लव एट फर्स्ट साइट

उसकी सहेली नंदिनी की शादी थी। बाहर काफी बारिश हो रही थी। हल्की-हल्की ठण्ड में मंडप के बिलकुल बीच में जलती आग का ताप उसे अच्छा लग रहा था। वो अंश के कंधे पर सर रख के एक टक आग को निहार रही थी। उसका ध्यान पंडित के मन्त्रों की तरफ भी था जो लाख चाहने के बावजूद उसे समझ नहीं आ रहे थे। बीच-बीच में नंदिनी और उसके पति को भी देख उन दोनों के लिए खुश हो लेती। फिर दूल्हा-दुल्हन खड़े हुए और घर वाले उनके पाँव छूने लगे। उसने अंश से धीमी आवाज़ में पूछा "वो उनके पाँव क्यूँ छू रहे हैं?" अंश उसकी तरफ देख मुस्कुराया और उसे लगा शायद उसने कोई बच्चों वाला सवाल पूछ लिया हो। अंश वापिस उन दोनों की तरफ देखने लगा। थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोला "ऐसा मानते हैं कि शादी होते वक़्त ये सब जो मन्त्र पढ़े जाते हैं उस समय लड़का और लड़की साक्षात भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के रूप होते हैं, इसी लिए सब आशीर्वाद ले रहे हैं।" जवाब सुनते ही वो हँसते हुए बोली "अच्छा,ये बात है! तुम क्या मानते हो?" अंश फिर मुस्कुराते हुए बोला "मुझे दिक्कत नहीं है इस सब से, धारणा है लोगों की तो मैं उसकी इज्ज़त करता हूँ। कल को यही लड़के वाले उस लड़की को परेशान करें तब ये सब धारणाएं बेवकूफियाँ लगने लगती हैं।" उसने वापिस कुछ न पूछा। सारे रीति-रिवाज़ ध्यान से देखती रही। कुछ पर उसे हँसी आती तो कुछ उसे काफी अच्छे लगते। शादी हो गयी। अंश ने उस से पूछा "तुम्हें नींद तो नहीं आरही न? सोना हो तुम्हें तो कुछ इंतज़ाम करवाऊँ?" वो अपने मोबाइल स्क्रीन देखते हुए जम्हाई लेते हुए बोली "अरे अब क्या, सुबह होने वाली है! घर जा कर ही सो लूँगी। कॉफ़ी मिलेगी?" अंश ने हामी में सर हिलाया और इशारे में ही उसे इंतज़ार करने को कह कॉफ़ी लेने चला गया। बाहर बारिश रुक चुकी थी। वो खड़ी हुई और वहाँ से निकलते हुए बालकनी में आगई। आसमान ताका तो बिलकुल साफ़ था। तारे जैसे कुछ ज्यादा ही चमक रहे थे। पूरा शहर अँधेरे से ढका हुआ। अंश कॉफ़ी ले कर आगया। "ये लो थर्मस भर कॉफ़ी और कप्स, पियो जितनी पीनी है.. चियर्स!" कहते हुए रेलिंग पर जाकर बैठ गया। वो कॉफ़ी कप्स में निकालती हुई गुस्से में बोली "पता है न तुम्हें हम छठवीं मंजिल पर हैं! गिर जाओगे तो परसों बैंक कौन जाएगा?" अंश ने बाँहें फैला मौसम को गले लगाने की कोशिश की और फिर लम्बी शोर करती हुई साँस ले कर हँसते हुए बोला "अरे अच्छा है न, इसी बहाने और छुट्टियाँ तो मिलेंगी!" वो नकली हँसी हँसते हुए उसकी तरफ कॉफ़ी का एक कप बढ़ाते हुए बोली "हा, हा, हा! वैरी फनी!" अंश ने कॉफ़ी का एक सिप लिया और फिर उसकी तरफ इशारा करते हुए आकर पास बैठने को कहा। "नो वे, मैं तुम्हारी तरह पागल नहीं हूँ! परसों से फोर्थ सेमेस्टर शुरू हो रहा, और मुझे हॉस्पिटल से पढ़ाई नहीं करनी" कहते हुए उसने भी कॉफ़ी की सिप ली। अंश ने ज़बरदस्ती टेढ़ा मुंह बना के मुस्कुरा दिया और फिर दूसरी तरफ देखने लगा। "तुम्हारे चक्कर में एक दिन मैं पक्का मरूँगी, और अगर नहीं मरी तो जिस दिन पापा को पता चलेगा वो मुझे मार देंगें" हँसते हुए बोलकर वो भी ठीक उसके बगल में जाकर रेलिंग पर बैठ गयी। "सो, तुम्हें बड़ा पता है रीति-रिवाजों के बारे में! पंडिताई का भी मन बनाए थे क्या कभी?" उसने अंश को कोहनी मारते हुए पुछा। अंश हँसते हुए मना करने को सर हिला दिया। "तो तुम भी आस्तिक हो?" उसने पूछा। अंश ने हामी में सर हिला दिया। "पर तुम्हारे फेसबुक पोस्ट्स पढ़कर तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता?" कहते हुए उसने खाली कप्स में वापस कॉफ़ी भरी। अंश थोड़ी देर तक चुप रहा। कप लेते हुए बोलना शुरू किया "हाँ, मैं आस्तिक हूँ। रीति-रिवाज़ का उस से कोई लेना देना नहीं। उतना धार्मिक तो नहीं हूँ पर अगर एक हिन्दू होने के नाते मुझे अपने रीति-रिवाज़ पता हैं तो उसमें बुरा भी कुछ नहीं है, न?" उसने हामी भरने को सर हिला दिया। "क्या हुआ? तुम्हें अजीब लगा क्या?"अंश ने पूछा। वो थोड़ी देर सोचने के बाद बोली "नहीं... पर हिन्दू सुनते ही मोहन भागवत, आशाराम, बजरंग दल, VHP, RSS जैसों का ख्याल आजाता है... बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे मुस्लिम सुनते ही तुम्हें ख्याल आता होगा किसी शख्स के हाथ में बंदूकें और बारूद"। अंश ज़ोर से हँस पड़ा। उसे भी हँसी आ गयी। फिर अंश बोला "उनके लिए धर्म कोई भी गलत काम करने का बहाना है और उनकी गलतियों की वज़ह से मैं अपने आपको हिन्दू बोलने में क्यूँ शर्मिंदा होऊँ? मैं अपने माँ-बाप का बेटा हूँ, ब्राह्मण हूँ, हिन्दू हूँ और भारतीय भी। दिस इज़ माय रिएलिटी एंड आई ऍम एक्सट्रीमली प्राउड ऑफ़ दैट! अगर मैं मुस्लिम भी पैदा होता तो भी आय वुड हैव बीन प्राउड ऑफ़ दैट... और मुझे जानने वाले किसी भी शख्स के लिए मैं हिन्दू हूँ न कि वो लोग.. तो मुझे अच्छी मिसाल कायम करनी हैं उनके लिए"। वो उसे टोकते हुए बोल पड़ी "पर तुम्हें नहीं लगता कि ये सब चीज़ें हमें बाँध कर रखती हैं?" अंश घूम कर उसकी तरफ मुंह करके बैठ गया और बोला "बाँध कर नहीं रखती हैं.. इन्हें साथ लेकर चलना कठिन होता है... और हमें सब कुछ आसान चाहिए.."।

"आसान? एक बार मैंने किसी पॉलिटिकल मुद्दे पर अपनी राय रखी थी तो लोगों ने ऐसी-ऐसी बातें बोलीं कि आई वाज़ मेंटली डिस्टर्ब्ड फॉर फ्यू डेज़!"

