स्त्री, तू सबसे बड़ी अछूत!

‘तू अछूत है मेरे घर मत आना ...|’

--आखिर तूने खानदान की नाक कटा दी न ....|

‘’मुझे तो पहले से मालूम था ये लड़की कोई न कोई गुल खिलाएगी |’’

‘अरे,किया भी तो कहाँ...कोई ढंग का लड़का नहीं मिला क्या इसे ...?’

तमाम विष बुझे तीरों को झेलती शीला सिर झुकाए उस दहलीज पर खड़ी थी ,जिसे कल तक वह अपना घर समझती रही थी |पर कब था यह उसका घर ?इस घर के सदस्यों ने तो कभी उसे समझने का प्रयास नहीं किया था ,फिर आज कैसे करते ?आज तो उसने ऐसा काम कर दिया है,जिसे बड़े से बड़े प्रगतिशील भी सिर्फ भाषणों तक सीमित रखते हैं |

उसने एक अछूत लड़के से विवाह कर लिया था और माँ का आशीर्वाद लेने घर की दहलीज पर आ खड़ी हुई थी |पिता जिंदा होते तो वह घर आने को सोचती भी नहीं |वे तो जाति-धर्म के मामले में बिलकुल ही पुरातन पंथी थे |माँ भी छूत-अछूत का ध्यान रखती थी |हाँ ,वह उतनी कट्टर नहीं थी|पर परिवार के सामने उसकी बोलती बंद थी |उसने सोचा ,अच्छा हुआ कि जरूरी काम औचक आ जाने के कारण राम उसके साथ नहीं आ पाए ,वरना जाने क्या होता ?|वह तो खुद भी नहीं आना चाहती थी ,पर राम ने जबरदस्ती उसे यहाँ भेजा था |राम का अपने ऊपर अतिरिक्त आत्मविश्वास उसे हमेशा संकट में डाल देता है|वे कहते—मुझमें कमी ही क्या है ,जो तुम्हारे घर वाले मुझे स्वीकार न करेंगे |पढ़ा-लिखा हूँ, अफसरों के परिवार से हूँ |ठीक है सुंदर नहीं दिखता और ढंग की नौकरी भी नहीं करता,पर तुम्हें इसकी कोई जरूरत भी तो नहीं |
अब वह उन्हें क्या बताती कि इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करने के बाद भी हमारा मध्यवर्गीय समाज जाति-धर्म के मामले में पंद्रहवीं सदी में ही जीता है |
वह विचारों में खोई खड़ी थी कि भाई दुकान से आ गया |उसे देखते ही गुस्से से बोला—अरे,तुम यहाँ कैसे चली आई ?चल भाग यहाँ से !कुलबोरनी कहीं की !हमारे लिए मर चुकी है तू |पहले ही क्या कम गुल खिलाए थे कि अछूत से विवाह कर हमेशा के लिए हमारा सिर नीचा कर दिया ?
अपमान के घूंट पीती उसने आँसू भरी आँखों से माँ की तरफ देखा |माँ के भारी चेहरे पर ममता की कंपकंपाहट थी ,पर भाइयों से टकराने का साहस न था ...और वह वापस अपने घर लौट आई थी |
घर ...हाँ घर ही कहती थी वह उसे |किराए का एक कमरा,जिसका किराया देते समय अक्सर वह गुस्से से भर उठती थी |उसकी छोटी सी नौकरी थी ,जिसकी तनख्वाह मात्र दो हजार थी |पहले पाँच सौ किराया और हजार के लगभग खाना खर्चा व बाकी खर्च करके वह लगभग पाँच सौ प्रतिमाह तो बचा ही लेती थी पर जब से राम साथ हैं कुछ नहीं बचता |उनके खर्चे भी उसमें जुड़ गए हैं |
