर अवेयर है आप चिन्ता नहीं करे, सब ठीक हो जायेगा।

मेरे आश्वासन से वह शान्त नही हुए और उसी स्वर में बोले- आप जैसे पढे़ लिखे विद्वान लोगो की आशावादिता से तो सब कुछ ठीक नहीं हो पायेगा। आप जानते है नक्सलवादी रेलबे लाइन और स्टेशन बिल्डिंग उड़ाने की धमकी देते है, सरकार उनसे सख्ती से निपटने की बजाय गाडि़यों का मार्ग बदल देती है या रेलगाडि़यां रद्द कर दी जाती है। मगर गाड़ी आये न आये हमें तो बारह घन्टे या रिलीबर नहीं आने तक स्टेषन पर पूरी बर्दी में तैनात रहना है,जिससे नक्सलबादी हमें अच्छी तरह और जल्दी से पहचान कर सरकार के प्रति उनका आक्रोष हम पर उतार सकें, इधर हमारी सुरक्षा का यह हाल हैे उधर सुरक्षा बलो पर घात लगाकर हमला होता है और संसद में नक्सलवाद से निपटने के लिये सैना तैनात करने की बात राजनैतिक दलों के सदस्यों की आपसी बहस में उलझ कर ठण्डे बस्ते में पड़ जाती है। आखिर नक्सलबाद भी तो इन्ही राजनैतिक नेताओं की देन है, और इसी के भरोसेेे ही कई राजननैतिक दलों की रोजी रोटी चल रही है। उन्हे तो घनी आबादी में जनप्रतिनिधि के तमगे साथ ए से लेकर जेड श्रंेणी की सुरक्षा मिली रहती है, तो वो क्या जानेंगे कि असुरक्षा के भाव की यातना क्या होती है।’

उनका आक्रोश फूटता ही जा रहा था और प्रवाह पता नहीं कितनी देर चलता मगर ‘साब’ की आवाज सुनकर वह रुक गये। एक प्रौढ़ से आदमी ने जो रेल्वे स्टॅाफ का ही लगता था, गेट से अन्दर प्रवेश किया और स्टेशन मास्टर से बोला- सा‘व हाइवे पर चार ट्र्क गारद (गार्ड) आ गई है और तीस गारद के जुआन (जवान) और एक अफसर को स्टेशन पर गाड़ी की रच्छा (रक्षा) का हुकुम हम अपने कानन से सुनकर आय रये है सो जल्दी ही गारद पहंुंच जावेगी।’’

‘अच्छा ठीक है,’ कहकर स्टेशन मास्टर मेरी ओर मुखातिब हुये फिर बोले- देखिये हमारेे जनप्रतिनिधियों की जनकल्याणकारी सरकार ने राजधानी ऐक्सप्रेस जैसी गाड़ी और उसमें सबार करीब आठसौ यात्रियों की सुरक्षा के लिये अत्याधुनिक हथियारों लेस नक्सलबादियों के मुकाबले के लिये इन तीस मामूली रायफलधारियों को बलि का बकरा बनाकर सिक्यूरिटी का इन्तजाम का तमाषा तो कर दिया, मगर मेरी आपको एक सलाह है- आप अपने कम्पार्टमेण्ट में ही रहे, और इस काफी साफ रोषनी बाली चांदनी बाली रात में कम्पार्टमेण्ट के अन्दर रोशनी और आबाज पैदा करने बाली हरकत बिलकुल नहीं करे और बेहतर होगा कि आप दोनो एक ही कम्पार्टमेण्ट मेें रहंे कहकर उन्होंने मेरी तरफ देखा तो मैने एक सिगरेट स्वंयं निकालकर सिगरेट केस दुबारा उनकी तरफ बढ़ाया मगर इस बार उन्होंने स्पष्ट इन्कार कर दिया और बोले- गाड़ी सुबह से पहले रवाना होगी नहीं और आपका ब्राण्ड यहां मिलेगा नहीं, कह कर बह चलने को मुडे़ तो मैने कहा-‘मास्साब! मेडम को जो कहना हो आप ही कहदें तो अच्छा रहेगा। ’’

स्टेशन मास्टर कुछ बोलते इसके पहले ही महिला बोल पड़ी-इसकी जरूरत नही है मैं तो आपके इसी ए.सी. कम्पार्टमेण्ट में ही हूँ। मेरी सीट दरबाजे के पास बिण्डो लोअर है।’’

आपकी मर्जी, कहकर मैने पहली बार उनकी और गौर से देखा। वह लगभग मेरी ही समवयस्क एक आकर्षक कद काठी की महिला थी। उनका सुनहरे फ्रे्रम का चश्मा उनके चेहरे को एक गम्भीरतापूर्ण गरिमा प्रदान कर रहा था।

मैने हाथ में पकड़ी सिगरेट जला ली और पास पड़ी एक सीमेण्ट की बैंच पर बैठकर कश लगाया तो महिला ने मुझे अपनी नाक सिकोड़ कर षायद सिगरेट के प्रति अपनी नापसन्दगी जाहिर की, मगर मैं ने उनकी प्रतिक्रिया को दरकिनार कर दिया, क्योंकि सभी समझदार सभ्य लोगों की तरह मुझे भी पता है कि सिगरेट में सिर्फ बुराइयां ही बुराइयां हैं, फिर भी मेरा अपना एक मजबूर ख्याल यह है कि उन तमाम स्वास्थनाषक बुराइयों के बाबजूद यह अकेलेपन के बोध के बोझ को आप पर हाबी नहीं होने देती।

थोड़ी देर तो एक सभ्य महिला की तरह सार्बजनिक स्थान पर धूम्रपान पर अपना बिरोध और अन्जान व्यक्ति से दूरी बनाये रखने का भाव प्रकट करने कंे लिये बैंच के दूसरे सिरे के पास खड़ी रही, फिर सकुचाती हुई सी वहीं बैठ गई। इसके कुछ समय बाद षरदऋतु के आकाष में पूनम के काफी ऊपर चढ़ आये चांद से बातावरण में जब ठण्ड बढ़ने लगी तो वह बोलीं- ठण्ड काफी हो गई है कम्पार्टमेण्ट में चलंे।

चलिये। कहकर मै भी उठ खड़ा हुआ। कम्पार्टमेण्ट के बाहर षरदऋतु की मादक ठन्ड होने के बाबजूद अन्दर एक अजीब सी घुटन थी। जेनरेटर बन्द कर दिया जाने की बजह से ए.सी. चल नही रहा था। मगर अब तो इसी कम्पार्टमेण्ट के अन्दर रह कर पूरी रात काटने की मजबूरी थी।

थोड़ी देर हम दोनो एक ही सीट के किनारों पर बिल्कुल खामोष बैठे रहे फिर मैने ही मौन भंग किया- देखिये इस मजबूरी में आपस में विष्वास से ही काम चलेगा। मेरे कहने को आप अन्यथा नहीं लें और आपकीे तरफ के दोनो दरवाजे अन्दर की चिटखनी लगाकर बंद करलंे और खिड़कियो के लोहे की ग्रिल भी बन्द करले। अगर कोई खटखटाये तो दरबाजा खोले नहीं, उस वक्त इधर मेरे पास आजायंे, जो होगा उसका मिल कर मुकाबला करेंगे और अपने होते हुये तो मैं आपको किसी को हाथ भी नहीं लगाने दूंगा।’

मैंरी बात से षायद उन्हे सुरक्षा का आष्वासन मिल गया, इसलिये एक बहुत छोटी सी मुस्कान के साथ बड़े सहज स्वरमें बोली- मैं अभी इधर, आपके पास ही शिफ्ट कर लेती हूँ। और अपना सामान उठाने चली गई।

जब उन्होंने अपना सामान सम्भाल कर रख लिया तो अपने मोबाइल की रोशनी में एक बेग में से टटोलकर बिस्कुट और नमकीन का पेकेट निकाला, फिर महिला सुलभ कौशल से खाने का सामान एक अखबार के टुकडे़ पर सजाकर बोली-आइये डिनर कर लेते है।

मैने दो तीन बिस्कुट उठाकर उन्हें धन्यवाद दिया और खिड़की के पास अपनी बर्थ पर आ गया।

बिस्कुट खाते खाते वह बोली- ‘‘ए.सी. चल नही रहा है, इसलिये कितनी घुटन है, और अगर ऐसे में ........ वाक्य अधूरा ही छोड़कर, मेरी और देखकर चुप वह हो गई तो मैं उनके आशय को समझ गया। मैने उन्हें आश्वस्त करते हुये कहा- मेडम! सोने के दौरान तो कोई भी सिगरेट नही पीता और अगर आपको तकलीफ होगी तो मैं अब कम्पार्टमेण्ट के अन्दर सिगरेेेट नहीं पीऊंगा।

