हम सोने की तैयारी कर रहे थे । नील अपने कमरे में चला गया और मैंने सारे खिड़की दरवाजे दोबारा जाँच लिए । मेरी पत्नी भी रसोई का सारा काम खत्म करके कमरे में आ गयी थी । मैंने कमरे की बत्ती बन्द कर दी और लेट गया । पत्नी थकी हुई थी इसलिए तुरंत सो गई मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी । मैं यूँ ही छत की ओर देखते हुए कुछ सोच रहा था कि अचानक ऐसा लगा कि बालकोनी में कुछ आवाज हुई । मैं सतर्क होकर ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगा । दोबारा कुछ आवाज हुई , ऐसा लग रहा था कि बालकोनी में कोई है । दो दिन पहले ही अखबार में पढ़ा था कि हमारी कालोनी के एक घर में कुछ लोग बालकोनी के रास्ते घुसकर लूट पाट कर गये । मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी तो मैं आगे के कमरे में बालकोनी की तरफ  वाली खिड़की के पास आ गया । कमरे में अंधेरा था इसलिए बाहर से अंदर देख पाना मुश्किल था लेकिन बालकोनी में हल्की रोशनी के कारण मैं बाहर थोड़ा थोड़ा देख पा रहा था । वो तीन लोग थे और आपस में धीरे धीरे बात कर रहे थे । मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की तो उनमें से एक की आवाज़ सुनाई दी वो दूसरे से कह रहा था , "क्या करें आवाज़ लगायें या यहीं छुपे रहें ?" दूसरा बोला , " जब तक अँधेरा है तब तक तो ठीक है लेकिन सुबह होते ही कुछ इंतजाम करना पड़ेगा, पर कैसे ये सोचो। " ये आवाजें सुनी हुई सी लग रही थीं, मैंने दिमाग पर थोड़ा जोर दिया तो आवाज़ पहचान गया फिर भी आश्वस्त होने के लिए मैंने धीरे से आवाज़ लगाई , "कौन है वहां ?" मेरी आवाज़ सुन कर तीनों ने एक दुसरे तो तरफ देखा।  थोड़ी देर के बाद एक धीरे से घबराई आवाज में बोला , "सर में मोहित, मैकेनिकल थर्ड ईयर। " मैं उसकी आवाज पहचान चुका था , ये मेरा स्टूडेंट मोहित था इसलिए इस बार मैं थोड़ा जोर से पुछा , "मोहित , इतनी रात में यहां क्या कर रहे हो ? तुम्हारे साथ और कौन है ? " मोहित उसी घबराहट भरी आवाज में बोला , " सर मेरे साथ बिपन और सुकृति भी हैं । हम एक मुसीबत में फंस गये हैं और हमें रात भर के लिए आसरा चाहिए । अगर आप हम पर भरोसा कर सकें तो हमें अंदर आ जाने दीजिए, हम आपको सारी बात बता देंगे । " मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ ? इतनी रात में इस तरह इन लोगों को घर के अंदर बुलाना क्या ठीक होगा?   अगले पल मेरे दिल से आवाज आयी, " ये मेरे शिष्य हैं  और शिष्य के लिए अध्यापक का स्थान माता पिता के बराबर होता है तो ऐसे में अगर शिष्य किसी परेशानी में है तो अध्यापक का कर्तव्य है कि उसका मार्ग दर्शन करे ।"  इतना सोचते हुए मैंने अच्छे बुरे की परवाह किए बिना बालकोनी का दरवाजा खोल दिया, सामने मेरे तीनो स्टूडेंट्स डरे हुए से खड़े थे।  मैंने उनको अंदर बुलाया और बैठने को बोला । मैंने उन्हें पानी पीने  के लिए दिया जिससे वो थोड़ा सामान्य हो सकें। फिर मैंने पुछा , "अब बताओ क्या बात है और तुम लोग इतनी रात में यहाँ क्या रहे हो।" मोहित ने बताना शुरू किया , "सर , हमारे कॉलेज में कुछ गड़बड़ रही है। " मुझे उसकी बात समझ में नहीं आयी  मैंने दोबारा पूछा , "ठीक तरह से बताओ बात क्या है ?" हम बहुत धीरे बात कर रहे थे जिससे कोई और ना सुन पाए। 