राम के घरवालों ने भी उसकी शादी को स्वीकार नहीं किया |वहाँ जाति का नहीं, जायजाद का मामला था |शायद उन्हें लगता था कि राम के कारण वह उनकी संपत्ति की हिस्सेदार बन जायेगी | विशेषकर तब ,जब इस विवाह से कोई संतान हुई |इसलिए उनकी डाक्टर बहन ने उसके बीमार होने पर जाने कौन सी दवा खिलाई कि उसका मिस कैरिज़ हो गया| राम ने नाराजगी में उसके साथ घर छोड़ दिया |वे अपने घर वालों को धन-पिपासु कहा करते थे |पिता को धृतराष्ट और बहन को स्वार्थी |उन्होंने घर आना-जाना बिलकुल छोड़ दिया |अब रात-दिन मशक्कत करके वह गृहस्थी की गाड़ी खींचने लगी |विवाह से पूर्व की सहानुभूति वह खो चुकी थी |उसे याद है राम खुद रहने के लिए किराए का मकान नहीं ढूंढ पाए थे |उनकी जाति सुनते ही लोग बहाना बना देते |जब उसने खुद मकान ढूँढा तो सिर्फ यही बताया कि अपने पति के साथ रहेगी| मकान मालिक उसकी जाति जानता था,इसलिए मकान दे दिया |यह बात उसने राम को नहीं बताई ,नहीं तो वे मकान मालिक से झगड़ पड़ते |ये सिर्फ कम पढे-लिखों व सनातनी लोगों से प्राप्त अनुभव नहीं था |कई पढे-लिखे लोगों ,यहाँ तक कि कई साम्यवादी विचारधारा वालों ने भी उससे कहा-आपने यह अच्छा नहीं किया |मित्रता तक ठीक था ,पर विवाह!यह सामाजिक चीज है |इसमें जाति,कुल,गोत्र का ध्यान रखना जरूरी है |
उसे आश्चर्य हुआ था कि मंच से ये ही लोग कितनी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं |जाति ,धर्म से बाहर विवाह करने का आह्वान करते हैं ,पर बात जब अपने पर आती है,वे घोर पारंपरिक हो जाते हैं |उसने लड़की होकर इसे सच कर दिया था,इससे वे खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे |सभी अजीब नजरों से उसे घूरा करते |एक बार माँ उससे मिलने आई और बोली –तू चाहे तो अकेले कभी-कभार घर आ सकती है,पर इस शादी की बात छिपाना |नहीं तो तुम्हारे भतीजे-भतीजियों की शादियाँ नहीं हो पाएगी |मान लो राम की जाति छिपाकर हम इस शादी के बारे में रिश्तेदारों को बता दें ,पर यह छिप नहीं पाएगा क्योंकि उसकी शक्ल-सूरत से ही उसकी जाति लोग जान जाएंगे |वैसे भी तूने शादी का फोटो अखबार में छपवा दिया था ,एकाध लोगों ने पहचान लिया था तुम्हें |मुझसे पूछा तो मैंने साफ मना कर दिया |होगी कोई लड़की मिलती –जुलती |तुम भी एक से एक बुद्धिमानी करती ही रहती हो | क्या जरूरत थी फोटो छपवाने की ?
अब वह माँ को क्या बताती कि राम के एक पत्रकार मित्र ने अपनी मर्जी से ये कर दिया था और इसमें बुराई क्या है ?जब विवाह किया है तो छिपाना क्यों ?पर माँ की बात भी ठीक थी |उसके कारण माँ के अन्य बेटे-बेटियों के परिवार के सामने सामाजिक समस्याएँ आ सकती थीं |समाज तो नहीं बदला था विशेषकर उसका वर्णिकों का समाज-जहां आज भी धन की पूजा होती है |जहां आडंबर और दिखावा ज्यादा है |उसने माँ से कह दिया –आपको जो ठीक लगे ,कर लीजिएगा |जो छिपाना-बताना हो ,अपने परिवार के भले की दृष्टि से कर लीजिएगा |
उसने माँ को आश्वस्त किया कि वह राम के साथ कभी उनके घर नहीं आएगी |फिर भी जाते-जाते माँ ने एक सलाह दी—वैसे ही उसके साथ रह लेती ,वह फिर भी ठीक था |तुम्हें शादी नहीं करनी चाहिए थी |पर आगे एक बात गाँठ बांध लेना कि कोई बच्चा न हो |नहीं तो जिंदगी भर ताना सुनोगी ‘..अछूत ... के जनमल ....|’बच्चे की भी जिंदगी बरबाद हो जाएगी |उसकी शादी होनी मुश्किल हो जाएगी ....|
उसका मुख विवर्ण हो गया |माँ द्वारा भविष्य के खींचे गए चित्र इतने भयावह थे कि एक पल को उसे लगा –क्या सच ही उससे कोई बड़ी भूल हो गयी है ?
