अहा! जिन्दगी

“सुन जीनत, हम फटाफट खाना निपटा लेते हैं, अभी-अभी खबर आई है कि मुख्य अतिथि एक घंटा लेट चल रहे हैं.” अर्चना ने बहाने से मुझे ऑडिटोरियम के कोने में ले जा कर कहा तो मेरा ध्यान घड़ी की और गया. अल्लाह! ग्यारह बज रहे हैं. दिसम्बर की ठंड में सुबह के आठ बजे से कॉलेज आ कर काम में लगे कब ग्यारह बज गए, मालूम ही नहीं चला.

किसी छोटे से कस्बे में सरकारी कालेज का छात्रसंघ उद्घाटन समारोह एक बहुत बड़ी घटना होता है, जिसमे वहाँ का हर स्थानीय तुर्रम खां इन्वॉल्व होता है, और अगर उसमे कोई राष्ट्रीय स्तर की हस्ती मुख्य अतिथि बन कर आ रही हो तो भगवान ही मालिक है. उस पर भी मंत्री केन्द्रीय स्तर का हो तो फिर भगवान भी केवल दीप-प्रज्ज्वलन तक ही सीमित रह जाता है.

इन्हीं मंत्री जी की आमद के चलते दो दिनों से कसबे के कितने तो स्थानीय नेता और कितने ही एलू-फेलू लोग प्रिंसिपल-रूम में धरना दिए हुए है, हर कोई मंत्री जी का खासमखास और स्टेज पर जगह पाने की हकदारी का परचा लिए घूम रहा है. लोकल मीडिया, प्रशासन, पुलिस और छात्रसंघ के सदस्य अपना-अपना रुतबा झाड़ रहे है सो अलग. ऐसे में प्रिंसिपल से लेकर चपरासी तक सब के प्राण हलक में आए हुए हैं. सब प्राणपण से काम में जुटे हैं, किसी तरह ये कार्यक्रम शांति से निपट जाए तो जान बचे.

कॉलेज की सांस्कृतिक समिति के सिर पर पर सरस्वती-वंदना, स्वागत-गीत, नृत्य, रंगोली वाली टीम तैयार करवाना, उनकी प्रेक्टिस देखना जैसे ढेरों काम एक साथ होते हैं. पिछले पाँच वर्षों से ये काम मेरे ही सिर आता रहा है तो इस बार भी क्यों कर बचती. हडबडी में तय हुए इस समारोह के लिए हमे तीन ही दिन मिले हैं जिसमें मैं, अर्चना और परवीन जी-जान से लगे हुए हैं.

इतने कम समय में लगभग ग्रामीण, अनगढ़ छात्राओं से समूह नृत्य और एकल गीत तैयार करवाने के लिए जिस कदर मशक्कत होती है ये वही समझ सकता है जो इससे गुजरा हो. खैर, अब जैसा भी हो, शांति से ठीक-ठाक हो जाए बस. क्योंकि उसके पहले तो सबसे बड़ी चिंता समारोह के समय छात्रसंघ-विरोधी ग्रुप के हुडदंग की होती है. अगर एक बार नारेबाजी होने लगे तो सारा करा हुआ धरा का धरा रह जाता है, फिर उस समय केम्पस के चप्पे-चप्पे पर तैनात ये पुलिस-फ़ोर्स भी कुछ नहीं कर पाती.

खैर, रंगोली तैयार है, पूजा के लिए सरस्वती-प्रतिमा भी मंच पर पहुँच गई है. ‘अरे, इस पर कितनी धूल जम रही है, किसी चपरासी को बुला के इसे गीले कपडे से साफ़ करवाना होगा.’ मैंने तेजराम को निर्देश दिया और ग्रीन रूम की ओर झाँका, स्वागत की लडकियाँ लगभग तैयार हैं. अब गीत ओर नृत्य की लड़कियों को तैयार करना बाकी है, मैं इनके साथ ही मंच-संचालन-कार्य भी देख रही हूँ. जिसकी तो कोई तैयारी ही नहीं है. ऐन वक्त पर ही कुछ कर लूँगी.