‘थंेक्स’, कहकर उन्होंने अपने कपडे़ संभाले और मेरी ओर सिर करके सीट पर लेट गई।

वातावरण बोझिल था। मगर गाड़ी रूके रहने की खीझ और विवशता के संताप की मानसिक थकान से नींद लग ही गई।

पता नहीं कितनी देर सोया। दरवाजा खटखटाने की आवाज से नींद टूटी तो मैं किसी अज्ञात आशंका से त्रस्त हो उठा। वह भी उठकर बैठ गई थी, और एकदम भयभीत लग रही थी। मैने उन्हंे उनकी सीट पर बैठे रहने का संकेत किया और धड़कते दिल से दरवाजा खोला तो स्टेशन मास्टर को देखकर बड़ी राहत मिली। सुप्रभात अभिवादन की औपचारिकता के बाद वह वोले- इन हालात में रात को आप लोगो को नींद तो क्या आई होगी,, मगर काली रात के बाद अब सवेरा हो गया है और स्टेशन के बाहर थड़ी बाला चाय बना रहा है।, आप चाहे तो चाय पी ले।’’अब मैनें आश्वस्त होकर देखा। सुबह के सात बज रहे थे और बाहर षरद की कोमल धूप ष फैल रही थी।

मैं नीचे उतरा और दो चाय लेकर लौटा। एक चाय उनकी और बढ़ाई। चाय लेते समय उनकी कमर के पास एक काला सा निषान दिखने लगा, जिसे उन्होंने बड़ी सफाई और तेजी से अपना आंचल खंौसकर छिपा लिया, मगर उनका कमर का यह काला निषान मेरे दिमाग में बिजली की तरह कौंध गया और मेरे मंुह से एक दम निकल गया-आप कानपुर को बिलोंग करती है क्या ?

मेरा प्रश्न सुनकर वह एकदम सकपका सी गई, उनके चेहरे पर कई भाव आये और गये तो मैं कुछ लज्जित और खिन्न हो गया। मैने क्षमा याचना करते हुये कहा- माफ कीजियेगा बस यूं हीं पूछ लिया था, आप माइन्ड नहीं करे।’ अपना स्पष्टीकरण पेष करते हुये मुझे लगा कि वह मुझे घूर रही हैं,मगर मेरी बात खतम होते ही वह हर्षपूर्ण दृढ़ स्वर में वोली- और आप धामपुर से हैं, अरे आप तो धामपुर बाले रंजीतजी हैं,हैं ना?‘

‘और आप सुप्रिया जी हंै ? हैं ना?मैने अब आश्वस्त स्वर में कहां।

हां! मैं वही अभागी सुप्रिया हूं’, यादों के समन्दर में डूबी हुई सी आबाज में कहकर वह एक दम मौन हो गई। उनकी स्वीकृति के बाद एक षालीन मौन पसर गया हमारे बीच में, हम दोनों ही तीन दशक पुरानी यादों में खोने लगे थे।

यह तब की बात है जब विवाह एक दिन का आपाधापी का सेलिब्रेशन नहीं होता था। यह एक परम्परागत पारिवारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक,धार्मिक उत्सव होता था। शादी के पांच सप्ताह पहले किसी षुभ दिन के षुभ समय पर घर की सबसे बरिष्ठ सुहागिन महिला घी में हाथ डुबोकर घर के पूजागृह में दीवार पर छाप लगाती थी, इसे सीधा हाथ करना कहते थे। इसे आज की भाषा में वैवाहिक कामों का उद्घाटन माना जा सकता है, क्योकि इसके बाद ही उस विराट उत्सव- विवाह के लिये तैयारियों के काम शुरू होते थे और पारिवारिक संबंधियों का आना भी। क्विण्टलों गेहंू साफ किये जाते थे अचार बनाये जाते थे, क्योंकि तब वुफे सिस्टम नही होता था। बड़ी संख्या में इकटठे हुये समबन्धियो, समाज के लोगों को कमसेकम आठदस दिन का और सैंकड़ो की संख्या में आये बारातियों को कम से कम छः समय का नाश्ता और खाने का प्रबन्ध कोई हंसी खेल नहीं होता था। यह सब काम घर परिवार और समाज के लोग मिल कर करबा लेते थे। घर के युवा लड़को को उनकी योग्यता के अनुसार काम सौप दिया जाते थे।

परिवार में ऐसे ही एक विवाहोत्सव में इस कहानी का और मेरे जीवन के पहले और एक मात्र प्यार का अंकुरण हुआ था। हमारे चाचा जिनके पुत्र का विवाह था एक रिटायर्ड चिकित्साकर्मी थे। उन्होने राजकीय सेवा की लम्बी अवधि में सरकारी बस्तुओं और सुविधाओं का भरपूर सदुपयोग करकेे कुछ भिन्न भिन्न प्रकार के प्रयोग किये और आयुर्वेदिक औषधीय जड़ी बूटीयों का एलोपेथिक रसायनों बगैरह में मिश्रण करके कुछ बीमारियों का इलाज करने में काफी सफलता पाई थी, इसलिये हमारे परिवार में ऐसे कुछ अवसरो पर कुछ मेहमान शादी में सम्मिलित होने के बहाने परिवार के किसी सदस्य का विशेषकर महिला या पुत्री के कुछ ऐसे रोगंांेे ( जिनकी आम चर्चा नहीं हो सकती थी) का इलाज कराने के लिये सीधा हाथ होते ही आने लगते थे। मेरे समवयस्को की कुटिल एकता से अबकी बार मुझे आगन्तुको को रेल्बे स्टेशन या बस स्टैण्ड से लिवाकर लाने का काम सौपा गया।

सीधे हाथ के दूसरे दिन ही मुझे रात दस बजे आने वाली गाड़ी से चाचाजी की बड़ी पुत्री की किसी बुआ सास को लिवाकर लाना था। स्टेशन हमारे घर से चार पांच किलोेमीटर दूर था और वह एक्सप्रेस ट्रेन यंहा केवल दो मिनिट रूकती थी। मैं गाड़ी के साथ ही स्टेशन में दाखिल हुआ था मगर एक तो उनके साथ बड़ी मात्रा में सामान और युवापुत्री की सुरक्षा की दृष्टि से वह कुली और मेरे बार बार कहने पर भी तब उतरी जब गाड़ी रेगने लगी थी। मेरा हाथ पकड़ने से इन्कार करते हुये वह चलती ट्रे्न से उतरते हुये औधे मंुह गिर गई जिससे उनकीे भारी कमर में अच्छी खासी चोट और पैर में मोच आ गई। इस पर उन्हांेने घर में पहंुंच कर ऐसा कोहराम मचाया मानो मैने उन्हें धक्का देकर गिराया हो।

मुझे डांट पड़ जाने पर वह शान्त हुई,े मगर फिर विलाप करती हुई, हमारे चाचाजी से बोली- भाई साहब! हमारी इस कमबख्त बेअकल लौंडिया ( लड़की) के कमरबंद कसकर बांधने से इसकी कमर के पास एक हल्का सा सफेद दाग पड़ गया है। आपकी विटिंया हमारी भांजी की शादी में कानपुर आई थी तब उन्होंने ही इसे आपको दिखाने के लिये कहा था, सो मै तो सीधा हाथ होते ही चली आई। पर इस कलमंुही (उनका अपनी युवा पुत्री के लिये प्रयुूक्त बिषेषण) का तो भाग ही खराब है अब इसका इलाज कैसे होगा ? कहकर वह सिसकने लगी तो खुद अपनी मां के अलंकरणों से मेरी मौजूदगी के कारण उनकी पुत्री की आंखे षर्म से झुक गईं, मगर चेहरा अव्यक्त आक्रोष से तमतमा गया।

हमारे अनुभवी चाचाजी ने बेटी की आहत मनःस्थिति को तुरन्त भांप लिया इसलिये बडे़ सधे लहजे में बोले-बहन जी बिटिया का इलाज तो मुझे करना है, आपको तो बस घर पर रहकर आराम करना है और आप भी चार पांच दिन में बिलकुल ठीक हो जाओगी। बच्ची को भला बुरा मत कहिये। मेहमानों का घर है। मैं कल से ही बिटिया का इलाज शुरू कर दंूगा। फिर वह उनकी पुत्री की तरह मुखतिब होकर बोले- बिटिया्र तुम सुबह नौ बजे तैयार हो जाना रंजीत तुम्र्हें िक्लनिक पर पहंुचा देगा। नाश्ता अच्छी तरह करके आना क्योंकि शुरू मंें पन्द्रह दिन दवा लगाकर तीन घण्टे क्लिनिक में बैठना पडे़गा।

चाचाजी की बात सुनकर वह एकदम विफर गईं और बोली-भाई साहब इलाज करना है तो घर पर ही करो। सप्पी (उनकी पुत्री का घरेलू नाम) क्लिनिक पर तीन घण्टे तो नहीं बैठी रहेगी।