पर माँ के जाते ही वह सामान्य हो गयी |उसने राम से माँ से हुई वार्ता के बारे में कुछ नहीं बताया |वे विश्वास भी नहीं करते |वे तो बड़े प्रसन्न थे |सबसे कहते फिर रहे थे कि उनके ससुराल पक्ष ने इस शादी को स्वीकार कर लिया है |अपने ऊपर उन्हें गर्व हो रहा था |वे तो अति उत्साह में दूसरे ही दिन ससुराल जाने को तैयार थे,पर उसने मना कर दिया कि अभी नहीं |अभी नहीं ....मतलब कभी नहीं था |क्योंकि वह जानती थी कि यह असंभव था |
अब वह चाहती थी कि राम के घर की ही सदस्य बन जाए ,पर वे लोग भी उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे |उनके अनुसार राम ने उससे शादी करके गलत कार्य किया है |राम की माँ ने कहा-वैसे ही रह लेते साथ ।शादी की क्या जरूरत थी ?वह सोचने लगी –क्या सारी माएँ एक ही तरह सोचतीं हैं ?राम अपने घर आते-जाते ,उनकी स्थिति में कोई फर्क नहीं आया था, पर वह दोनों परिवारों द्वारा उपेक्षित थी ,जैसे सारी गलती उसी की हो |हर गलती का ठीकरा लड़की के सिर पर फोड़ने की परंपरा जो है |दोनों कुलों की लाज निभाने की ज़िम्मेदारी जिसके कंधे पर हो ,वही इस तरह के कदम उठाए तो भुगतना तो उसे ही पड़ेगा |
राम उसकी परेशानियों को छोटी-मोटी बात कहकर टाल दिया करते |वे कम्यूनिस्ट थे |देश व समाज को बदलने का सपना देखते थे |उन्होंने लंबा पार्टी जीवन जिया था |अच्छी-अच्छी नौकरियाँ छोड़ दी थीं |पूरा समाज ही उनका घर था |निजी संपत्ति के वे विरोधी थे और स्त्री ,दलितों के पक्षधर |भाषण देने में उनका कोई जबाव नहीं था |उनके प्रगतिशील विचारों से ही वह प्रभावित हुई थी पर विवाहोपरांत उनकी समाज सेवा उसे खलने लगी |दोनों परिवारों ने उसे छोड़ दिया था और वह अकेले ही सब कुछ झेल रही थी |राम का झोला हमेशा तैयार रहता |देर रात तक बाहर रहते |सुबह होते ही चल पड़ते |वह अकेलेपन से त्रस्त रहती |राम को इस बात की कोई चिंता नहीं रहती थी कि वह गृहस्थी की व्यवस्था कैसे कर रही है ?घर चलाने के लिए उसे कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं ?कैसी-कैसी नजरों का सामना करना पड़ता है ?कैसी-कैसी अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ता है |राम थके हुए घर आते ,खाना खाते और सो जाते और वह रात भर करवटें बदलती रहती |उससे बातें भी नहीं करते |कभी नहीं पूछते कि सब कुछ कैसे चल रहा है ?वह तनावग्रस्त रहने लगी |जब तनाव ज्यादा बढ़ जाता ,वह राम से लड़ पड़ती ...बहुत कुछ कह जाती |राम चुपचाप सुनते ...कुछ न कहते पर उस दिन रात को लौटते ही नहीं |फोन भी नहीं करते |उसकी परेशानी और बढ़ जाती |रात आँखों में काट देती |कई निर्णय लेती,पर उनके लौटते ही उस पर अमल नहीं कर पाती |वे बड़े सामान्य ढंग से बातें करते और रात न लौट पाने का कोई बहाना बना देते |वह चुप रहती |उसे लगने लगा था कि वे उसकी कमजोरी बन गए हैं |अकेले रहने की कल्पना से भी उसे डर लगता |कम से कम वे रात को तो घर में रहते हैं |जिस दिन वे रात को बाहर रहते उसकी हालत पागलों –सी हो जाती |
कभी-कभी वह सोचती स्त्री पुरूष के सामने इतनी कमजोर क्यों हो जाती है ?वह आत्म-निर्भर थी ।गृहस्थी उसकी अपनी भी |इसका तिनका-तिनका उसने खुद जोड़ा था |राम ने तो इसे बनाने में हाथ तक नहीं लगाया था ,फिर राम के सामने वह इतनी कमजोर क्यों पड़ जाती है ?जिस अकेलेपन से बचने के लिए उसने विवाह किया था,वही दूर नहीं हो पा रहा था |इस विवाह से सिवाय उदासी,उपेक्षा,टूटन और बदनामी के कुछ हाथ न आया था |
राम को उसके साथ देखकर कोई भी चौक जाता |कई लोग अकेले में यह पूछने से बाज नहीं आते कि आखिर आपने क्या देखा उनमें ?उच्च शिक्षिता,सुदर्शना,आत्मनिर्भर व उच्च जाति की थीं|आपको तो एक से एक वर मिल सकते थे |फिर क्यों एक बदसूरत ,बेरोजगार दलित युवक को चुना ?क्या आपको इनसे प्यार हो गया था ?
