बिन्नू भाई की शादी में पहली बार उससे मिले थे.


उसकी भी नई-नई शादी हुई थी. गुड्डू की वाइफ थी. खूब सजी-धजी थी. लेकिन इतने बनाव श्रृंगार के बाद भी नई दुल्हन जैसी नहीं लग रही थी. उसका ड्रेसिंग सेन्स अलग था. एकदम बॉलीवुड हीरोइन जैसी ड्रेस अप हुई थी.

लेकिन थी एक दम काली. हाँ सच में. वो इतनी काली थी जितना काला होता है. इसलिए उसके क्म्प्लेक्शन को ले कर गेहूँआ या सांवला शब्द कहना मज़ाक होगा.मगर कुछ था उसकी पर्सनालिटी में जो अनायास ही उस पर नज़र पड़ जाती थी. इनफैक्ट नजर टिक भी जाती थी उस पर.

मुझे तो हैरत इस बात पर हुई थी की रसिका जैसी ग्लेमरस लड़की ने गुड्डू जैसे विशुद्ध देसी और काने आदमी से शादी कैसे कर ली. बचपन में क्रिकेट खेलते हुए आँख में चोट लगी थी और तब से गुड्डू की बायीं आँख आधी ही खुलती थी. वैसे अगर सोचने बैठो तो हैरत की कोई ऐसी बात थी भी नहीं. अगर गुड्डू भाई देसी और काने थे तो रसिका कौन सी हूर की परी थी. न ज़्यादा वेल-प्लेस्ड गुड्डू थे और न रसिका कोई बहुत बड़े खानदान से थी या कोई ख़ास क्वालिफिकेशन थी उसकी.लेकिन नैन-नक्श उसके बहुत अच्छे थे और एक अदा थी . उस अदा से ही शायद वो लोगों का ध्यान अपने काले रंग से हटा पाती थी.

उधर गुड्डू लोगों का ध्यान अपने सांवले रंग, साधारण रूप, एवरेज नौकरी, और क्रिकेट की भेंट चढ़ी आँख से हटाने के लिए अपने कांफिडेंस का इस्तेमाल करता था. गुड्डू के कांफिडेंस की हालत तो ये थी की उसे कोई काम बोल के देखो बस. कर के न दे तो नाम बदल लो. हुनर और दिमाग ऐसा की दोस्ती यारी में सब गुड्डू को बारह-खाने का रिंच बोलते थे. गुड्डू कही भी फिट हो सकता था. कुछ भी कर के आपको सरप्राइज़ कर सकता था. इनफैक्ट गुड्डू ने अपने कांफिडेंस से ऐसा चार्म बनाया था अपना की वो लड़कियों में ख़ासा मशहूर भी हो गया था. और इस सबसे इतर, मुझे बहुत मानता था. अपनी सब बातें बता देता था. लेकिन मैं उसे शायद उतना भाव नहीं देता जितना वो मुझे.

खैर, कुल मिला कर लगा ये था की गुड्डू और रसिका, दोनों अपनी असलियत बखूबी जानते थे और शायद इसी वजह से एक दूसरे से शादी करने के लिए माने भी थे. एक जैसे ही थे दोनों.


बिन्नू भाई की शादी

बाराती और मेहमान वैगैरह सब जा चुके थे और शादी होने में अभी कुछ समय बाकी था. देर रात का मुहूर्त था इसलिए सिर्फ वही रिश्तेदार और दोस्त यार रुके थे जिन्हें रात में शादी अटेंड करनी थी. बिन्नू भाई आखिर मेरे ममेरे बड़े भाई थे तो उनकी शादी में मेरा रहना तो बनता था.

अच्छा एक चीज़ है, सिंगल लड़के लड़कियों को शादी अटेंड करने में बहुत मज़ा आता है. करना कुछ नहीं होता, सिर्फ नैन-मटक्का और चकल्लस. मेरे भी अजेंडे वैसे ही कुछ थे.

शादी के मंडप से दूर, मैं होटल के लॉन में सर्दी भगाने के लिए बॉन फायर के आगे खड़ा आग ताप रहा था. तभी पीछे से कंधे पर किसी का हाथ महसूस हुआ. "अरे माधव...यार कहाँ रहते हो तुम? अमां माना आज बिन्नू की शादी है लेकिन हमारी भी तो पिछले ही हफ्ते हुई है. अब तुम भाई को चलो इग्नोर कर लो, लेकिन भौजाई को भी इग्नोर करे पड़े हो?" गुड्डू ने हथेली से मेरा कंधा दबाते और हंसते हुए कहा. मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही अपने हाथ भी आलाव के सामने लाते हुए बगल में खड़ी रसिका की ओर आँखों से इशारा करते हुए बोला, " मैडम बता रहीं थी की तुम सामने से इनके निकले कई बार आज और इनसे बात भी नहीं करी. वो अकेली बैठी बोर हो रही थी. कैसे देवर हो भाई?"