‘‘बहन जी इलाज तो इलाज के तरीके से ही होगा। घर पर सारा क्लिनिक तो नहीं जुटाया जा सकता न। रंजीत कल सुबह इसे क्लिनिक पहंुचा देगा और लौटाकर ले आयेगा।’’ चाचा जी ने बात का समापन करते हुये कहां।

‘‘नहीं भाई साहब आप घर की किसी लड़की कोे साथ कर दे।’’ वह आदेशात्मक स्वर में बोली तो चाचाजी ने अति विनम्रता के साथ उन्हें समझाया कि घर की तीनो युवा लड़कियां कालेज जाती है, उनकी परीक्षा निेकट होने की बजह से वह तो विवाह के मुख्य तीन चार दिन¨ं में ही¦ कालेज की छुट्टी करेगी और रंजीत मेरे अपने लड़के से ज्यादा विश्वास का है उनके घर में इसलिये वह बिलकुल चिन्ता न करे।’’

‘‘मगर भाई साहब! आप सप्पी के पापा को नही जानते, वह बहुत नाराज होगे जब उन्हें पता चलेगा कि सप्पी कालेज में पढ़ने वाले एक जवान लड़के के साथ अकेली क्लिनिक जाती थी। अब वह कुछ संकोच से बोली, तो चाचाजी ने अपने व्यावसायिक अनुभव में सामाजिक प्रतिष्ठा के मिश्रण का नुस्खा आजमाते हुये कहा- बहिन जी पहली बात तो यह है कि उन्हे बतायेगा कौन ,फिर सबसे बड़ी बात यह है कि अब तो रोज ही मेहमान बढ़ेगे तब बिटिया की नादानी से ही पड़े सफेद दाग के इलाज की बात छिपी कैसे रह जाबेगी। चाचाजी के बेहद गम्भीरतासे बोले गये षब्दों में छिपी आषंका में छिपे भय के सत्य से बह चुप हो गई।

पहले दो दिन तो हम रिक्शे में बिलकुल अजनबी की तरह बैठे रहे्े थे। कस्वाई सड़क के गड्डों में जब हिचकोले लगते तो मैं सौजन्यता के नाते भरसक कोशिश करता कि मेरा शरीर उनके शरीर से टकराये नहीं मगर कभी कभी ऐसा हो ही जाता था। ऐसी ही एक कोशिश में उस दिन मैने आगे झुकते हुये रिक्शे की सीट पकड़ने की कोशिश की तो पुरानी सीट में निकले लोहे का किसी टुकड़े से मेरी उंगली कट गई। खून बह निकला तो सुप्रिया एकदम घबरा गईं। घबराहट में उन्होंने एकाएक मेरा हाथ पकड़कर उंगली को अपने होठो में दबा लिया। मुझे तो जैसे बिजली का झटका सा लगा,मगर जो अनन्त आनन्द की अनुभूति हुई वह तो बर्णननातीत है। थोड़ी देर में खून बहना बंद हो गया तो वह लज्जित सी हो कर बडे़ संकोच से बोलीं थी- मेरी बजह से आपको कितनी तकलीफ हो गई।’’

अरे इसमें तकलीफ क्या है, ये छोटी मोटी चोटे तो लगती ही रहती हैं, आप नाहक ही परेषान नही हो। मैने उन्हे आष्वस्त करने के लिये थोड़ा बहादुरी दिखाते हुए कहा। उन्हे मरी बात से कितनी तसल्ली हुई,पता नहीं, मगर उस दिन के बाद हमने रिक्शे में लगने वाले हिचकोलो पर अपने शरीर एक दूसरे से टकराने का बचाव का प्रयास छोड़ ही दिया था,बल्कि ऐसे अवसर पर जब वह नजर नीची करके हल्के से मुस्करा देती थी तो मुझे रोमांचक आनन्द का अनुभव होता था। इसके बाद हम धीरे धीरे आपस में खुलने लगे अपने काॅलेज, केरीक्यूलम बगैरह बहुत से विषयों और परिवार के बारे में बात करने लगेे। ऐसे ही बात करते करते एक दिन अचानक वह मेरे पिताजी के बारे में पूछ बैठी- आपकी माताजी से कई बार मिल चुकी हूं मगर आपके पिताजी को नहीं देखा, वह यहां नहीं है क्या ?

पिता की मृत्यु को दस बर्ष हो गये थे। उनके अचानक प्रश्न से पिता की स्मृति में मैं भावुक हो गया तो पता नही उन्होंने मुझे सांत्वना देने के लिये,या अपनी षर्मिन्दगी छिपाने के लिये या भावुकता के आबेष में मेरा हाथ अपने हाथ में थाम लिया और विनयपूर्ण स्वर में बोलीं- देखिये मैं सच कह रही हूं, मुझे बिल्कुल मालूम नही था कि मेरे इस प्रष्न से आप को दुख होगा। आप मुझे माफ कर दीजिये। (प्लीज कहने का उन दिनों फेषन आम नहीं था) कहतंे हुये वह लगातार मेरा हाथ पकड़े रही तो मुझे ऐसा लगा था मानो पिताश्री ने स्वर्ग में बैठे हुये बिगत दस बर्षे के स्नेह का कोटा आज इस पल में ही मुझ पर लुटा दिया हो।

उस दिन के बाद मैने कालेज जाना बन्द ही कर दिया। सुप्रिया का अधिक से अधिक सामीप्य पाने के लिये मैं घर के ज्यादे से ज्यादा काम करने लगा और उनकी मां का तो ज्यादे से ज्यादा काम पूरी तत्परता से करने लगा था।

इधर हमारी नजदीकियां बढ़ रही थी उधर विवाह के दिन नजदीक आ रहे थे और आखिर वह दिन भी आ गया जब सुप्रिया के पिताश्री अपने दो पुत्रो के साथ पधार गये।

उस कद्दू आकार के श्याम वर्ण मंुह पर कर्जन कट मूछो और बड़ी बड़ी खंूंखार आंखो वाले व्यक्ति सुप्रिया के पिता ने चाचाजी की बड़ी पुत्री के फूफिया ससुर होने के नाते आते ही उनके भारी भरकम स्वागत से लेकर हरबात में फूं फां करने के दायित्व से निवृत्त होते ही सबसे पहले अपनीे पत्नी को तलब किया और किसी आपराधिक मामले के बेहद कठोर जांच अधिकारी के अन्दाज में सुप्रिया के इलाज के बारे में पूछा और यह पता लगते ही कि उनकी पुत्री पूरेे एक माह कालेज में पढने बाले एक जबान लड़के के साथ घर से चाचाजी की क्लिनिक तक अकेली जाती आती रही तो उन्होंने मेहमानो की परवाह न करते हुये अपनी पत्नी को बेहद बदतमीजी से डांटा।

मेरी बदकिस्मती कि मैं उसी समय वहां पहुंुच गया था सो पत्नी से फुरसत पाते ही उन्होंने मुझे लपक लिया और फिर बिना किसी भूमिका या लाग लपेट के मेरा हाथ पुलिसिया अन्दाज मंे पकड़ कर बोले- देखो मिंयां, अगर तुमने पिछले एक महीने में हमारी बेवकूफ लोंडिया के साथ कोई ऐसी बेसी हरकत की होगी तो मुझे पता चल ही जायेगा फिर तुम्हारी खैर नहीं है। तुम मुझे नहीं जानते, कानपुर में पूरा मुहल्ला मुझसे कांपता है। समझ गये ना, और इसके साथ हीे सुप्रिया को खा जाने बाली नजरों से देखते हुये गरजे-खबरदार जो अब क्लिीनिक पर जाने का ख्याल भी दिमागे में लाई तो तू जानती है मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।

इस आदेष से मुझ पर तो बज्रपात ही हो गया। इस आदेष से सुप्रिया से मिलने की संभावना तो एकदम खतम ही होगई। फिर भी तमाम आवष्यक या उनकी झलक पा जाने की आस में सोच कर निकाले गये कामों की बजह से आतेजाते कभी वह दिखाई दे भी जाती थीं तो उनका उदास और बुझा हुआ चेहरा देखकर मन को बेहद तकलीफ होती थाी।

सुप्रिया से मिलने का कोई अवसर न देखकर मैने एक योजना बनायी । मैने काॅलेज में यूनिवर्सिटी हॅाकी टूर्नामेण्टस में जाने वाली टीम के चयन का ट्र्ायल शुरू हो जाने का बहाना बनाकर चाचाजी के घर जाना आना बेहद सीमित कर दिया। यह मेरी अगली योजना का एक भाग था। इस बहाने से मैं बारात में जाने से रूक जाऊंगा और सुप्रिया के पिता का भारी मनुहार के साथ बरात में ले जाया जाना निश्चित था। उन दिनो विबाह की रस्में आराम के साथ तीन दिन में पूरी होती थीं इसलिये बारात जाने और वापिस आने में तीन चार दिन की अवधि तो निश्चित ही होती थी। उन दिनो में कभी न कभी सुप्रिया से मिलने का मौका मिलने की संभावना थी और सौभाग्य से यह सम्भावना सत्य बन गई।