मौके की नजाकत को देखते हुए भी हमें पापी पेट का भी ध्यान था और अभी चूकने पर तीन बजने ही थे सो मैंने भी अपने सूत्रों की मदद से एक बार दुबारा कन्फर्म कर लिया कि अर्चना पक्की खबर लाई है तो हम लेडीज टीम ने फटाफट टिफिन का ठंडा खाना गटक लिया. चलो एक काम तो निपटा, अब जरा कल्चरल प्रोग्राम वाली लड़कियों को संभाला जाए. ‘या मौला, सब खैर हो.’ मैंने दुआ पढ़ी और ग्रीन रूम में एंट्री ली.

वहाँ उठ रहे कोलाहल ने आसमान सिर पर उठा रखा है. कोई लड़की बाल बिखेरे खड़ी है तो कोई नकली चोटी को चाबुक की तरह घुमा रही है, कोई टाईट करघनी को पहनने के लिए कमर से कुश्ती लड़ रही है तो किसी की पेन्सिल सी कलाई में कंगन नही ठहर रहा. किसी के हाथ में ब्लशर है तो कोई आइब्रो पेन्सिल न मिलने से रुआंसी हो रही है. चारों तरफ लहँगे-ओढ़नी, कुर्ती-कांचली बिखरे पड़े हैं. शहरी कालेजों की तरह यहाँ कोई मेक’प मेन तो आता नहीं, केमिस्ट्री डिपार्टमेंट की दिव्या शर्मा और समाजशास्त्र की किरण सिंह कम उम्र फेकल्टी हैं सो लडकियों को तैयार करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर है.

वो दोनों लगी हैं लेकिन उनकी बेचारी सी शक्लें देखते ही समझ आ रहा है कि शोर, मस्ती, असंतोष और नॉन स्टॉप शिकायतों के इस के सैलाब में उनका कौशल, धीरज और ऑंखें सब बह जाने को उद्धत है. मुझे देखते ही लड़कियों का सैलाब मुझ पर लपका और उनके सिर पर उठा आसमान शोर से घबरा कर जमीन पर आ गिरा.

“मेम, मुझे नहीं नाचना, इतने गहने और ये लहँगा मुझसे नहीं सम्भलेगा.” दुबली-पतली, छोटी बच्ची सी माहरूख की बड़ी-बड़ी आँखों में सच वाले आँसू भरे हुए हैं. “माहरूख, कैसी बातें कर रही हो, तुम ग्रुप में हो, तुम्हारी प्रेक्टिस है, अब ऐन वक्त पर किसे तैयार करेंगे?” मुझे झुंझलाहट हो रही है, लेकिन माहरूख के पास जवाब तैयार है, “मेडम, ये दीपाली है न, ये तीनों दिन से हमारे साथ ही प्रेक्टिस में आती थी, इस ने सब सीख लिया है तो ये नाच लेगी.”

“फालतू बात नहीं करो, चुपचाप ड्रेस पहनो...” मन तो थप्पड़ ज़माने का हो रहा है लेकिन उसकी आँखों में अटके आँसुओं से चेत कर मैंने अपने सुर में रस घोला “और किरण मेम हैं न, वो खूब सारे पिन लगा के तुम्हारी ड्रेस और ज्यूलरी सेट कर देंगी, फिर कुछ नहीं होगा. बी ब्रेव, तुम तो इतना अच्छा डांस करती हो. आ जाओ बच्चे.. शाबास. किरण... माहरूख को ध्यान से तैयार करना भई.” उफ्फ...मैंने चुपके से शांति की साँस ली. शुक्र है देवी मान गई. लेकिन मेरी शांति क्षण-भंगुर निकली.

“मेम, देखो, मेरी आँख के नीचे कीड़े ने काट लिया, मुझे तो इस आँख से कुछ दिख ही नहीं रहा है, नाचूंगी कैसे?” मैंने उगन्ता की ओर देखा, बाप रे, ये तो सचमुच ललिता पवाँर बनी हुई है. क्या करूं?

“सबसे पहले तो आँख मलना बंद करो, और ठीक से इस जगह को डिटोल से क्लीन कर लो. ज्यादा दर्द हो तो एक पेन किलर दे दूंगी, तुम डरो नहीं, कुछ नहीं होगा. दिव्या जी, उगन्ता की इस आँख में ज्यादा गहरा काजल लगा देना.” मैंने उगन्ता को नहीं खुद को पुचकारा.