इस बार सुकृति बोल , " सर , असल में बात यह है कि पिछले कुछ दिनों से हॉस्टल में बाहर के लोग आते जाते हैं कभी कभी वो रात में रुकते भी हैं। हॉस्टल के दो कमरे जो फाइनल ईयर के राहुल , सुबोध , शारिक और वसीम के नाम पर अलॉट हैं वही इन लोगों के अड्डे हैं। ये लोग देर रात आते हैं और सुबह सुबह निकल जाते हैं। पहले वो चारों भी आया करते थे लेकिन पिछले हफ्ते से केवल ये संदिग्ध लोग ही कमरे में आते जाते हैं।  एक रात मोहित ने बताया की वो लोग कॉलेज ग्राउंड के कार्नर में कुछ कर रहे हैं।  हमने छिप कर देखा की वो एक गढ्ढा खोद कर उसमे कुछ दबा रहे थे। हम कुछ देर छुप कर उन लोगों के जाने का इन्तजार करते रहे।  उनके जाने के बाद हम उस जगह पर गए, अँधेरा होने की वजह से कुछ दिख नहीं रहा था। हमने मोबाइल की रोशनी से देखने की कोशिश की मगर जमीन को पहले की तरह बराबर किया गया था इसलिए सही जगह पता लगन मुश्किल था। तभी बिपन ने कहा कि अगर उन्होंने यहाँ कुछ छिपाया है तो कुछ न कुछ निशानी भी बनाई होगी। हम निशानी ढूंढने लगे तभी हमारी निगाह कुछ टूटी हुयी हड्डियों पर पड़ी, हड्डियां आधी जमीन में दबी हुयी थी। हमने उसी जगह पर खोदना शुरू किया , हाथ से ही कुछ एक फुट खोदते ही हमें कुछ पिस्तौल और बड़े चाकू दबे हुए दिख गए।  ये सब देख कर हम डर गए। मैंने इन दोनों को बोल कि हम प्रिन्सिपल को सब बता देते हैं वो अपने तरीके से ये सब हैंडल कर लेंगे। लेकिन मोहित का कहना था कि हमें इन लोगों का पीछा थोड़ा समय और करना चाहिए जिससे पता चले कि ये करना क्या चाहते हैं। बस यहीं से मुसीबत की शुरुआत हो गयी। मोहित ने उन पर निगाह रखनी शुरू कर दी। अगले कुछ दिनों तक उन्होंने कुछ विशेष हरकत नहीं करी। रोज रात में आते और सुबह सुबह निकल जाते। 

एक दिन हमने देखा वो लोग रात में आए लेकिन अपने कमरे में नहीं गये बल्कि सीधे उसी जगह गये जहाँ उन्होंने हथियार छिपा रखे थे । पहले उन लोगों ने चारों तरफ से जगह का मुआइना किया, हम दूर से छिपे हुए देख रहे थे । जब वो लोग आश्वस्त हो गये कि कोई देख नहीं रहा तब उन्होंने पहले वाली जगह पर फिर से खुदाई की, खुदाई करने के बाद उन्होंने अपने साथ लाये हुए बैग से कुछ और सामान निकाल कर उस गढ्ढे में रखा उसके बाद गढ्ढे को दुबारा भर दिया । वो मुड़कर जाने लगे तभी अचानक मेरे पैर के नीचे दबा हुआ पत्थर फिसल गया और मैं गिर पड़ा । आवाज सुनकर वो लोग रुक गये और वापस आ गये । हम तीनों ने अंधेरे में दौड़ लगा दी, हमें भागते देख कर वो भी हमारे पीछे भागे । हम अंधेरे का फायदा उठा कर भाग तो निकले पर अपने कमरे पर नहीं जा सके क्योंकि हमें नहीं पता कि वो हमें पहचान पाए थे या नहीं । अगर उन्होंने हमें पहचान लिया है तो वो हमें जिंदा नहीं छोड़ेंगे । जब हमें कोई और जगह नहीं समझ आई तो हम यहां आ गये क्योंकि यह जगह हाॅस्टल से दूर है और उनके यहाँ पहुँचने कि उम्मीद बहुत कम है ।" इतना बोलकर वो चुप हो गया ।

मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ इन बच्चों को इस मुसीबत में छोड़ नहीं सकता लेकिन अगर यहाँ रखता हूँ तो अपने और परिवार के लिए खतरा लेने वाली बात है । कुछ सोचते हुए मैंने उन लोगों को पूछा, "अब आगे क्या सोचा है ?" तीनों के चेहरे पर पहले ही हवाइयां उड़ी हुई थीं, मेरे इस प्रश्न ने उन्हें और परेशान कर दिया । तीनों एक साथ बोले, "सर हमें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।" मैं थोड़ी देर सोच कर बोल , " ऐसा करो फिलहाल तो तुम्हें छिप कर रहना पड़ेगा जब तक मैं पता न कर लूँ की पूरा मामला क्या है। मेरा नया फ्लैट खाली पड़ा है जो यहाँ से करीब तीन किलोमीटर दूर है। तुमलोग अभी वहां चले जाओ मैं कल कॉलेज का माहौल देख कर तुम्हें बताऊंगा कि क्या करना है। " तीनों ने सहमति में सिर हिला दिया। मैंने उन्हें चाभी दी और रास्ता बता कर रवाना कर दिया। 