अब रसिका भी आग ताप रही थी और कोयलों को देखती हुई शरारती अंदाज़ में मुस्कुरा रही थी.सच बताऊँ तो पहली बार रसिका को गौर से देखा था. रात के अँधेरे में कोयले से निकलती लाल-पीली रौशनी में उसके चेहरे की रंगत से ज़्यादा उसके नैन नक्श निखर कर आ रहे थे. और उसकी वो मुस्कराहट तो कुछ अजब थी. वो जान रही थी की मैं उसे देख रहा हूँ लेकिन उसने मेरी ओर देखना मुनासिब नहीं समझा और कोयलों को ही एकटक देख होंठ तिरछे कर मुस्कुराती रही.

कुल मिलाकर गुड्डू के शिकायत और रसिका की हरकत ने मुझे असहज कर दिया और मैं बच्चों की तरह सफाई पेश करने लगा।" अरे नहीं गुड्डू। कसम से मैंने इन्हें नोटिस नहीं करा। तुम तो जानते हो यार, मैं इन सब बातों का कितना ख़याल रखता हूँ। आई एम नॉट लाइक दिस...," मैंने झेंपते हुए कहा।

सुनते ही रसिका ने एक गहरी सांस ली और मेरी ओर हल्की सी गर्दन मोड़कर कहा, "आई होप अब नोटिस करेंगे आप।" उसका साथ देते हुए इतराते हुए गुड्डू बोला, "हाँ भाई...अब ऐसी गुस्ताख़ी न करना हमारी बेग़म से।" तभी गुड्डू का हाथ पकड़ते हुए रसिका बोली, "सुनिए आप ज़रा मेरे किये घर से ओढने के लिए कुछ ले आयेंगे? सर्दी बढ़ रही है और पूरी रात यहीं बितानी है."

"श्योर, डार्लिंग. यार लेकिन तुम्हें साथ में लाना चाहिए थे वुलेन्ज़. शुक्र है घर पास है, वरना मुश्किल हो जाती," गुड्डू ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर मेरी ओर मुखातिब हो कर बोला, "माधव, भाई तुम प्लीज़ रसिका को कुछ देर कंपनी देना. मैं इनकी शाल लेकर आता हूँ." मैंने दोनों को देखते हुए हामी में सर हिला दिया और गुड्डू वहाँ से निकल गया.

मैं गुड्डू का कोई सगा रिश्तेदार नहीं था. वो बिन्नू भाई के मामा का लड़का था और बिन्नू भाई मेरे मामा के बेटे थे. बचपन का काफी हिस्सा मामा के घर में बीता जहाँ रवि सहगल, उर्फ़ गुड्डू का भी आना-जाना रहता था. हम दोनों हमउम्र थे इसलिए बचपन से ही खूब दोस्ती हो गयी. उम्र के साथ हम दोनों की अलग-अलग लाइफ बनने लगी लेकिन जुड़ाव बना रहा. गुड्डू मुझे काफी मानता था और मैं भी उसके इमोशन की खातिर उससे नजदीकी बनाए रहता था. दुनिया के लिए भले वो जगलर हो, मेरे लिया अच्छा आदमी था. अपनी, स्याह-सफ़ेद, हर बात बताता था. लेकिन अभी देखा की कैसे गुड्डू महाशय तो बीवी के आगे एकदम बिछे हुए थे.

ताज्जुब इसलिए हुआ क्यूंकि गुड्डू फितरत से लड़कियों को अपने आगे बिछाने में यकीन रखता था और यहाँ वो खुद बीवी के आगे बिछे हुआ था. वैसे उसकी बीवी में था कुछ ऐसा की गुड्डू का बिछना शायद स्वाभाविक था.

गुड्डू जा चुका था और कुछ एक पल की खामोशी के बाद मेरे दिल में न जाने क्या आया की मैंने रसिका की बैकलेस और डीप नेक वाली ड्रेस देखते हुए उससे पूछ लिया, "इतनी सर्दियों में लड़कियां कैसे इतने कम कपड़े पहन कर पार्टी अटेंड कर लेती हैं?" रसिका ने एक पल को हैरान हो कर मुझे देखा और फिर उसी कातिल अदा से मुस्कुरा कर मुझसे बोली, "और लड़कियों का तो पता नहीं, मुझे गर्म कपड़ों की ज़रुरत कम पड़ती है क्यूंकि मैं हॉट हूँ. "मेरे लिए वो एक मायने में अनजान लड़की थी और ऐसा कुछ पहली ही मुलाक़ात में मैं सुनने को मेंटली तैयार नहीं था. लेकिन मुझे लगा देवर समझ कर मज़ाक कर रही होगी इसलिए मैंने भी सोचा की वैसा ही कुछ जवाब दे दूं. मैंने इतराते हुए कहा, "तो एकदम से आपको गर्म कपड़ों की ज़रूरत क्यूँ पड़ गयी?" मुझे लगा रसिका झेल जाएगी, लेकिन उसने मुझे फिर चित कर दिया. अपने क्लीवेज की ओर एक नज़र डालते हुए बोली, "शायद मेरी हॉटनेस आज कुछ कम हो गयी है. वरना भला आप नोटिस न करते ऐसा नहीं हो सकता था. इसी लिए सर्दी लगी आज."

