सुसाइड - जिम्मेदार कौन ?

ऋतु आज बहुत खुश नजर आ रही थी । और खुश हो भी क्यों न , “पत्रकार सम्मेलन” जिसमें देश - विदेश के तमाम पत्रकार , और पत्रकारिता से संबंधित अनेक लोगों ने शिरकत किया था । सम्मेलन के मुख्य बिंदु यह थे की “देश का चौथा स्तम्भ , देश के विकास में किस तरह योगदान दे” और “गलत खबर को फैलने से कैसे रोके” । इस सम्मेलन में ऋतु अपने चैनल “न्यूज़ 24” को प्रतिनिधित्व कर रही थी । पहले चैनल के तरफ “असित झा” का नाम सामने आया था , पर असित ने अपना नाम वापस ले लिया था । असित एक क्राइम रिपोर्टर था , और उसकी हर खबर और रिपोर्ट सच पर आधारित थी । और चैनल के कार्यकारिणी विभाग उसके काम से संतुष्ट था , इसलिए जब उसने अपना नाम वापस लिया , तो किसी ने इसका विरोध नही किया । असित के नाम वापस ले लेने से यह मौका “ऋतु मिंज” को मिला था । ऋतु “आंग्ल-भारतीय” थी । ऋतु झारखंड के सुदूर क्षेत्र से संबंध रखती थी ।

ऑफ़िस में उड़ रहे खबर ऋतु के कानों तक भी पहुँची थी । असित ने ऐसे ही अपना नाम वापस नही लिया था , वो किसी खुफ़िया काम के लिए चुना गया था । इस खुफ़िया काम में बहुत बड़े गिरोह सब का पर्दाफ़ाश होने वाला था । ऑफ़िस में दिखाने के लिए , असित ने नाम वापस लिया था । ताकि लोगों यह लगे की असित खुद ही नही जाना चाहता है इस सम्मेलन में ।

पर जो भी हो इसका फायदा ऋतु को मिल गया था । यह सम्मेलन में भाग लेना उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए सही था । दो महीने से इस सम्मेलन की तैयारी ऋतु कर रही थी । और इन दो महीनों में असित एक ख़ुफ़िया काम पर व्यस्त था । इन दो महीने में उसने ऋतु से एक बार बात तक नही की थी । ऋतु मन ही मन असित को पसंद करती थी , पर असित किसी से ज्यादा बात नही करता था । असित में एक अजीब सी शांति थी , जिससे ऋतु डरती थी । पर उसे इस चैनल में नौकरी असित के संदर्भ से ही मिली थी । किसी पार्टी में एक “कॉमन फ्रेंड” के जरिये असित और ऋतु की मुलाकात हुई थी । बाद में असित ने उसे अपने ही सोसाइटी में एक फ्लैट दिलवा दिया । ऋतु को लगा , असित कितना अच्छा है दिल का , इस अनजान शहर में वो उसकी इतनी मदद कर रहा है ।

पर असित के मन में ऐसा कुछ भी नहीं था । वो सिर्फ एक दोस्त के नाते उसने ऋतु की मदद की थी । असित किसी से ज्यादा बात नही करता था , किसी से ज्यादा मतलब नही रखता था ।

ऋतु की फ्लाइट दिल्ली आ चुकी थी । और कुछ ही देर में वो ऑफ़िस में थी । ऑफ़िस में उसके सहकर्मी उसके लिए छोटे से पार्टी का आयोजन किये थे । ऑफ़िस में ऋतु की नज़रे सिर्फ असित को ढूंढ रही थी , पर असित ऑफ़िस में नही था । ऋतु ने बॉस से जा कर पता किया , तो बॉस ने बताया की - असित अपना रिपोर्ट जमा करने के बाद , अपना इस्तीफ़ा देने वाला था । पर मैंने उसे मना कर दिया , और बोला की कुछ दिन आराम कर लो । तब कुछ फैसला करना , इसलिए असित दो दिन से छुट्टी पर है ।

ऋतु जल्दी से ऑफ़िस से निकल के , अपने फ्लैट के तरफ निकल पड़ी । इस्तीफ़े वाली बात उसको विचलित कर रही थी । ऐसी कौन सी बात है , जिससे असित इस्तीफ़ा देने की सोच रहा है । जबकि बॉस ने तो यह भी बताया की असित को जो काम दिया गया था उसने बखूबी अंजाम दिया है । कहीं असित को किसी ने धमकी तो नही दिया है , वैसे भी असित एक क्राइम रिपोर्टर है । इस काम में वैसे भी खतरा बना रहता है । और बॉस ने मुझे यह नहीं बताया की इस बार असित किस ख़ुफ़िया काम पर गया था ।

यह सब सोचते - सोचते ऋतु अपने सोसाइटी पहुँच चुकी थी । ऋतु “बी” विंग के फ्लैट संख्या - “30 बी” में रहती थी , जो पाँचवे तल्ला पर था । और असित उसी विंग के चौथे तल्ला पर फ्लैट संख्या - “24 बी” रहता था ।

ऋतु लिफ्ट से चौथे तल्ला पर गयी । असित का फ्लैट अंदर से बंद था । ऋतु ने गेट पर लगे घंटी वाले स्विच को दबाया । काफी देर तक किसी ने दरवाज़ा नही खोला , तो ऋतु ने सोचा की शायद असित कहीं बाहर गया होगा । पर तभी उसकी नज़र नीचे फर्श पर रखे गलीचे पर गयी , दूध का पैकेट और अखबार दोनों गेट पर ही थे । यानी इसका मतलब असित घर में ही है । तभी ऋतु को याद आया , की असित घर का एक चाबी हमेशा अपने किसी जूते में रखता है । ऋतु ने जूता स्टैंड में से खोज कर चाबी निकाल ली । उसके बाद उसने दरवाज़ा खोला , और अंदर गयी …….

अंदर पूरा घर बिखरा पड़ा था । सारे घर में “रिज़ला पेपर” , गाँजा , लहरी के चार - पाँच पैकेट । यह दृश्य देख कर ऋतु घबरा सी गयी । वह तुरंत असित के बेडरूम गयी , वहाँ का दृश्य देख कर सहम सी गयी । कमरे में असित बेड के नीचे गिरा हुआ था , उसके मुँह से झाग निकला हुआ था , उसकी साँस बंद थी । टेबल पर रॉयल स्टैग की फुल बोतल , जॉइंट और लहरी का दो पैकेट खुला हुआ था ।

ऋतु ने अपने आप को संभाला , और फ्लैट से बाहर आई । उसने सबसे पहले पड़ोसी को यह बात बताई ।

कुछ ही देर में सोसाइटी में भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी । सोसाइटी के सिकरेट्री ने पुलिस को खबर कर दी थी । कुछ देर बाद पुलिस वहाँ आ चुकी थी , असित के शव को एम्बुलेंस में डाल कर पंचनामा के लिए भेज दिया गया । उसके बाद पुलिस वालों ने ऋतु और पड़ोसी सब से पूछ ताछ की । कुछ देर पुलिस वाले असित के फ्लैट को सील कर के चली गयी ।

पुलिस वालों ने असित के घर वालों को फ़ोन कर घटना की सारी जानकारी दे दी थी । असित के मामा और उसका एक दोस्त पटना से आ रहे थे ।