प्यार ......|वह हँस कर टाल जाती |अब कैसे बताती वह कि किस प्यार ने उसको राम के करीब किया |वह प्यार ही तो था ,जिसकी असफलता ने उसे इस भंवर में डाल दिया था |
युवा....सजीला ...भव्य व्यक्तित्व का स्वामी....प्रगतिशील विचारों वाला महीप ....कितना चाहती थी वह उसे |उसके कारण ही तो उसने आजीवन विवाह न करने का निर्णय लिया था |वह भी तो उससे प्यार का दम भरता रहा पर वह छली था ...अंदर से खोखला था |जाति-धर्म का विरोध करने वाले उसके महीप ने अंतत:अपनी ही जाति की कमउम्र लड़की से विवाह कर लिया |इस आघात से वह टूट गयी |शायद आत्मघात कर लेती पर राम उसकी ढाल बन गए |उन्होंने ही उसे इस भंवर से निकाला और भंवर से चकराई वह उनकी बाँहों में जा गिरी|राम उसके मित्र ...राजदार और हमदर्द थे और धीरे-धीरे उसकी जरूरत भी बनते गए |उन्हीं से वह महीप की बातें करती थी |
राम से उसे प्यार नहीं था और उनसे विवाह की कभी कल्पना तक नहीं की थी उसने |बस अपना दोस्त मानती थी उन्हें |इसलिए जब राम ने उसके साथ रहने की इच्छा जाहिर की तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी |अब वह महीप की जगह थी और राम उसकी जगह पर खड़े थे |महीप जाति,कुल,पद ,प्रतिष्ठा,रूप-रंग में उससे बढ़कर था और वह राम से |
'तो....क्या ....वह भी वही करे ,जो महीप ने उसके साथ किया |'
उसने महसूस किया राम भी उसकी ही तरह बिलकुल अकेले हैं और सब कुछ जानते हुए भी उससे प्रेम करते हैं |उसे उन्हें स्वीकार कर लेना चाहिए पर वह खुद से ही भयभीत थी |वह जानती थी कि राम से उसे सहानुभूति तो है ,मगर प्यार नहीं |पता नहीं वह उन्हें प्यार कर भी पाएगी या नहीं |उसने यह बात राम से कह भी दी ,पर राम ने उसे आश्वस्त किया कि वे उसे बदल देंगे ...उसके मन में अपने लिए प्यार जगा देंगे और तब तक इंतजार करेंगे |उनमें बहुत अधिक सब्र है |वह सोच में पड़ गयी थी |महीप उसकी जिंदगी से सदा के लिए जा चुका था और उसके मन में दूर-दूर तक अंधेरा फैला हुआ था |उसमें और ज्यादा अकेलापन झेलने की हिम्मत नहीं थी |अकेले ही दुनिया का सामना करने की शक्ति नहीं थी |नींद की गोलियों के सहारे रातें कट रही थीं |वह इस स्थिति से उबरना चाहती थी |वह डूब रही थी |डूबने से बचने के लिए उसने यह सोचकर अपना हाथ राम के बढ़े हुए हाथों में दे दिया कि शायद वे ठीक कह रहे हैं |साथ रहने से प्यार हो ही जाएगा |राम अपनी अच्छाइयों से उसे फिर से प्यार करने के लिए मजबूर कर देंगे |
पर कितनी गलत थी वह ?उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया |उसके शरीर को पाते ही बदल गए |शायद उसे पाने के लिए ही उन्होंने आदर्श का मुखौटा पहन लिया था,जिससे वह भ्रमित हो गयी थी |न तो उसका अकेलापन दूर हुआ और ना ही समस्याएँ|वे और भी बढ़ गयी थीं ,विशेषकर दोनों के परिवार से बहिष्कृत किए जाने के कारण |फिर भी वह अपने स्त्री धर्म का पालन करती रही ,पर कभी-कभी उसे लगता –यह विवाह एक समझौता है |तब महीप आँसू बनकर उसकी आँखों में लरज़ उठता |वह बिलख पड़ती-तुमने ऐसा क्यों किया महीप ?देखो न तुम्हारे कारण मैं किस दलदल में आ गिरी हूँ!
फिर वह अपने को धिक्कारती-यह गलत है ,महीप अब पराया पुरूष है |वह राम के कंधे पर सिर रखकर खुद को संभालना चाहती ,पर वहाँ सिर्फ तकिया होता या फिर एक ऐसा पशु ,जो उसके शरीर पर टूट पड़ता |वह आहत हो जाती |राम सिर्फ एक देह की तरह उसके साथ रह रहे थे ,जिसमें मन बिलकुल गायब था |उन्हें उससे कोई सहानुभूति नहीं थी ,न ही कोई लगाव |बस यंत्रवत सब कुछ |यही कारण था कि महीप उसकी स्मृतियों से कभी गायब नहीं हुआ |पर जितनी जल्दी वह दिल में आता, उतनी ही जल्दी दिमाग उसे दूर फेंक देता |फिर उसे राम याद आने लगते |राम ने उसे बताया था कि महीप जैसे बड़े लोगों के लिए लड़कियां महज भोग की वस्तु होती हैं |वे कभी उसे अपनाते नहीं |राम को अपने पर गर्व था की उन्होंने उसे अपनाया था |चाहते तो भोगकर छोड़ सकते थे |वह आश्चर्य से राम के चेहरे को देखने लगती कि वे तो विवाह से पूर्व उसकी अंगुली भी छूने की हिम्मत नहीं जुटा सकते थे और अब कितना बढ़-बढ़कर बोलते हैं |राम को खुद पर कितना आत्मविश्वास है !