"हाहा... ये तो हमारे और तुम्हारे ऊपर है न कि हम कैसी मिसाल कायम करते हैं दूसरों के लिए... मुझे हर रोज़ मंदिर छोड़ने वाला ऑटोवाला कहता है कि वो चाहता है कि उसका लड़का एक दिन मेरी तरह बने। वो मुसलमान है और मैं हिन्दू, फिर भी!"

"हाँ... तुम्हारी बात अलग है। पता है तुमसे जब भी कोई बहस करो तो खुद का ही नज़रिया बदल जाता है चीज़ों को देखने का..."

"क्या मैं इसे एज़ अ कॉम्प्लीमेंट ले लूँ? वो क्या है न खूबसूरत लड़कियाँ बहुत कम ही दूसरों की तारीफ़ करती हैं.."

"क्या यार... तुम भी न!"

दोनों हंसने लगे। फिर कुछ और बातें करने लग गए।

हलकी-हलकी रौशनी हो चुकी थी। "चलो, मैं तुम्हें ड्रॉप कर देता हूँ तुम्हारे घर पे" कहते हुए जब अंश ने ध्यान दिया तो वो उसके कंधे पर सर रख के सो चुकी थी। वो देखता रहा उसे। थोड़ी देर बाद उसने आँख खोली तो बोली "मुझे लगा यू विल किस मी पर तुम तो.."। अंश हंसने लगा। वो दोनों बालकनी से उतर के नीचे आये। अंश ने उसे उसके घर ड्रॉप किया और फिर अपने दोस्त की गाड़ी वापिस कर स्टेशन चला गया जहाँ से उसकी ट्रेन थी। वो घर आते ही चुप चाप सो गयी। दोपहर में नींद खुली तो भी वो अलसायी बिस्तर पर ही पड़ी-पड़ी पिछली रात अंश से हुई बातें सोचने लगी। उसने खुद को और अंश को नंदिनी और उसके पति की जगह सोचा और फिर शर्मा गयी। फेसबुक पर लॉग इन किया और पोस्ट डाला "We should always be proud of our reality. Try to be an example for the ones who come across it."। अगले ही सेकंड नोटिफिकेशन आया कि Ansh Tripathi commented on your status और तुरंत देखा तो अंश ने कमेंट किया था

। उसने फिर कमेंट किया

तो उस पर अंश ने कमेंट किया

। अब वो सोच में पड़ गयी कि क्या करे, कोई रिश्तेदार देखेगा तो क्या बोलेगा। फिर उसने अपना पोस्ट दुबारा पढ़ा "We should always be proud of our reality" और फिर बोलते हुए "रिश्तेदारों की ऐसी की तैसी" उसने भी कमेंट कर दिया

थोड़ी देर बाद उसकी माँ उसके कमरे में आयीं तो उसे नमाज़ अदा करते देख चौंक गयीं। उनके लाख समझाने पर भी उसने कभी ये सब नहीं किया था। खुश भी हुईं। शाम को खाना खाते वक़्त पूछ ही लिया तो बेटी से जवाब मिला "बिकॉज़ निदा खान इज़ एक्सट्रीमली प्राउड ऑफ़ हर रिएलिटी!"...

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"तुम्हारे चेहरे पर ये निशान कैसा है?", निदा ने उसके बाएं गाल पर हाथ फेरते हुए पूछा|

"तुमसे मिला हूँ उस से पहले से है, तुमने आज देखा?"

"यार, बहुत हल्का है... आज इतनी करीब से देखा तो पता चला, सामने से देखने पर पता ही नहीं चलता।"

"लो, तुमने आज तक मुझे करीब से नहीं देखा?"

"हाँ, तो?"

"मुझे तो इतना पता है कि तुम्हारे चेहरे पर तीन तिल हैं, उनमें से एक पता नहीं चलता जल्दी क्योंकि वो बिलकुल ही तुम्हारी पलकों के बगल में है।"

"हाँ, मेरी प्रोफाइल पिक्चर की क्वालिटी सही है... तुम्हारी तरह डिम पिक्चर अपलोड नहीं करती मैं!"

"मैंने पहली बार में ही नोटिस कर लिया था और फेसबुक पर फ्रेंड्स हम मिलने के काफी टाइम बाद बने।"

"अबसे ध्यान दूँगी पक्का, अब बताओ चोट कैसे लगी थी?"

"हम्म... एक्सीडेंट हो गया था एक बार, तब मैं यहीं पर पोस्टेड था.. काफी चोट लदी टी मेले को", अंश ने बच्चों जैसा मुँह बना तुतला कर बोला|

"ठीक है, ठीक है... अभी ज़िंदा हो तो नॉर्मल हो जाओ।"

"हाहा.. और बताओ?"

निदा बोलती रही, बीच-बीच में अंश भी कुछ बोल देता| थोड़ी देर तक ऐसे ही चलता रहा|

"मेरी बड़ी ख़्वाहिश है कि मैं एक किताब लिखूँ" निदा ने बोलते हुए अंश की तरफ देखा| अंश का पूरा ध्यान मोबाइल की स्क्रीन पर था| वो गुस्से में बोली "एक तो हम दो हफ़्तों में बस एक बार ही मिलते हैं और तुम्हें फेसबुक से फुरसत नहीं उस दिन भी"| अंश ने मोबाइल किनारे रखते हुए बोला "अरे नहीं, तुम बोलो न... मैं सुन रहा था"|

"अभी मैंने क्या बोला था?"

"यही कि तुम्हारी लखनऊ वाली जो खाला हैं उनकी तबियत ख़राब है...शायद?"

"वो मैंने 10 मिनट पहले बोला था!"

अंश ने रेस्टोरेंट की घड़ी की तरफ देखा, फिर निदा की तरफ| फिर बोला "इस ड्रेस में एक दम तुम ठायें टाइप्स लगती हो"|

"डोंट ट्राय टू चेंज द टॉपिक!"