दोपहर में पुलिस और ऋतु दोनों असित के ऑफ़िस में थे । पुलिस वालों ने सब से पूछ ताछ की । कोई ज्यादा जानकारी हासिल नही हुई । पुलिस वालों ने बताया कि प्रथम दृष्टया में यह आत्महत्या दिख रही है । क्योंकि असित के कमरे से एक कागज का टुकड़ा मिला है , जिसमे लिखा था - “मेरी मौत का जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ मैं हूँ” । इससे ज्यादा उस कागज पर कुछ नहीं लिखा था । पुलिस वालों ने जाते वक्त कहा , की कल शाम तक पंचनामा की रिपोर्ट आ जायेगी ।

पुलिस के जाते ही , ऋतु बॉस की केबिन में गयी ।

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सर चैनल ने असित को किस ख़ुफ़िया काम पर भेजा था ? - ऋतु ने सवाल किया ,,

देखों ऋतु यह तुमको जानने का हक़ नही है - बॉस ने कहा ,

बिल्कुल है सर मुझे । क्योंकि मुझे लगता है मैंने असित की जान ले ली - ऋतु चिल्लाते हुए बोली । उसके आँखों में आसूं थे ।

क्या ? पर तुम्हें ऐसा क्यों लगता है - बॉस ने पूछा ,

सर मुझे असित से प्यार हो गया था । “पत्रकार सम्मेलन” में पहले वह जाने वाला था । लेकिन बाद में चैनल ने मुझे भेज दिया । अगर वह गया रहता तो शायद आज वो ज़िंदा रहता - ऋतु ने कहा ,,

प्लीज सर , मैं आपके सामने हाथ जोड़ती हूँ । मुझे सच बतायें - ऋतु ने अपना हाथ बॉस के सामने जोड़ कर खड़ी थी ,,,

ठीक है , तो सुनो । सभी न्यूज़ चैनल और अखबार वाले “टॉपर घोटाले” की खबर दिखा रहे थे और लिख रहे थे । पर हम लोग को इससे बड़ी एक खबर हाथ लगी थी । और वो था “सर्टिफिकेट घोटाला” - बॉस ने कहा ,

सर्टिफिकेट घोटाला ? - ऋतु ने कहा ,

हाँ , सर्टिफ़िकेट घोटाला । चार महीने पहले की बात है । हम सब को खबर मिला की दिल्ली यूनिवर्सिटी में इस साल कुछ ऐसे स्टूडेंट सब ने एडमिशन लिया जिनकी इंटर की सर्टिफ़िकेट नकली था । मतलब उन सब ने अपनी सर्टिफ़िकेट “नकली - बोर्ड” से लिया था या फिर किसी दूसरे स्टूडेंट के असली बोर्ड के सर्टिफ़िकेट पर अपना फ़ोटो स्कैन डाल कर एडमिशन लिया था । यह पूरी तरह से एक गोरखधंधा था । इससे योग्य स्टूडेंट का हक़ छीन लेने जैसा था । तो चैनल ने अपने दस सबसे बेहतरीन क्राइम रिपोर्टर को इस काम के लिए चुना । इस दस रिपोर्टर में एक असित भी था । सभी को तीन - तीन राज्य के हिसाब बाँट दिया गया । असित को बिहार , झारखंड और बंगाल की जिम्मेदारी दी गयी । और तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद सभी ने अपना रिपोर्ट चैनल को सौंप दिया । यह हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी । पर असित ने रिपोर्ट सौंपने के बाद मुझसे अपने इस्तीफे की पेशकश की थी । और मैंने उसे दो - चार दिन छुट्टी की सलाह दी थी - बॉस ने कहा ,,

और फिर उसके बाद आज यह खबर आई है । और मैंने यह सारी बात पुलिस को भी बता दी है - बॉस ने कहा ,

अब ऋतु तुम इस घटना से बाहर निकलो । और संभालो अपने आप को , तुम्हारे सामने पूरी दुनिया पड़ी हुई है - बॉस ने ऋतु को समझाया ,,

हाँ सर , क्या मुझे असित की वो रिपोर्ट मिल सकती है , जो उसने जमा किया था - ऋतु ने पूछा ,

मैं समझ सकता हूँ । यह लो वो फ़ाइल , इसी में असित की रिपोर्ट है । यह मैं नियम के खिलाफ जा कर तुम्हें दे रहा हूँ - बॉस ने अपने रैक से एक फ़ाइल निकालते हुए ऋतु को दिया ,,

अच्छा सर , एक आखिरी सवाल । क्या आपको पता था की असित नशा करता था - ऋतु ने पूछा ,,

कोई भी क्राइम रिपोर्टर बिना नशे का रह ही नही सकता - बॉस ने कहा ,,

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ऋतु अपने फ्लैट वापस आ चुकी थी । ऋतु ने उस रिपोर्ट को खोल के देखना शुरू की । यह तो फ़ोटो कॉपी थी उस रिपोर्ट की । असली रिपोर्ट पुलिस अपने साथ ले गयी थी । ऋतु ने उस रिपोर्ट को दो बार पढ़ी , पर उसमें कोई सुराग नही मिला । उसने रात को सोने से पहले भी उस रिपोर्ट को एक बार और पढ़ी । पर कोई सफलता हाथ नही लगी ।

दूसरे दिन शाम में असित के पंचनामा का रिपोर्ट आ चुका था । रिपोर्ट दिल दहला देने वाला था । असित उस दिन पाँच जॉइंट फूँक चुका था , साथ में चार पैकेट लहरी । जब इन सब से कुछ नही हुआ तो उसने शराब भी पिया । जब आधी बोतल शराब खत्म हो चुका था तब उसने अंतिम पैक में “सल्फॉस” की पाउडर को मिला के पी लिया । जिससे उसकी जान गई । पुलिस वालों ने यह भी बताया की उन्हें असित के कमरे से एक सुसाइड लेटर भी मिला है । जिसमें केवल यह लिखा है की उसके (असित) के मौत का जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ वह खुद है । पुलिस ने कहा की असित की बॉडी उसके घर वालों को दे दी गयी है । वह उसकी डेड बॉडी ले कर पटना चले गए है । पुलिस ने यह भी कहा की उनकी तफ़्तीश जारी रहेगी ।

