घड़ी का आलार्म बन्द कर के आज फिर सो गयी , रात को देर से सोना और सुबह जल्दी उठ न पाना केतकी की आदत बन गयी हैं। और इस एक बुरी आदत की वजह से पूरा दिन उसका अस्त व्यस्त हो जाता हैं। पहले केतकी ऐसी नहीें थी सुबह 5 बजे उठना उसकी आदत थी। पर कुछ वक्त से जिंदगी के उतार चढ़ाव में खुद को थका थका महसूस करने लगी है षायद ।

भीड़ के पीछे दौड़ने वाली केतकी कॉलेज की तीसरी सीट पर अब अकेले खामोष बैैठना पसन्द करती हैं और वजह बस इतनी है कि वह थक गयी है। ऐसा नही है कि वह किसी से बात नही करती अक्सर क्लास के बच्चे अपने छोटे मोटी मस्तियों में षामिल कर लेते और हर बार केतकी कोई बहाना बना के भाग जाती उन सभी को लगता षायद की उसे पसन्द नहीें हैं ज्यादा बात करना। लेकिन सच तो केवल उसे ही पता है, बस उसे ही पता है कि थक गयी है वो।

केतकी को बस इतना पता है कि वो लड़ रही है क्यो और किससे ये नहीं पता है, और षायद इसलिए ही तो जी रही है वो। साथ हीं अक्सर खुद को हारा हुआ महसूस भी करती है। इस तरह अपने दो हिस्सों मेें बंटे जीवन की नाव को किसी दूर किनारें पर खड़ी देखती रहती है जिस नाव के कभी बह कर दूर चले जाने का डर तो कभी डूब जाने का डर सताता हैं।ऐसी संजीदा प्रव्त्ति के चलते उसे अच्छे से अच्छे वातावरण में भी उदासी की वजहें मिल ही जाती है और इसी वजह से लोगों के प्रति उसका व्यवहार रूखा हो जाता हैं पर कोई समझ ही नहीं पाता इसका कारण खैर वो तो केतकी खुद भी नहीं जानती हैं।

अकेेेेलापन कभी कभी हमारा खुद का गढ़ा हुआ भी होता हैं जिस मनोस्थिति से केतकी गुज़र रही हैं। मानसिक अषांति के इस चक्र व्यूह में आज सभी फसें है और र्दुभाग्य से जब हमें इसका एहसास होता हैं ये बीमारी हमें अन्दर से खोखला कर चुकी होती हैं।


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