अगले दिन मैं सुबह तैयार होकर कॉलेज पहुंचा। आज कॉलेज में बहुत गहमा गहमी हो रही थी , मैं माहौल का जायज़ा लेने के लिए धीरे धीरे हॉस्टल की और बढ़ा। हॉस्टल के बाहर बहुत भीड़ लगी हुई थी, पुलिस की एक जीप भी खड़ी थी। मैं आगे बढ़ते हुए हॉस्टल में दाखिल हुआ तो हॉस्टल का वार्डन दिखाई दिया, वो बहुत घबराया हुआ था। मैंने उसके पास जाकर पूछा की क्या हो रहा है यहाँ। वो लगभग रुआँसा होकर बोला , " सर आज सुबह सुबह फाइनल ईयर में जो राहुल है उसने प्रिन्सिपल को शिकायत की है की हॉस्टल में कुछ लोग गलत काम कर रहे हैं।  इसपर प्रिन्सिपल सर ने सभी कमरों की तलाशी करवाई तो थर्ड ईयर के  स्टूडेंट गायब मिले और उनके कमरे से कुछ पिस्तौल और चाक़ू मिले हैं। प्रिन्सिपल ने तुरंत पुलिस को भी बुला लिया और पुलिस ने कमरे को सील कर दिया है। मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। " मैंने उससे उन स्टूडेंट्स के नाम पूछे तो उसने मोहित, बिपन और सुकृति का नाम लिया। मेरी रगों में तो मनो खून सूख गया। मैं सोचने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं इन लोगों ने अपने आप को बचाने के लिए मेरा इस्तेमाल किया हो। मेरा मन बेचैन हो उठा और मैं स्टाफ रूम में आकर बैठ गया। मुझे अब भी यकीन नहीं रहा था कि ये तीनों ऐसा काम कर सकते हैं क्योंकि ये मेरे क्लास के सबसे होनहार छात्र रहे हैं। 

सन्नाटे को चीरती हुई नील की आवाज मेरे कानों में पड़ी , " पापा आपने सुना हाॅस्टल में क्या हुआ ? कहीं कुछ गड़बड़ है ये तीनों ऐसा नहीं कर सकते । आप क्या सोचते हैं इस बारे में ?" मैं अपने खयालों में ही था और नील की ओर देखे बिना ही बोला, "कुछ समझ नहीं आ रहा कि किस पर विश्वास करूँ ? जो आँखों के सामने है वो सही है या जो वो लोग कह रहे हैं ।" नील मेरे बिलकुल पास आकर बोल ,"कौन लोग कह रहे हैं ? क्या कह रहे हैं ? आप किसकी बात कर रहे हैं ?" मैंने अचानक निगाह उठा कर देखा तो नील मेरी तरफ अचरज भरी निगाहों से देख था। मैं थोड़ा हड़बड़ा गया लेकिन अपने आपको सम्भाल कर बोल , " कुछ नहीं , मैं यूँ ही कुछ सोच रहा था।  चलो घर चलते हैं मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही। " इतना कह कर मैं उठ कर चल पड़ा। "ठीक है चलिए। " बोलते हुए नील भी पीछे पीछे चल पड़ा। 

रास्ते भर मैं सोचता रहा कि क्या करूँ किससे बात करूँ फिर तय किया नील से बात करके देखता हूँ। घर पहुँच कर मैं नील को लेकर बालकनी में गया क्योंकि मैं जानता था कि मेरी पत्नी ये सब सुनकर घबरा जाएगी। मैंने नील को सारी बातें बतायी और सब सुन कर वो भी सोच में पड़ गया। कुछ देर चुप रहने के बाद वो बोला , "क्या सच है और क्या झूठ वो या तो ये तीनो जानते हैं या फिर वो लोग जिनके बारे में ये आपको बता रहे थे। सच्चाई का पता लगने के लिए हमें इन लोगों से मिलना पड़ेगा। " मैंने भी सहमति में सिर हिलाया । मैंने पत्नी को बोला कि हम (मैं और नील) कुछ जरूरी काम से बाहर जा रहे हैं और खाने के समय तक वापस आ जाएंगे ।
हम दोनों फ्लैट की ओर चल दिये, बिल्डिंग के मेन गेट से लगभग भागते हुए हम फ्लैट तक पहुँचे लेकिन वहाँ  ताला लगा हुआ था । इससे पहले कि हम कुछ सोच पाते बगल वाले घर से हमारे पड़ोसी अस्थाना साहब बाहर निकले और अपने चिर परिचित अंदाज में हँसते हुए बोले, "अरे प्रोफेसर साहब बड़े दिनों बाद दर्शन दिए, घर तो आपका बन कर कब का तैयार हो गया आप कब आ रहे हैं रहने के लिए ? हमें भी मौका दीजिए आपके पड़ोसी होने का ।" मैंने सहज होते हुए जवाब दिया, "अरे साहब ये तो हमारा सौभाग्य है कि हमें आप जैसे पड़ोसी मिल रहे हैं । बस 2-3 महीने और उसके बाद तो यहीं आशियाना रहेगा । वैसे कल रात मैंने अपने तीन स्टूडेंट्स को घर की चाभी देकर भेजा था लेकिन वो दिखाई नहीं दे रहे । आपने उन्हें कहीं जाते हुए तो नहीं देखा? " अस्थाना साहब ने आश्चर्य से मुझे देखा और बोले, "नहीं साहब मैं सुबह 6 बजे माॅर्निगं वाॅक के लिए गया था तब भी यह ताला यूँ ही था मुझे अच्छी तरह याद है । रात में भी 12 बजे तक हम जगे हुए थे तब भी कोई नहीं आया । रात भर में ही कोई आया हो और चला गया हो तो बात अलग है । फिर भी अगर कोई रात में आया होता तो हमें जरूर पता चलता क्योंकि बिल्डिंग में ज्यादातर घर खाली हैं इसलिए हम किसी भी हल्की सी आहट पर बाहर आकर तसल्ली कर लेते हैं ।"
अस्थाना साहब की बात सुनकर हम और परेशान हो गये । अगर वो यहाँ नहीं पहुँचे तो गए कहाँ, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि यह पहेली कैसे सुलझेगी ?