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तीन हफ्ते से ज्यादा वक्त गुजर चुका था । पुलिस वालों ने असित के केस पर ध्यान देना भी बंद कर दिया था । कहीं कोई सुराग ही नहीं था । धीरे - धीरे लोग इस केस को भुला चुके थे । चैनल वाले “सर्टिफ़िकेट घोटाला” का उजगार कर के अपने चैनल का टी.आर.पी बढ़ा चुकी थी । पूरा देश सर्टिफ़िकेट घोटाले खबर से परेशान थी । पूरे देश में क्रांति का माहौल था । हर राज्य , हर शहर , हर कस्बे से लोग गिरफ्तार किए जा रहे थे । बड़े - बड़े गिरोह का पर्दाफ़ाश हो रहा था । तकरीबन 45 से 50 नकली बोर्ड का भंडाफोड़ हुआ था । जो धरल्ले से अपना सर्टिफ़िकेट पैसा लेकर विद्यार्थी सब को मुहैया करवा रही थी । कुछ ऐसे गैंग भी थी जो असली बोर्ड के सर्टिफ़िकेट पर किसी और बच्चे के अंक-पत्र पर दूसरे बच्चे का फोटो स्कैन कर के उसे रिजल्ट मुहैया करवा रही थी । इन सभी के तार नेता , मंत्री तक पहुँची । केंद्र सरकार भारी दवाब में थी । फिर यह आग विपक्ष के नेता को भी अपने लपेटे में लेना शुरू किया । हर राज्य से नेता , मंत्री , विपक्ष के नेता सब के नाम सामने आने लगे । सरकार पर चौतरफा हमला हो रहा था । देश को दिखाने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्री को बर्खास्त कर दिया गया । हर राज्य से एक - दो नेताओं पर गाज गिरी । यही हाल विपक्ष में बैठे नेताओं का भी था । सरकार जल्द से जल्द इस खबर को बंद करवाना चाहती थी । इसी क्रम में सरकार ने एक कमिटी गठन किया किया , ताकि जनता को लगे की सरकार ने कुछ कार्यवाही की । उसके बाद सरकार के तरफ से चैनल पर दवाब बनाया जाने लगा । और इस खबर से सभी जानकारी टीवी पर ऋतु दिखाती थी । ऋतु का प्रोग्राम रोज़ रात के 9 बजे प्रसारित होता था “ऋतु के बोल” में । वो खुश थी , असित और बाकी के उसके जैसे 9 पत्रकार की मेहनत रंग ला रही है । और आज उसे अपने प्रोग्राम एक बहुत बड़े नाम का खुलासा करना था । पर ऐन वक्त पर उसकी खबर बदल दी गयी । उसे देश के आर्थिक हाल पर आर्थिक नीति के जानकार के साथ चर्चा करना था । वो समझ चुकी थी , की सरकार और चैनल के बीच समझौता हो चुका है । धीरे - धीरे इस खबर को कम कर दिया जाएगा , फिर जनता इसे भूल जाएगी और यह नकली सर्टिफ़िकेट वाले फिर से अपना पैर पसार लेंगे । ऋतु ने चुप रहने का फैसला किया , वो अकेले चैनल और इन बड़ी ताकत से नही लड़ सकती थी । वो सोचती की जो असित के साथ हुआ ,,,,,

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कल असित को मरे हुए पूरे एक महीने हो जाएंगे । पुलिस ने लगभग केस बन्द ही कर दिया है । वैसे भी पिछले दिनों देश मे जो क्रांति का माहौल था , उसमें सभी का ध्यान असित से हटा कर सर्टिफ़िकेट घोटाला पर केंद्रित कर दिया था ।

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22th जुलाई 2017, ( असित को मरे हुए एक महीना ) ,,

ऋतु ऑफ़िस के लिए निकल चुकी थी । मेन रोड तक उसे पैदल जाना था । उसे लगा की कोई उसका पीछा कर रहा है । वो घबरा गयी , तभी सामने से एक साईकल वाले ने ऋतु के सामने अपनी साईकल रोक दी । उसने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाला और ऋतु के तरफ बढ़ा दिया ।

यह लिफाफा असित भैया ने आपको देने को कहा था - उस साईकल वाले आदमी ने कहा ,

क्या - ऋतु चौंकतें हुए बोली ,

हाँ , उन्होंने मुझसे 21जून को यानी पिछले महीने , उनके ठीक मरने से एक दिन पहले मिले थे । और उन्होंने कहा था की आज के दिन मैं यह लिफाफा आप तक पहुँचा दूँ - साईकल वाले ने कहा ,,

और हाँ , वो जो आदमी आपका पीछा कर रहा था , वो मेरा ही आदमी था । वो आप पर पिछले एक महीने से नज़र रख रहा था । लेकिन अब हम दोनों का काम हो गया । अब वो आपको दिखाई भी नही देगा , और भूल जाएगा की हम दोनों कभी मिले थे - इतना बोल के वो साईकल वाला चला गया ।

ऋतु ऑफ़िस न जा कर , वापस अपने फ्लैट में आ गयी थी । उसने तुरंत वो लिफाफे को फाड़ कर उसके अंदर से एक कागज को निकाल कर पढ़ने लगी । असित ने उसके लिए एक संदेश छोड़ा था ।

“तुम सीलमपुर जा कर बशीर भाई से मिलो , तुम्हे तुम्हारे सभी सवालों के जवाब वहीं मिलेंगे ” । और यह रहा बशीर भाई का फ़ोन नंबर -9472****** ।

ऋतु बिना देर किए , उस नंबर पर कॉल लगाई ।

जी मैं ऋतु बोल रही हूँ , असित की दोस्त - ऋतु ने फ़ोन पर कहा ,

जी हम आप ही के फ़ोन का इंतज़ार कर रहे थे , इतने दिनों से । आप एक - दो घंटे में सीलमपुर आ जाइए । आपकी अमानत आपको सौंप दूँ - बशीर भाई ने फ़ोन के दूसरे तरफ से कहा ,

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दो घंटे के बाद ऋतु सीलमपुर के पास थी । वो कैब से आयी थी । उसको जहाँ बोला गया था , वहाँ वह खड़ी हो कर इंतज़ार कर रही थी । तभी एक अट्ठारह - उन्नीस साल का लड़का आया । और उसने पूछा - आप ऋतु जी है ?

हाँ मैं ही ऋतु है , क्या आप बशीर भाई है ? - ऋतु ने सवाल किया ,

नहीं , मेरा नाम शाकिब है । आप जिनसे मिलने आयी है वो मेरे अब्बू है - शाकिब ने कहा ,

आप मेरे साथ चलिए - शाकिब ने कहा ,

ऋतु शाकिब के साथ पीछे - पीछे चल दी । सीलमपुर एक तंग बस्ती । ऋतु को सब गुंडे मवाली जैसे लग रहे थे । लड़के खुलेआम चरस , गांजा , हेरोइन ले रहे थे । कुछ लड़के ज़मीन पर सोये हुए थे । उन लड़को को देख कर ऋतु ने शाकिब से पूछा - उन लड़को को क्या हुआ है ?

वो सभी डालूटर ( व्हाइटनर) सूँघते है , ये उसी का असर है - शाकिब ने कहा ,

पर यह तो बारह - तेरह साल के बच्चे है - ऋतु ने कहा ,

यहाँ खाना मिलने से आसानी नशा मिल जाता है । और यहाँ चुप - चाप बिना किसी को देखे चलिए । यह जगह आप जैसों के लिए सही नहीं है - शाकिब ने कहा ,

ये लीजिये हम लोग घर आ गए - शाकिब ने कहा ,

“बशीर कवाब सेन्टर”

यह अब्बू की दूकान है , आप ऊपर चलिए अब्बू ऊपर अपने कमरे में है - शाकिब ने कहा ,,

ऊपर बशीर भाई का मकान था । बशीर भाई दोपहर की नमाज़ अदा कर रहे थे । नमाज़ अदा करने के बाद बशीर भाई गेस्ट रूम में आये । ऋतु उनका इंतज़ार कर रही थी ।

सलाम बशीर भाई - ऋतु ने कहा ,

बशीर भाई ने भी सलाम कहा ।

यहाँ आने में तकलीफ तो नही हुई । वो क्या है ना यह जगक थोड़ा अजीब है - बशीर भाई ने कहा ,