“मेडम जी, आपने सा’ब याद कर रिया है.” दरवाजे के बाहर से रामधन चपरासी ने हाँका दिया. “किरण जरा देखना, मैं अभी आती हूँ.” किरण को कहते हुए मैं गर्ल्स रूम से बाहर निकल गई लेकिन उगन्ता की सूजी हुई आँख मेरे ध्यान से बाहर नहीं निकली. कितनी ललाई ओर सूजन है, कहीं ज्यादा बढ़ गया तो क्या करेंगे. कसबे के बाहर इस जनहीन इलाके में दो किलोमीटर तक तो कोई क्लिनिक भी नहीं, न ही कोई मेडिकल स्टोर है और इस छोटे से कालेज के फर्स्ट एड किट में क्या होगा, जिन्दा होगा या एक्सपायर होगा, ये भी भगवान ही जाने.

“मैडम, बच्चियों के खाने का क्या करना है?’’ प्रिंसिपल की बंदूक से सीधी सवाल की बुलेट निकली, और पीछे-पीछे सूचना का गोला भी आ गिरा “क्यूंकि मेहमान तो तीन बजे के पहले नहीं आने वाले. सारा दिन बच्चियों को भूखा तो नहीं रख सकते न.”

‘हांय...!! तीन बजे?? लाहोल विला... प्रोग्राम खत्म होते-होते साढ़े चार बजेंगे, मतलब आज तो कॉलेज में ही पाँच बजना पक्का है. मेरा दिमाग समय के मीजान में उलझ रहा है पर कर्तव्यपरायण जीभ ने प्रिंसिपल को सुलझा हुआ जवाब दिया “जी, सर वो दस बजे चाय और समोसे खिला दिए थे. ”एक समोसे से सारा दिन कैसे गुजरेगा मैडम, आप किसी से कह के दो-तीन किलो केले मंगवा लो इनके लिए.”

‘सारे काम सांस्कृतिक समिति ही कर लेगी तो तुम किस लिए ये कुर्सी तोड़ रहे हो मोटे.’ मन में भुनभुनाते हुए मैं मरे कदमों से गर्ल्स रूम में आकर खड़ी हो गई. मेरे मन में तीन बजे ही चल रहा है.

‘तीन बजे!! क्यों इन तथाकथित विद्वान देश के कर्णधारों को किसी के समय की कोई चिंता नहीं होती. नेता बनते ही ये सारी दुनिया के समय को अपना बंधुआ समझ लेते है क्या?’ इस शोचनीय विषय मैं कुछ और भी गहन चिंतन-मनन करती लेकिन छात्राओं को मेरा दार्शनिक बनना मंजूर नहीं था. नेहा गुर्जर की जिद्दी आवाज ने मेरी साधना भंग कर ही दी.

“मैं नहीं पहनूँगी ये कांचली, मेरी भाभी कह रही थी तू इसमें गंवार लगेगी.” उसके हाथ में सिल्वर कलर का डिजाइनर ब्लाउज है और कालबेलिया ड्रेस के काले ब्लाउज को वो गहरी घृणा की नजर से देख रही है. “नेहा प्लीज.....ड्रेस की कन्टीन्यूटी पर रहम करो और चुपचाप काँचली पहन लो.” नेहा ने मेरी ओर जहर बुझी निगाह से देखा लेकिन पता नहीं क्या सोच कर ब्लाउज़ पटक कर काँचली उठा ली. उफ्फ्फ!! मैंने शांति की साँस ली, लेकिन पूरी साँस भी कहाँ ले पाई.

“जीनत मेम, हमारे पीरियड्स आ गए. पेट दुख रहा है, उलटी आ रही है.“ ये लो नई आफत. लडकी के उतरे हुए चेहरे को देख कर समझ आ रहा है कि वो झूठ नहीं बोल रही. “घबरा मत बेटे, कुछ नहीं होगा मैं दवा देती हूँ न. नेपकिन हैं या मैं दूँ?” औरत हूँ, जानती हूँ कि ऐसे समय में एक औरत किस दर्द से गुजरती है, लेकिन मैंने स्वार्थी हो कर उसे फुसलाया और सेनिटरी नेपकिन के साथ पेटदर्द की एक गोली निकाल के पकड़ा दी. चपरासी बिस्किट और केले ले आया था, अधिकांश छात्राओं ने खाने से मना कर दिया. कुछ ने घबराहट में और कुछ ने लिपस्टिक ख़राब होने के डर से.”