हम लौट कर घर आ गये । मेरा मन अब भी बहुत विचलित था सो मैं चुपचाप जाकर बालकोनी में बैठ गया । थोड़ी देर बाद नील भी वहीं आ गया और एक कुर्सी लेकर मेरे बगल में बैठ गया । कुछ देर तक हमारे बीच कोई बात नहीं हुई लेकिन मेरे चेहरे पर परेशानी साफ झलक रही थी । चुप्पी को तोड़ते हुए नील बोला , "पापा मैं समझ सकता हूँ आप क्यों परेशान हैं आपके स्टूडेंट्स हैं तो मेरे भी सहपाठी हैं और मुझे भी चिंता हो रही है कि न जाने वो कहाँ और किस हाल में होंगे । लेकिन हमें अभी तक पूरी बात नहीं पता है और ऐसे में हम कोई कदम नहीं उठा सकते न ही किसी को ये सब बता सकते हैं । क्या पता हम उनकी मदद करने के चक्कर में खुद ही किसी मुसीबत में फंस जाएँ । हमें फिलहाल इंतजार करना चाहिए कि पहले इन लोगों का पता चले फिर हम कोई कदम उठाएँ । आप क्या कहते हैं? " मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं उसकी बात से सहमत हूँ या नहीं लेकिन फिर भी मैंने सहमति में सिर हिला दिया ।

मेरे जीवन में ऐसा वाकया पहली बार हुआ था इसलिए  इन सब बातों ने मुझे झकझोर कर रख दिया था । उस रात मुझे नींद नहीं आयी मुझे ऐसे हाथ पे हाथ धरे नहीं बैठना चाहिए।अगले दिन मैंने अपने बचपन के दोस्त संजय को फोन किया जो कुछ दिन पहले ही पड़ोसी जिले में एस पी होकर आया था ।औपचारिक बातचीत के बाद मैंने उसे मिलने को बुलाया । मैं उससे अकेले में बात करना चाहता था जिससे कि उसे सारा वाकया बता सकूँ और राय ले सकूँ। हमारा अपॉइंटमेंट दो दिन बाद मेरे ही शहर के एक रेस्टोरेन्ट में तय हुआ। 

हम सही समय पर रेस्टोरेन्ट में पहुँचे , इतने सालों के बाद मिलना हुआ था तो जाहिर है दोनों के पास बहुत सारी बातें थी बताने के लिए। थोड़ी देर अपने परिवार वगैरह की बातें करने के बाद मैंने उसे अपनी परेशानी बताई। सारी बातें सुनने के बाद वो थोड़ा गम्भीर हो गया उसका कहना था कि ये सब उसे संदिग्ध लग रहा था और किसी बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता था। उसने मुझे आश्वासन दिया की वो इस समस्या का हल जल्दी ही ढूँढ़ने की कोशिश करेगा। इसके बाद हम अपने अपने रास्ते चल दिए। करीब दो दिन के बाद उसका दोबारा फोन आया और उसने मुझे दोबारा उसी जगह मिलने कहा। मैं बताए हुए समय पर पहुँच गया , वहां उसके साथ कोई और भी था।  संजय ने मुझे उससे मिलवाया , वो उसका जूनियर था रोहित जो हमारे शहर में ही इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट में तैनात हुआ था। संजय ने उसको सारी बात बता दी थी। उसने मुझसे पूरे वाकये को फिर से बताने को बोला सही समय और जगह के साथ। मैंने उसे बताना शुरू किया जैसे की मेरे घर का पता फिर किस समय वो तीनो लड़के मेरी बालकनी में आये और किस समय वो मेरे घर से फ्लैट की चाभी लेकर निकले और मेरे फ्लैट का पता। सब सुनने के बाद रोहित ने अपना लैपटॉप खोला और उसे इंटेलिजेंस के हैडक्वार्टर से जोड़ा। फिर वो बोल ," सर मैं आपके बताए समय और जगह के आस पास के सी सी टी वी कैमरों की फुटेज आपको दिखता हूँ आप उन लोगों को पहचानने की कोशिश कीजिये जिससे हमें पता चल सके की वो आपके घर से निकल कर कहाँ गए।उसने सबसे पहले हमारी कॉलोनी के सिक्योरिटी गेट और आस पास के कुछ कैमरों की फुटेज मुझे दिखाई । करीब साढ़े ग्यारह बजे तीनों कालोनी के गेट से बाहर निकलते हुए  दिखे । मैंने समय से ये अंदाजा लगा लिया था कि वो मुझसे चाभी लेकर तुरंत कालोनी से निकल गये थे । अब ये देखना था कि वो आगे कहां गये?