"आई डोंट इवन रिमेम्बर द टॉपिक!"

निदा चुपचाप रेस्टोरेंट की खिड़की से बाहर देखने लगी| अंश हँसते हुए बोला "अरे, मज़ाक कर रहा था"|

"हाँ, तो मैं मज़ाक ही तो हूँ... तुम्हारी लाइफ का सबसे बड़ा एंटरटेनमेंट!"

"अच्छा सुनो... तुम्हारी खाला की तबियत खराब है, उनकी दो लड़कियाँ हैं, बड़ी वाली की शादी हो चुकी है वो दुबई में रहती है... छोटी वाली तुम्हारी उम्र की है, इंग्लिश से एम.ए. कर रही लखनऊ यूनिवर्सिटी से... बचपन में तुम दोनों एक ही स्कूल में छठवीं क्लास तक पढ़े हो पर अलग-अलग सेक्शन्स में... उसे भी तुम्हारी तरह अंग्रेज़ी नोवेल्स का शौक है, वो थोड़ा बहुत फेसबुक पर लिखती भी है... ठीक-ठाक लिख लेती है और क्योंकि वो एक लड़की है और उसकी प्रोफाइल पिक्चर अच्छी है तो लाइक्स भी ढेरों आ जाते हैं... बचपन में तुमने भी किसी राइटिंग कॉम्पिटिशन में पार्ट लिया था जिसमें तुम्हें सेकंड प्राइज मिला था...तबसे तुमने भी थोड़ा लिखना शुरू किया पर केवल खुद की डायरी में... तुम्हारी बड़ी ख्वाहिश है कि तुम भी एक किताब लिखो... और बताओ?"

टेबल पर मेन्यू कार्ड रखने आये वेटर ने अंश के मज़ाक में अंश के पैर छूते हुए बोला "गुरुजी"| और थोड़ी दूर खड़े दो वेटर भी तालियाँ बजाने लगे| अंश दो साल पहले तक इसी शहर में पोस्टेड था| इस रेस्टोरेंट को बनाने का लोन उसी के हाथों सैंक्शन हुआ था| इसलिए अंश को वहाँ सभी जानते थे| मालिक से लेकर वेटर तक सभी अंश को दोस्त की तरह मानते थे| अब निदा भी उनकी दोस्त थी| इसी वज़ह से सन्डे को 3 से 6 ऑफ टाइम होने पर भी सिर्फ़ अंश और निदा के लिए ही सर्विस ओपन रहती थी| वो दोनों अब यहीं मिलते थे|

निदा को भी हँसी आगयी| वो चूमने जैसे होंठ बना कर बोली "उम्ममाह... आई लव यू रे"|

"आई नो, और बताओ? क्या लिखने का इरादा है? लव स्टोरी?"

"हाँ, तुम्हें कैसे पता?"

"क्योंकि मैं जानता हूँ तुम एक लड़की हो, किसी के प्यार में पड़ी हुई लड़की" अंश ने आँख मारते हुए, इतराते हुए बोला| निदा हँसने लगी|

"मैं तुम्हारी और मेरी लव स्टोरी लिखूँगी!"

अंश पानी पीते हुए मेन्यू कार्ड पर नज़र फेरता रहा थोड़ी देर और फिर बोला "वही घिसी पिटी स्टोरी, एक हिन्दू लड़का और एक मुस्लिम लड़की, प्यार, घर वालों से तकरार, फलाना-ढिमका... ठीक इस मेन्यू कार्ड की तरह... वही पनीर, पनीर, पनीर"|

"भैया जी, रेस्टोरेंट तो बहुत अच्छा चल रहा है... साहेब तो शहर की दूसरी साइड एक और खोलने की बात कर रहे हैं" एक वेटर बोला|

निदा ने भी अपनी खूबसूरत सी आँखें और बड़ी कर के बोला "देखा! और वैसे भी तुम्ही तो कहते हो कि अच्छा होने के लिए अलग होना ज़रूरी नहीं, बस अच्छा होना ज़रूरी है"|

"ह्म्म्म... लिखना पर खुद को थोड़ा बेवक़ूफ़ टाइप्स दिखाना उस कहानी में, लोगों को भरोसा होना चाहिए कि इतनी खूबसूरत बंदी किसी ऐंवे टाइप्स बन्दे से पट गयी"

निदा फिर हँसने लगी| अंश को निदा की मुस्कुराहट से ज़्यादा उसकी हँसी पसंद थी| वो जब भी हँसती तो उसकी आँखें बिलकुल छोटी हो जाती और होंठ के दोनों किनारे एक दूसरे से जितनी दूर हो सकते हैं उतनी दूर हो जाते| उसे इस बात से भी फर्क न पड़ता कि वो उस पर हँस रही है या उसकी बातों पर| मुस्कुराते वक़्त उसके चेहरे पर शायद थोड़ी सी शर्म की परवाह सी रहती थी लेकिन जब वो हँसती थी तो बिलकुल बेशर्म सी और परवाह से आज़ाद हो जाती है|

"सिर्फ हँसोगी ही या कुछ खाओगी-पियोगी भी?"

निदा पानी पी ही रही थी कि उसे इस बात पर भी हँसी आ गयी| अब उस से पानी पिया ही नहीं जा रहा था| जैसे ही वो पानी पीने की कोशिश करती, अंश उसकी तरफ देख कर हँसने लगता और वो ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगती। अक्सर ही वो और अंश एक ऐसे लूप में चले जाते थे जहाँ उनसे हँसी काबू नहीं होती थी और वज़ह भी नहीं पता होती थी कि क्यों हंस रहे, बस हँसते रहते काफी देर तक| उन्होंने किसी तरह हँसते हुए ही खाना ऑर्डर किया|

"हाँ, तो तुम ने मुझे अपनी डायरी कभी पढ़ाई नहीं?"

"तुम ठहरे समाज सुधारक टाइप्स, वैसा मैं कुछ लिखती नहीं... और तुम्हें पढ़ने का शौक कभी रहा नहीं तो मुझे लगा कि पसंद नहीं आएगा।"

"अरे, तुमने लिखा है तो पसंद कैसे नहीं आएगा?"