गज़ब कांफिडेंस था उसका. वैसे कॉम्प्लेक्शन और सिम्पल क्वालिफिकेशन वाली कोई और लड़की होती तो ऐसे कांफिडेंस का सौवां हिस्सा भी उसमें नहीं होता, लेकिन यहाँ तो रसिका इतनी कॉंफिडेंट और वोकल थी की मैं सोचने लगा की आखिर किस बात के दम पर ये इतना बेलौस और बेबाक हो सकती है. वैसे उसे शायद वाकई लगा की मैंने उसे इग्नोर करा. शायद उसे इग्नोर किये जाने की आदत नहीं थी. लेकिन मैंने सच में उसे जान बूझ कर इग्नोर नहीं करा था. मैं अब सोच ये रहा था पार्टी में इतने लोग थे, उसे क्या मेरा ही इग्नोर करना खला?

मैंने माहौल को हल्का करते हुए कहा, "अरे आप तो लगता है वाकई नाराज़ हैं मुझसे. सच कह रहा हूँ भाभी जी, मैंने जान बूझ कर इग्नोर नहीं करा आपको. अच्छा चलिए सॉरी." अपनी दोनों हथेलियों में मेरी हथेली लेते हुए बोली, "अरे नहीं नहीं. सॉरी जैसी कोई बात नहीं. मैं तो मज़ाक कर रही थी. और हाँ. आप मुझे रसिका कहा करिए. हम दोनों हम उम्र हैं. और आप जैसे हैंडसम देवर के मूंह से भाभी जी अच्छा नहीं लगता." मैंने मन-ही-मन कहा की अरे ये तो फ्लर्ट भी करने लगी. लेकिन बुरा नहीं लगा. न जाने क्यूँ मुझे उसकी तारीफ पसंद आने लगी और मैंने सोचा चलो देवर-भाभी के रिश्ते वाली मौज है ये सब. इसे भी एन्जॉय करा जाए. मैंने भी स्टाइल मारते हुए कहा, "ठीक है रसिका. तुम्हारे जैसी हसीन लड़की को भाभी जी कहना भी अच्छा नहीं लगता."ये सुनते ही हम दोनों हंसने लगे.

इतनी देर में गुड्डू आ गया और हम दोनों को हँसता देख खुश हुआ और रसिका को शाल ओढ़ाते हुए बोला, "बेगम अब तो आप हमारे भाई से नाराज़ नहीं हैं न?" गुड्डू के सीने से लिपटते हुए रसिका मुझे निहारते हुए बोली, "बिलकुल नहीं. अब तो ये हमारे दोस्त बन गए हैं."मैंने भी बोल दिया, "हाँ ऑफ कोर्स." हँसते बोलते हम तीनों शादी के मंडप की ओर बढ़ गए.

गुड्डू और रसिका साथ अच्छे लग रहे थे. एक जैसे ही थे दोनों.


बुरा न मानो होली है

कुछ महीने बाद होली पर घर वापस आना हुआ तो उसी दौरान मामा ने घर पर ड्रिंक्स पार्टी रखी. पहुंचा तो वहाँ गुड्डू भी था. मामा-मामी और आये हुए बाकी बड़ों से मिलने के बाद मैं, बिन्नू भाई, और गुड्डू ड्रिंक्स एन्जॉय करने लगे. इसी बीच बिन्नू भाई की पत्नी शिल्पी भाभी हाथ में स्नैक्स ले कर आयीं और बोलीं, "कैसे हैं भैया? ये लीजिये फ्रेंच फ्राइज़ खाइए." मैंने मुस्कुरा कर उन्हें जवाब दिया और जैसे ही फ्रेंच फ्राई उठाने के लिए हाथ बढाया, पीछे से रसिका हाथ में चिकन टिक्के की ट्रे लेकर आ गयी और बोली, "शिल्पी इन्हें वेज नहीं...नॉन वेज ज़्यादा पसंद आएगा." बात उसने एक दम सही कही थी, लेकिन नॉन वेज शब्द पर ऐसा जोर दे कर कही की मैं झेंप गया. एक तो अचानक उसे वहाँ देख लिया और उस पर आँखों में आँखें डाल कर हलकी सी कातिल मुस्कान के साथ उसके बोलने की अदा ऐसी थी की सिम्पल से सिम्पल बात भी किसी डबल मीनिंग स्कैंडल से कम नहीं लगती थी.