पर कितना झूठा है यह आत्मविश्वास !वह सोचती -मर्द चाहें कितना भी अपढ़,मूढ़ ,कुरूप ,दलित और निर्धन हो ,उसका अहंकार बड़ा होता है|वह हर हाल में खुद को स्त्री से श्रेष्ठ समझता है |पर वह नहीं जानता कि इस अहंकार में वह क्या खो रहा है ?वह स्त्री का मन खो देता है,उसका प्रेम खो देता है |विश्वास और सम्मान खो देता है |
उसने महीप को मन से निकाल दिया था,पर राम को वहाँ स्थापित नहीं कर पा रही थी |वह चाहती थी ऐसा ,कोशिश भी करती रहती थी |राम महीप की तुलना में ज्यादा ईमानदार व बेहतर इंसान थे ,पर जब से वे साथ रहने लगे थे ,वे सिर्फ नर-पशु की भूमिका में आ गए थे और उसे सिर्फ मादा बना देना चाहते थे |
फिर भी वह राम का साथ चाहती थी |जब राम घर में नहीं होते थे, तो उसे बड़ी तकलीफ होती थी |राम बिलकुल अराजक थे |कभी उसकी किसी बात का बुरा मानकर ,तो कभी विशिष्ट दोस्तों के साथ दारू पार्टी का आनंद लेने लिए वे घर नहीं लौटते थे |उनकी नशे की लत उसे नहीं भाती थी |कई बार इस बात को लेकर उनसे लड़ाई हो गयी |वे हर बार कसम खाते पर मित्रों के उकसाने पर कसम तोड़ डालते और रात को नहीं लौटते |जब वह शिकायत करती तो कहते –तुम घर में ही ऐसी पार्टियाँ अरेंज करती तो बाहर क्यों जाना पड़ता ?पर तुम तो कंजूस हो |
वह फिर टूटने लगी थी |राम खुद तो कोई काम करते नहीं |दिन-रात घूमते हैं |वह दाल-रोटी भर का इंतजाम कर पाती है |कुछ पैसे भविष्य के लिए रखती है ,यह राम को नहीं भाता |वे कहते कि चाहे घर ही न क्यों बेच दो,शराब-कबाब का इंतजाम जरूर करो,वरना या तो वे अपने घर वापस चले जाएंगे या दोस्तों के साथ रातें गुजारेंगे |
वह सोच नहीं पा रही थी कि वह कहाँ गलत थी ?यह सच था कि जिंदगी के उतार-चढ़ावों और तकलीफ़ों ने उसे कुछ कठोर बना दिया था |वह फूँक-फूँक कर कदम रखती थी |राम पर भी इतना भरोसा नहीं था कि घरफूंक तमाशा देखे |आर्थिक मुद्दों पर वह ज्यादा सतर्क रहती थी |उसने अभाव देखे थे और यह भी जानती थी कि स्त्री के पास पैसा न हो तो क्या हश्र होता है उसका ?
राम को साथ रखने के लिए वह उनकी ज़्यादतियों को भी सह रही थी |वे उसकी कमजोरी जान गए थे कि उसे अकेलेपन से डर लगता है ,इसलिए उसे सता रहे थे|जब वह उन्हें समझाती तो कहते –क्यों बेकार की बातें सोचती हो?खुश रहा करो |मैं तुम्हारे पल्लू से बंधा तो नहीं रह सकता |मुझे और भी तो काम है |उनका काम वह जानती थी |वे सबकी मदद करते और यह अच्छी बात थी पर क्या उसकी मदद करना ,गृहस्थी में सहभागी बनना उनका काम नहीं था ?घर-गृहस्थी क्या सिर्फ उसकी ज़िम्मेदारी थी ?घर उन्हें बस भूख के समय याद आता था |भूख चाहे पेट की हो या देह की !वाह री किस्मत !वह सोचती- जीने और खुश रहने के लिए उसने कितना बड़ा समझौता कर डाला है !
उसका सौंदर्य प्रेमी मन राम में कोई भी और कहीं भी सौंदर्य न पाकर पहले ही बुझ गया था ,फिर भी उसने मन को समझा लिया था–पुरूष का सौंदर्य नहीं चरित्र देखना चाहिए |राम में गुणों का भंडार है ...उनका मन सुंदर है ...कार्य सुंदर है ...उससे प्यार करते हैं |उसके अतीत को जानकर भी उसे अपनाया |सबसे बड़ी बात की उनके चरित्र पर कोई दाग नहीं है |समाज में एक प्रतिष्ठा अर्जित की है उन्होंने |