"तुम इकलौते ऐसे हो जो मुझे सीरियसली लेते हो, मैंने कह दिया कि लिखती हूँ तो मान लिया अच्छा लिखती हूँ" बोलते हुए निदा हँस पड़ी| फिर बोली "अगली बार जब मिलेंगे तो ले कर आऊँगी"|

वेटर खाना ले आया| उन दोनों ने खाना शुरू किया|

"तुमने एक बार अपनी एक्स-गर्लफ्रेंड का ज़िक्र किया था पर यह नहीं बताया कि ब्रेक-अप क्यों हुआ था, मैं बस कहानी की वज़ह से पूछ रही।"

अंश कुछ देर तक बिना कुछ बोले ही खाता रहा| निदा ने कभी उसे सीरियस देखा ही नहीं तो उसे उससे कुछ भी पूछने में झिझक नहीं होती थी| शायद यही उनके रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात थी कि उन्हें एक दूसरे से ज़रा भी शर्म नहीं थी और न ही डर| फिर भी पिछली बार जब उसने यह पूछा था तो अंश ने कोई जवाब नहीं दिया था| उसे लगा वह अब भी कुछ नहीं बोलेगा| वो भी चुपचाप खाना खाने लगी| थोड़ी देर बाद अंश बोला "मेरे ब्रेक-अप के बारे में मैंने काफी लोगों से काफी बात की है, काफी... जिस से भी मिलता था उस से... फिर एक दिन मुझे लगा कि सब बेवकूफी है और मैंने फैसला लिया कि उस बारे में कभी दोबारा नहीं बात करूँगा, और तुम मुझे जानती हो मैं अपने फैसले नहीं बदलता"| निदा चुपचाप सुनती रही| अंश बोलता रहा|

"हमारा ब्रेक-अप हुआ क्योंकि हम दोनों ही एक दूसरे से प्यार नहीं करते थे... उसे यह बात पहले से ही पता थी और मुझे बाद में जब मैं तुमसे मिला।"

थोड़ी देर तक दोनों कुछ नहीं बोले| बस खाना खाते रहे| निदा को लगा कि बेवज़ह के सवाल से माहौल काफी भारी हो गया| अंश हँसते हुए बोला "तुमने वो फ़िल्मी सवाल नहीं पूछा कि और कुछ जो मेरा जानना ज़रूरी है"| निदा फिर से ज़ोर से हँसने लगी| अंश की सबसे ख़ास बात उसे यही लगती थी कि वो हर बात में कुछ न कुछ मज़ाक ढूँढ लेता था| उसने पूछा "हाँ, ऐसा कुछ और जो मेरा जानना ज़रूरी हो?"|

"चिंता न करो, मैं वर्जिन हूँ", आँख मारते हुए अंश ने बोला|

"भक्क्क!"

"तुम भी ठीक-ठाक लिख लेते हो", निदा ने चिढ़ाते हुए बोला| अंश नैपकिन से हाथ पोंछते हुए बोला "हाँ, इतना ठीक कि डायरी में छिपाना नहीं पड़ता"|

"हाहाहा... तुम्हें किताब नहीं लिखनी कोई?"

"मुझे बचपन में क्रिकेटर बनना था, फिर साइंटिस्ट, फिर इंजीनियर, फिर सिंगर, फिर रेडियो जॉकी, फिर इवेंट मेनेजर, फिर अब राइटर और कल को कुछ और... पर हूँ बैंकर!"

निदा हँसने लगी| अंश ने दोनों के लिए फिर आइसक्रीम ऑर्डर की| दोनों ने आइसक्रीम खायी, फिर थोड़ी देर रुक कर वो वहाँ से चलने लगे| दोनों ने आधा-आधा बिल पे किया| हर बार इस बात को ले कर निदा की ज़िद होती थी, अंश को मानना पड़ता था और दोनों आधा-आधा बिल पे करते थे|

"चलो, तुम्हें घर छोड़ दूँ!"

गाड़ी के अंदर किशोर के गाने बज रहे थे| अंश किशोर कुमार का बहुत बड़ा फैन था| वो गाड़ी चलाते-चलाते उन गानों को ज़ोर-ज़ोर दोहराया भी जा रहा था| अंश अच्छा गा लेता था और निदा को उसकी आवाज़ बेहद पसंद थी| निदा गाने की आवाज़ धीमे कर के पूछा "तुमने मुझसे कभी नहीं पूछा मेरे एक्स के बारे में"| अंश ने हँसते हुए हाथ से इशारा किया बताने को|

"मेरा वो रिलेशनशिप सिर्फ एक दिन का ही था, सुबह को मुझे उस लड़के ने प्रोपोज़ किया और मैंने हाँ कर दी। शाम तक मेरे को इतना अजीब लगा कि मैंने उसे कॉल कर के मना कर दिया और अच्छे से समझा दिया।"

अंश ने गाड़ी रोकी और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा|

"हाँ, ठीक है, हँस लो मुझ पर... मैं तब सिर्फ 18 साल की थी, इतना दिमाग कहाँ रहता है तब!"

"और बताओ? बस एक ही था!"

"हाँ, तो क्या पचासों होंगे?"

"अरे, तुम इतनी तो खूबसूरत हो, फिर भी कोई प्रपोजल नहीं मिलते क्या तुम्हें?"

"नाह... एक बार एक अजीब चीज़ हुई थी।"

"क्या?"

"मैं मम्मी के साथ उनका चेक-अप करवाने गयी थी...वहाँ एक लड़के को ले कर आये थे, उसका एक्सीडेंट हुआ था, उसका बाएं चेहरे पर काफी चोट लगी थी और पूरा चेहरा खून ही खून... मेरी नज़र उस पर ठहरी तो उसने मुझे बोला 'आई लव यू'.. मैं दंग रह गयी... एक तो उसे इतनी चोट लगी थी, फिर भी आशिकी सवार थी उस पर!"

"ओह, लव एट फर्स्ट साइट!"

"अगर पहली ही नज़र में हो रहा तो वो प्यार तो बिलकुल ही नहीं।"

"कोई फिक्स फार्मूला थोड़े ही होता है, कोई थ्योरी भी परफेक्ट नहीं होती... एक्ससेप्शन्स आर ऑलवेज देयर... उसे इतनी चोट लगी थी फिर भी उसने नोटिस किया तुम्हें, इतने दर्द में भी उसके दिमाग में ये बात आई!"

"मैं नहीं मानती!"

"एक्ससेप्शन्स शुड बी कंसिडर्ड एंड रेस्पेक्टेड। जब तक न पता चले तब तक बेनिफिट ऑफ़ डाउट तो दे ही दो!"

"ह्म्म्म... जो भी हो, आई-गयी बात ख़त्म! तुम क्यों उसकी इतनी साइड ले रहे...तुम्हें लव एट फर्स्ट साईट पर यकीन है?"

"मुझे... लो तुम्हारा घर आ गया!"

अंश ने गाड़ी रोक दी| निदा ने गाड़ी से उतरते हुए अपना सवाल वापिस दोहराया|

"तुमने कोई जवाब नहीं दिया?"

"चलता हूँ... ट्रेन छूट जायेगीं नहीं तो!"

