एक थे खान साहव । नहीँ काबुल वाले नहीँ इधर हिंदुस्तान के ही थे । बाबुल वाले ! खाँ साहव पान बिल्कुल भी पसन्द नहीँ करते थे । न ही उन्हें तम्बाकू का व्यसन था । पान पराग छूते भी नहीँ थे । हाँ , एक शौक उनका अद्भुत एवं अद्वितीय था । वह था खाना खाने का शौक। उनका हाजमा अर्थात पाचन शक्ति भी उनका खूब साथ देती थी । भोजन तथा पाचन के इस अद्भुत समन्वय को देख स्वयं रचयिता ठगे से

रह जाते होंगे ,इसमें कदाचित ही कोई संदेह रहा हो।

विशालकाय व्यक्तित्व तथा विलक्षण आभा से युक्त चेहरा इस अनुपम समन्वय की कथा अपने मूक स्वर से कूक कूक कर कहता था । जब वह नन्हे बालक ही थे , तो सब बालकों की भाँति प्राइमरी पाठशाला भी जाते । तब से ही बह कक्षा के बच्चों को बहुत हंसाया करते थे।प्रकृति माता ने ही दिया था उन्हें यह अनमोल उपहार .उनकी जन्मदात्री देवकी जैसी ?माँ जो सेवा के बलबूते पर यशोदा भी बन गई थी । कभी उनके लिये माखन बनाती तो कभी सौंफ मिश्री खिलाती । इस प्रकार समय पर भोजन करने के कुछ समय उपरांत ही क्षुधा उनके मस्तिष्क की घंटी पुन; बजाने लगती । और उनके कदम तुरंत बढ़ने लगते पाकशाला की ओर । जो भी भोजन सामग्री मिलती उस पर अपनी कृपादृष्टि कर देते थे । बिना समय नष्ट किये । सेवा करते करते माताजी देवकी से यशोदा बन गई थी । एक बड़े से डिब्बे में बहुत सारे बिस्कुट रखे होते , जो माताजी बेकरी से बड़ी मेहनत से बनवा कर लाया करती थीं । उस युग में आज की भाँति विद्युत ओवन नहीँ होते थे। तब माताएं बहुत अधिक श्रम करतीं थीं ,अपने दायित्वों के निर्वाह हेतु। वे पहले कच्चा सामान जैसे आटा, घी, शक्कर,

दूध आदि बेकरी मॆं ले जातीं , तब वहाँ बिस्कुट तैयार होने की प्रक्रिया पूर्ण की जाती।


प्रसंग चल रहा था , कहाँ साहब के खान-पान का । पाठशाला मॆं क्या होता था ,कौन नहीँ जानता ।घर से पेट भर खाना कहा कर जाना और कक्षा मॆं पुस्तक खोलते ही, पाठ नहीँ , वरन भोजन से भरे डिब्बे के दर्शन, न जाने क्यों

होने लगते । तब वह पेंसिल या रबर गिरने के बहाने से थोड़ा सा झुकते और अध्यापक की दृष्टि बचा कर बैग से ?!टिफिन धीरे से निकाल लेते । तब अध्यापक ब्लेकबोर्ड पर लिखने के लिए ज्यों ही पीठ घुमाते, त्यों ही पुस्तक के बजाय टिफिन का कार्य बड़े मनोयोग द्वारा सम्पन्न कर दिया जाता । आस पास की सीटों वाले मित्र भी इस कार्य मे अपना भरपूर योगदान प्रदान करते । अब आराम से मुँह पोंछ कर थोड़ा पुस्तक मॆं मन लगाने का प्रयत्न करते तो पता ही न चलता कि अध्यापक कौन से पृष्ठ से पढ़ा रहे हैं । जल्दी जल्दी इधर उधर देख कर कूछ प्रयत्न कर ही रहे होते कि उस कक्षा चक्र के समाप्त होने का संकेत हो जाता और बालकों मॆं प्रसन्नता कीलहर दौड़ जाती .कहाँ साहब की आती जान मॆं जान । इस प्रकार चार कक्षा चक्र चार मित्रों के खाने के डिब्बों का सम्पूर्ण उद्धार करते हुए बीतते । छोटी आयु में इन बालकों को इतना अधिक श्रम करना पड़ता था । न करें तो क्या करें ? पेट पालने के लिए नन्ही नन्ही जानें इतने बड़े बड़े खतरे उठाने से भी नहीँ घबरातीं । अब हो जाती आधी छुट्टी टन...टन....टन । अब क्या खाएँगे यह शाश्वत प्रश्न सदा भाँति की भाँति मुँह बाए खड़ा मिलता । अब फ़िर से श्रमसे ही खाएँगे ,मुफ्त का भी भला कोई खाता है !नहीँ ना । तब कहाँ साहब चौकडी भरते हुए पूरी कक्षा मॆं रोटियाँ उडाते। पूरी कक्षा के बच्चों के टिफिन वैसे ही साफ हो जाते जैसे टिड्डी दल के खड़ी फसल वाले खेत होते हैं , टिड्डी दल के आ जाने पर । तब खान साहब की सवारी चलती अन्य कक्षाओ की ओर ।वहाँ भी तो मित्रमंडली होती थी उनकी। खैर जाने दीजिए । पापी पेट का सवाल था । अब आधी छुट्टी ख़त्म होती टन ..टन..टन..खान साहब भारी कदमों से कक्षा की ओर लौट पड़ते .कुर्सी पर बिराजे भी न पाते थे कि नए अध्यापक का कक्षा मॆं प्रवेश होता तथा पाठ पूर्ववत ही प्रारम्भ होता । और क्या होता था दूसरी ओर ? आप अनुमान लगा सकते हैं? धीरे धीरे खर्राटों की ध्वनि तीव्र होती हुई कक्षा की नीरवता मॆं स्पष्ट गुञ्जायमान हो रही होती । "खान ! तुम बताओ इस प्रश्न का उत्तर, "अध्यापक महोदय कहते ! साथ की सीट वाला बच्चा उन्हें धीरे धीरे हिलाता।" उठ जा , सर तुझसे पूछ रहे हैं ।" "मुझसे!"


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