शुक्र है बिन्नू भाई बीच में चिकन टिक्कों की ओर हाथ बढ़ाते हुए बोले, "सही कहा रसिका. चिकन टिक्कों के आगे फ्रेंच फ्राई किसे समझ आयेंगे." लेकिन शिल्पी भाभी रूठ न जाएँ इसलिए दूसरे हाथ से उनके फ्रेंच फ्राई वाली ट्रे भी ले ली और भाभी को मुस्कुराते हुए देख कर बोले, "शिल्पी, हम तो आज सिर्फ फ्रेंच फ्राई ही खायेंगे." भाभी शर्मा गयीं. मुझे न जाने क्या हुआ, मैंने भी रसिका को मानो चिढाते हुए बोल दिया, "आज तो हम भी फ्रेंच फ्राई ही खायेंगे." और ऐज़ एक्स्पेकटेड, गुड्डू बोला, "नहीं नहीं. ये सब नहीं चलेगा. सबको दोनों चीज़ें खानी पड़ेंगी. बीवियों का दिल नहीं दुखाना चाहिए भाई...रात में पिटना है क्या..." ये सुन कर सब हंसने लगे और रसिका और शिल्पी भाभी किचन की ओर चले गए.जाते हुए रसिका ने मुझे हलके से मुड़ कर देखा. मुस्कुरा रही थी. डीप कट और फिटिंग वाला सलवार सूट पहने थी. काफी वेल मेंटेंड थी.

लेकिन उसके कपड़ों की चॉइस से लगा उसे फर्क नहीं पड़ता वो कैसी गैदरिंग में जा रही है. उसे फर्क नहीं की वहाँ उसके सास ससुर या घर के और बड़े लोग हो सकते हैं और उसे थोडा कंसर्वेटिवली ड्रेस अप होना चाहिए. रसिका शायद हमेशा इसी जद्दोजेहद में रहती थी की कैसे भी अपनी काली काया से लोगों का ध्यान हटाये. जितना लोग उसके रंग को ध्यान नहीं देते थे शायद उससे ज़्यादा उसे इस बात का काम्प्लेक्स था. और इसी कोशिश में शायद वो खुद को ऐसे कन्डक्ट करती थी. लेकिन गुड्डू भी अपनी बीवी को ऐसे ही पसंद करता था और उसके चार्म में अंधा सा हो रहा था.

खैर, मुझे क्या करना. मैंने सोचा मैं कौन सा इन सबके साथ रहता हूँ और मुझे क्या... कोई कैसे भी रहे. साल-छह महीने में मुलाक़ात होनी है. जिसको जैसे रहना है रहे. मैं वापस अपने ड्रिंक्स एन्जॉय करने लगा. लेकिन रह-रह कर मुझे रसिका का "इन्हें नॉन वेज पसंद आयेगा" कचोट रहा था और मैं शर्मिंदा हो रहा था. लग रहा था मानों उसने मुझे नंगा कर दिया हो सबके सामने. लेकिन वैसा कुछ तो होना अभी बाकी था.

मुझे होली बहुत पसंद है और मैं खूब खेलता हूँ होली. मामा के घर की पार्टी के दो दिन बाद होली थी. पार्टी में ही डिसाइड हो गया था की इस बार सब होली साथ खेलेंगे. होली वाले दिन घर के बहार 10 बजे एक कार रुकी. देखा गाड़ी में बिन्नू भाई, शिल्पी भाभी, गुड्डू, और रसिका थे. आते ही सबने पहले तो मम्मी पापा के गुलाल वगैरह लगा कर आशीर्वाद लिया और उसके बाद अचानक बिन्नू भाई फॉर्म में आ गए. जेब से रंग निकाल कर रगड़ दिया मेरे. बस फिर क्या था, हुडदंग शुरू भाइयों का. ज़्यादा गन्दगी के अंदेशे से मम्मी ने सबको बोला की बाहर गेट के पास लॉन में ही खेलें होली सब. इसी बीच शिल्पी भाभी बोलीं, "अरे भाई आप लोग कुछ देर रुकें तो मैं और रसिका भी माधव भईया को रंग लगा दें."