निदा ने मुस्कुराते हुए हाथ हिलाते हुए कहा "बाय बैंकर साब" |

अंश ने गाड़ी वापिस चालू की| फिर एकदम से अपने बाएं गाल की तरफ चोट के निशान की तरफ़ इशारा करते हुए बोला "मैं उन्हीं चीज़ों की तरफदारी करता हूँ जिन्हें मैं सही मानता हूँ"|

"मतलब?"

"16 फ़रवरी, 2012... वार्ड 23! तुमने नीला सूट पहन रखा था!"

इतना कह कर अंश वहाँ से निकल गया| निदा कुछ देर तक वहाँ चुपचाप खड़ी रही| उसे यकीन ही नहीं हो रहा था उस बात पर जो अंश बिना बताये बता कर चला गया था|

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फोन बज उठा| अंश अभी-अभी घर पहुँचा था| हर दुसरे वीकेंड पर वो घर आता था अपने मम्मी-पापा के पास| इस बार शनिवार और सोमवार की छुट्टी ले कर वो शुक्रवार को ही घर आ गया था| आते ही बाथरूम में फ्रेश होने गया था| उसकी मम्मी ने फोन देखा तो स्क्रीन पर दिखा 'Khan Sahab calling'| उन्होंने सोचा बैंक के किसी कस्टमर का होगा| फोन वपिस टेबल पर रख दिया| फोन फिर बज उठा| इस बार मम्मी ने फोन उठा लिया| इस से पहले कि वो कुछ बोलती, दूसरी तरफ से निदा बोल पड़ी|

"मुझे टाइम मशीन चाहिए!"

"हेल्लो!"

"हेल्लो, ओह सॉरी! मुझे लगा अंश ने फोन उठाया!"

"जी नहीं, वो अभी बाथरूम में है... थोड़ी देर बाद करियेगा फोन।"

"जी!"

फोन कट गया| अंश थोड़ी देर बाद नहा कर बाहर आया| आते ही अपनी माँ से पूछा "खाने में क्या है?"|

"भिन्डी मसाला।"

"वाह! अच्छा, पापा किधर हैं?"

"ऑफिस के काम से दिल्ली गए हैं... आज सुबह ही अचानक जाना पड़ा... तीन दिन बाद आएंगे।"

अंश ने अपना फोन उठा कर चेक किया|

"किसी का फोन आया था?"

"हाँ, किन्हीं ख़ाँ साब का था... पर आवाज़ उनकी लड़कियों जैसी थी!"

मम्मी का कटाक्ष अंश को समझ आगया| उसने हँसते हुए टीवी का रिमोट उठाया और टीवी चालू किया| उसे पता था कि औरतों का ध्यान भटकाने का सबसे सही तरीका है टीवी चालू करना| कोई सीरियल चालू था| अंश ने मम्मी से सिर्फ एक बार पूछ लिया उस सीरियल के बारे में, उन्होंने सारे सीरियल गिना डाले|

"आओ, खाना खा लो!"

दोनों खाना खाते वक़्त भी बातें करते रहे| मम्मी सीरियल और रिश्तेदारों की बात करती और अंश बैंक और कस्टमरों की| रात को मम्मी अंश के सर में तेल लगा रही थीं| अंश को उस से बेहद सुकून मिलता था|

"याद है, तुम्हारे काढ़े हुए बाल कोई छेड़ देता था तुम कितना गुस्सा होते थे!"

"हाँ,अब भी वैसा ही है।"

मम्मी ने हलकी सी टाप मारी उसके सर पर|

"कब सुधरेगा!"

फोन बज उठा| वही "Khan Sahab calling"| निदा ने एक बार बताया था "पापा मुझे प्यार से खान साहब बुलाते हैं"| अंश को वो नाम भा गया और उसने उसका नंबर उसी नाम से सेव कर लिया| उसकी आदत थी ऊल-जुलूल नामों से लोगों के नंबर सेव करने की| बैलेंस जानने वाले नंबर को "आज की औकात" नाम से सेव कर रखा था| अंश ने फोन उठाया|

"हेल्लो!"

"हाँ, बताओ?"

"यार, थोड़ी देर पहले मैंने फोन किया था तो शायद तुम्हारी मम्मी ने उठाया था।"

"हाँ, मम्मी ने बताया... और क्या हाल?"

"बढ़िया! मैं कल आ रही लखनऊ... किसी रिश्तेदार के यहाँ कोई फंक्शन है।"

"मुझसे भी मिल लेना हो पाये तो!"

"कैसे?"

"मैं भी पहुँच जाऊँगा डॉक्टर खान के फंक्शन में!"

"तुम? कैसे?"

"पापा के दोस्त हैं वो, पापा है नहीं तो माँ के साथ मैं आजाऊँगा।"

"वाह... तो मिलते हैं!"

"ह्म्म्म... और?"

"और सब मिल कर।"

"ठीक, बाय!"

"वाह रे शरीफ़ लौंडे, मम्मी के सामने इतना शरीफ़ बन रहे।"

"बआआय्य्य्य!"

"हाहाहा... बाय!"

फोन कट गया| अंश ने मम्मी की तरफ देखा और मम्मी ने इशारों में ही पूछा कौन था| अंश ने यह सब बहुत बार ख्यालों में ही प्रैक्टिस किया था कि मम्मी को निदा के बारे में कैसे बताना है| उसे पता था कि यह किसी न किसी दिन तो घर वालों को बताना ही होगा और मम्मी को बताना-समझाना सबसे आसान होगा| इस वक़्त पापा है भी नहीं, तो बहस एक बनाम एक ही होगी|

"पता है, एक लड़की है!"

"सही बताओ? कौन?"

"निदा नाम है उसका... निदा खान!"

"हाँ, तो?"

"तो कुछ नहीं, कल वो भी डॉक्टर खान जी के यहाँ फंक्शन में आएगी।"

"बढ़िया! उस से मिलने के बहाने ही सही तुम मेरे साथ चलोगे तो, वरना मुझे अकेला जाना पड़ता... सब पूछते हैं तुम्हारे बारे में, सबसे मिल लेना।"

"हाँ!"

"चल अच्छा, गुड नाईट!"

मम्मी उसके सर पर हाथ सहला कर अपने कमरे में चली गयीं| अंश समझ गया कि मम्मी अभी भी नहीं समझीं| वह देर तक बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचता रहा कि कल सुबह नाश्ते के वक़्त साफ़-साफ़ बता दूँगा। सोचते-सोचते उसे भी नींद आ गयी|

"अब उठ भी जाओ!"