बारात चले जाने के बाद घर में पुरूष तो एक दो ही और स्त्रियां ही शेष रह जाती थी। घर की सुरक्षा हेतु स्त्रियां रात्रि जागरण करती थी और जागरण का क्र्रम अनबरत रखने हेतु मनोरंजन के लिये स्त्रियां खोरिया (लोक नृत्य नाटिका) का खेल करते हुये रात बिताती थीं। खोरिया आरम्भ करने के पहले वह परम्परा के अनुसार घर के निकट मंदिर में में जाकर शिव पार्वती की पूजा करती थी।

बारात चले जाने के दूसरे दिन स्त्रियां पूजा को गई तो सुप्रिया को रजस्वला होने के कारण घर पर ही छोड़ दिया गया था, तब एक भाभी की कृपा से यह सुअबसर आया-सुप्रिया मुझसे मिलने आई। वह एकदम उदास और बुझी हुई थी। आते ही मेरे दोनो हाथों को अपने हाथों में कसकर पकड़ कर उनपर अपना सिर टिकाकर बोली ं- रंजीत जीवन में यह आपसे मिलना और इतने दिन का सामीप्य मैं जीवन में कभी भुला नहीं पाऊंगी। शायद इसी को जीवन का पहला प्यार कहते है। मैं तीन चार दिन में यहां से चली जाऊंगी, फिर शायद जिन्दगी में कभी मिलना नही हो, मगर मैं जंहा भी रहूंगी, कभी कभी आपके साथ बिताये इन खुषी के लमहों को याद करके खुष हो लिया करुंगी, मगर आप हमेषा खुष रहना मेरी खातिर - मेरी खुषी की खातिर। पिताजी ने आपका जो अपमान किया है उसके लिये मैं माफी मांगती हूँ। एक बार फिर कहती हूँ आप हमेषा खुषऔर बहुत खुष रहकर मुझे कभीकभी याद लिया करना। फिर थोड़ा रूक कर बोली- मैं आपको-जिन्दगी के पहले प्यार को भुला नहीं पाऊगीे,इसलिये जब भी संभव होगा, आपको खत लिखूंगी। मगर आपसे एक बादा लूंगी, आप जबाब में मुझे कभी खत नहीं लिखंेगे। अगर पापा के हाथ पड़ गया तो आपने देख ही लिया कि किस तरह जलील करंेगे, उन्हे किसी की कोई परवाह नहीं है। वह तो मारपीट भी कर सकते हैं। उनके लिये कुछ भी असंभव नही है। आप बादा करो। कहकर वह सिसकते हुये कांपते स्वर में बोल रही थी- बोलिये मेरी खातिर, अपने प्यार की खातिर बादा दे सकते हो आप। कहकर वह जोर से सिसकने लगी थीं।

उनकी बात सुनकर मैं बड़ी उलझन में पड़ गया था। यह कैसा बादा मांग रही है कि वह पत्र लिखेगी और मैं जबाब नहीं दूंगा। मगर सिसकियों के ज्वार से उनका सारा बदन कांपने लगा तो मैने भी कांपते स्वर में ही कहा था- सुप्रिया, अगर तुम्हारी खुशी इसी में है तो मैं बादा देता हूँ। सुनकर उन्होंने मेरे दोनो हाथो को चूमकर अपने माथे से लगाया और स्त्रियों के गीतो की आवाज नजदीक आती सुनकर आंसू पोछते हुए चली गई थी।

इसके बाद लगभग डेढ़ साल तक दस पन्द्रह दिन में उनका पत्र आता था। पत्र में केवल किसी अंग्रेजी या हिन्दी की किसी कविता की कुछ पंक्तियां, मुझे खुश और स्वस्थ रहने का और पत्र का उत्तर नहीं देने का अनुरोध होता था। बड़ी मुश्किल से संयम रख पाता था मगर फिर भी उनके अनुरोध की रक्षा करता रहा। मगर डेढ़ साल बाद पत्र आना एकदम बंद हो गये तो षुरु में मैने इसका कारण उनकी परीक्षा की निकटता और बाद में पारिबारिक अनुषासन की कठोरता की स्थिति को माना मगर जब बन्द सिलसिला फिर से चालू ही नहीं हुआ तो मैने उनकी मजबूरी स्वीकार कर ली। एक दो बार चचेरी बहिन के मायके आने पर उनसे बातो बातो में सुप्रिया के बारे में कुछ जानने की चेष्टा की तो उन्हांेेने कह दिया- वह लोग किसी से ज्यादा ताल्लुक नहीं रखते।

इसके बाद जीवन की आवश्यकताये पूरी करने और व्यावसायिक सफलता के लिये संघर्ष में मेरी जिन्दगी एक तेज रफतार से दौडती रेलगाड़ी की तरह सबको पीछे छोड़कर निकल चली तो सुप्रिया को ढ़ूढ़ने का प्रयास करना तो भूल ही गया, हां किसी भी प्रसंग में कानपुर और सुप्रिया नाम का जिक्र भी मुझे कुछ लम्हों के लिये ही सही हमेषा भावुक जरूर कर देता था। ऐसे ही तीन दशको का लम्बा समय कब उड़ गया, पता ही नहीं चला। 10-12 साल तो विदेशो में अध्ययन अध्यापन करते बीत गये। अपने बारें में सोचने का मौका ही नही मिला। जिन्दगी की रेलगाड़ी की रफ्तार से उड़े धूलकणीें के बालों में सफेदी बनकर चिपकने का अहसास तो उस दिन सिंडीकेट की मीटिंग में प्रोफेसर रज्जाक ने मजाक में कराया - अरे रंजीत भाई ,हेयर डाई करना शुरू करो। तुम्हारे बाल तुम्हारी उम्र की चुगली करने लगे है। ऐसे ही रहोगे तो लड़कियां तुम्हे अंकल कहने लगेगी।

जिन्दगी एंेसे कट रही थी कि-

जिन्दगी एक खन्डहर हैे ,और हम पे्रतात्मा है,

रह रहे अभिषप्त हो, दूजा न कोई रास्ता है।

हो गये बदरंग ओ जर्जर,इसके सब दीबारो दर हैं,

खण्डहर ढ़हता नहीं क्या जाने किसका बास्ता है।

ष्षायद इसीलिये आज जब तीन दशक के बाद दोनो की जिन्दगी का पहला प्यार आमने सामने था तो दोनो बात शुरू करने का सूत्र ढूंढ रहे थे।

आखिर मैने ही मौन भंग किया-‘‘सुप्रिया जी! मैने तो आपको दिया गया बचन पूरी ईमानदारी से निभाया फिर आपने पत्र देना क्यों बंद कर दिया ?

अब सुप्रिया का मौन टूटा-‘‘रंजीत! हम लगभग तीन दशक बाद किसी देवयोग से अचानक इस सफर में मिले है मगर हम अजनवी तो नही है जो आप मुझे आप और सुप्रिया जी कह रहे हो। आप मुझे सिर्फ सुप्रिया कहेगे, और आप नहीं पहले की तरह तुम कहेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा। कहकर उन्होने बड़ी आत्मीय दृष्टि से मुझे देखा।

‘‘अच्छा सुप्रिया! मैं अपना प्रश्न दोहराता हूँ। मैने कहां ?

‘‘ओफफोह! लहजा तो बिलकुल प्रोफेसरो बाला हो गया है, कहते हुये उनके होठो पर एक सलज्ज मुस्कान उभर आई तो मुझे आज से तीन दशक पुरानी सुप्रिया मिल गई। मगर इतना कहकर सुप्रिया थोड़ी देर के लिये मौन हो गई, मानो शब्द ढूढ रही हो, फिर बोली-‘‘समझ में नहीं आता, कैसे शुरू करूं, कहां से शुरू करूं ?