और वह पछताने लगती कि क्यों भला-बुरा कह देती है उन्हें?समाज में इज्जत से जीने के लिए उसे उनकी अधिक आवश्यकता है |उसे याद आता कितनी मुश्किलों से वह आत्मनिर्भर हुई ...नाम कमाया ...और सब कुछ पाकर खुश हुई कि बिना किसी पुरूष के सहारे उसने ये सब किया है पर एक दिन जब उसने अपने बारे में समाज की सोच का पता किया तो पता लगा कि लोग उसके बारे में कई तरह की गलत  बातें करते हैं |उसके सामने उसके संघर्षशील व्यक्तित्व की सराहना करने वाले भी पीठ पीछे कुछ और ही कहते हैं |उसकी सारी सफलताओं का श्रेय किसी अनाम पुरूष को दिया जाता है ,वह अनाम पुरूष जिसे वह भी नहीं जानती थी |लोगों की दृष्टि उसके यौवन के साथ उसके पैसों पर हैं ,यह वह जान गई थी|उसका सबसे कमजोर पक्ष था शहर में अकेला होना ,जिसका मनमाना अर्थ लगाया जाता |कई कहानियाँ भी गढ़ ली गयी थीं |वह विवाहिता ,परित्यक्ता ,विधवा ,महत्वाकांक्षिणी और जाने क्या-क्या थी ? वह हैरान थी कि बिना पुरूष की स्त्री को समाज में मात्र एक चीज की दृष्टि से देखा जाता है |उसकी मेहनत ,त्याग ,संयम का कोई मूल्य नहीं होता |वह आहत हो गयी थी।
उच्च शिक्षा के बाद भी उसे कोई सरकारी नौकरी नहीं मिली |प्राइवेट संस्थानों की नौकरी के अपमान जनक उतार-चढ़ावों से वह ऊब चुकी थी |मैनेजर अकारण भी उसे डांट-फटकार देता |जब तब अपमानित कर देता और वह खून का घूंट पीकर रह जाती |नौकरी करना उसकी विवशता थी |उसी के कारण उसके सिर पर छत और पेट को रोटी थी |पिता के न रहने पर भाइयों के यहाँ दो दिन के लिए भी गुजारा न था |गनीमत थी कि इस नौकरी में यौन शोषण न था |महीप को भी उसकी इन परेशानियों से कोई सरोकार न था |
महीप से उसके रिश्ते की बात कम ही लोग जानते थे |जब महीप ने पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कभी भी और किसी से भी विवाह न करने का निर्णय लिया था ,तो उसने भी सोच लिया था कि वह भी विवाह नहीं करेगी |पूरी उम्र महीप के साथ रिश्ते में काट देगी ,भले ही वे देह से हमेशा साथ न रहे |तब भी वह अकेली थी ,पर उसे अकेलापन नहीं डराता था क्योंकि महीप का आभासी प्यार उसे हर क्षण पूर्ण महसूस कराता था |
विवाहोपरांत भी उसकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया |वही कार्यस्थल पर अपमान ,वही हर पल नौकरी छूट जाने का खौफ ...वही अकेलापन जिसमें मन का अकेलापन भी शामिल हो गया था |अब तो कोई आभासी प्रेम भी दिल को नहीं बहला पाता था |प्रेम की असलियत उसके सामने थी |महीप और अब राम ...दोनों ने उससे प्रेम के नाम पर खेल किया था |उनकी जाति से कोई फर्क नहीं था |स्त्री के लिए सभी मर्द एक ही जाति के होते हैं |
जीवन के सारे संघर्ष ज्यों के त्यों ही थे |वही काम से थककर लौटना ,साग-सब्जी लाना ,पकाना ,जोड़-घटाना करना |अब तो राम का देर रात तक इंतजार करना भी उसमें शामिल हो गया था |पहले तो काम खत्म कर कम से कम चैन से सो तो लेती थी |अब तो नींद भी पूरी नहीं होती थी |
रात –रात भर जाग कर राम की प्रतीक्षा उसके सब्र की परीक्षा थी |इतना सब कुछ करने के बाद जब वे उसे सीमित दायरे में कैद ,अवसरवादी व धनाग्रही स्त्री कहते और चाहते कि वह भी उनके अभियानों में धन खर्च करे, तो अक्सर तो वह चुप सुनती ,पर कभी-कभी उबल पड़ती ,जिसका नतीजा फिर कुछ दिनों का वियोग होता |वह समर्थ स्त्री पति वियोग में तड़पती रोती रहती और वे किसी दोस्त के साथ बैठकर शराब-कबाब के मजे लूटते और कहीं भी पड़ रहते |
कुछ समय पहले उनकी माता जी बीमार पड़ीं थीं ,तब वह खुद बिना बुलाए राम को साथ लेकर उन्हें देखने गयी |तभी से राम घर आने-जाने लगे थे |उसके साथ उनके घर वालों का व्यवहार हमेशा उपेक्षापूर्ण रहा था ,फिर भी माता जी के बीमार पड़ने पर वह जाने लगी और जब भी जाती ,उनकी खूब सेवा करती |उनकी पसंद की चीजों को घर से बनाकर ले जाती |वे जो कहतीं,उनकी रसोईघर में बना देती|उन्हें तेल लगाती,नहलाती |वे खुश होतीं और आशीर्वाद देतीं ,पर वे एक बार भी नहीं कहतीं कि यही आकर रहो |इतना ही नहीं ,वह जब तक वहाँ रहती ,वे आरामकुर्सी से ही रसोईघर के रास्ते वाले कमरों पर नजर रखतीं |अपने जेवर उतारकर बेटी को दे दिया था कि एकाएक उनके कुछ हो जाने पर वह ले न ले |वह सब समझती थी|उनकी इस सोच पर दुखी होती थी पर धर्म समझकर अपना कर्तव्य कर रही थी |दरअसल इस समय वह मानवता के लिए उनकी सेवा कर रही थी |उनकी जगह कोई दूसरी बूढ़ी या बीमार औरत होती तो भी वह उतना ही करती |दिन भर नौकरी में खटकर लौटती तो उनकी पसंद की चीजें बनाती ,फिर लगभग तीन-चार मिल पैदल चलकर उनके पास पहुँचती।वे बच्ची की तरह उसकी हाथ से चीजें छीनकर जल्दी-जल्दी खातीं और उनके चेहरे पर असीम संतोष होता|यह दृश्य उसे तृप्त कर देता|वह अपनी थकान भूल जाती |