मम्मी ने चिल्लाते हुए बोला तो अंश की नींद खुली| उसे पता था कि मम्मी के बाकी डायलॉग पता थे| वो उनके साथ साथ सारे डायलॉग दोहराने लगा|

"कब सुधरोगे? इतने बड़े हो गए फिर भी... वहाँ भी ऐसे ही रहते हो क्या? बैंक टाइम से पहुँच पाते हो या सोते ही रहते हो!"

अंश झट से ब्रश वगेरह कर के आगया| नाश्ता तैयार था| वो नाश्ते पर टूट पड़ा|

"नहा तो लेते!"

"छुट्टी के दिन भी कोई नहाता है क्या?"

"ब्राह्मण वाले एक भी लक्षण नहीं है तुम में!"

"कौन सा मुझको पंडिताई करनी है।"

फिर अंश ने सिर्फ़ नाश्ते पर फोकस किया| पेट भर खाया, फिर मम्मी को चिढ़ाने के लिए शोर करती हुई डकार ली| नाश्ता कर के वो टीवी देखने लगा| फिर उसने सोचा मम्मी से अभी बात करना सही रहेगा|

"मम्मी, वो मैंने निदा के बारे में कल बताया था न?"

मम्मी फ्रिज में पानी की बोतलें भर कर रखते हुए बोलीं "हाँ, वही जो वहाँ आने वाली है न?"|

"हाँ, तुम हमेशा कहती हो न कि तुम्हें उस दिन का इंतज़ार है जब मैं तुम्हें किसी लड़की से मिलवाते हुए कहूँगा... मैं इस लड़की से शादी करना चाहता हूँ..."

मम्मी अब तक समझ चुकी थीं कि अंश कहना क्या चाह रहा, फिर भी अंश ने बात पूरी ख़त्म की|

"मैं निदा से शादी करना चाहता हूँ।"

मम्मी ने कोई जवाब नहीं दिया| अंश ने भी सोचा कि उन्हें जो शॉक उसने दिया है वो उस से अभी तक नहीं उबरीं| थोड़ी देर बाद उस से रहा नहीं गया| मम्मी धुले हुए बर्तन रख रहीं थी कि अंश ने वापिस बोला "मैं निदा से शादी करना चाहता हूँ"| मम्मी ने एक स्टील का गिलास गुस्से में घुमा के फेंका उसकी तरफ| अंश ने उसे सोफे पर गिरते हुए हवा में ही पकड़ लिया| फिर सीधे बैठते हुए चिल्लाया "हाउज़ दैट?"| मम्मी को हँसी आ गयी| अंश आँख मारते हुए बोला "हँसी तो फंसी"|

"तुम्हारे पापा मानेंगे?"

"नहीं, पर तुम हो न!"

"न, मुझे फालतू में डाँट नहीं खानी उनसे।"

"कैसी औरत हो तुम... अपने पति को ऊँगली पर नचाना नहीं आता तुम्हें! सीखो कुछ दूसरी औरतों से!"

"अहहाहा... मेरी तो न मेरा पति सुनता है और न ही बेटा!"

"मुझे सुनाई दिया, तुमने जो भी कहा।"

दोनों हँसने लगे| मम्मी ने बताया कि उन्होंने जब कल फोन उठाया था तो निदा ने बोला था कि उसे टाइम मशीन चाहिए| अंश ने तुरंत निदा को फोन किया|

"तुम्हें टाइम मशीन क्यों चाहिए थी?"

"हाहा... आंटी ने बताया क्या तुम्हें?"

"हाँ!"

"यार, जब से तुमने सच बताया है तब से जब भी मैं खाली होती हूँ तो उसी दिन के बारे में सोचती हूँ... तुम्हें कितनी चोट लगी थी उस दिन... मैंने ध्यान भी नहीं दिया था तुम्हारी तरफ़... काश, मुझे पता होता कि तुम आगे चल कर मेरे लिए इतने ज़रूरी होने वाले हो!"

"हाहाहा... कोई नाह!"

"हम्म्म!"

"मम्मी तुमसे मिलना चाहती हैं, आज शाम।"

"क्या!"

"हाँ!"

"सीरियसली?"

"हाँ, तुम्हारी खाला की कसम!"

फिर अंश ने निदा को सारी बात बतायी| फिर शाम को मिलने का बोल कर फोन रखा| फिर पूरा समय मम्मी को निदा के बारे में बताता रहा| उसे क्या पसंद है, वो कितनी बेवक़ूफ़ है, वगेरह वगेरह|

"उसकी कोई फोटो नहीं है?"

"नहीं!"

"क्यों? फोन में उसकी एक भी फोटो नहीं!"

"नहीं है, शाम में सीधे मिल ही लेना... मैं फोन में फ़ोटो-वोटो रखने वाला आशिक़ नहीं हूँ!"

"वॉलेट में फोटो रखने वाले भी नहीं?"

"क्या मम्मी, तुम भी न... नो वे!"

फिर वो दोनों बाकी बातें करने लग गए|

शाम हुई| अंश और उसकी मम्मी फंक्शन में थोड़ी लेट पहुंचे| डॉक्टर खान और बाकी जानने वालों से मिले और अंश के पापा के न आ पाने पर माफ़ी माँगी|

"कहाँ है वो?"

"अरे मम्मी, सब्र रखो!"

"सारी की सारी लड़कियाँ यहाँ गोरी-चिट्टी, जिसको भी देख रहीं हूँ सोचती हूँ कि कहीं यही निदा तो नहीं।"

"हाहाहा!"

"अरे अंश बेटा, क्या हाल? बहुत दिनों बाद दिखाई दे रहे!"

अंश न घूम कर देखा तो निदा के पापा खड़े थे| यूनिवर्सिटी में इतिहास के लेक्चरर थे और उनका खाता अंश की ही पुरानी ब्रांच में था| निदा को जानने से भी पहले से अंश उन्हें एक कस्टमर के तौर पर जानता था|

"अरे अंकल, नमस्ते! मैं तो बढ़िया हूँ, आप सुनाइए? मम्मी के साथ आगया बस इधर। अच्छा हुआ कि आपसे भी मुलाकात होगयी|"

"हम भी बढ़िया... बस खान साहब के बुलावे पर खान साहब को ले कर आगये!"

अंश की मम्मी को हँसी आगयी| अंश को भी मालूम था कि वो किसकी बात कर रहे फिर भी उसने पूछा "मतलब?"|

"अरे, हमारी बिटिया रानी! तुम नहीं जानते उन्हें, मगर किसी साहब से कम मिज़ाज़ नहीं हैं उनके!"

"अच्छा!"

"यहीं कहीं होंगी, रुको, मिलवाता हूँ... वो रही! खान साहब! अरे ओ खान साहब!"