‘‘कहीं से भी, जहां से तुम्हे उपयुक्त लगे। मैने उन्हें आश्वस्त किया।

सुप्रिया थोड़ी देर पैर के अंगूठे से फर्श पर रेखा खींचने का उपक्रम करती रही फिर उन्होंने कहना शुरू किया- ‘‘धामपुर से आने के बाद मन बड़ा खिन्न रहने लगा। किसी भी काम में और पढ़ाई में तो मन बिल्कुल नहीं लगता था। एक दिन ऐसे ही खिन्न और अन्यमनस्क बैठी थी कि मां ने एक दम बिना किसी भूमिका के सीधे चोटी पकड़ कर झिझोड़ते हुये पूछा-क्योंरी! देख रही हूँ जब से धामपुर से आई है किसी काम में तेरा दीदा ना लगे है, किसकी याद में खोई रहती है हर वखत कलमुंही।

मां का रोद्र रूप और उनके प्रिय सम्बोधन के अपमान से मन भय के साथ घृणा और बितृष्णा से भर गया, मगर किसी भी तरह बात तो संभालनी थी सो बोल दिया - मां कोई बात नहीं है डेढ़ महीने से कालेज नही गई, सो पढ़ाई में काफी पिछड़ गई हूँ यही सोचकर दिल घबराता है।’’ उसी समय एक पड़ौसिन के आ जाने बात दब गई,मगर यह ध्यान आते ही कि मां का धामपुर का प्रसंग देकर क्रोधित होने का कारण वंहा मेरे इलाज में उनके पतिदेब की मान्यता की अबहेलना के कारण है,मुझे किसी लेखिका का यह कथन-भारतीय नारी को अपने जीवन में सिर्फ आर्थिक और षारीरिक सुरक्षा के लिये एक आदमी की जरुरत होती है और षारीरिक सुरक्षा के लिये तो हर वर्ग के हर समाज में जरुरत होती है, एक प्रत्यक्ष सच प्रतीत हुआथा।

इस विचार पर सोचते हुये मुझे यह भी लगा कि -मेरी मां जैसी अल्प शिक्षित मध्यमवर्गीय औरत अपनी षारीरिक,सामाजिक आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करने के स्वार्थ में अन्धी होकर इसके प्रदाता उस आदमी- अपने पति के प्रति इस तरह पूर्णसमर्पित और कृतज्ञ रहती है कि इस कृतज्ञताज्ञापन के प्रयत्न में संतान और खास तौर पर पुत्री उसके परिवार के प्रति कर्तव्यों की प्राथमिकताओं में बेहद निचले पायदान पर पंहुच जाती है।

उस दिन के बाद यह बात भी दिल में बैठ गई कि हर औरत के अन्दर एक मां होती है, यह बात हमारे समाज में पुत्री के प्रसंग में तो लगभग लफ्फाजी ही है। वह खुद कभी आम भारतीय परिवार की पुत्री रही होने और उस रुप में अपना भोगा अतीत भूलकर अपनी पुत्री की सहृदय संरक्षिका बनने के स्थान पर अंग्रेजो के जमाने की जेलर बन जाती बन जाती है। लड़की पर सबसे ज्यादा अंकुश का अत्याचार मां-एक महिला द्वारा ही होता है और इसका ठीकरा हर बात में पुरुष प्रधान समाज का मातम मनाते हुये पुरुषों के माथे फूटता हैे। तभी तो मेरी मां के सामने कोई स्पष्ट कारण नहीं होते हुये भी उस दिन के बाद उसकी चैकसी कुछ इस तरह बढ़ गई कि वह मेरे काॅलेज जाने और बापिसी के समय किसी न किसी बहाने गली के नुक्कड़ पर तैनात मिलने लगीे।

घर में मेरी पढ़ाई के लिये कोई अलग कमरा नही था। रात का खाना आठ बजे तक हो जाता था, फिर रसोई समेट कर मैं वहीं जमीन पर गद्दा डालकर दो तीन घण्टो पढ़ती और सो जाती थी।उस दिन मैंने आपको पत्र लिखकर अपनी कापी में रख लिया मगर उसे बारबार पढ़ते हुये कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। सुबह मां ने रसोई का दरवाजा खटखटाया तो हडबड़ाहट में दरवाजा खोलने से पहले खत उठाना भूल गई। बस मां ने बिस्तर के पास कापी किताबों से अलग पडे़ उस पत्र को मेेरे लिये उनके मन में पनप रही षंका का सूत्र मान कर उठा लिया और जेलर की तरह पूछा-ये क्या है ?

खत अं्रग्रेजी में था और एक कविता की कुछ पंक्तियां थी और सम्बोधन में किसी का नाम नही था, सो मां स्थापित तो कुछ कर नहीं सकी मगर जलती नजरो से उसने जब फिर वही सवाल दागा तो मै मां का रोद्र रुप देखकर घबरा तो गई,मगर बात सम्भालते हुये कह दिया-मां अंग्रेजी की एक कविता है, मैं लिखकर याद कर रही थी।

आज मां को अपने अल्प शिक्षित होने का बड़ा दुःख हुआ फिर भी यह कहकर- तेरे वाऊजी से समझ लूंगी, उन्होंने उसे अपने ब्लाउज में खोस लिया तो मेरे तो पैरो तले की जमीन ही खिसक गई, मगर कर तो कुछ सकती ही नही थी।

पिताजी कुछ दिन से लखनऊ गये हुये थे। हाइकोर्ट में उनके खिलाफ गबन का मुकदमा चल रहा था। एक पुराने घाघ एकाउन्टेन्ट मेरे पिता का यह विभाग तब एकदम नया-नया ही था, जो बिधबाओं और अनुसूचित जाति की कन्याओं के कल्याण जैसा कुछ था। यहां विधवाओं और स्कूल जाने वाली लड़कियों को अनुग्रह राशि प्रदान की जाती थी। पिताजी पर आरोप था कि उन्होने जाली हस्ताक्षर करवा कर पैसे का गबन किया है। पिताजी सबको बांट कर खाने में विश्वास करते थे,मगर एक युवा ईमानदार आडिट अफसर की जांच ने भण्डाफोड़ कर दिया था। गबन स्थापित होते ही सारे अफसरो मंे भुगतान की जिम्मेदारी ऐकाउन्टेन्ट (पिताजी) की बताकर पल्ला झाड़ लिया। इस पद के कई अन्य प्रत्याशियांें ने बहुत जल्दी विभागीय जांच कराके पिताजी को दोषी साबित करवा दिया। पिताजी सस्पेण्ड कर दिये गये और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही अदालत में शुरू हो गई थी।

तीसरे दिन पिताजी लौट आये। मैं रसोई निपटाकर पढ़ने बैठी ही थी कि रसोई का दरवाजा धड़ से खुला। शराब के नशे में धुत पिताजी मां के साथ आये, उन्होंने मुझे सीधे हाथ से पकड़कर खड़ा किया और वह कापी का पेज दिखाकर बोले- यह क्या है ?’’

मैं तो हतप्रभ रह गई। यह सौचा भी न था कि मां पिताजी के आते ही ये बात उन्हें बता देगी सो ‘‘वो पापा, वो पापा ये एक अंग्रेजी कविता है मैं याद कर रही थी लिखकर..... कहते कहते मैं हकलाने लगी, तो पापा ने चीख कर पूछा- ये कविता के नीचे खुष रहने के लिये किसे लिखा है ? बोल ?’

पापा का रोद्र रूप देखकर मैं तो जड़ हो गई, तभी पापा का एक झन्नाटे दार तमाचा गाल पर पड़ा तो मुंह से चीख निकल गई। इसके बाद पता नही पाता कब तक हाथो और लातो से पीटते रहे। जब हाथो लातो से थक गये तो उन्होने रसोई के उपकरणों को इस्तेमाल करना शुरू किया। मैं तो अपनी मां की मौजूदगी में बाप की एक दो मार खाकर ही तन की बजाय मन से इतनी आहत हो गई कि मैने बचाव करना भी छोड़ दिया।

मां मुझे पिताजी की मार से बचाने के बजाय बीच बीच में-अरे यह तो पूछो कि इस कलमुंही ने और कित्ते खत लिखे हैं अपने इस यार को, और उस हरामजादे का नाम पूछ लेने के कर्तव्य का स्मरण कराके अपनी कर्तव्यपारायणता का परिचय दे देती थी।

थोड़ी देर में पिताजी हाथ पांव चलाते चलाते जब थक गये तो उन्होंने स्टोव जलाने के लिये रखा केरोसिन का केन उठाया और बोले- आज किस्सा ही खत्म कर देता हूँ हरामज़ादी का और वह केन उठाने के लिये आगे बढ़े तब मां उन्हें रोकते हुये बोली-अरे आप पहले ही परेशान हो कोर्ट कचहरी के चक्करों से, इस कलमंुही के लिये अपनी परषानीेे और क्यों बढ़ाते हो ?आज आप थक भी बहुत गये हो, चलो फिर देख लेना। कहकर वह पिता को रसोई से बाहर ले गई। मां के पिता के प्रति सहानुभूतिपूर्ण संबाद में इस क्र्रूरकाण्ड के षेष भाग की सुबिधानुसार पुनरावृत्ति की सम्भावना अन्र्तनिहित थी।