साथ ही रसिका हाथ में रंग की पुडिया हिलाते हुए बोल पड़ी, "हाँ भाई. इनके गोर रंग पर तो रंग अच्छे से मेरा रंग चमकेगा."मैंने बोला हाँ भाभी बेशक लगाइए. शिल्पी भाभी ने फ़ौरन आ कर मेरे गाल पर अच्छे से रंग मल दिया. पहले से इतना पुता हुआ था की कोई फर्क पड़ा नहीं, लेकिन भाभी को संतुष्टि मिल गयी की उन्होंने भी रंग लगा लिया. जैसे ही रसिका आगे बढ़ी मैंने फ़ौरन उसे रोका और बोला की मेरे पास रंग ख़त्म हो गया है वो लेकर आता हूँ. रसिका कुछ बोलती उसके पहले ही मैं गायब. इस बीच सबने एक ब्रेक ले लिया और खाने पीने में लग गए. मैं इतनी देर में छत पर पहुँच गया और वहाँ मैंने बाल्टी में रंग बना कर पहले से रखा हुआ था. सोचा ऊपर से डालूँगा सब पर. मज़ा आएगा. आनन्-फानन में बाल्टी उठायी और नीचे पलट दी. देखा तो उस वक़्त नीचे सिर्फ रसिका खड़ी थी और बाकी लोग अगल बगल थे. निशाना चूक गया मेरा, लेकिन रसिका पूरा भीग गयी. उसने गुस्से से मुझे देखा और बोली, "अभी बताती हूँ.." पीछे से गुड्डू बोला, अब निपटो तुम बेटा. बहुत होली खेलने का शौक़ है न..." गुड्डू की बात सुन सब हंसने लगे और इस बीच रसिका ऊपर आ गयी.

लोअर और टीशर्ट पहने हुए थी वो लेकिन पूरी भीग चुकी थी. कपडे शरीर से चिपके हुए थे और पता चल रहा था की वाकई अच्छा फिगर है उसका. छत पर बस मैं और रसिका थे. मेरे बगल में रंग से भरी एक बाल्टी और थी लेकिन मैंने हँसते हुए कहा, "चलो ये तुम ले लो." लेकिन रसिका मुझ पर झपट पड़ी और बोली, "मैं ये बच्चों वाले तरीके से नहीं रंग लगाती." उसने मेरी दोनों हथेलियाँ पकड़ ली और मुझे अपने पास खींच लिया. मैं बस उसे देखता रहा और वो मेरे काफी करीब आ गयी थी. ऑलमोस्ट हमारे शरीर छू रहे थे एक दूसरे को. रसिका ने फिर अचानक मेरी टी शर्ट में हाथ डाल कर मेरे रंग लगाना शुरू कर दिया.

इसके पहले की मैं कुछ करता वो हंस-हंस कर अपने हाथ मेरे पूरे शरीर पर फेरने लगी. मुझे अजीब लग रहा था इसलिए मैंने उसके हाथ पकड़ लिए लेकिन उसमें गज़ब तेज़ी थी उस वक़्त. उस पर एक दम बेशर्मी का जूनून सवार था उस वक़्त. मेरे सीने पर हाथ फेरते वक़्त उसने मेरी टी शर्ट फाड़ दी और उसे ऐसा करने से रोकने के चक्कर में मैंने जब उसको बाहों से रोकने की कोशिश करी तो वो मेरी कोशिश नाकाम करते हुए मुझसे लिपट गयी. उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था की वो मेरे कितने करीब आ रही थी और उसके एक लड़की होने के नाते मैं एक लिमिट से ज़्यादा फ़ोर्स नहीं इस्तमाल कर सकता था. मैं बार-बार बोलता रहा, "अरे यार बस करो." लेकिन वो बार-बार बोल देती, "अरे बुरा न मानो होली है. तुम्हें किसने रोका है. तुम भी लगाओ रंग."

मैंने सोचा ये तो मौके का मानो फायदा उठा रही है. मैंने भी फिर उसके गालों पर, हाथों पर और उसके शरीर का जितना भी हिस्सा खुला दिखा और हाथ आया उस पर रंग लगाने की कोशिश करी. अब उसकी तरह तो नहीं लगा सकते थे. खैर, ये हुडदंग पांच मिनट बाद ख़त्म हुआ और तब तक मेरे कपडे काफी हद तक फट चुके थे. यूँ तो मुझे होली खेलना पसंद है, लेकिन मैं लड़कियों के साथ नहीं खेलता होली और वो भी ऐसी होली तो कभी नहीं खेली. गुस्सा आ रही थी की चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया और वहीँ रसिका ने मुझसे हर सेन्स में अपने तरीके से होली खेल ली.

मैं रिश्तों का लिहाज़ करता रहा और उसने रिश्तों की होली जला दी थी.

इस बीच दूसरी टी शर्ट पहनने के इरादे से मैंने अपनी फटी टी शर्ट उतार दी थी. तभी उसने मुझे अपनी ओर खींचा और मेरे अधनंगे शरीर से चिपक गयी. बोली, "माधव, होली है. गले तो मिल लो." मैं कुछ बोलता उससे पहले ही हम दोनों नें एक दूसरे के जिस्म बहुत अच्छे से महसूस कर लिए. फिर जल्दी से मुझसे अलग होते हुए बोली, "मज़ा आया होली खेल कर माधव?" ये कह कर वो वापस नीचे भाग गयी.

