''नहीं, नहीं। शायद आपको कोई गलतफहमी हुई है.....मैं..मैं तो सीधा-सादा सा इन्‍सान हूं। मैं भला किसी का मर्डर कैसे कर सकता हूं ?'' मैं पुलिसवाले के सामने मिमिया रहा था।

''नहीं..झूठ बोलते हो तुम। तुमने डिकॉस्‍टा का मर्डर किया। उसकी लाश हमने बरामद कर ली है। उसके जेब से एक ही कागज का टुकड़ा मिला है, जिस पर लिखा है नाम। तुम्‍हारा नाम मिस्‍टर शैलेष !'' पुलिस वाले ने लगभग चिल्‍लाते हुए कहा। उसकी चिल्‍लाहट ने मुझे अन्‍दर तक हिला दिया।

''नहीं..नहीं। सर प्‍लीज सुनिये। कोई मिसअण्‍डरस्‍टेण्डिंग हुई है शायद...'' मैंने दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना की।

''अबे चोप्‍प्‍प...। पुलिस को घुमाता है क्‍या ? डिकॉस्‍टा का मर्डर हुआ। मर्डर तूने किया। अभी क्‍वेश्‍चन ये है, कैसे किया..बोल..बोल हरामजादे।' अब पुलिसवाले का पारा हाई होने लगा था।

मेरे हाथ जुड़े थे और मैं ना में गर्दन हिला रहा था। पुलिसवाला मेरे दीन-हीन हावभाव से पूरी तरह बेअसर था। उसने अपने पुलिसिया रूप में आते हुए अपने हाथ को मेरी गर्दन में अजगर की तरह लपेटा और कुटिलता से बोला, ''देख मर्डर किया ये तो फाईनल है। बट मर्डर कैसे किया ये ढूंढना पुलिस का काम। तुने उस बेवड़े डिकॉस्‍टा को जब चाकू घौंपा तो ब्‍लड का फव्‍वारा निकला होगा...है कि नहीं...कपड़ों पर खून भी लगा होगा। है कि नहीं ? उन कपड़ों को तुमने छिपा दिया होगा। बोल कहां छिपाया..।'' मेरी घिग्‍घी बंध गयी।

''सुन बे।'' वह बोलता गया, ''सबूत तो हम पाताल से भी निकाल लायेंगे...अब देख तू कैसे नहीं बोलता।' 'ऐसा कहते हुए उसने अपने मोटे हाथ से एक चांटा मेरे कान पर मारा। अचानक से हुए इस वार से मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। चांद-तारे से कौंधने लगे। अचानक पानी की एक तेज बौछार से मैं वापिस होश में आया।

रात के तकरीबन दो-सवा दो बजे होंगे। कुत्‍तों की समवेत आवाजें कंक्रीट के जंगल जैसे शहर की खामोशी में सिहरन उत्‍पन्‍न कर रही थी। मेरे घर के आगे पुलिस की जीप खड़ी थी। अन्‍दर दो सिपाहियों के सामने मैं दीन-हीन सा दया की भीख मांग रहा था। पुलिसवालों के बदन से शराब की लपट उठ रही थी। मेरे ड्राईंगरूम में उमस थी। नम वातावरण में जैसे जहर तैर रहा था। मैं कसमसा रहा था और वे यमदूतों की तरह मेरी छाती पर चढे थे।


मैं रोना चाहता था, लेकिन मेरा पुरूष होना मुझे रोने नहीं दे रहा था। रूवांसे होने की स्थिति थी। मैं बार बार 'नहीं, नहीं। मुझे छोड़ दो। मुझे छोड़ दो।' कह रहा था जिसका उस पर कोई असर नहीं हो रहा था।

''ज्‍यादा शरीफ बनने की जरूरत नहीं है। देख । ये हाथ देख। इससे मैंने कई हत्‍यारों की हडिडयां चूर चूर की है। दो-एक को तो...'' बोलते हुए उसने उपर देखते हुए सीटी की आवाज निकाली। इसका मतलब था कि वह एक-दो को तो जान से भी मार चुका था। मैं थर थर कांपने लगा।