हाँ मैंने देखा - ऋतु ने कहा ,,

वो दोनों बात कर ही रहे थे , की तभी वहाँ एक औरत प्लेट में मिठाई और कटोरे में सेवईयां लेकर आई ।।

ये हमारी बेगम रिज़वाना है - बशीर भाई ने कहा ,

बशीर भाई आपकी जान पहचान असित से कैसे हुई - ऋतु ने मुद्दे पर आते हुए पूछा ,

जी हम लोग बांग्लादेशी रिफ्यूजी है । हमारे अब्बू का बांग्लादेश में चीनी का बहुत बड़ा फैक्ट्री था । 71 की युद्ध के बाद हम लोग को अपना देश छोड़ना पड़ा , भूखा नंगा हो गया था हम लोग । बांग्लादेश में अब कुछ बचा नहीं था हम लोग का और भारत के लोग हम लोग को अपनाने को तैयार नही थी । भटकते - भटकते हम लोग दिल्ली के इस एरिया में बस गए । तब से यही है , समय के साथ हमारे वालिद इस दुनिया से रुकसत कर गए । हमको दो लड़का और दो लड़की है । बड़ा लड़का बैंगलोर में इंजीनियर है , दोनों बेटी का निकाह हो चुका है । और छोटा बेटा हमारे साथ धंधा देखता है - बशीर भाई ने कहा ,

एक बार पुलिस हमारे बड़े लड़के को आतंकवादी होने के शक पर उठा के थाना ले गयी । उसे थाना में पुलिस वालों ने बहुत मारा । तब असित भाई ने हमारी मदद की । उन्होंने अपनी पैरवी से मेरे बड़े बेटे को छुड़वा दिया और उसपर कोई केस भी नही बनने दिया । फिर भी घूस में पुलिस वालों को चालीस हजार देने पड़े थे - बशीर भाई ने कहा ,

ओह । पर आपने यह नही बताया की असित का आपसे जान पहचान हुआ - ऋतु ने पूछा ,

वो हर जुम्मे के शाम को हमारे यहाँ कवाब खाने आते थे । और हमारे दुकान में काम करने वाला वसीम उनका खबरी था - बशीर भाई ने कहा ,

वो कवाब के साथ , आपके यहाँ से गाँजा ओर रिज़ला पेपर भी खरीदने आता था - ऋतु ने कहा ,

बशीर भाई इस बात पर चुप थे । उनकी चुप्पी ही उनका जवाब थी । बशीर भाई गाँजा भी बेचते थे , दुकान के पीछे ।

अच्छा बशीर भाई । असित की कौन सी अमानत आपके पास है - ऋतु ने कहा ,

हाँ याद आया । अरे रिज़वाना जरा मेरे अलमीरा के ऊपर वाले रैक पर एक काली रंग की डायरी होगी , जरा वो लेकर आना - बशीर भाई ने रिज़वाना से कहा ,

ये लीजिये असित भाई की अमानत - बशीर भाई ने डायरी रिज़वाना के हाथ से लेकर ऋतु के हाथों में देते हुए कहा ,,

पर यह डायरी में तो लॉक लगा हुआ है - ऋतु ने कहा ,

रुकिये मैं चाबी ले कर आता हूँ - बशीर भाई ने कहा,

ये लीजिये चाबी - बशीर भाई ने चाबी देते हुए कहा , चलिए मैं आपको मोड़ तक छोड़ आऊँ - बशीर भाई ने कहा ,,

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असित भाई के बारे में सुन कर दुख हुआ । अल्लाह उनकी रूह को जन्नत नसीब करे - बशीर भाई ने रास्ते में चलते हुए बोले ,

ऋतु चुप थी ।

वो आपके बारे में मुझसे हमेशा बात किया करते थे । हम दोनों हर रविवार को साथ में बैठते थे और … - बशीर इतना बोल कर चुप हो गए ,

और साथ में शराब पीते थे - ऋतु ने उनकी बात पूरी कर दी ।

ऋतु ऑटो लेकर अपने सोसाइटी आ गयी । अपने फ्लैट में जाने के बाद उसने पानी पीने के बाद असित के डायरी को खोला ……

“प्यारी ऋतु ,,,

हाई ऋतु , कैसी हो ? और कैसा रहा तुम्हारा ‘पत्रकार सम्मेलन’ ? बस ऐसे ही ज़िन्दगी में आगे बढ़ते रहना । जब तक तुम वापस आओगी , मैं तुमसे और तुम सब से बहुत दूर निकल चुका रहूँगा । मेरे लिए ज्यादा उदास होने की जरूरत नहीं है । मैंने सिर्फ तुम्हें अपना एक दोस्त माना है , तुम्हारे पास पूरी ज़िंदगी पड़ी हुई है । इसे तुम खूबसूरत बना सकती हो ।

मैंने यह कदम क्यों उठाया , यह बात मैं किसी को बताना चाहता हूँ । मैंने अपने आस - पास बहुत खोजा , पर मुझे कोई नही मिला । फिर मेरे दिमाग में तुम्हारा चेहरा नज़र आया , जिसे मैं अपनी बात कह सकूँ । हर इंसान का एक बीता हुआ कल होता है , जिससे वह इंसान हमेशा भागने की कोशिश में रहता है । पर कभी न कभी वो बीता हुआ कल किसी न किसी रूप दोबारा उसके सामने आ ही जाता है । बस मेरा वही बीता हुआ कल मेरे सामने आ गया , और मैं इससे बच नहीं सका । मेरी आत्मा तो बहुत पहले ही मर गयी थी , बस शरीर बचा हुआ था अभी तक । आओ क्लाइमेक्स पर चलने से पहले तुम्हें एक छोटा सा कहानी सुनाऊं ……

मैं असित झा , बिहार के मधुबनी ज़िला से आता हूँ । पर मेरा पूरा परिवार पटना में है और हमारा मकान भी वहीं है । पापा की सरकारी नौकरी की वजह वो कभी भी एक जगह स्थायी रूप से नही रह सके , उनका हमेसा तबादला होते रहता था । तो हम सभी भाई - बहन पटना में चाचा और चाची के साथ रहते थे । उनके भी बच्चे , और हम सब मतलब एक संजुक्त परिवार था । चाचा चाची ही हम सब के गार्डियन थे ।

मैं पढ़ने में उतना तेज नही था , एक औसत विद्यार्थी था । 8th क्लास तक मेरा भी बाकी बच्चों की तरह सपना था इंजीनियर बनने का । पर मेरे रिजल्ट इसकी अनुमति नही दे रहे थे । घर में भी दब्बू था , और स्कूल में भी दब्बू था । 10th आते - आते मेरा ध्यान साइंस से हट कर “आर्ट्स स्ट्रीम” की तरफ बढ़ गया । और उस साल सी. बी. एस. सी ने एक नया पैटर्न लागू किया सी. सी. ई , जिसमें बच्चों को छूट दी गयी या तो वो बोर्ड कंडक्ट परीक्षा दे या स्कूल कंडुक्टेड परीक्षा दे । दोनों के भाव एक जैसे ही थे । पर उस साल यह एकदम नया फैसला था , जिससे बच्चे और गार्जियन में काफी ऊहापोह की स्थिति अंत तक बनी हुई थी । सी. बी. एस. सी के ज़िद के सामने पटना के बड़े - बड़े स्कूल झुक गए । और सबने फैसला किया की वो स्कूल कंडुक्टेड परीक्षा ही लेंगे । जब यह बात मैंने घर वालों की बताई , तो उन लोगों ने विश्वास नही किया । उन्हें लगा मैं नही पढ़ने के लिए इतने बहाना बना रहा हूँ ।