हमारी कॉलोनी से लेकर फ्लैट तक के रास्ते में तीन और जगहों पर सी सी टी वी कैमरे लगे थे।  सभी कैमरों में हमने थोड़े थोड़े अंतराल के फुटेज देखे जिससे ये तो तय हो गया कि वो लोग मुझसे चाभी लेकर फ्लैट की और ही गए थे।  अब हमने फ्लैट के सिक्योरिटी गेट पर लगे कैमरे की फुटेज देखी। इसमें दिखाई दिया की वो सामने से आ रहे थे लेकिन फ्लैट से थोड़ी ही दूर पर ठिठक कर रुक गए , जैसे किसी को देख कर डर गए हों। उसके बाद वो वापस उधर ही भागने लगे जिधर से आये थे मगर पिछले कमरों की बाद की फुटेज में वो नहीं दिखे इसका मतलब वो किसी और तरफ भागे थे। इसके बाद रोहित ने उस इलाके के चारों तरफ लगे कैमरों को देखना शुरू किया और कुछ ही समय में उन्हें ढूंढ लिया। वो एक गली में घुसते हुए दिखे लेकिन उसके बाद वो किसी कैमरे में नहीं दिखे। संजय बोला , "हो न हो आपके फ्लैट के पास कोई ऐसा था जिससे इन्हे खतरा हो सकता था इसलिए ये वहां से भाग कर उस गली के किसी घर में छुपे हैं। पुलिस को देख कर ये और डर सकते हैं इसलिए हमें अलग तरह से पता लगाना होगा। " मैंने भी हामी में सिर हिल दिया। 

तय हुआ की शाम को संजय साधारण कपड़ों में उस गली की छान बीन के लिए जायेगा मेरे जोर देने पर वो मुझे साथ ले जाने को राजी हो गया। हम अँधेरा होते ही वहां पहुँच गए। गली में घुसते ही मुझे लगा की इस गली में मैं पहले आ चुका हूँ। मैंने दिमाग पर जोर दिया याद आ गया कि इसी गली में हमारे कॉलेज की महिला टीचर जो अंग्रेजी पढ़ाती हैं वो रहती हैं। लगभग एक साल पहले उनके गृह प्रवेश की पूजा में हम सब आये थे। थोड़ा आगे चलने पर मुझे घर याद आ गया और मैंने संजय को उस घर में चलने के लिए कहा। हमने दरवाजा खटखटाया तो मैडम ने ही दरवाजा खोला और मुझे देख कर चौंक गयी। वो बोलीं ," अरे सर आप यहाँ इस वक़्त ? कोई ख़ास काम ?" तब तक उनके पति भी बाहर आ गए और उन्होंने मेरा परिचय कराया। मैंने संजय को अपना दोस्त बता कर परिचय दिया। मैडम ने दोबारा हमारे इस समय आने की वजह पूछी। मैंने उन्हें पूरी बात बताई और उनसे पुछा कि क्या वो उन तीनों के बारे में कुछ जानती हैं। मेरे ये पूछते ही वो रोने लगी और उनके पति बोले , "देखिये सर वो तीन चार दिन पहले यहाँ आये थे। वो डरे हुए थे और मदद मांग रहे थे इसलिए हमने उन्हें घर में जगह दी लेकिन हमें नहीं पता था कि हम खुद ही मुसीबत में फँस जायेंगे। " मैंने थोड़ा आश्चर्य के साथ पुछा , " कैसी मुसीबत ? और वो हैं कहाँ अभी ?" मैडम बोली , " सर वो दो दिन यहीं छुपे थे।  रोज रात में निकल कर आपके फ्लैट की और जाते लेकिन लौट आते और कहते की वहां अभी खतरा है। कल रात भी वो जाकर वापस आये लेकिन उनके घर में घुसते ही पीछे से चार पुलिस वाले भी आये और उन्हें पकड़ कर ले गए और जाते हुए हमें बोल गएकि हम इस बारे में किसी से बात न करें वर्ना हमें मुजरिमों को पनाह देने के जुर्म में हवालात में डाल देंगे। " इतना कहकर वो फिर रोने लगी। संजय ने अपना आई डी कार्ड दिखते हुए कहा ," देखिये आप लोग घबराइए मत मैं आपके पडोसी जिले का एस पी हूँ और मैं जानता हूँ कि आप निर्दोष हैं इसलिए आपको कुछ होगा। मुझे सिर्फ इतना बताइए की वो अपना कोई सामान  छोड़ कर गए हैं क्या ?" "वो यहाँ खाली हाथ ही आये थे उनके पास कोई सामान नहीं था। " मैडम के पति बोले।