वे कहतीं-तुम जो मेरे लिए लाती हो न ,सब आकर खा जाते हैं|मुझे नहीं देते |
जबसे वे बीमार पड़ी हैं |कोई उनके पास नहीं रहता |बेटी शहर के ही मेडिकल कालेज में एम एस कर रही है |जब तक माँ ठीक थीं और उसके मुँह तक निवाला डालती थीं ,वह रही | उनके बीमार पड़ते ही हास्टल में रहने लगी ,जबकि उनके बीमार होने की वजह भी वही थी | एक दिन उसके लिए खाना लेकर आते समय उनके हाथ से थाली छूटकर उनके पैर पर गिर पड़ी थी और उनका पैर कट गया |वे शुगर की मरीज थीं |घाव लाइलाज हो गया |वे धीरे-धीरे चलने-फिरने में असमर्थ हो गईं |एक और बहू थी,वह बाहर रहती थी |कभी-कभार आती ,तो नौकर साथ लाती |रूपए-पैसे देकर चली जाती |पति देखभाल करते पर अपने मनोरंजन की भी व्यवस्था करते थे |वे अकेली कमरे में कुढ़ती रहतीं |न कोई बोलने-बतियाने वाला ,न सेवा करने वाला |जब वह उन्हें देखने पहली बार गयी तो उन पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं |शायद कई दिनों से उन्हें नहलाया तक नहीं गया था |राम को देखते ही रो पड़ीं |राम उनसे ज्यादा जुड़े थे,पर पिता को पसंद नहीं करते थे |माँ को इस हालत मे देखकर रो पड़े और उससे कहा—थैंक्स कि तुम जबरन मुझे यहाँ ले आई ,वरना मैं कभी नहीं आता |वह बोली-एक बेटे को माँ से अलग करना मैंने कभी नहीं चाहा |आप ही घर छोड़कर गए और मुझे भी साथ लेते गए ,वरना मैं हर हाल में यहीं रहती |
माता जी उनकी बात सुनकर घबरा गईं –नहीं ...नहीं तुम यहाँ मत रहना...कभी-कभी आना फिर चली जाना ,नहीं तो वे सब मुझे.....|वह समझ गईं थी कि माता जी की यहाँ नहीं चलती |वे महज एक कठपुतली हैं |
बाद में माता जी ने उसे अपने बारे में कई सारी बातें बताईं –जानती हो वह जो तुम्हारा ससुर है अच्छा आदमी नहीं है |बुढ़ापे में रंगीन टी शर्ट और जींस पहनकर किसी से मिलने जाता है |बहुत औरतों से इसके रिश्ते रहे हैं |मैं रोकती थी तो मुझे टार्चर करता था| जिंदगी भर मैं सबकी सेवा करती रही ,बदले में क्या मिला ?
दलित के यहाँ भी स्त्री दलित है ,यह पहली बार उसने जाना था |
माता जी कई बार आई सी यू गईं और फिर कुछ दिन बाद ठीक होकर लौट आईं |उस बार जब वे भरती थीं |राम उसे लेकर इलाहाबाद गए थे |उसका नौकरी के लिए साक्षात्कार था |हालांकि वे चाहते तो किसी और के साथ भी उसे भेज सकते थे या फिर वह अकेली जा सकती थी |इलाहाबाद राम के कई मित्र तथा रिश्तेदार थे पर संयोग ....|रात को वे पहुंचे थे |दूसरे दिन सुबह साक्षात्कार था |रात को वह पढ़ रही थी कि भोर के समय राम आए और बोले –दोपहर के बाद ही कोई ट्रेन पकड़ कर वापस चलेंगे ,माता जी की तबीयत ज्यादा खराब हो गयी है |वह समझ गयी कि माता जी चल बसी हैं |किसी तरह वे वापस लौटे |शहर पहुँचते ही राम बोले --पहले पिता जी के घर जाऊंगा |उसने कहा –पहले अपने घर चलकर सामान रख देते हैं ,फिर चलेंगे |रूकना पड़ सकता है |पर वे नहीं माने |वे वहाँ पहुंचे तो घर के बारामदे में हवन हो रहा था |दाह संस्कार उसी दिन सुबह हो चुका था |एक कोने सामान रखकर वे भी वहाँ बैठ गए |घर के लोगों ने बड़े गुस्से से उसे देखा |हवन के बाद सब एक कमरे में चले गए |वह भी पीछे गयी तो उन लोगों ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया |उसने राम से कहा –अब घर चलें |कल फिर आ जाएंगे |कल ही मृतक भोज है तो वे बोले –तुम जाओ ,मैं बाद में आऊँगा |वह घर आई ,पर राम नहीं लौटे |दूसरे दिन वह फिर गयी |माता जी की पसंद की चीजें बनाई जा रही थीं |ये वे ही चीजें थीं ,जो वह बनाकर लाया करती थी |चावल के आटे और