अंश की नज़रें उधर गयीं| इस से पहले की निदा मुड़ती, उसने उसे ढूँढ लिया| निदा धीमे-धीमे क़दमों के साथ उनकी तरफ आई|

"इनसे मिलो, ये हैं अंश त्रिपाठी और उनकी मम्मी... अंश तुम्हारी ही उम्र का है पर पिछले पाँच साल से बैंक में मैनेजरियल पोजीशन्स संभाल रहा!"

अंश की तारीफ सुनते ही उसकी मम्मी ने उसकी पीठ थपथपायी| भारतीय माँ-बाप के लिए उनके बच्चों की बड़ाई से बढ़कर गुरूर करने वाली बात कोई और नहीं होती|

"तुम आंटी जी के साथ रहो, मुझे कुछ बातें करनी हैं अंश से कुछ इंवेस्टमेंट्स को ले कर... आप दोनों लोग बेवज़ह बोर होंगे।"

सब हँसने लगे| फिर अंश की मम्मी और निदा वहाँ से चले गए| निदा के पापा और अंश आपस में बात करने लगे| थोड़ी देर बाद अंश को उसकी मम्मी और निदा दूर पर एक दुसरे से हँस-हँस कर बात करते हुए दिखे| अपनी ज़िन्दगी में सबसे ज़्यादा मायने रखने वाली दो औरतों को साथ देख उसे बेहद अच्छा लग रहा था| वो दोनों ही बेहद ही खूबसूरत लग रहीं थीं| वो लगातार उन्हें ही देखे जा रहा था| उसे फोटो वगेरह खींचने का ज़्यादा शौक कभी नहीं था पर उसने अपना फोन निकाला और एक फोटो क्लिक की| निदा के पापा ने पूछा "भाई, किसकी फ़ोटो खींच रहे?"|

"मम्मी की!"

रात काफी हो चुकी थी तो मम्मी ने आ कर कहा अंश से चलने को| अंश ने भगवान को मन ही मन शुक्रिया बोला वरना निदा के पापा उस से सारी भारतीय अर्थव्यवस्था का कांसेप्ट समझ लेते| एक तो इतना बोरिंग टॉपिक और ऊपर से वो निदा से बिलकुल भी बात नहीं कर पाया था| फिर भी वो इस बात से खुश था कि मम्मी और निदा की मुलाकात अच्छे से होगयी| सभी लोगों से मिल कर वो और उसकी मम्मी वापिस आने लगे| अंश ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए ही पूछा "कैसी लगी?"|

"बेहद अच्छी! तुम्हारी चॉइस हमेशा से ही कमाल रही है!"

"आखिर सीखा किस से है परखना, तुमसे!"

"रहने दो, अब मक्खन नहीं भी लगाओगे तो भी चलेगा, मैं तो मान ही चुकी हूँ... अपने पिताश्री के लिए बचा के रखो, काफी लगाना पड़ेगा।"

दोनों हँसने लगे| तभी अंश के फोन पर एक मेसेज आया| उसने एक हाथ से स्टेयरिंग सँभालते हुए मेसेज पढ़ा| मम्मी ने डाँटा और सामने ध्यान देने को बोला|

"निदा का मेसेज था!"

"क्या कह रही?"

"तुम्हारे बारे में कुछ कह रही।"

"सास की बुराई अभी से चालू?"

"हाहा... नहीं, तुम्हारी बड़ाई कर रही।"

"इतना मक्खन एक दिन में! कहीं मैं फिसल न जाऊँ! वैसे कहा क्या?"

"तुम हमेशा सही कहते थे कि योर मॉम इज़ द कुलेस्ट मॉम एवर।"

मम्मी ने गाड़ी में पड़े अंश के गॉगल्स लगा कर कहा "ऑटोग्राफ चाहिए?"|

अंश ज़ोर से हंसने लगा|

"यार मम्मी, पर मैं उस से नहीं मिल पाया!"

"तुम हर दुसरे वीकेंड पर कहाँ रहते हो वो बताया उसने मुझे... और कितना मिलना है!"

"तुम नहीं समझोगी मम्मी... कुछ कुछ होता है!"

अंश ने हँसते हुए कहा|

"माँ सब समझती है, इसीलिए कल निदा को घर पर बुलाया है।"

"सच्ची!"

"मुच्ची! निदा की लखनऊ वाली खाला की कसम!"

दोनों ही ज़ोर से हँसे इस बात पर,फिर अंश ने लड़की की आवाज़ में गाना शुरू कर दिया|

"तू कितनी अच्छी है, तू कितनी भोली है..."

"बस भी करो अब... न गाने का कितना लोगे?"

"... ओ माँ... ओ माँ..."

"हँसते-हँसते मेरा पेट दर्द होने लगा... बस करो अब!"

एक और मेसेज आया अंश के मोबाइल पर|

"तुम गाड़ी चलाओ, मैं देखती हूँ!"

"अरे... रहने दो..."

"उधर से गुड नाईट बोला गया है बहुत सारे किसिंग स्माइलीज़ के साथ!"

अंश ने कुछ नहीं बोला, बस शर्मा कर मुस्कुराते हुए सामने की ओर देखता रहा| मम्मी ने मेसेज कैन्सल किया तो फोन में खुद की फोटो का वॉलपेपर देख के दंग रह गयीं|

"ये मेरी फोटो कब खींची तुमने?"

"बस आज ही!"

"सुबह वाली बात पे!"

"नाह... बिकॉज़ आई लव यू!"

मम्मी कुछ नहीं बोलीं| बस अंश के सर पर प्यार से हाथ फेरा|

"टाइम क्या हो गया?"

"बारह बज गए, क्यों?"

"हैप्पी मदर्स डे मम्मी!"

"थैंक यू बेटा!"

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माँ को कभी किसी ज्योतिषी ने बताया था कि उनके बेटे की कुंडली में मृत्युयोग तीन बार था। माँ भोली थी तो डरती थी। डरती थी तो पूजा भी करती थी। जब वह आठ साल का था तो बीमार पड़ा था। किसी भी दवा ने असर करना बंद कर दिया था। हर बदलते डॉक्टर के साथ दवा का दाम तो बढ़ता पर हालत और ख़राब होती जाती। माँ तब भी पूजा करती थी। पहली बार में तो उसने नियति को अपने विश्वास से हरा दिया। पर उसने पूजा करना बंद नहीं किया। उसके विश्वास की परीक्षा अभी दो बार और होनी थी। वह अपनी माँ पर हँसता था। वह कहता कि धर्म और भगवान झूठ हैं। माँ उसे हँसते देख कर हँसती। उसे कौन सा अपनी ममता का रिसर्च पेपर छाप कर नोबेल प्राइज जीतना था।