'अब बोलेगा या बुलवाना पड़ेगा...।'' उस काले से पुलिसवाले ने मेरे भय को भयानक के स्‍तर तक पहुंचाते हुए एक झन्‍नाटेदार थप्‍पड़ मेरे गाल पर रसीद कर दिया। मेरी आंखों के आगे घोर अंधेरा छा गया। मुझे बचपन से लेकर जवानी तक किसी ने थपकी तक नहीं मारी थी। अब इतना भयानक वार ! मैं असहाय सा घुटनों के बल बैठा हाथ जोड़े था।

'बोल..क्‍यूं किया मर्डर...बोल। क्‍या दुश्‍मनी थी तेरी डिकॉस्‍टा से ? देख एक बार बता दे। अगर थाने ले गये तो फिर वहां से चार कंधों पर ही निकलेगा।'' लगभग चिल्‍लाते हुए उसने मेरे बाल पकड़ कर आगे-पीछे हिलाया। मैं दर्द से कराह उठा।

''सर मैं नहीं जानता कौन डिकॉस्‍टा। मैंने डिकॉस्‍टा को नहीं मारा..मैं..मैं..'' मैं कुछ बोल ही नहीं पा रहा था। अचानक दूसरे पुलिसवाले ने मेरी पिण्‍डली पर लाठी का जोरदार वार करते हुए कहा, ''ये ले। ऐसे बोलेगा तू..' मैं बिलबिला उठा, ''अम्‍मा...''

मैंने उसके पैरों पर अपना सिर रखा। गिड़गिड़ाया, ''सर..सर प्‍लीज आप..आप मेरी बीबी से पूछ लीजिये। मेरी बिटिया से पूछिये। मेरी अम्‍मा भी हैं। उनसे पूछ लीजिये। मैं...मैं तो बहुत शरीफ आदमी हूं। सर। प्‍लीज सुनिये। सर, मैं शराब तो क्‍या, बीड़ी-सिगरेट भी नहीं पीता।'' मेरे गिड़गिड़ाने पर पुलिसवाले ने मेरी कॉलर पकड कर एक झटके में मुझे उठाया और कड़कदार आवाज में बोला, ''बुला। बुला तेरी अम्‍मा को। तेरी बीवी को। तेरी बेटी को।''

'हां..हां...सर थेंक्‍स सर। थैंक्‍स...मैनी मैनी थैंक्‍स...मैं...मैं अभी बुलाता हूं।' मैं फुर्ती से कमरे के अन्‍दर जाकर अम्‍मा को उठाने लगा। अम्‍मा थी कि उठने का नाम ही नहीं ले रही थी। मैं अम्‍मा को जोर-जोर से हिला कर उठाने की कोशिश कर रहा था। पर सब व्‍यर्थ। अम्‍मा रोज मुझे उठाती थी। आज मैं जागा हुआ था। खुद उस समय सो रही थी जब बेटे को सबसे ज्‍यादा जरूरत थी।

बदहवास सा मैं अम्‍मा को छोड बैडरूम में भागा। बीवी सोई थी। बीवी को उठाने लगा। वो भी बेसुध सी थी। मैं उसे झिंझोड़ रहा था। मैं हैरान था कि उसके पति की जान पर बन आई है और वो नींद के आगोश में बेहोश सी पड़ी है। इस बीच पुलिसवाले की गुर्राहट फिर सुनाई दी, 'अरे ओ लफंगे। हमको बेवकूफ बना रहा है क्‍या ? एक एक मिनिट की देरी तुझे भारी पडेगी। सुन रहा है ना साले ?

मैं भयभीत तो था ही अब थाने में पड़ने वाली अमानवीय पिटाई के संकेत से और भी कांपने लगा। इधर पत्‍नी उठने का नाम तक नहीं ले रही थी। बदहवासी की अवस्‍था में ही मैंने मटकी से एक लोटा पानी भरा। जल्‍दी से पत्‍नी के चेहरे पर छपाक से डाल दिया। वह फिर भी नहीं उठी। मैं भयाक्रान्‍त हो उठा। झटपट पत्‍नी के गालों को जोर-जोर से थपकाया। उसकी आंखों की पलको को अपनी अंगुलियों से उठाया तो देखा...वहां पुतलियां थी ही नहीं । सीने में धड़कन भी नहीं। कुछ भी नहीं। मैं रोने लगा। अचानक दोबारा अम्‍मा का ख्‍याल आया। अम्‍मा की तरफ आया। अम्मा की काया भी निस्‍तेज थी। बिन सांस। मरी हुई। मैं जोर-जोर से रोने लगा।