दाल का फरा,अरबी के पत्ते का रिकवच,बेसन की सब्जी ,लौकी का कोफ़्ता माता जी को बहुत पसंद था ,पर इसे दरिद्रों का भोजन कहकर घर के बाकी लोग मुंह बिचकाते थे |उसने रसोईघर में जाकर हाथ बँटाना चाहा ,तो उसे मना कर दिया गया |किसी भी चीज में उसे शामिल नहीं किया गया,जैसे वह कोई बाहरी स्त्री हो |मृतक भोज में सैकड़ों लोग आए थे |वह उन्हें भोजन कराने में लग गयी |आधी रात हो चुकी थी ,फिर सभी लोग माता जी के कमरे में इकट्ठा हुए |दोनों ननदें,दोनों देवर ,ससुर और कुछ खास रिश्तेदार पर राम और उसे आते देख दरवाजा ठेल दिया गया |अंदर माताजी के जेवर का बंटवारा होना था |उसने राम को देखा |राम उसे लेकर घर आ गए पर ये क्या, वे तो किसी भूखे की तरह उसके शरीर पर टूट पड़े |उसने भी उन्हें मना नहीं किया –सोचा ,शायद माँ की मृत्यु का गम भुलाने के लिए ये इस तरह व्यवहार कर रहे हैं |
उस दिन के बाद राम बराबर अपने घर जाने लगे और उससे रूखा व्यवहार करने लगे |एक दिन उसने कारण पूछा तो फट पड़े—तुम्हारे कारण मैं अपनी माँ का मुंह तक नहीं देख पाया |उसकी चिता को अग्नि तक नहीं दे पाया ,जबकि मैं उसका बड़ा और लाडला बेटा था |
वह तो जैसे आसमान से गिरी ,तो इनके घर वालों ने इनके मन में जहर घोल ही दिया |उसका क्या दोष था ?होम करते उसके हाथ जल गए थे |अब राम के पास उसे देने के लिए एक बड़ा –सा ताना भी था |
वह सोचने लगी –उसकी अच्छी सोच,करूणा और प्रगतिशील विचारों का क्या कोई मूल्य नहीं है ?न दोनों परिवारों की दृष्टि में वह अच्छी थी ,न समाज के | राम से शादी के करके वह ‘पर कटी मैना’ बन चुकी है और उसके साथ कुछ भी किया जा सकता है |वह कितनी असहाय और बेचारी- सी हो उठी है |सीता को एक ही अग्नि परीक्षा देनी पड़ी ,पर वह प्रतिदिन एक नयी अग्नि परीक्षा दे रही है |आखिर क्यों ?क्या इसलिए कि वह एक स्त्री है और स्त्री होकर भी इतने क्रांतिकारी फैसले लेती रही है |वह कब तक सहेगी ?किसी दिन उसका धैर्य अपनी सीमा तोड़ देगा| आखिर सहने की भी एक सीमा होती है |वह एक-एक पैसे को दांतों से पकड़ती क्योंकि इसी पैसे के लिए उसे क्या-क्या नहीं झेलना पड़ता था ?और वे अपनी लापरवाही से सैकड़ों का नुकसान कर देते और माथे पर शिकन तक न लाते |कभी पैसा कमाया हो तो उसकी कीमत समझें |वह रोती ...जलती कुढ़ती ...छटपटाती,पर उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता |साफ कहते- 'मुझे पास रखना है तो मेरी जरूरतें पूरी करो ,वरना मेरे पिता का घर है और यह पूरा समाज है |मुझे कभी कोई कमी नहीं होगी |'
उनका कहना गलत नहीं था |उन्हें कभी किसी अभाव से गुजरना ही नहीं पड़ता था.... न पड़ेगा |पर वह क्या करे ,उसके लिए तो कहीं भी कोई जगह नहीं थी |क्या करे वह ?राम को छोड़ती है तो दुनिया जीने नहीं देगी और पास रखती है तो ये जीने नहीं देंगे |क्यों सहना पड़ रहा है उसे इतना कुछ ?
चलिए उसका परिवार और पूरा समाज उससे इसलिए नाराज है कि एक अछूत से विवाह कर वह अछूत हो गयी है| पर राम और उनके परिवार के लिए वह क्यों अछूत है ? राम के परिवार के लोग अमीर हैं इसलिए उसे अछूत मानते हैं या इसलिए कि अमीर होने से पहले अछूत समझे जाने की जो पीड़ा उन्होंने झेली थी ,उसका बदला उससे ले रहे हैं |उनकी बात भी समझ में आती है पर स्वयं राम ,उन्हें क्या परेशानी है ?उनके मन में क्या है ?कहीं वे भी उसे इसलिए तो अछूत नहीं समझ रहे कि वह महीप के साथ अंतरंग रिश्ते में थी ,पर यह तो वे पहले से जानते थे | तो ये बात है ......वे सच ही खुद को राम और उसे अहल्या मानते हैं|उन्हें लगता है कि उन्होंने उसका उद्धार किया है |उनके इस अभिमान के साथ तो वह कदापि नहीं जी सकती |वे ईश्वर नहीं हैं और न ही वह अहल्या |
पर अब तक वह इतना तो समझ ही चुकी है कि स्त्री अछूतों की भी अछूत है दलितों की भी दलित है .....क्योंकि स्त्री है |

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