इस काण्ड को अंजाम देकर मां और पिताजी तो चले गये,मगर मैं तन और मन दोनों सेे पूरी तरह जड़ हो गई थी। मार की पीड़ा से तन और ग्लानि से दिल फटा जा रहा था। एक दफा तो इच्छा हुई कि कैरोसिन का केन उडेल कर आग लगा लू मगर अब तन और मन इस कदर घायल हो गया था कि कुछ करने की हिम्मत नही हुई इसलिये आत्म हत्या करके खुद को खतम भी नहीं कर सकी। सारी रात तड़प तड़पकर सुबकती रही, मगर मेरी मां कोई युवा पुत्री की सहेली वाली मां थोड़े ही थी जो सान्त्वना देने आती।

दूसरे दिन मां ने ही रसोई का दरवाजा खोला मेरा सूजा हुआ मंुह और जख्मी हाथ पैरो को देखकर बोली-सजा तो तुम्हें अपने करमों की ही मिली है, पर अब अन्दर के कमरे में जाकर मरो, दोपहर को हल्दी गरम करके लगा दूंगी।’’ मैं चुपचाप घिसटती हुई अन्दर कमरे में चली गई।

दूसरे दिन मेरी एक सहेली, जो मेरी ही जैसी किसी मां की बेटी थी, उसकी एक किताब वापिस मांगने आई तो मैने चुपके से उसे अपने मामा का लखनऊ का टेलीफोन का नम्बर देकर उन्हें मुझे कुछ दिन के लिये बुला लेने का अनुरोध करने को कहा। मेरे मामा के अपने एक मात्र पुत्र के विदेश चले जाने के बाद उनकी दूसरी संतान पुत्री की मृत्यु से बडे़ दुःखी रहते थे और कई बार मां और पापा से मुझे गोद लेने की इच्छा प्रकट कर चुके थे। सहेली ने अपनापन निभा दिया। तीसरे दिन मामा का फोन आ गया। उन्होंने पापा से मामी की तबियत खराब हो जाने की बात कहकर मुझे कुछ दिनो के लिये उनके पास भेज देने का अनुरोध किया था।

मां और पिताजी को तो मंुह मांगी मुराद मिल गई। मां ने मुझे तुरन्त लखनऊ चलने के लिये तैयार किया और बोली-‘‘वहां मामा मामी के प्यार में आकर बह मत जाना और सजा तो तुम्हें तुम्हारी करतूत की ही मिली है। वैसे भी कोई तलवारो के घाव तो है नहीं, मामा मामी रखेंगे तो महीने पन्द्रह दिन, उसके बाद तो हम पर ही बोझ बनोगी।’’

मां के वचन सुनकर मैने यह निर्णय कर लिया कि अब इस घर में वापिस नहीं आऊंगी। अगर जरूरत पड़ी तो मामा मामी के पैर पकड़ कर कहूंगी कि भान्जी की तरह नहीं तो नौकरानी की तरह रख लो। सब काम कर दूंगी, बस कुछ दिन रोटी कपड़ा दे देना और एक उपकार कर देना कि कही छोटी मोटी नौकरी लगवा देना। इण्टरमीडियेट तो कर ही चुकी हूँ। मगर इस तरह की नौबत नही आई। मामी ने तो मेरी हालत देखकर मुझे ऐसे कलेजे से लगा लिया जैसे मेरी सगी मां ने कभी नही लगाया था फिर सिसकते हुए बोली- हाय कोई ऐसी बेरहमी से लड़की को मारता है कहीं ठोर कुठोर अन्दरूनी चोट लग जाती तो, और लग गई हो तो क्या मालूम? अरे बाप जवान बेटी को मां के सामने इस तरह पीटता रहा और मां ने रोका तक नहीं। मामी ने भर्राये गले से कहां तो सहानुभूति का यह स्पर्श पाते ही मेरे आंसू बह निकले और मैने सुबकते हुए कहां-मामी यह सब तो मां का ही प्रायोजित कार्यक्रम था।

मामा जो अब तक जड से खडे़ थे मामी को इस भावुक दोैरे से उबारने के लिये थोड़े कडे़ स्वर में बोले- अब उसकी मार का मातम बनाती रहोगी या कमरे में ले जाकर उसकी चोटे भी देखोगी। मैं डाक्टर मालती को बुला लेता हूँ।

‘‘मगर डाक्टर को बतायेगें क्या ?’’ मामी हताश स्वर में बोली तो मामा ने कहा- डाक्टर मालती तुम्हरी सहेली है, चाहे जो किस्सा गढ़ लेना।’’

न जाने डाक्टर मालती के इलाज से या मामा मामी के प्यार संे चार पांच दिन में घाव भरने लगे चोटो का दर्द भी जाता रहा, मगर मन अब तक घायल था।

दो महीने बीत गये, मेरी बी.ए. फाइनल की परीक्षा में एक माह रह गया था, मगर मां बाप ने मुझे बुलाने के बारे में बात करना तो दूर मामी के स्वास्थ के बारे में जानने की कौशिश भी नहीं की। इस बीच पापा अपने मुकदमें के सिलसिले में मामा के घर आयंे तो मैं उनके लिये पानी लेकर गई और पानी का गिलास उनके सामने करते हुये बोली- पापा बहुत थके हुये लग रहे हो, क्या बात है, सुनकर पापा ने मुझे खा जाने बाली नजरो से देखा और हाथ से गिलास को धकेलते हुये गरजे- तुमसे मतलब,खबरदार आइन्दा मुझे अपनी सूरत मत दिखाना। पापा के रोद्र रुप और कटु षब्दों की चोट से मेरा मन जमीन पर गिरे कांच के गिलास की तरह टुकड़े टुकड़े हो गया। इस घटना के बाद मामा ने प्रयत्न करके मेरा परीक्षा केन्द्र कानपुर से बदलवा कर लखनऊ के ही एक कालेज में करवा दिया, और इसकी सूचना भी मेरी मां को दे दी।

परीक्षा खत्म हुये एक सप्ताह बीत गया था पिताजी के केस का निर्णय हो गया था। गबन आरोप साबित हो जाने के कारण उन्हें छः मास के कारावास की सजा हो गई थी। मगर मामा ने उनकी तुरन्त जमानत कराली थी, इसलिये वह जेल जाने से बच गये थे।

इस घटना ने मुझे स्तब्ध कर दिया था। मैने एक बार कानपुर जाकर मां बाप से मिलने का फैसला किया मगर मामा मामी ने मेरे लखनऊ आने के बाद पापा का उनके घर आने पर मुझसे किये गये व्यवहारबाली घटना को याद करते हुये मुझे समझाते हुये कहा- अभी उनकी मनःस्थिति ठीक नहीं होगी, थोडे़ दिन रूक कर चली जाना हम भी तेरे साथ चलेंगे।

मगर तीसरे दिन ही रात को पिताजी के गंभीर रूप से बीमार होने का फोन आया, तो मामा तुरन्त कार में मुझे और मामी को लेकर निकल पडे़। कानपुर पहंुचते पहंुंचते 3-4 घण्टे लग गये। वहां पहंुचते ही घर के बाहर से ही रोने चीखने की आवाजो ने मुझे पिता की मृत्यु का आभास करा दिया था। मैं तो जड़वत हो गई, आखिर को वो मेरे पिता थे।

मामी ने बडे़ बात्सल्य से मुझे सीने से चिपका लिया,मगर घर के अन्दर पहंुचते ही मां ने झपट कर मेरी चोटी पकड़ कर दो तीन झटके दे दिये फिर छाती कूटती हुई बोली- खा गई कलमंुही बाप को, अरे उन्हें तो उस दिन का ऐसा सदमा बैठा कि सबसे बोलनाई बन्द कर दिये थे। कहते थे.....फिर पता नहीं क्या सोच कर मां ने आगे कुछ कहने बजाये जोर से एक दोहत्थड़ अपनी छाती पर रसीद किया और फिर चीखचीख कर रोना शुरू कर दिया। अबसर की नजाकत देखते हुये मामी ने बड़ी मुश्किल से मुझे मां से मुक्त कराया, मगर जब दोनों भाइयों ने भी मुझे जलती नजरो से देखा तो मुझे लगा कि जमीन फट जाये और मैं उसमें समा जाऊ, मगर न समय त्रेतायुग का था न मैं - जनकदुलारी सीता थी। मै अपने जनक की दृुलारी तो होती भी कैसे मैं तो अपनी जननी की ही दुलारी नही थी।