छत से नीचे झाँक कर देखा तो रसिका सबको मानो अपनी विजय गाथा बता रही हो. सब सुन कर हंस रहे थे. इसी बीच गुड्डू ने मुझे ऊपर देख लिया और इतराते हुए बोला, "खेल लिए होली? माधव बेटा, मेरी बीवी से पंगा न लेना." मैं झेंप कर वहाँ से हट गया और दूसरी टी शर्ट पहन कर नीचे आ गया.गुड्डू भी ऐसा ही जुनूनी था. सोच ले अगर कुछ की करना है, तो फिर कर के ही दम लेता था. वही हाल कुछ रसिका का भी लगा. मानों सोच कर आई थी की आज ऐसी होली खेलनी है उसे. एक जैसे ही थे दोनों.


फेसबुक

होली के बाद लाइफ वापस अपनी यूजुअल रफ़्तार पर आ गयी और मैं अपनी लाइफ में बिज़ी हो गया. एक दिन अचानक देखा रसिका सहगल की फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट आई. गुड्डू वाली रसिका ही थी. ऐड कर लिया. गुड्डू हालाँकि फेसबुक पर नहीं था. ऐड करते ही रसिका का मेसेज आया.

हेलो-हाय के बाद बोली, "होली पर इस बार मज़ा आ गया." मैंने जवाब में बोला, "मुझे तो नहीं आया. इट वाज़ ऐन अनहोली होली. तुमने तो मानो मेरा फायदा उठाया हो.

"उसने हंसते हुए दो-तीन इमोटीकॉन के साथ लिख कर भेजा, "बट आई एन्जोयेड इट. अब तुमने मौके का फायदा नहीं उठाया तो मैं क्या करूं. मैंने तो नहीं रोका था. पूरा मौका तुम्हारे पास था"

मैंने जवाब में सिर्फ गुस्से वाला एक इमोटिकॉन भेजा.

उसने आँख मारते हुए इमोटिकॉन के साथ लिखा, "चलो कोई बात नहीं. तुम आ जाओ. फिर से होली खेल लेंगे वैसे ही. इस बार मैं नहीं लगाउंगी. तुम लगा लेना. लेकिन बिना रंग के खेलेंगे."

ये पढ़ कर मैं सोंच में पड़ गया की वो क्या कह गयी. उसे अंदाज़ा भी है की वो क्या कह रही है और किससे कह रही है. मैं भले ही उसका कोई डाइरेक्ट रिश्तेदार न हूँ, लेकिन फैमिली टर्म्स तो घर जैसे ही हैं. मैंने उससे पूछ ही लिया. "क्या कह रही हो? जैसी होली तुमने खेली मेरे साथ, वैसी मैं अगर तुम्हारे साथ बिना रंग के खेलूँ तो उसका मतलब समझती हो क्या-क्या होगा तुम्हारे साथ? तुम्हारी टी शर्ट में हाथ डाल कोई तुम्हारी बॉडी पर रंग लगाये तो कैसा लगेगा तुम्हें?"

फ़ौरन जवाब में बोली, "आई वुड लव तो हैव सच फन विद यू."

"तुम्हें गुड्डू का ज़रा भी डर नहीं?" मैंने संजीदगी से पूछा.

उसने बेबाकी से बोल दिया, " डरना कैसा? तुम कौन सा बताने जा रहे हो उसे. और देखो मैं तो बहुत फ्रैंक हूँ. तुम मुझे पसंद हो इसलिए तुमसे लिबर्टी लेती हूँ. और तुम वैसे भी मेरे कोई रिश्तेदार तो हो नहीं जो मैं इतना सोचूँ. तुम शायद ज़्यादा रिश्तेदारी के बारे में सोचते हो. माधव, दीज़ सोशल प्रेशर्ज़ किल अस. अरे लाइफ छोटी सी है. मज़े करो आगे बढ़ो."

मेरी तो मानों जान हलक में आ गयी. गुड्डू की बीवी तो लेजेंड निकली. मैंने मन ही मन सोचा की अगर ये इस फिज़िकल अप्पियारेंस में ऐसी सोच रखती है तो कहीं अगर सोशली पॉपुलर रंग रूप और क्वालिफिकेशन होती तो क्या कुछ करती. मैंने जब-जब उससे मज़े लेनी को सोची, रसिका ने उल्टा मुझे ही सरप्राइज़ कर दिया.खैर, मैंने भी कुछ सोचा और रसिका की बात से सहमती जताते हुए उसे थम्ब्स अप वाला इमोटीकॉन भेजा.