घरवालों ने कभी मुझ पर विश्वास नही किया , मैं अपना विश्वास घर मैं खो चुका था । उन्होंने बोर्ड एग्जाम की बात को मेरे दूर के रिश्ते के एक भाई से पक्का किया । जब उसने बोला की यह सही बात है , तो घर वाले चुप थे ।

10th बोर्ड के परीक्षा के परिणाम आ चुके थे । मुझे 82.6 % नंबर आये थे , अपने घर में सबसे अधिक , आज तक मेरे घर में किसी ने भी इतना प्रतिशत दसवीं के परीक्षा में नहीं लाया थे । मैं बहुत खुश था , की मैंने बाजी मार ली थी । जब मैं रिजल्ट घर वालों को दिखाया , तो सब ने मुझे बधाई दिया । पर साथ मैं मुझे यह भी सुनने को मिला की स्कूल कंडुक्टेड परीक्षा में इतना खुश हो क्या फायदा ?

अब चाचा और भैया ने मुझसे पूछा , आगे क्या करना है । सी. बी. एस. सी की नौटँकी से परेशान हो चुका था , इसलिए यह फैसला कर लिया था की इस बोर्ड में दोबारा नही पढ़ना है । क्या पता 12th मैं भी ऐसा कोई नियम आ जाये , और मैं कितना भी मेहनत करूँगा पर घरवाले नही समझेंगे । तो मैंने फैसला किया की आगे की पढ़ाई “बिहार बोर्ड” से करूँगा , आर्ट्स लेकर । शायद यह मेरे जीवन की पहली गलती थी , आर्ट्स लेना । इनका कोई आगे क्षेत्र नहीं होता है । पर मैं इसे गलती आज भी नही मानता हूँ , बच्चों को यह छूट रहनी चाइये , की उसे आगे क्या लेकर पढ़ना चाइये । मैं बिहार बोर्ड से प्रमाणित एक स्कूल का फॉर्म घर ले कर आया । उस समय बिहार बोर्ड से पास होना बहुत कठिन होता था , इसमें गुणवत्ता थी ।

उस फॉर्म को देख कर मेरे चाचा ने कहा , जब आर्ट्स लेकर पढ़ोगे तो क्या जरूरी है रेगुलर क्लास करने की । ओपन से आर्ट्स लेकर 12th कर लो । यानी आर्ट्स वालों की यह इज्जत थी । हाँ मैंने उनका बात मान लिया , और एन. आई. ओ. एस बोर्ड से 12th में अपना नाम लिखवा लिया । अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती मैंने वहीं की थी , ओपन में नाम लिखवा के । ओपन में आप कितना भी पढ़ने की कोशिश करो , पर आपको एक छूट का एहसास हो जाता है की कौन देखने वाला है । पर फिर भी मैंने पढ़ा , पर इस बार रिजल्ट 59% ही थे । 10th के परीक्षा में मेरे घर में सबसे अधिक नंबर थे , पर 12th में अपने घर में सबसे कम नंबर लाने वाला भी मैं ही था । जीवन में जब तक हो सके कभी भी ओपन बोर्ड से पढ़ाई नही करना चाइये , यह आपके मन से पढ़ाई अहमियत कम कर देती है ।

मैंने सोचा था बारहवीं के बाद पटना में ही रह कर सरकारी नौकरी की तैयारी करूँगा । पटना की हवा में ही सरकारी नौकरी थी । मैं कभी पटना छोड़ना ही नही चाहता था । वैसे भी सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए पटना से अच्छी जगह कोई नही थी ।

रिजल्ट आये हुए केवल दो दिन हुए थे । चाचा की बेटी की शादी थी , तो मैंने सोचा शादी के बाद चाचा से बात करूँगा , अपने आगे के पढ़ाई के बारे में । पर शादी में आये मेहमान लोगों से यह सुनने को मिल चुका था की इंटर की परीक्षा में मुझे आटे दाल का मूल्य पता चल गया है । एक ने तो मुझे यहाँ तक कहा की 10th की परीक्षा में चोरी कर के तो पास कर गए , पर यहाँ पता चल गया न ।

पर मैं चुप रहा , आगे सरकारी नौकरी की तैयारी करने की सोच रहा था । पर शादी के दूसरे दिन पापा और चाचा में किसी बात को लेकर मनमुटाव हो गया , और बात बंटवारा तक चला गया । बात इतनी आगे बढ़ चुकी थी , की किसी ने भी अपने कदम पीछे लेने के लिए तैयार नही थे । मेरा हँसता खेलता परिवार एक पल में बिखर गया था । मेरे बड़े भैया , और छोटी दीदी ने चाचा के साथ देने का फैसला किया । मैं भी मन ही मन चाचा के साथ था , पर चाचा ने मुझे अपने पास रखने को तैयार नही हुए । तीन दिन तक मुझसे , मेरे पापा और मेरी माँ को घर के बाकी सदस्य ने टोका तक नही । हम तीनों लोग ऊपर वाले कमरे में रोते रहे थे , कोई देखने तक नही आया था । यह परिवार पिछले 20 साल से संजुक्त थी , पर आज तिनके की तरह बिखर चुकी थी । मैंने उस वक़्त आत्महत्या का विचार मेरे दिमाग में आया था , पर मैं कर नहीं सका । “उस तीन दिन में मेरी आत्मा पहली बार मर चुकी थी” ।

पापा मुझे अपने साथ , बर्दवान , पश्चिम बंगाल ले आये । उन्हें तो यह भी नही पता था की मेरा 12th में क्या सब विषय था । जब उन्हें पता चला की मैंने आर्ट्स से पढ़ाई की है , तो वो बहुत नाराज हुए । शायद उनकी भी नज़रो में भी गिर चुका था ।

मैं तीन - चार महीने पूरे अवसाद के दौर से गुज़र रहा था । मुझे नफरत सी होने लगी थी परिवार के नाम से । और मेरे पापा मेरे भविष्य के लिए चिंतित थे , उन्हें समझ नही आ रहा था मुझे किस लाइन में भेजे ।

इसी खोजबीन के दौरान उन्हें एक इंस्टिट्यूट के बारे में पता चला , जो रांची में था । वहाँ पापा ने मेरा एडमिशन “डिप्लोमा इन मेडिकल लैब तकनीशियन” में करवा दिया । इस कोर्स में इंटर साइंस की जरूरत नही था । मैंने अपने आप को भाग्य मान कर रांची चला गया । होस्टल लाइफ अगर आपको ज़िन्दगी जीने का तरीका सिखाती है , तो साथ में यह आज़ादी भी दिलाती है । और यह आज़ादी नाजायज़ होती है । और यह नाजायज़ आज़ादी का असर मेरे ऊपर भी हुआ । शराब , सिगरेट सब कुछ । दिन में क्लास , दोपहर में रूममेट्स के साथ मस्ती पर रात को मुझे नींद नही आती थी । मेरे अंदर का गुस्सा बढ़ रहा था , मुझे सब से नफरत होने लगा था , मैं हर रात “गैंग्स ऑफ वासेपुर” फ़िल्म का दोनों भाग देखा करता था । सबके दिमाग में अपना अपना फ़िल्म चल रहा था , और मैं खुद को फैज़ल खान समझने लगा था । फिर फाइनल ईयर में ट्रेनिंग का समय आया , और ट्रेनिंग के कारण मुझे यह कोर्स पसंद आने लगा था , मैंने ट्रेनिंग के दौरान हॉस्पिटल के हर विभाग के काम को सीखा । नाईट शिफ्ट में हमेसा शराब और सिगरेट , और इसी के साथ मैंने अपना गुस्सा पालना सिख रहा था ।