इसके बाद हम वहां से निकल पड़े। संजय बोला , " हो न हो ये पुलिस टीम उसी चौकी की होगी जहाँ कॉलेज के प्रिंसिपल ने रिपोर्ट की होगी। चलो एक बार चल के देखते हैं। " हम कॉलेज के इलाके की पुलिस चौकी में पहुंचे संजय ने अपना परिचय दिया तो सब सलूट मारने लगे और हमें बैठने के लिए बोला। संजय ने वहां के चौकी इंचार्ज से बात शुरू की ,"तीन चार दिन पहले आपके इलाके में  इंजीनियरिंग कॉलेज है वहां कुछ वारदात हुई थी और प्रिंसिपल ने रिपोर्ट लिखाई थी। उस रिपोर्ट के चलते आपकी टीम ने तीन लड़कों को कल रात गिरफ्तार भी किया है। मैं उनसे मिलना चाहता हूँ। " चौकी इंचार्ज भौचक्का होकर संजय को देखने लगा और बोला ," सर आप किस वारदात की बात कर रहे हैं ? हमारे पास तो कोई रिपोर्ट नहीं है और हम बिना रिपोर्ट के किसी को क्यों गिरफ्तार करेंगे ?" संजय ने मेरी तरफ घूम कर देखा फिर दोबारा चौकी इंचार्ज की और मुखातिब होकर बोला , " देखो वारदात तो हुई है पर हो सकता है रिपोर्ट इस चौकी के बजाय किसी और चौकी में लिखी गयी हो।  आप आस पास की चौकियों से पूछताछ कीजिये। " चौकी इंचार्ज अविश्वास के साथ बोला , "सर आप कहते हैं तो मैं पता कर लेता हूँ पर कॉलेज हमारे इलाके मैं है तो रिपोर्ट भी यहीं लिखी जानी चाहिए कोई और चौकी रिपोर्ट लिखेगा ही नहीं। " उसने दो तीन चौकियों में बात की और उसका कहना ठीक निकला कहीं भी रिपोर्ट नहीं लिखी गयी थी। " मैं और संजय एक दूसरे को आश्चर्य से देख रहे थे।  मामला और भी उलझता जा रहा था। 

अगर रिपोर्ट ही नहीं हुई तो पुलिस कॉलेज कैंपस में कैसे आयी और लड़कों को गिरफ्तार क्यों किया ? इन सवालों का जवाब कौन देगा ? हम दोनों इसी उलझन में थे कि अचानक मुझे ख्याल आया जब मैं कॉलेज हॉस्टल पहुंचा था तो वार्डन ने मुझे बताया था कि राहुल ने प्रिंसिपल को बताया था और प्रिंसिपल ने पुलिस में रिपोर्ट की थी।  इसका मतलब कि अब प्रिंसिपल ही बता सकता था कि सारा माजरा क्या है। रात हो रही थी फिर भी हम प्रिंसिपल के घर की और चल दिए। हमने प्रिंसिपल के घर की घंटी बजाई तो खुद प्रिंसिपल ने दरवाजा खोला। मुझे इतनी रात में अपने घर पर देख कर वो हैरान थे। हमने उन्हें बताया कि हम कॉलेज  में हुई घटना के बारे में छानबीन कर रहे थे और संजय का परिचय दिया। संजय के बारे में जान कर वो थोड़ा असहज हो गए फिर भी हमें अंदर बुला कर बैठाया और पानी लाने अंदर चले गए। कुछ ही क्षणों में हमें अंदर से कुछ गिरने की आवाज़ आई हमने एक दूसरे को देखा और संजय ने अंदर की और दौड़ लगा दी। मैं भी पीछे पीछे अंदर के कमरे में पहुंच गया और देखा प्रिंसिपल साहब खिड़की से बाहर जाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन संजय ने कोशिश को नाकाम कर दिया और उन्हें पकड़ लिया। प्रिंसिपल साहब गिड़गिड़ाने लगे , " मुझे छोड़ दीजिये मैंने कुछ नहीं किया, मुझे कुछ पता नहीं। " संजय बोला ," सर अगर आपने कुछ नहीं किया तो आप भाग क्यों रहे थे।  आपने भाग कर ये साबित कर दिया  है कि या तो आप खुद दोषी हैं या आप इस सबके बारे में जानते हैं। " प्रिंसिपल साहब ने सिर नीचे झुका लिया और कुर्सी पर बैठ गए। "