मामा,मामी के निरन्तर सान्त्वना देने पर थोड़ी देर में बडे़ भाई ने मामा को बताया कि सस्पेण्ड होने के बाद से पिताजी आमदनी कम हो जाने से सस्ती शराब और सिगरेट पीने लगे थे। तीन महीने पहले जब दिल का दौरा पड़ा था और मामा की सहायता से इलाज हो गया था तब डाक्टर ने उन्हें सिगरेट और शराब से तौबा करने को कहा था मगर जब से उन्हें यह अहसास हो गया था कि सारे सुबूत उनके खिलाफ है और वह अकेले अभियुक्त बन गये है तो उन्हांेने शराब और सिगरेट खूब पीनी शुरू कर दी थी। यहां तक कि मामा की लखनऊ से भेजी महंगी दवाईयां वह केमिस्ट को ओने पोने में बेचकर सस्ती शराब पी लेते थे। कुछ दिनों से हाथ पैरों के साथ मुंह पर भी खूब सूजन आ गई थी सो खाना खा ही नही पाते थे । डाक्टर ने एक सप्ताह पहले ही जबाब दे दिया था।

उस दिन जो कुछ हुआ उससे मैं अपनी पिटाई बाले दिन से भी ज्यादा आहत मन लेकर तीसरे दिन लखनऊ लौट आई। तेरहवी बाले दिन मां ने मामा को कहा- भइया तुम इसे गोद लेना चाहते थे ना, सो अब तुम्हीं ले जाओ इसे, मैं तो इस कलमुंही का मंुंह भी देखना ना चाहूं।’ मां के इस व्यवहार से अन्दर से पूरी तरह टूट कर मैं मामा के साथ वापिस लखनऊ आ गई।

मामा के पास रहकर एम.ए. कर लिया तो एकदिन मामा बोले- बेटी! दो साल के बाद में रिटायर हो जाऊंगा, इसलिये मैं सोचता हूं कि तेरे विवाह की जिम्मेदारी निभा दूं। मामा की बात सुनकर मैं असमंजस में पड़ गई क्या कहूं समझ में नही आया। बस डूबती आबाज से इतना ही कह पाई-मामा!क्या मैं बोझ लगने लगी हूं आपको। मेरी कांपती आबाज सुनकर मामी ने षायद मेरी मनःस्थिति भांप ली,सो उन्होने मामा को इशारे से कुछ कहा- मामा फौरन वहां से हट गये।’’

थोड़ी देर हम दोनो चुपचाप बैठे रहे फिर मामी ने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फैरा तो मैं मामी का हाथ पकड़ कर सिसक पड़ी। रोते रोते मैने आपके बारे में उन्हें सब कुछ बता दिया- मामी मैं तो अपना दिल रंजीत को समर्पित कर चुकी हूं। आप लोग कर दोगे तो शादी कर लूंगी मगर ह्दय से समर्पित प्यार उसे नहीं दे पाऊंगी।

सारी बात सुनकर मामा ने कहा था- अगर आज नन्हीं जिन्दा होती और ऐसा वचन निभाने बाला लड़का उसे मिला होता तो मैं तो उसे लखनऊ लाकर नन्हीं का हाथ सौपना अपना सौभाग्य मानता, और दो दिन बाद ही अपना वचन निभाने के लिये आपका पता लगाने मामा धामपुर के लिये रवाना हो गये।

धामपुर पहुंचने पर मामा को पता चला कि आपकी मां की अचानक मृत्यु के बाद आप अपना मकान बेच कर कहीं बाहर जा चुके है। मगर मामा तो धुन के पक्के थे। वह लगातार आपकी खोज करते ही रहेे, मगर वह जब तक सफल हुए आप किसी विदेशी यूनीवर्सिटी की छात्रवृत्ति पर वंहा षोध के लिये जा चुके थे। काफी समय बीत गया इस भाग दोड में।

कुछ दिनें के बाद मामा रिटायर हो गये और कुछ बीमार भी रहने लगे थे। नन्दू (मामा का बेटा) ने उन्हें लिख दिया था कि उसे अमेरिका में ग्रीन कार्ड मिल गया है इसलिये उसका अब भारत में आकर रहना संभव नही है। वह चाहें तो अपनी देखभाल के लिये मुझे गोद ले लें और लखनऊ की कोठी को भी चाहें तो मुझे दे दे उसे कोई ऐतराज नही होगा। कहकर वह थोड़ा रूकी। थर्मस में बचे हुये पानी में से दो घूंट पानी पिया फिर बोली-मैने इस बीच पी.एचडी. करली और लखनऊ विश्वविद्यालय में लेक्चरार हो गई, अब हेड आफ डिपार्टमेण्ट हूंँ। कल मेरा रांची की योग शक्तिपीठ में हठयोग पर व्याख्यान है तीन दिन चलेगा यह कार्यक्रम।

अरे! मुझे भी बिरला इन्स्टीटयूट में व्यवसाय प्रबन्धन पर लेक्चर देना है। मगर मेरी तो परसो फ्लाइट है रात को देहली के लिये। चलो रांची में मेरे साथ ही ठहरना।’’ मैने उत्साह से कहां।

‘‘नहीं रंजीत योगपीठ वाले ठहरने का प्रबन्ध खुद करतेे है।’’सुप्रिया ने दृढ़ स्वर में कहा।

‘‘तो तुम अपना पता दो, तुम लखनऊ पहंुच कर मुझे फोन करना, मैं लखनऊ आकर मामाजी से मिलूंगा। सुप्रिया मैं भी अब अकेलेपन से ऊब गया हूँ।’’ ठीक रहेगा न।’’ कहकर मैने थोड़ा मुस्कराकर सुप्रिया को देखा।

वह थोड़ी देर मौन रही, फिर बोली ‘‘नहीं रंजीत! मैने अपना ह्दय तुम्हें समर्पित किया है, और वह अबतक भी तुम्हारा ही था और हमेषा तुम्हारा ही रहेगा, मगर अब मैं एक व्रत्त से बंध गई हूँ- जब तक मामा मामी जीवित है, सम्पूर्णभाव से उनकी सेवा करूंगी। उनके रहते मैं अपना अपनत्व और साहचर्य किसी को समर्पित नही कर पाऊंगी। जिस लड़की को सगे मां-बाप ने तन और मन दोनो से इतना आहत कर दिया कि वह अन्दर से तो पूरी तरह मर ही गई थी उसे मामा मामी ने अपनाकर अपने निच्छल स्नेह और और प्यार देकर जो नया जीवन दिया है वह तो उन्ही की पूंजी -उन्ही की धरोहर है मेरे पास। अपनी सेवा से अगर उसका छोटा सा भी प्रतिदान कर सकूं तभी जीवन को सफल मानूंगी। मगर तुम अपना पता दो। मैं तुम्हें आज से तीन दशक पूर्व की तुम्हारी अल्हड़ सुप्रिया बनकर तुम्हें पत्र लिखूंगी, मगर आज तुम से एक नही दो बादे लूंगी।’’ बोलो दोगंे ? कहकर उन्होंने तरल आंखो से मुझे देखा।’’

उनकी आंखो की तरलता मुझे भीतर तक पूरी तरह भिगो गई। मैने उन्हें बादा देने का आश्वासन दिया तो वह बोली-एक तो वही कि तुम मुझे खत नही लिखोगे और अपना ख्याल रखोगे और खुश नही- बहुत बहुत -खुश रहोगे और दूसरा ...........

‘‘ पहले मैं तुम्हारे इस वादे में संषोधन चाहंगा,क्योकि अब तो तुम्हारे पापा नही हैं,’’ मैंने अबसर का लाभ लेने के लिये कहा सुप्रिया की बात काटते हुये कहा तो सुप्रिया मानो बेहद बेबस हो कर बोली- बह बात नहीं ,मगर मामा को आपकी जरा सी भनक भी मिल गई तो वह मेरा व्रत किसी भी तरह पूरा नहीं करने देंगे, रंजीत! तब मैं तुम्हे पाकर भी पूरी तरह नहीं पा सकूंगी, क्या तुम मुझे इस दुबिधा में डालना चाहोगे। बोलो रंजीत! कहतेकहते स्ुप्रिया बेहद भावुक हो गई।

सुप्रिया के इस सबाल से मैं बिचलित हो गया, इसलिये जबाब नहीं देकर मैंने कहा- अच्छा, इसे छोड़ो, चलो बताओ दूसरा बादा क्या हैे?ै

‘‘ यह सिगरेट पीना छोड़ दो’’,सुप्रिया ने एक सहृदय अभिभावक की तरह बड़े स्नेह से मेरी तरफ देखते हुये कहा।

‘‘सुप्रिया मैं तुम्हारी खुषी के लिये कुछ भी कर सकता हूं मगर फिर भी ऐसा बादा नहीं कर सकता जिसे पूरा नहीं कर सकूं,इसलिये इस समय तुम्हे एक ही बादा दे सकूंगा- कि तुम्हारे खत के जबाब में तुम्हे खत नहीं लिखूंगा। दूसरा बादा नहीं दे सकने की मेरी मजबूरी को माफ कर देना।’ मैंने स्पष्टबादिता से कहा तो सुप्रिया ने फिर एक स्नेहिल अभिभावक की तरह प्रष्न कर लिया-‘‘मगर सिगरेट पीना छोड़ क्यो नहीं सकते?’’