मैंने डिप्लोमा के बाद इसी कोर्स का डिग्री कोर्स करने का सोचा । पर डिग्री कोर्स के लिए इंटर साइंस होना जरूरी था , पर मेरे पास इंटर साइंस नही था । पापा और मैं दोबारा परेशान थे , दो साल बाद ज़िन्दगी फिर वहीं आ के रुक चुकी थी , जहाँ से शुरुवात हुई थी ।

इस बीच के एक दूर के रिश्तेदार ने कहा , की वह इंटर साइंस की सर्टिफ़िकेट दिलवा देगा । मेरी दूसरी गलती वहीं थी , मैंने आँख बंद कर के भरोसा कर लिया । उसने मुझे “बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन मध्य भारत ग्वालियर” का सर्टिफ़िकेट दिखाया , और बोला जा कर पहले कॉलेज वालों को यह डिग्री दिखाओ , अगर कॉलेज वाले तैयार होते है , तब मैं यह डिग्री तुम्हें दे दूँगा । मैंने वो सर्टिफ़िकेट कॉलेज वालों को दिखाया , और कॉलेज वाले मान गए । उस रिश्तेदार ने मुझे उस बोर्ड का डिग्री मेरे हाथों में रख दिया , और उस डिग्री का चार्ज लिया पंद्रह हजार रुपये । और उस डिग्री का रिजल्ट उसने नेट पर भी दिखा दिया ।

वह डिग्री लेकर मैं दुर्गापुर आ गया । दुर्गापुर धरती पर जन्नत के सामान थी , मैं सोचता अब यहीं रह जाना है । मेरा कॉलेज यहीं था “पैरामेडिकल कॉलेज दुर्गापुर” । पहला दिन कॉलेज का , मेरी ज़िंदगी का सबसे खुशी वाला दिन था । अपने बड़े भैया के बाद मैं ही एक था जो कॉलेज तक पहुँचा था । मेरे बड़े भैया मुझे गवांर बोलते थे , ये उनके लिए जवाब था ।

कॉलेज की ज़िंदगी देखना हर स्टूडेंट के लिए सपना होता है , और मैं भी यह सपना जी रहा था । मैंने नशा करना छोड़ दिया था , क्योंकि अब पापा का तबादला दुर्गापुर हो चुका था । मैं सिर्फ कॉलेज और कोर्स पर ध्यान दे रहा था । कॉलेज में मेरा सबसे पहला दोस्त बना “सौम्यजीत बनर्जी” हम दोनों क्लास में साथ बैठते थे । वो मेस में रहता था । लंच में हम लोग कार्तिक दा के यहाँ खाना खाते थे , वो रोज़ एक पीस मछली जरूर खाता था । और खाने के बाद हम लोग रोज़ एक सिगरेट पीते थे । सौम्यजीत को सभी “सम्राट” के नाम से बुलाते थे । सम्राट 18 साल का था और मेरी 24 । अपने क्लास में सबसे ज्यादा उम्रदराज़ मैं ही था । क्लास मैं सब मुझे दादा कह कर बुलाते थे । बंगाल में दादा का मतलब बड़ा भाई , छुट्टी के टाइम मैं , सम्राट और अपर्णा एक साथ निकलते थे । अपर्णा , सम्राट की गर्लफ्रैंड थी । दोनों की जोड़ी बहुत खूबसूरत थी ।

सब कुछ सही चल रहा था , पर कब तक ? किस्मत मेरे पीछे हँस रही थी । पहले सेमेस्टर के फॉर्म भरने का समय आ चुका था । हम सभी ने फॉर्म जमा कर दिया था । पर कुछ दिन बाद एच.ओ.डी सर ने मुझे और सम्राट को अपने ऑफ़िस में बुलाया औऱ हम दोनों की इंटर की सर्टिफ़िकेट हम दोनों को वापस कर दिया । उन्होंने कहा की यूनिवर्सिटी वालों ने कहा है की हमारी सर्टिफ़िकेट नकली बोर्ड के है । उन्होंने साथ मे यह भी कहा की अगर चाहते हो की तुम दोनों का साल बर्बाद न हो तो पंद्रह दिन के अंदर किसी असली बोर्ड का सर्टिफ़िकेट ले कर आओ । हाँ , मेरी किस्मत मुझ पर फिर से हँस रही थी । पंद्रह दिन तो हमारे इसी में निकल गए की हमारे बोर्ड नकली कैसे है , हमने नेट पर सर्च किया तो पता चला ऐसे लगभग 50 नकली बोर्ड्स है । सम्राट जिस बोर्ड का इंटर का सर्टिफ़िकेट लाया था वो था “बोर्ड ऑफ युथ एजुकेशन इंडिया” । हम लोग के पंद्रह दिन खत्म हो चुके थे । हमारे साथ पढ़ने वाले बाकी सब स्टूडेंट परीक्षा की तैयारी में लगे हुए थे । जबकि , मैं और सम्राट कॉलेज के कैंपस में दिन भर घूमते थे ।