कुछ देर ऐसे ही बैठे रहने के बाद वो बोले , "सर आप मेरा विश्वास करें या न करें मगर मैं सचमुच इन लोगों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता बस मैं वो ही कर रहा था जो वो कहते थे । मुझे उनकी मदद के बदले एक बड़ी रकम मिल जाती थी । राहुल और उसके तीनों साथी जो हमारे ही काॅलेज हास्टल में रहते हैं वो ही मुझसे बात करते थे उनके साथ और कौन लोग हैं मुझे नहीं पता ।" संजय कुछ सोचकर बोला,  "आप राहुल या उसके किसी साथी को अपने घर बुलाइए । मगर याद रहे उसको बिलकुल शक नहीं होना चाहिए । आप अगर हमारा साथ देते हैं तो मैं सरकार से आपके लिए नर्मी की दरख्वास्त कर सकता हूँ ।" पसीना पोछते हुए प्रिंसिपल ने राहुल को फोन किया और उसे यह कहते हुए अपने घर बुलाया कि वो आने वाले इम्तहान के प्रश्नों के बारे में बात करना चाहते हैं । करीब एक घंटे के बाद घंटी बजी, हमने एक दूसरे की ओर देखा प्रिंसिपल साहब ने उठ कर दरवाजा खोला । दरवाजे पर राहुल था उसे अंदर करके दरवाजा बंद कर लिया अंदर आते ही राहुल मुझे देखकर चौंक गया  और वापस दरवाजे की ओर भागा लेकिन तभी संजय ने अपना रिवल्वर उसकी कनपटी पर रख दिया और कड़क आवाज में बोला, " हिलने की कोशिश मत करना वर्ना मारे जाओगे ।" वो प्रिंसिपल की ओर देख कर बोला, "सर ये सब क्या हो रहा है ?" संजय ने उसी कड़क अंदाज में कहा, "थोड़ी देर में तुम्हें सब समझ में आ जाएगा । तुम्हारे सर ने अपने हिस्से की कहानी सुना दी ह अब तुम्हारी बारी है ।" राहुल इधर उधर देखते हुए बोला, "मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा आपलोग किस बारे में बात कर रहे हैं ।" संजय ने एक निगाह हम पर डाली और दोबारा उसकी ओर देखते हुए बोला, "मैं उस हथियारों के गोरखधंधे की बात कर रहा हूँ जो तुम लोगों ने काॅलेज में चला रखा है और जिसकी वजह से तुम्हारे तीन जूनियर भी लापता हैं ।" राहुल असहाय सा होकर बैठ गया और बोला , "सर मुझे कुछ नहीं पता हमें तो बस बताया जाता है कि क्या करना है और करने के बाद पैसे मिल जाते हैं । उनके कुछ लोग भी आते हैं कभी कभी ।" संजय गुस्से में बोला कौन बताता है कि क्या करना है और कौन पैसे देता है ? " राहुल घबरायी हुई आवाज में बोला, "हमने उसे नहीं देखा,  वो ही हमें फोन करता है जब काम होता है और पैसे पार्सल में हमारे पास हाॅस्टल में आ जाते हैं ।" संजय बोला, "मुझे वो नंबर दो जिससे फोन आता है ।" राहुल ने नंबर बताया और सिर नीचे करके बैठ गया । संजय ने उस नंबर पर फोन करने जा ही रहा था कि अचानक बोला, "मैं अपने फोन से करूँगा तो वो सतर्क हो जाएंगे क्योंकि ये सरकारी नंबर है । " उसने मेरे फोन से नंबर मिलाया और फोन को स्पीकर मोड पर कर दिया । दो घंटियां बजने के बाद फोन उठा और दूसरी तरफ से आवाज आई , "हैलो पापा, कहाँ हैं आप इतनी देर तक ।" ये नील की आवाज थी । सभी भौंचक्के होकर एक दूसरे को देख रहे थे । मुझे लगा किसी ने मेरी सारी ताकत ही छीन ली हो और मैं लड़खड़ा गया । संजय ने मुझे संभाला और बात करने के लिए इशारा किया । मैं लगभग हकलाते हुए बोला, " वो ब बेटा मैंने ये कहने के लिए फोन किया कि मैं किसी दोस्त के साथ हूँ तो थोड़ा देर से आउंगा ।" उधर से आवाज आयी, " ठीक है पापा ।" और फोन कट गया । मेरा दिमाग सुन्न हो गया था । संजय ने तुरंत रोहित को फोन किया और उसे पुलिस फोर्स के साथ मेरे घर पर पहुँचकर मेरे बेटे को गिरफ्तार करने को कहा साथ ही चार पुलिसकर्मियों को प्रिंसिपल के घर पर बुलाया । थोड़ी ही देर में पुलिस आ गई और प्रिंसिपल के साथ राहुल को गिरफ्तार कर लिया गया । उन्हें पुलिस स्टेशन रवाना करने के बाद हम मेरे घर की ओर चले हम दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे क्योंकि हमें समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या कहें ।
जब मैं घर पहुँचा तो बिल्डिंग को पुलिस ने चारों ओर से घेर रखा था और रोहित ने नील को हथकड़ी लगा कर बैठा रखा था ।