सुप्रिया के प्रष्न का मुझे मुझे एकाएक तो उत्तर देते नहीं बना, सो थोड़ा सोच कर बोला- सुप्रिया पिछले तीन दषको में सिगरेट कब से अकेलेपन का साथी बन गई,पता ही नही चला। देखो सुप्रिया सिगरेट में बुराई चाहे कितनी भी हों, अकेलेपन का इससे अच्छा साथी नहीं है।’’ मैंने सुप्रिया को सन्तुष्ट करने का प्रयास करने के लिये कहा तो सुप्रिया ने प्रतिउत्त्तर में सवाल दाग दिया-‘‘ तो फिर तो मुझे भी सिगरेट पीना षुरु करना पड़ेगा। मेैं भी तो अकेली ही हूं तुम्हे खोकर।’’

‘‘ तुम अकेली कैसे हो। तुम्हारे साथ मामा मामी हैं, मेरे साथ कौन है?’’कहकर मैंने प्रष्नबाचक नजरों से सुप्रिया को देखा तो उन्हे भी कोई तार्किक जबाब नहीं सूझा, तब जेसे मुझे समझाने के लिये भावुकता सहारा लेते हुये बोली- ‘‘अपने पहले पहले प्यार में एक साथ गुजारे समय की खुषगबार यादें काफी नहीं है क्या अकेलेपन की त्रासदी से मुक्ति के लिये?’’

‘‘इन किताबी और रुमानी बातों से हकीकत बदल नहीं जाती सुप्रिया! मैं अब भी अपने पहले बायदे पर कायम रहने का बिष्वास दिला सकता हूं बस।‘‘कहकर मैं चुप हागया।

‘‘ तुम से बहस करना बेकार है, और खासतौर पर आज जब तीन दषक की लम्बी जुदाई के बाद षायद किसी देबयोग से हम मिल गये हैं। मेरे लिये यही काफी है कि तुमने मेरे पहले प्यार को पूरा सम्मान देकर उसे अपने दिल में संजोकर रखा है। सुप्रिया ने मानों प्रणयसन्धि स्वीकार करते हुये कहा तो मैंनंे सुप्रिया के कथन का उत्साह पूर्ण समर्थन करते हुये कहा -यह हुई न बात ’’कहकर सन्धिपुष्टि के लिये मैने अपना हाथ उनकी ओर बढ़ाया। उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया, उसे चूमा माथे से लगाया और दोनों हाथों में कसकर पकड़ कर बैठ गई। उनके गरम गरम आंसू लगातार मेरे हाथ पर गिर रहे थे।

पता नही हम कितनी देर तक ऐसे ही बैठे रहे,अचानक दरवाजे को धकेलने की आवाज हुई तो हम संभल कर बैठ गये। स्टेशन मास्टर ने प्रवेश किया और बोले-अरे कल रात को तो आप एकदम अनजाने थे मगर अब तो ऐसा नही लग रहा। संकट दो अनजानंो को कितना करीब ला देता है। है न साहब। खैर मैं आपको खुश खबरी देने आया हूँ कि गाड़ी थोड़ी देर में रबाना होने वाली है। ‘‘अच्छा सर हैप्पी जर्नी, कभी इधर आना हो तो मिलियेगा जरूर, कहकर वह गरम जोशी से हाथ मिलाकर विदा हुये।

स्टेषन मास्टर के आगमन कें साथ सुप्रिया बर्तमान में लौट आईं थी ,इसलिये उनके जाते ही बोली-रंजीत मामा मामी के बाद मैं उनकी कोठी को बेचकर उस पैसे से उनके नाम से कुछ जरूरत मन्द लड़के और लड़कियों की छात्रवृत्ति का प्रबन्ध कर दूंगी जिससे कोई मेरी सेवा पर स्वार्थ का कीचड़ नही उछाले। उसके बाद अचानक किसी दिन एक अकेली, निर्धन, गतयौवना औरत के रूप में शेष जीवन तुम्हारा साहचर्य, तुम्हारा सहारा पाकर बिताने के लिये तुम्हारे द्वार पर आकर खड़ी हो जाऊंगी। उस दिन मुझे अपनाकर अपना यह तीन दषको से सुरक्षित रखा प्यार आश्रय और साहचर्य दे सकोगे। बोलो। भावावेश में उनका स्वर बुरी तरह कांपने लगा था।

सुप्रिया! मैने साहित्य नहीं पढ़ा। मैं तो मेनेजमेण्ट का बंदा हूँ। मगर मैने और तुमने एक दूसरे के शरीर से तो प्यार किया ही नही है, अवसर ही नही मिला हमें तो इसका। अपना प्यार तो भावनाओं का प्यार है, दिल से दिल का प्यार है शायद इसी को अलौकिक प्यार कहते हांेें। तीन दशक तुम्हारी प्रतीक्षा में ही बीत गये है, अब जीवन का शेष भी तुम्हारी प्रतीक्षा में बिता सकता हूँ। मैं जीवन भर उस क्षण की प्रतीक्षा करूंगा- जब तुम अपने समस्त पारिबारिक, नैतिक बन्धनो से और तुम्हारे व्रत से मुक्त होकर स्वयं मेरे पास आओगी। पर आज देवयोग से ही सहीे तीन दषक के बाद हुई मुलाकात के बाद दोबारा कब मिल सकें,और क्या पता मिल पायेंगें भी या नहीं यह निष्चित तो नही है,ं इसलियें आज मैं भी तुमसे दो बायदे मांगता हूँ, बोलो दोगी बादा।’’ मैने कुछ अधीरता से पूछा।

सुप्रिया ने प्रश्न बाचक नजरो से मुझे देखा तो मैने कहां-घबराओ नहीं मैं कोई ऐसा बेसा बायदा नही मांगूंगा।’’

‘‘मुझे मालूम है। आप कहिये तो। आपको बादा देने के बाद अगर अब जीवन में कभी नही भी मिले तो आज इस मिलन की घड़ी में बादा ही सही- आपको कुछ दे सकी- यह सन्तोेष और इसकी याद मेरे जीवन की धरोहर तो मेरे पास रहेगी।’’ वह दृढ़ता से बोली।

‘‘तो सुनो! पहला बादा तो यह दो कि अब कभी पत्र देना बन्द नहीं करोगी, मैं इन पत्रो में ही तुम्हें, तुम्हारा प्यार पाकर खुश और स्वस्थ रहूंगा। दूसरे अपनी किसी खुशी में शामिल करो या मत करो, मगर दुःख की किसी भी घड़ी में अपना भागीदार जरूर बनाओगी। बोलो देती हो बादे?’’ मेैने बड़ी अधीरता से पूछा।

सुप्रिया ने आंसू भरी आंखो से मेरी तरफ देखा, शायद उनकी आबाज अब भी कांप रही थी, इसलिये उन्होने केबल सिर हिलाकर स्वीकृति दी।

मैने माहोल को हल्का करने के लिये मुस्कराते हुये- तो मिलाओ हाथ इस बात पर कहकर अपना हाथ सुप्रिया की तरफ बढ़ाया। उन्हांेने पहले की तरह मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया और मेरी छाती पर अपना सिर टिकाकर आंखे मूद ली। सुप्रिया बेहद आश्वस्त लग रही थी, मगर मेै अन्जाम को समझ रहा था। रांची पहंुच कर हम अनिश्चित काल के लिये, या हमेषा के लियेे अलग हो जायेगे। यही हमारी नियति है।

मैं रेलगाड़ी के साथ साथ दौड रही डबल लाइन की दूसरी पटरी को देख रहा था जो दूर क्षितिज पर आपस में मिलती दिखाई देती थी मगर वह वास्तव में कभी एक दूसरे नही मिलती। एक समानान्तर दूरी उन्हें हमेशा एक दूसरे से दूर रखती है। मेरा और सुप्रिया का यह आज का अक्समात मिलना भी ऐसा ही मिलन है। भविष्य में हम शायद ही कभी मिलेंगंें। अकेले पन को अपने ऊपर हावी नहीं होने देने के लिये मैने जिस सिगरेट का सहारा लिया था, उसके लम्बे साहचर्य के कारण मेरे सांसों की गाड़ी पिछले तीन चार सालों से एक ही फेफड़े की लाइन पर चलरही है, जिससे अपने साथी के वियोग में मेरा षेष ऐकमात्र फेफड़ा भी काफी निर्बल हो चुका है,और डाक्टरो के अनुसार बह सांसों की रेलगाड़ी को दो तीन साल से ज्यादा नहीं चला पायेगा,अगर मैंने सिगरेट नहीं छोड़ी तो। मैं समझता हूं और मानता हूं कि यह कोई अच्छी बात नहीं है, मगर किसी षायर ने षायद ऐसी ही स्थिति में लिखा होगा- आखिरी बक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे।

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