घर में जब पता चला तो पापा मुझ पर चिल्लाने लगे की सारी गलती मेरी है । एक तरह से मेरा एक साल बर्बाद हो चुका था । पापा ने कहा की अब तो तुम दुबारा 12th की परीक्षा तो दे नही सकते हो , तो जा कर आई.टी.आई कर लो । बस यह सुन मेरा दिमाग गुस्से से उबल पड़ा , और उसके बाद मैं पापा पर भड़क गया । और उनको काफी कुछ गुस्से में बोल दिया । मैंने उन्हें कह दिया की आप सब के कारण मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गयी । बारहवीं के बाद मैं सरकारी नौकरी की तैयारी करना चाहता था , पर घर के जगड़े में मेरा सपना पीस कर रह गया । जब आपको पता था मेरे पास इंटर साइंस नहीं है , तो क्यों मुझे इस साइंस वाले लाइन में भेजा । और जब मुझे यह लाइन पसंद आ गया तो मेरी किसमत धोखा दे दिया । और वो रिश्तेदार कम दलाल कहीं का क्या उसे पता नही था की वो मुझे नकली बोर्ड का सर्टिफ़िकेट दे रहा है , उसे सब पता होगा । पर उसे तो सिर्फ पैसे से मतलब था , और आप अब चाहते है की अब यह लाइन बदल के आई.टी.आई करूँ । नहीं अब जो भी हो मैं करूँगा यही कोर्स से , चाहे तरीका सही हो या गलत । यह बोल के मैं अपने कमरे में चला गया , पर उस रात मैं सो नहीं सका । मेरे मन मे अफसोस था , की आज मैं अपने बाप से ऊँचे आवाज़ में बात की । ज़िंदगी में कभी भी बाप से ऊँची आवाज़ में बात नही करना चाइये , क्योंकि आपका वजूद आपके बाप के कारण होता हैं । सुबह पापा ने कहा देखो तुमको जो सही लगे वो करो ।
कॉलेज वालों ने मुझसे और सम्राट से कहा की असली बोर्ड का सर्टिफ़िकेट ले आओ , अगले साल तुम दोनों का बिना पैसा का दाखिला कर देंगे । हम लोग के पास अब छः महीने थे का वक़्त था । यह समय मेरे और सम्राट के लिए सही और गलत सोचने का नही था , हम दोनों यह कोर्स करना चाहते थे । पढ़ाई के लिए क्षमता नहीं यहाँ सर्टिफ़िकेट मायने रखती है । अब हम लोग अपने कॉलेज के स्टूडेंट सब से मिले , कॉलेज के होस्टल में न जाने कितने दलाल बैठे हुए थे । कोई किसी बोर्ड का नाम बताये , कोई किसी नेता का पैरवी बताएं । मतलब हमें समझ नही आ रहा था की हम किसको सही माने । तब हमारी डील हुई हमारे साथ पढ़ने वाले “सोएब खान” से उसने कहा वो हम दोनों की बिहार बोर्ड से साइंस की इंटर की सर्टिफ़िकेट बनवा के दे देगा । सर्टिफ़िकेट के लिए पंद्रह हज़ार लगेंगे , मैंने और सम्राट ने उसे पंद्रह हज़ार रुपए दे दिए । उसने एक महीने का समय माँगा ।
पर इस बीच सोसाइटी के लोग मम्मी से पूछने लगे थे की असित कॉलेज क्यों नहीं जाता है । मम्मी रोज़ कुछ न कुछ बहाना बनाती थी । बाद में उन सब का चेहरा मेरे लिए बोझ बनते जा रहा था । इस कारण मैं दोपहर को अपने सोसाइटी से बाहर रहने लगा । कभी दोस्त के यहाँ , कभी कॉलेज के होस्टल में बैठ कर ताश खेलना , कभी क्रिकेट खेलने चले जाना । पर इन सब से खतरनाक काम भी किया , खाली दिमाग शैतान का होता है । मैंने गाँजा पीना शुरू कर दिया था , लोगों के लिए गलत शायद बहुत ही गलत बात होती है , पर मुझे उस वक़्त यह आराम दे रही थी । उसको पीने के बाद मेरा होश कहीं खो जाता और मैं किसी और ही दुनिया में चला जाता , इस काम में सम्राट भी मेरे साथ था । मैं शाम को अपने घर वापस आ जाता ।
एक महीने बाद हम दोनों का बिहार बोर्ड का सर्टिफ़िकेट आ चुका था । हम दोनों बहुत खुश थे । मैंने वो रिजल्ट को नेट पर सर्च किया । बिहार बोर्ड के साइट पर मैंने अपना क्रमांक संख्या टाइप किया , तो नेट पर वो रिजल्ट किसी रोशन सिंह का बता रहा था । और सम्राट का रिजल्ट किसी राहुल मिश्रा का । हम लोग दोबारा ठगे गए थे , किसी और क रिजल्ट पर हमारा फ़ोटो स्कैन कर के डाल दिया गया था । सोएब से इसके बारे में पूछा तो उसने कहा , अरे बिहार बोर्ड का सर्टिफ़िकेट मिल गया न इससे मतलब रखो , और यूनिवर्सिटी को केवल इससे मतलब होता है की सर्टिफ़िकेट असली बोर्ड का है या नहीं । उसने यह भी बोला की वो खुद इसी सर्टिफ़िकेट पर इस साल का कॉलेज की परीक्षा दी है । जबकि असली रिजल्ट किसी और का था । हम दोनों चुप थे , औऱ हमारी चुप्पी हाँ की ओर थी । हम दोनों इसी सर्टिफ़िकेट पर पढ़ने का ठान लिया । हम दोनों ने यह सर्टिफ़िकेट कॉलेज वालों को दिखा कर अपना सीट पक्का कर लिया अगले साल के लिए । पर मेरे मन में था , यह गलत है । पर मैं चुप रहा,,,,
अभी कॉलेज शुरू होने में चार महीने थे , की इसी बीच पापा का तबादला पटना हो गया । पटना में हम लोग का अपना मकान था , जिसका बंटवारा हो चुका था । ऊपर वाला तल्ला पापा का और नीचे वाला तल्ला चाचा का । पर बोलचाल आपस मे बंद था । पापा मम्मी के साथ रह कर मुझे एहसास हुआ की अब इन दोनों को छोड़ कर जाना उचित नहीं होगा , क्योंकि मैंने उन दोनों को देखा था बड़े भैया के लिए तड़पते हुए । भैया पटना आते थे तो चाचा के यहाँ नीचे रहते थे पर अपने बाप के पास वो नहीं आता था । मेरे जीवन में इतना कुछ हो चुका था , की मेरा विश्वास इंसान , इंसानियत , धर्म और भगवान पर से उठ चुका था । मैंने वापस दुर्गापुर जाने के लिए तैयार नहीं हुआ । शायद यह मेरे मन का डर भी था , की कहीं वो असली बोर्ड का नकली सर्टिफ़िकेट भी पकड़ा न जाये । मैंने सम्राट को फ़ोन कर के बता दिया की मैं दोबारा दुर्गापुर नही आने वाला । पर उसने कहा की वह यह कोर्स करेगा ।
मैं दोबारा पटना में सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की । पर कुछ ही दिनों में मेरा मन उचट गया । आप जब एक बार पढ़ाई से दूर हो जाते तो फिर आप वापस नही आ पाते हो । और यहाँ तो मैं एक साल से बेकार बैठा हुआ था ।
पापा समझ गए थे की मैं हार मान चुका था । पर वो कुछ बोलते नहीं थे । मैं फिर से अवसाद में था । एक दिन मैंने हिम्मत कर के पापा से बात की “पापा आपके सभी बेटा - बेटी में सबसे बेकार मैं ही रह गया । अब मुझसे पढ़ाई नहीं होती है , मुझे कहीं भी नौकरी पर लगवा दीजिये । मैं कोई सा भी नौकरी करने के लिए तैयार हूँ ”
किसने बोल दिया की तुम बेकार हो - पापा ने मुझसे कहा ,
हाँ पापा मैं बेकार ही हूँ । आपका बड़ा बेटा बैंक में अधिकारी है , आपकी बढ़ी बेटी दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी की प्रोफ़ेसर है और आपकी छोटी बेटी गुजरात में एक शिक्षक है पर मैं कुछ भी नही हूँ । एकदम बेकार हो के रह गया - मैंने कहा ,
