पर्वतीय क्षेत्रों से युवा वर्ग का पलायन ,कारण और निदान

"मेखलाकर पर्वत अपार अपने सहस्‍त्र दृग-सुमन फाड़, अवलोक रहा है बार-बार दर्पण सा फैला है विशाल".

महाकवि पन्त ने पर्वत मालाओं की सुन्दरता को लेखनी बद्ध करते समय शायद ही कभी सोचा हो कि इन पर्वत श्रेंख्लाओं से भी कभी पलायन हो सकेगा .पर्वत भूमि का पांचवां भाग घेरते हैं , ये प्रत्येक महाद्वीप में उपस्थित हैं। पर्वतों के बिना संसार की कल्पना निश्चय ही आकर्षण व सम्मोहन से विहीन होती है.हमारें देश भारत में हिमालय पर्वत की श्रृंखलाएँ हैं, जिसमें अनेकों चोटियाँ, सुंदर घाटियाँ व महाखड्‌ड हैं। इसकी पूर्व-पश्चिम लंबाई लगभग 2,500 किलोमीटर तथा उत्तर से दक्षिण इसकी चौड़ाई 160 से 400 किलोमीटर है। हिमालय पर्वतमाला में भी अनेक क्षेत्रीय विभिन्नताएँ हैं।

आज विकास, आस्था और पर्यावरण के इस फरेब के बीच पर्वतीय प्रदेशों के दर्द को समझा जाना बहुत आवश्यक है।आज बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि हर राज्य के सीमांत क्षेत्रों से युवा पलायन जारी है, परंतु उनकी इस पलायन का सही आंकड़ा सरकार जनता के सामने नहीं लाना चाहती। जबकि उसे पर्वतीय क्षेत्र की जनता एवं सरकार को पर्वतीय सीमांत क्षेत्र से हो रहे पलायन और पर्वतीय क्षेत्र के अवरुद्ध विकास पर विचार करना चाहिए|

यह तो मानना होगा कि युवा पलायन ,प्रदेश एवं देश की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा है।पलायन का कारण है पर्वतीय क्षेत्र में विकास की कमी है. सड़कें,बिजली एवं पानी का अभाव है। सभी सरकारों ने पर्वतीय क्षेत्र के विकास के लिए केवल नीतियां बनाई, जो केवल कागजों में सिमट कर रह गई हैं, जिससे बेरोजगार परिवार रोजी-रोटी के लिए पलायन करने को मजबूर हो गए।

अब इस पलायन कि क्या प्रमुख वजह है यह जानने का प्रयास करेंगे---

१. बड़े बड़े बाँध जैसी योजनाओं और अन्यत्र परियोजना के तहत ,बहुत जल्दी, बहुत ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए;विकास का जो सपना सरकारें दिखाती रही हैं उसकी आड़ में एक बड़ी आबादी को उजाड़कर मुनाफाखोर अब जनता को जनता के खिलाफ ही खड़े करने की साजिशें करने में लगे हैं।

२.खेती , पशुपालन और ग्रामीण दस्तकारी पर लंबे समय तक आत्मनिर्भर रही अर्थव्यवस्था मूलतः वनों पर आश्रित थी. मगर अंग्रेजों और बाद में हमारे शासकों द्वारा वनों से जनता के अधिकार खत्म करते जाने के चलते इस अर्थब्यवस्था ने दम तोड़ना शुरू कर दिया.

३.कृषि क्षेत्र के विस्तार पर लगी रोक और बढ़ती कृषक आबादी के बीच लगातार बंटती जमीन ने पर्वतीय क्षेत्र के किसानों को भूमिहीन की स्थिति में पहुंचा दिया है . आज पहाड़ में औसतन प्रति परिवार आधा एकड़ कृषि भूमि ही किसानों के पास बची है. कृषक आबादी के भूमिहीनता की स्थिति में पहुंचते जाने और रोजगार के कोई नए क्षेत्र विकसित न होने के कारण ग्रामीणों युवा के सामने रोटी के लिए पलायन ही एकमात्र रास्ता बचा रह गया है .