फिर हर कुछ दिन बाद रसिका से मेरी चैट होने लगी और मेरे पास एक ओपन रिलेशनशिप का ऑफ़र आ गया था. रसिका लिखती रहती मैं पढता रहता और ज्यादातर इमोटिकॉन से जवाब देता रहता. वर्चुअल वर्ल्ड में हम दोनों के बीच हर तरह की बात हो जाती थी. और रियल वर्ल्ड में फिज़िकल होने का खुला निमंत्रण तो था ही. लेकिन क्यूंकि मैं दूसरे शहर में था और मिलना इतना आसान नहीं था, इसलिए उसकी सम्भावना बहुत कम थी. रसिका को बहुत चाहत थी ऐसी किसी मुलाक़ात की, लेकिन मुझे बिलकुल इच्छा नहीं थी. इनफैकट गुड्डू के टूर गए होने पर मुझे ज़रूर बताती थी की मैं आ सकता हूँ. लेकिन मैं कभी नहीं गया. नहीं-नहीं. वो रिश्ते-नाते वाला प्रेशर नहीं था. तब तक मैं उस रिश्तेदारी वाले लोड से निजात पा चुका था.

रिश्ता वैसे भी एक टू वे कांसेप्ट है. और यहाँ कोई ऐसा वे था ही नहीं.

मेरा इरादा ऐसा कुछ करने का इसलिए नहीं था क्यूंकि मुझे सिम्पल और अनकोम्प्लिकेटेड लाइफ पसंद है. ऐसे कोम्प्लिकेटेड एडवेंचर मेरे बस की बात नहीं. खैर, रसिका के साथ ये चीप वर्चुअल थ्रिल्ज़ मज़ा तो मुझे भी देती थी, लेकिन अंदर ही अंदर बुरा भी लगता था गुड्डू के लिए. बुरा इसलिए क्यूंकि कमबख्त ऐसा अँधा था रसिका के आगे की उसे समझ ही नहीं आता था की उसकी बीवी की फितरत कैसी है. वैसे गुड्डू भी खुद कौन सा शरीफ था. न जाने कितनी लड़कियों के साथ उसके रिलेशन पहले रहे थे.और इस बात से अगले ही पल लगा मेरे अंदर का शौविनिस्ट था जो शायद रसिका को बुरा समझ रहा था. आखिर मर्द भी तो ये सब करते हैं? मैं खुद भी वही सब कर रहा था उसके साथ जो वो मेरे साथ कर रही थी. औरतों के कन्डक्ट को लेकर ही न जाने क्यूँ हम इतने जजमेंटल हो जाते हैं. उनका लिबेरेटेड होना न जाने क्यूँ मर्दों को खलता है? लेकिन समस्या यहाँ ये नहीं थी की औरत लिबेरेटेड थी. समस्या ये थी की औरत शादी-शुदा थी और किसी पराये मर्द के लिए लिबेरेटेड थी.


सरप्राइज़

मैं दफ्तर से निकल ही रहा था की रसिका का फोन आ गया. क्यूंकि हम लोग फोन पर बात करते ही नहीं थे और सिर्फ टेक्स्ट चैट करते थे, उसका फोन देख कर मैं चौंक गया. क्यूंकि दफ्तर से निकल ही रहा था, सोचा कार में ही बात कर लूँगा. "आज फोन कैसे कर लिया तुमने मुझे?" मैंने सीधे सवाल कर दिया."आई नीड योर हेल्प," कुछ मायूसी से वो बोली. उसे पहली बार ऐसे मूड में पाया इसलिए पूछा की आखिर हुआ क्या और क्या मदद चाहिए. मुझे एक बार को लगा की इसकी गुड्डू से लड़ाई हो गयी होगी. अगले पल इस बात का डर लगा की कहीं गुड्डू को हम दोनों की ऑनलाइन बातों का पता न चल गया हो. माजरा जानने को मैं भी बेताब था. दिल में मेरे एक चोर तो था ही."देखो माधव. मैं तुम पर ट्रस्ट कर के बता रही हूँ और इसे अभी अपने तक ही रखना. रवि को नहीं पता लगना चाहिए. उसकी हेल्प नहीं ले सकती इसलिए तुमसे मांग रही हूँ," रसिका ने कहा. मैं सोच में पड़ गया की ऐसी कौन सी बात है जो ये गुड्डू को नहीं बता सकती और मुझसे मदद मांग रही है.मैं बोला, "ठीक है. डोंट वरी. बताओ हुआ क्या?"

"माधव तुम्हारी फ्रेंडलिस्ट में प्रकाश चतुर्वेदी है. उससे कैसे रिलेशन हैं तुम्हारे," रसिका ने मुझसे पूछा. मैं हैरान हो गया प्रकाश का नाम सुन कर. प्रकाश मेरे कांटेक्ट में बस इसलिए था क्यूंकि हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे और हलकी फुल्की बात चीत थी कभी. स्कूल कलेज के सालों बाद फेसबुक पर मिले तो जोड़ लिया. प्रकाश वैसे तो एक लखैरा टाइप लड़का था. पहले भी आवारागर्दी करता था और शायद अब भी ऐसे ही कुछ काम करता था. मैं ठीक से जानता नहीं था उसे. हाँ देखने में ज़रूर ठीक था.