मुझे देखते ही मेरी पत्नी भाग कर मेरे पास आयी और रोते हुए बोली ,"देखिए ये सब क्या हो रहा है ,  इन लोगों ने नील को पकड़ लिया है और कहते हैं कि इसने हथियारों की दलाली की है। " मैंने घृणा भरी निगाहों से नील को देखा मगर उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। वो मुझे देख कर बोला ,"आपका नंबर देख कर मैं धोखा कहा गया वर्ना ये मुझ तक कभी नहीं पहुंच सकते थे। " संजय उसके पास जाकर बोला , "अपनी होशियारी का बखान बाद में करना पहले हमारे सवालों का ठीक ठीक जवाब दो वर्ना हमें दूसरा तरीका इस्तेमाल करना पड़ेगा सच निकलवाने के लिए। " नील धीरे से मुस्कुरा कर बोला , "इंस्पेक्टर में तुम्हें सब बता दूंगा फिर भी तुम मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकते क्योंकि कानून को सबूत चाहिए और मैंने कोई ऐसा काम नहीं किया जिसका कोई सबूत हो और जिससे ये साबित हो कि में गुनहगार हूं। कानून गुनाह की सज़ा देता है न कि गुनाह की सलाह देने की। " संजय उसे घूरते हुए बोला , "सीधी तरह बातो ऐसे गोल मोल मत घुमाओ।" नील ने अपनी बात आगे बढ़ाई ,"देखिए ये जो हथियार आपको मिले हैं वो अंडरवर्ल्ड डॉन के हैं और उन्हें छिपाया कॉलेज स्टूडेंट्स ने है, मैंने तो सिर्फ उन्हें गाइड किया। आप डॉन को पकड़िए हथियार रखवाने के लिए और स्टूडेंट्स को पकड़िए रखने के लिए। मैं निर्दोष हूं इसलिए मुझे छोड़ दीजिये। " कुछ देर के लिए सन्नाटा सा हो गया , फिर संजय बोला ," अगर तुमने गाइड किया तो तुम्हें ये भी पता होगा कि ये हथियार रखवाए क्यों गए है। " लगभग हँसते हुए नील बोला ,"बिल्कुल पता है , शहर में जो धरना चल रहा है वो दंगे का रूप लेने वाला है और उस दंगे की आड़ में डॉन के आदमी इन हथियारों का इस्तेमाल करके लूटपाट करेंगे।  सिर्फ कॉलेज ही नहीं और भी बहुत सी जगहों पर हथियार छिपाए गए हैं। अब आप ये उम्मीद मत करना कि मैं आपको बाकी सब जगहों के बारे में भी बताऊंगा क्योंकि असल में मुझे भी नहीं पता कि वो कौन सी जगह है मैंने सिर्फ कॉलेज के काम में मदद की क्योंकि वहां के बारे में मुझे पता था बाकी और जगहों का जिम्मा दूसरे लोगो पर था। हम सब कुछ फोन नम्बरों से जुड़े हैं तो मैँ आपको सिर्फ उनके नंबर दे सकता हूं पर वो मिलेंगे या नहीं मुझे नहीं पता। मैंने आपको सब बता दिया है मुझे अब छोड़ दो। " मेरे बर्दाश्त की हद पार हो गई थी , मैंने नील के मुंह पर एक जोरदार तमाचा लगाया और चिल्ला पड़ा ,"क्या जरूरत पड़ गई तुम्हे ये करने की ? क्यों किया ये सब ?" नील के चेहरे के  भाव अचानक बदल गए , वो चिल्ला कर बोला ,"तो क्या करता आपकी तरह जिंदगी भर मजबूर होकर जीता। जब इंटरमीडिएट में कॉलेज में सबसे ज्यादा नंबर लाने के बाद वादा करने के बावजूद आप पैसों की कमी की वजह से मेरे लिए मोटर साइकल नहीं खरीद पाए तब पहले तो मुझे बहुत गुस्सा आया फिर मुझे आपकी मजबूरी पर दुख हुआ। मैं आप लोगों को दुखी नहीं देख सकता इसलिए  दोबारा किसी चीज़ की मांग नहीं की बल्कि अपने आप से वादा किया की अब में अपने और आप दोनों के सारे सपने पूरे करूंगा चाहे उसके लिए मुझे कुछ भी करना पड़े। मैंने अपने जैसे होनहार मगर पैसों से मजबूर लोगों को ढूंढा और एक ग्रूप बनाया जो लोगों को अलग अलग कामों में सलाह देता था ऐसे में कुछ ऐसे लोग भी आए जिन्हे गलत कामों में सलाह चाहिए थी जैसे किसी खास जगह पर चोरी के लिए कैसे घुसे या दंगे भड़कना और उससे अपना लाभ कैसे लें।  धीरे धीरे हमें इस तरह की सलाह पर ज्यादा पैसे मिलने लगे और हम उन्हें ज्यादा ध्यान देने लगे। हमने खुद कभी कोई गलत काम नहीं किया सिर्फ लोगों की मदद की। " इतना कहकर उसने सिर नीचे कर लिया। संजय बोला ,"गुनहगार की मदद करना और उसका साथ देना भी बराबर का गुनाह है इसलिए तुम भी उतने ही दोषी हो जितने बाकी सब और हमें तुमको गिरफ्तार करना ही पड़ेगा। माफ करना प्रोफेसर में अपने फ़र्ज़ का आगे मजबूर हूं। " मैं  कुछ बोलूं इससे पहले मेरी पत्नी बोल पड़ी ," इंस्पेक्टर साहब आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं , ये गुनहगार है तो इसे सजा जरूर मिलनी चाहिए। इतना ही नहीं इसने हमारे संस्कारों का भी मजाक उड़ाया है। आप ले जाइए इसे यहां से। "

नील को चार साल की कैद हुई उसके बताए तरीकों से पुलिस ने बाकी सब को भी पकड़ लिया। जेल से छूटने के बाद वो घर आया लेकिन उसके मन में कुछ और ही था।  वो हमसे बोला ,"आप लोगों  सिद्धांतों के हिसाब से में जिंदगी नहीं जी सकता इसलिए अब में यहाँ नहीं रहूंगा। " हमें नम आंखों के साथ छोड़ कर वो चला गया। आज कल वो एक बड़ी राजनीतिक पार्टी में मुख्य कार्यकर्ता है। हमने भी मान लिया था की हम ही अपने बेटे को सही रह नहीं दिखा पाए और शायद इस उम्र में अकेले इस गुनाह की सजा काट रहे हैं।

 

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