नहीं तुम बाकी सब में सबसे अच्छे हो । बुढ़ापे में तुम ही केवल साथ में हो और यही अच्छे बेटे की निशानी है - पापा ने कहा ,
मैं अपने स्तर पर कोई नौकरी खोजता हूँ तुम्हारे लिए जो पटना में मिल जाये - पापा ने कहा ।
।।
इसी बीच मैं अपने समाज के किसी भी फंक्शन में नही जाता था । मुझे लोगों से नफरत हो चुकी थी , इंसान की भीड़ से डर लगने लगा था । मुझसे जूनियर सब अच्छे - अच्छे जगह सेटल हो चुके थे ।। पर मैं बेकार हो चुका था ।
इसी बीच पापा ने कहा की जब तक तुम्हारी नौकरी नहीं मिल जाती किसी ओपन यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई कर लो । इस खोज मैं पहुँचा “नालन्दा ओपन यूनिवर्सिटी” बिस्कोमान भवन पटना । हम जैसे पिछड़े स्टूडेंट के लिए सबसे उत्तम जगह । इसकी मान्यता सही थी , और मेरे जैसे लाखों स्टूडेंट भरे हुए थे । क्लास करने की झंझट नही थी , बस साल के अंत मे परीक्षा देनी थी पढ़ के । तो मैंने अपना एडमिशन “बैचलर इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन” में ले लिया । इसी बीच पापा ने अपनी पैरवी से मेरी नौकरी “इंडिगो एयरलाइन्स” पटना एयरपोर्ट पर लगवा दी । मैं वहाँ ग्राउंड स्टाफ था । तीन साल मैंने वहाँ नौकरी की , इधर मेरी स्नातक भी पूरी हो चुकी थी , स्नातक पूरी होने के बाद मैंने एयरलाइन्स की नौकरी छोड़ दी , और पत्रकार बनने की राह पर निकल पड़ा । प्ररीक्षण के लिए मैंने ‘प्रभात खबर’ अख़बार में गया । धीरे - धीरे मैं इसी क्षेत्र में आगे बढ़ते गया । फिर पापा ने मुझे दिल्ली जाने को कहा , की वहाँ मुझे और सफलता मिलेगी । मैं यहाँ दिल्ली आ गया , शुरू में मुझे खेल से जुड़े समाचार पर काम करने को मिला । पर मैंने अपना नेटवर्क अच्छा बना लिया , और इस कारण मैं क्राइम रिपोर्टर बन गया । सब कुछ ठीक चल रहा था , की बिहार बोर्ड में टॉपर घोटाला हो चुका था ।
पर बॉस कुछ और ही खबर चाहते थे । वो था सर्टिफ़िकेट घोटाला । मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की मुझे इस काम पर मत भेजे । मैं यह काम नही करना चाहता था , क्योंकि मैं खुद भी दोषी था , सर्टिफ़िकेट घोटाला तो मैंने भी किया था , पर बाद में उससे निकल गया था । जब आप खुद दोषी हो , तो उसी आरोप के लिए दूसरों को सजा कैसे दिलवा सकते है । पर बॉस और चैनल वाले नही मानें और मुझे बिहार , झारखंड और बंगाल से जुड़े इस खबर से जुड़े सभी जानकारी जुटाने के लिए भेज दिया । इसी खोजबीन में दुबारा आठ साल बाद दुर्गापुर के अपने कॉलेज में गया । पुलिस ने करवाई करते हुए काफी लोगों को गिरफ्तार किया , उसमें से एक मेरा दोस्त “सौम्यजीत बनर्जी” उर्फ “सम्राट” भी था , जो अपने गाँव हुगली ज़िला में लैब टेक्नीशियन का काम करता था । सम्राट पर भी सर्टिफ़िकेट धांधली का आरोप लगा था । उसने कॉलेज के बाद अपर्णा से शादी कर लिया था । उसके दो बच्चे थे , एक बेटा और एक बेटी । मैंने उसके हँसते खेलते परिवार को तबाह कर दिया था । सम्राट जेल में आत्महत्या कर लिया , इज्जत बहुत बड़ी चीज होती है । सम्राट जैसे न जाने कितने लोग स्थिति की मार के कारण नकली सर्टिफ़िकेट लिए होंगे , मैंने भी तो नकली सर्टिफ़िकेट लिया था । पर मैं बच गया , और बाकी सब को सज़ा ।
जिस गलती की सजा उसे मिली , वही गलती तो मैंने भी की , तो सज़ा का हकदार तो मैं भी हुआ । मेरी ज़िंदगी में इतने उठा पठक हो चुके थे की मुझको रात में नींद आना बंद हो चुका था । दिल्ली में जब से था तो रात को शराब या गाँजा पी के सो जाता था , पर जब से सम्राट ने आत्महत्या की थी जेल में , मेरी रात की नींद गायब हो चुकी थी । सम्राट की मौत का जिम्मेदार मैं अपने आप को मान रहा था , और मैं दोषी भी हूँ उसका और उसके परिवार का । शराब और गाँजा से भी मुझे नींद नहीं आ रही थी । और नींद इंसान को कितना जरूरी है यह सभी जानते है । इसलिए मैंने फैसला कर लिया है की मुझे अब हमेशा के लिए सो जाना चाइये । और जानती हो जब इस घोटाले के बारे में पूरे देश को पता चलेगा , तो शुरू में सब पर गाज गिरेगी , पर धीरे - धीरे इस खेल के जितने भी बड़े खिलाड़ी है सब आराम से बच जाएंगे । और फँस के रह जाएंगे असित और सम्राट जैसे लड़के , और ज़िन्दगी भर कोर्ट के चक्कर लगाते रह जाएंगे । यघ नकली बोर्ड और नकली सर्टिफ़िकेट हम लोग के ज़िन्दगी में ज़हर घोल के रख दिया है ।
मैं कभी अच्छा बेटा , अच्छा भाई , अच्छा दोस्त या अच्छा इंसान नहीं बन सका । तो तुम्हारे लिए क्या अच्छा बनता ऋतु ?
मेरे मौत का कोई जिम्मेदार नहीं है । इसका जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ मैं हूँ ।
मेरे जीवन में तीन अधूरी इच्छा रह गयी ।
1. मैंने अपने जीवन में एक अधूरा प्यार किया था । पर उसे कभी अपनी दिल की बात नही बता सका । उसका नाम था “नूर” । उससे दोबारा जीवन में एक बार मिलने की इच्छा ।
2. दुर्गापुर में मेरा अपना खुद का मकान ।
3. दुर्गापुर में अपने कॉलेज में अधूरा छुटा वो कोर्स , पूरा करने की इच्छा मन में ही रह गयी ।
और अंत में , तुम ऋतु इस डायरी को पढ़ कर इसका नामोनिशान मिटा देना । क्योंकि बहुत लोग इस डायरी के पिछे होंगे । और मैं नहीं चाहता की मेरी ज़िंदगी दूसरों के सामने मजाक बन कर रह जाये । मेरे अंदर की आत्मा तो बहुत पहले ही मर चुकी थी , बस यह मिट्टी का शरीर दिखावें के लिए बची थी ।
और मैं मरने से पहले अपनी दिल की बात किसी को बताना चाहता था । बिना बताएं मर जाने में वो मजा नहीं है , इसके लिए मैंने तुम्हें चुना ।।।
तुम्हारा ,
असित
(यादों में जिंदा रखना)
।।।।

रात के दो बज चुके थे ,,
ऋतु के आँखों में आँसुओं का सैलाब था । उसने तुरतं बाथरूम में जा कर उसने उस डायरी को आग के हवाले कर दिया , फिर उसको कमोड में फ्लश कर दिया ।
असित की जी ज़िन्दगी उसके सीने में दफन हो चुकी थी हमेशा के लिए ।।। उसने फैसला कर लिया था , असित का यह राज़ हमेशा के लिए राज़ ही रहेगा । औऱ लोगों को हमेशा इन नकली बोर्ड के बारे में सचेत करती रहेगी । ताकि कभी कोई “सम्राट” या “असित” न बने ।

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