मैंने उल्टा सवाल करा, "तुम कैसे जानती हो उसे?" और साथ ही अगली लाइन में क्लियर किया की मेरा परिचय उससे सिर्फ फेसबुक तक ही है अब."माधव यार उस कमीने से बचाओ मुझे. वी वर इन अ रिलेशनशिप फॉर अ वाइल. फिर मैं अलग हो गयी उससे तो उसने मुझे कुछ मेरे ओब्जेक्श्नेब्ल फोटो दिखाए जो उसने हम दोनों को कोम्प्रोमाइज़िन्ग पोज़ीशन में रहते क्लिक करे थे. वो मुझे अब ब्लैकमेल कर रहा है और बेसिकली चाहता है की मैं उसके साथ वापस फिज़िकल हो जाऊं वरना वो रवि को मेरे फ़ोटोज़ भेज देगा. बताओ मैं क्या करूं माधव?"

रसिका ने एक सांस में सब बोल दिया.ये सब सुन कर मेरे कान सुन्न हो गए कुछ सेकंड को और गले में मानो कुछ अटक गया हो.ये औरत तो मेरी सोच के भी परे निकली. जिन कोम्प्लिकेशन्ज़ को कोई अपनी लाइफ में लाने की सोच भी नहीं सकता, उन कोम्प्लिकेश्न्ज़ को रसिका शायद एन्जॉय करती थी.

मेरी तबियत अचानक घिना गयी रसिका से. मैंने सीधे उससे कहा, "रसिका, आज के बाद मुझे कभी कॉल न करना और न कभी फेसबुक पर कांटेक्ट करना. सामने मिले कभी तो तब-की-तब देखी जाएगी. लेकिन अभी बस रखो फोन तुम." वो कुछ बोलती उसके पहले ही मैंने फोन काट दिया. गुस्से से मेरा खून खौल रहा था. मैंने फ़ौरन फेसबुक पर उसको ब्लाक करा और उसका नम्बर अपने फोन से डिलीट कर दिया. घिन आ रही थी रसिका के ख़याल से ही. उस वक़्त दिल कर रहा था हर वो काम कर दूं की रसिका सी निजात पा सकूं. शायद निजात मिल भी गयी थी उससे. फिर कभी उसने कांटेक्ट नहीं करा.

कुछ दिन बाद अचानक गुड्डू का फोन आया. मुझे डर लगा की कहीं रसिका ने मुझसे बदला लेने के लिए कोई कहानी तो नहीं बना दी और गुड्डू मुझसे लड़ने के लिए फोन कर रहा है. लेकिन मैंने खुद को नोर्मल करते हुए कॉल रिसीव करी. उधर से गुड्डू की मायूस और लड़खड़ाती आवाज़ आई."यार माधव एक काण्ड हो गया. बताओ यार कैसे डील करें." आवाज़ से लग रहा था गुड्डू काफी शराब पिए हुए है. मैंने पुछा, "हुआ क्या?"

गुड्डू ने बताना शुरू करा, "यार नई-नई शादी हुई है और बीवी को पता चल जायेगा तो गज़ब हो जायेगा. बॉस की बीवी को मैं दो साल से टहला रहा था और बॉस की एब्सेंस में हम दोनों फिज़िकल भी कई बार हुए. साला हमेशा प्रोटेक्शन लेते थे न जाने उस दिन क्या हुआ की ऐसे ही कर लिया और शिखा प्रेग्नेंट हो गयी. उसको भी दो-तीन महीने कुछ पता नहीं चला और अब अबोर्शन होना भी मुश्किल है. इधर बॉस को भी पता चल गया है उसकी प्रेगनेंसी और हमारे रिलेशन के बारे में. वो हरामी शिखा को छोड़ने की बात कर रहा है और साला मेरी नौकरी तो ले ही लेगा. और अब शिखा मुझसे बोल रही है की मैं रसिका को छोड़ उससे शादी करूं. बताओ माधव ये भी कोई बात हुई? तूने तो देखा ही है मैं रसिका को कितने अच्छे से ट्रीट करता हूँ और फ्रीडम देता हूँ ताकि न उसे कभी कुछ पता चले और न वो कभी शिकायत करे. लेकिन अब ये कमीनी शिखा मेरा घर बर्बाद कराएगी. भाई बताओ क्या करूं?"

गुड्डू की बातें मैं बस सुनता रहा और खामोश हो गया. उधर से गुड्डू हेल्लो-हेल्लो करता रहा. मैंने कॉल बिना कुछ कहे काट दी. और फोन ऑफ कर लिया. वाकई, एक जैसे ही थे दोनों.


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