४.उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी पहाड़ की कृषि को रोजगारपरक बनाने के लिए एक ठोस नीति बनाने के बजाय कांग्रेस – भाजपा की सरकारों ने कृषि क्षेत्र पर हमले तेज कर दिए. कृषि क्षेत्र के लिए आधारभूत ढांचागत सुविधाएँ उपलब्ध कराने और राज्य द्वारा पूंजी निवेश को बढ़ावा देने की नीति के उलट ऊर्जा प्रदेश , इको ट्यूरिज्म और औद्योगिकीकरण के नाम पर किसानों की जमीनों को कारपोरेट घरानों और पूंजीपतियों के हवाले कर उन्हें विस्थापित किया जा रहा है.

५.कृषि क्षेत्र के विकास और राज्य की ७५% ग्रामीण आबादी की आजीविका की सुरक्षा के लिए जिन प्राथमिक कदमों को उठाने की राज्य सरकारों से उम्मीद थी वो उनके एजंडे से पूरी तरह गायब हैं.

६ पहाड़ में पिछड़े किस्म के भूमि सम्बन्ध और अति पिछड़ी उत्पादन पद्धति में किसी तरह के बदलाव की कोई कोशिश नहीं की गई. इसके चलते खेती लगातार अलाभप्रद और अरुचिकर होती गई. राज्य बन जाने के बाद भी स्थितियों में कोई बदलाव आता न देख आज बड़े पैमाने पर युवा वर्ग पलायन को मजबूर हो गए हैं..

हमें क्या करना होगा ---

१.जमीनों पर श्वेत पत्र जारी करे सरकार---पहाड़ में लगातार बंजर होती खेती को आबाद कर कृषि को रोजगार परक बनाना होगा . उसे मनरेगा योजना से जोड़ना आवश्यक है. इसमें खासकर बंजर खेतों को आबाद करना , खेतों के बीच की टूटी दीवारों का निर्माण, झाड़ी काटन , कृषि भूमि की चार दिवारी (सुरक्षा दीवार ) का निर्माण, सिंचाई के लिए बरसाती टेंकों का निर्माण जैसे कार्य को प्रमुखता दी जाय .

२. स्थानीय पशु नस्लों का सुधार और पर्वतीय क्षेत्र में पैदा हो रहे पूर्णतःजैविक दुग्ध का जैविक मूल्य किसानों को नहीं मिल रहा है. इन तमाम समस्याओं के समाधान के साथ हर गांव को दुग्ध समितियों से जोड़कर इस क्षेत्र में रोजगार की व्यापक संभावनाएं तलाशी जा सकती है.

३.पहाड़ों पर डेम या बांधों का बनाना इस तरह की परियोजनायें ठेकेदार और दलाल तो पैदा करती हैं लेकिन रोटी पैदा नहीं करतीं। हर परियोजना पर्यावरणीय विनाश के साथ विस्थापन और पलायन लाती है। यही वजह है कि दुनिया के तमाम देश अपने यहां बने बांधों को तोड़ रहे हैं। वे अपने यहां ऊर्जा के नए स्रोत तलाश रहे हैं। यह तथ्य हम अपने ही आसपास कोरबा, सोनभद्र या उन अनेक उदाहरणों से पा सकते हैं

कुल मिला कर यहाँ यह कहना जरूरी है कि युवा विस्थापन या पलायन को रोक कर ही हम देश को विकास और प्रगति की ओर ले जा सकते हैं .सरकार इसे गम्भीरता से लें और निस्वार्थ भाव व् समर्पित इच्छा शक्ति से आज तक हुई क्षति से देश की युवा पीढ़ी को बचाएं .

दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों से में अपनी बात को विराम देते हुए कहूँगी ---

" सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। "

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