सड़क के किनारे भीड़ लगी हुई थी। एक तेज़ निकलती हुई गाड़ी ने उस माँ के बेटे को टक्कर मार दी थी। करीब तेरह फुट ऊपर उछल कर उसका शरीर सड़क के किनारे आ गिर पड़ा। शरीर में क्या-क्या टूटा था यह तो देखने पर पता नहीं चल रहा था पर, हाँ, चेहरे के बायीं तरफ से काफी खून बह रहा था। थोड़ी दूर पर पान की गुमटी से रेडियो पर बजते हुए कुमार सानू के गाने की आवाज़ भी आ रही थी। वह गाना उसे पसंद था। "तेरे दर पर हम सनम चले आये, तू न आया तो हम चले आये..."। टक्कर इतनी भयानक थी, चोट इतनी ज़ोरदार थी कि उसे कुछ नहीं याद आ रहा था। वह किस लिए वहाँ पर आया था, वहाँ क्या कर रहा था और उसके साथ कोई और भी था क्या? बस, माँ याद थी। वह बचेगा भी या नहीं? यह शहर तो उसका नहीं लग रहा। अपने शहर से इतनी दूर वह यहाँ क्या कर रहा था? यह बस एक दुर्घटना थी या उसकी आत्महत्या करने की कोशिश? सब उसे देख रहे और वह रास्ते में गिरा पड़ा हुआ था। कहीं उसे लोग पिया हुआ तो नहीं समझ रहे? उसने उठ खड़े होने की कोशिश की पर उसका शरीर उसे महसूस ही नहीं हुआ। कहीं वो मर तो नहीं गया? जैसा फिल्मों में होता था कि आत्मा शरीर मरने पर भी कुछ देर तक आस पास की चीज़ें देखती रहती है। तभी दूर कहीं से एम्बुलेंस की आवाज़ सुनाई दी। भीड़ एक तरफ से खाली हुई। चार लोग स्ट्रेचर लेकर उसकी तरफ भागते हुए दिखाई दिए। उनमें से एक ने जब उसको उठाने के लिए हाथ लगाया तो उसे महसूस हुआ कि वह अभी भी ज़िंदा था। अगले ही पल उसे इतना दर्द महसूस हुआ कि वह ज़ोर से "माँ" चिल्ला, माँ को अपने पास बुला लेना चाहता था। पर आवाज़ निकली ही नहीं। वह नहीं बचेगा। थोड़ी देर में एम्बुलेंस चल चुकी थी।

माँ को पता चलेगा कि उसका बेटा नहीं रहा तो उस पर क्या बीतेगी? माँ को तो पता ही नहीं कि वह यहाँ आया था। पापा को कैसा लगेगा जब उन्हें पता चलेगा कि किस वज़ह से आज वह इस हालत में पहुँचा। वह फोन करना चाहता था। कहीं ऐसा न हो कि वह हॉस्पिटल पहुँचने से पहले ही मर जाए। मगर सोचते दिमाग के अलावा उसका कोई भी शरीर का हिस्सा काम नहीं कर रहा था। थोड़ी देर में अस्पताल आ गया। हो क्या रहा था, यह उसके समझ से परे था। बीच-बीच में उसे बस इतना सुनाई देता "आई सी यू", "खून बहुत बह चुका", "समय नहीं है"। हाँ, समय नहीं था। शायद माँ के भगवान के साथ-साथ समझदारों का विज्ञान भी घुटने टेक देने वाला था। वह बचना चाहता भी था या नहीं, उसे यह भी नहीं पता था। पर माँ के लिए उसे बुरा लग रहा था। जिस लड़ाई को लड़ने के लिए उसने अपनी ज़िन्दगी के बीस साल लगा दिए, वह उसे हारने वाली थी। खैर, माँ को अक्ल तो आएगी ही कि धर्म और भगवान हमेशा से ही झूठ थे। थोडा समय बचेगा उनका।

वह यह सब सोच ही रहा था कि उसे एक लड़की उसकी तरफ आती दिखाई पड़ी। पता नहीं क्यों उस लड़की को देख कर उसे अच्छा लगा। उसे लगा कि शायद उसका दर्द हल्का सा कम हो गया था। वह उसके करीब तक पहुँची तो वह बोल पड़ा "आई लव यू"। शायद दर्द इतना बढ़ चुका था कि उसे इस बात की समझ ही नहीं थी कि वह कब क्या कर रहा था। लड़की ने ध्यान से उसकी तरफ देखा। उसके खून से लतपथ चेहरे को देख वह डर गयी। फिर अचानक ही उसे किसी ने पुकारा "अरे निदा, तुम को मैंने कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा!"। जिस तरफ से वह आवाज़ आई वह लड़की उस तरफ चली गयी। अच्छा, तो उस लड़की का नाम 'निदा' था। नाम से उसे याद आया कि उसका भी तो कुछ नाम होगा। कौन था वो? तभी उसने देखा कि एक नर्स उसकी तरफ चलती हुई आई और उसको ले कर आने वालों से उसके बारे में पूछा। उन लोगों ने उस नर्स को क्या-क्या बताया यह उसे समझ नहीं आया पर उसका पर्स से उसका कोई कार्ड निकाल कर किसी ने ज़ोर से उस पर लिखा हुआ नाम पढ़ा।

"अंश त्रिपाठी!"

खुद का नाम सुनते ही उसमें जैसे जान आ गयी। अंश त्रिपाठी की कहानी ऐसे ख़त्म नहीं होगी। वह खुद अपनी कहानी बनाता था। अपनी कहानी के साथ-साथ औरों की भी। भगवान पर तो उसे भरोसा नहीं था पर भगवान बनना उसकी हॉबी थी। इस अस्पताल में जितनी दवाइयों के पैकेट नहीं बिकते थे, उससे कहीं ज़्यादा उसके शहर में उसकी सलामती के लिए दुआ में जुड़ते-उठते हाथ थे। तीन तो क्या तीस मृत्युयोग भी उसकी टेढ़ी सी मुस्कान के आगे हार जाते। वह शाहरुख़ खान का फैन था। और पिक्चर अभी बाकी थी, मेरे दोस्त!

दूसरी बार मौत को हराने में उसे तीन ही दिन लगे। जब उसे होश आया तो टूटी हुई टाँग पर नज़र गयी। ठीक बगल में कुर्सी पर बैठी थी दुनिया की सबसे सुन्दर औरत- उसकी माँ। वह मुस्कुराई- शायद अपनी जीत पर या उसे आये होश पर। माँ बनाम नियति का स्कोर 2-0 हो चुका था।

"हम जल्दी ही यहाँ से निकल चलेंगे!"

माँ की आवाज़ और उनका इतना कहना दवाइयों के असर से काफी ज़्यादा था।

आठ हफ़्ते बीत चुके थे। अंश अपने शहर तो वापस आ चुका था पर उस शहर से काफी हिसाब बाकी रह गए थे।


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