अचानक बिटिया का ख्‍याल आया। तेजी से उसके कमरे की ओर भागा। बिटिया वहां पर नहीं थी। बेटू-बेटू...आवाज लगाता हुआ मैं एक कमरे से दूसरे कमरे तेजी से आ जा रहा था। बेटू कहीं नहीं मिली। किसी अनजाने डर से मैं सिहर उठा। मैं बेटू का नाम लेकर अपना सिर-छाती पीटने लगा। मेरा सब कुछ लुट चुका था..सब कुछ।

मैं हार चुका था। मैंने अपने जीवन में किसी को एक थप्‍पड तक नहीं लगाई थी। अब मैं हत्‍या के आरोप में अपने जीवन को एक हत्‍यारे के रूप में किसी काल कोठरी में भुगतने वाला था। मैं नहीं जानता था कि डिकॉस्‍टा कौन था। पुलिसवाले मुझसे क्‍यों पूछ रहे थे। शायद मैं किसी साजिश का शिकार हो रहा था। स्थितियां मेरे प्रतिकूल थी। मेरे पास इस भीषण परिस्थिति और आरोप का कोई जवाब नहीं था।

लडखडाये कदमों से मैं वापिस बैठक में आया। पुलिसवाले मेरा इंतजार कर रहे थे। मैं हारा हुआ सा उनके सामने आ खड़ा हुआ। अचानक मेरी दाहिनी तरफ कुछ हलचल हुई। बिटिया की झलक नजर आई। मेरी निढाल काया में हल्‍की सी हरकत हुई। मैं जल्‍दी से उसकी ओर बढा...दो कदम ही बढाये थे कि दूसरे पुलिसवाले ने मुझे रोक दिया। मैं ठिठका। बिटिया पुलिसवाले के पीछे से आगे निकल कर आई। उसके हाथ में कपड़े थे। खून से सने हुए। वह बोली, ''पप्‍पा। इन कपड़ों पर खून क्‍यों लगा है ? आपने किसका मर्डर कर दिया ?..बोलो। बोलो पप्‍पा......'' बेटी के प्रश्‍नों ने उसके जीवित होने की खुशी काफुर कर दी। मैं कुछ न बोल सका। मुझे लगा शायद मुझे याद नहीं रहा होगा। मैंने ही किसी डिकॉस्‍टा नामक शख्‍स को मारा होगा। तभी ये सब कुछ हो रहा है।

पुलिसवाले ने कुटिल और विजयी मुस्‍कान के साथ मुझे देखा। दूसरे पुलिसवाले ने झटके से मेरे दोनों हाथों को पीछे किया और हथकडी में जकड़ दिया। मैं असहाय था। असहाय नजर से ही बिटिया को देखा। पुलिसवाला मुझे आगे धकेल रहा था। मेरे कदम जैसे जमीन पर चिपक गये थे। मुझे धकेलते हुए मेरे पीछे चल रहे पुलिसवाले ने कड़कते बूट से मुझे लात मारी और.......

.....मैं बदहवासी में चिल्‍ला कर उठ गया। चेहरे पर मौत का भय। ललाट पर पसीना।

''क्‍या हुआ ?'' पत्‍नी भी झटपट उठी। मेरे माथे पर अपना नर्म हाथ फेरा। उसे जीवित देख कर मुझे अच्‍छा लगा।

''कुछ नहीं....'' कहते हुए मैं जल्‍दी से अम्‍मा को संभालने चला। अम्‍मा सो रही थी। उनके सांसों की आवाज से मेरी सांस में सांस आई। तभी बिटिया भी दौड़ती हुई आई। मासूम सा चेहरा लिये बोली, ''क्‍या हुआ पप्‍पा ? बुरा सपना देखा ?''

मैं मुस्‍कुराया। बिटिया के हाथ में खून से सने कपड़े नहीं थे।


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