“अरे बच्चियों खा लो, भूखी मर जाओगी. मंत्री जी तो बीच में किसी उद्घाटन के लिए अटक गए हैं वो चार बजे के पहले नहीं आने वाले.” कमरे में चाय लिए घुसती रामप्यारी ने न्यूक्लियर धमाका किया. सुनते ही जो होना था वही हुआ, लडकियाँ बिदक गई और हम अपना गम भूल कर उन्हें मेनेज करने करने में लग गए.

“चार बजे!! मतलब छह बजे यहाँ से निकल के सात बजे बजे घर पहुंचूंगी...? मेरे घर वाले तो मार ही डालेंगे. मुझे नहीं करना डांस-वांस.” मीरा ने रामप्यारी की बात सुनते ही चूडियाँ उतारना शुरू कर दिया. वो पन्द्रह किलोमीटर आगे के किसी गाँव से आती है सर्दियों में शाम भी तो कितनी जल्दी झुक जाती है, इसका कहना सही है.

“तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें घर भी छुडवा दूंगी और तुम्हारी मम्मी से भी अभी बात कर लूँगी.” बहुत फुसलाने पर देवी जी किसी तरह मानी, लेकिन उसका तेवर फिर भी नाराज़ ही है.

“मैडम, वो लड़के हमारी रंगोली छेड़ रहे हैं.” बीएससी की रत्ना गुस्से में तमतमा रही है, उसके गाल ही नही कपड़े और बाल भी गुलाल से हरे-गुलाबी हो रहे हैं. उसकी शिकायत सुनने के बहाने मैं उसके पीछे-पीछे बाहर पोर्च की तरफ आ गई. दरअसल पौष के महीने की कड़ाके की ठंड में बाहर की गरम मीठी धूप चाय जैसी लगती है जिसका सेवन सब किसी न किसी बहाने कर ही लेना चाहते हैं.

पोर्च और उसके बाहरी बगीचे में झुण्ड में घूमते स्टूडेंट्स गुच्छे में बंधे फूलों की तरह खिले पड़े हैं. सब विशेष परिधानों में सजे-धजे, खास कर लडकियाँ, शायद ही किसी ने स्वेटर पहना हो. हम ही इस उम्र में कब पहनते थे, सर्दी भी जवान खून से डरती है. मुझे अपना जमाना याद आ गया.

“मेम, मेम, मेम... प्लीज मेम! आप जरा हमारा भाषण एक बार ठीक कर दो न, हमे डर लग रहा है.” रघुवीर मुझे देखते ही मेरी और दौड़ा. गाँव-कस्बे के बच्चे शहर के स्मार्ट बच्चों से अलग होते हैं, सरल और पारदर्शी. “तुम स्टूडेंट यूनियन के प्रेजिडेंट हो और तुम्हारा भाषण मैं लिखूं?” मैंने आँखें तरेरी, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ा, वो खुशामद-चिरोरी करता रहा, जब तक कि मैंने उसके हाथ से कागज नहीं ले लिया.

गेट के सामने ठीक सामने पोर्च में बनी बड़ी सी रंगोली बड़ी सुंदर लग रही है. सामने पसरे विशाल मैदान में मंच, मंच के आगे कॉलेज की बोनी सी सरहद ओर उसके बाहर दूर-दूर तक फैला सन्नाटा है. गोचर जमीन पर बनी इस बिल्डिंग के आसपास जरा दूर से जाती एक पतली सडक के अलावा कोई खेत-बस्ती नही है. बस यहाँ-वहाँ लहराते आक-बबूल की नाटी सी हरियाली दीख रही है. “लो भागो, मेहमान आने के पहले बहुत काम है मुझे.” जितना सम्भव था, सुधार कर के कागज मैंने उसकी ओर बढ़ाया.

“मैडम आप चिंता मत करो, मंत्री जी साढ़े चार बजे के पहले नहीं पहुँचेंगे यहाँ.” रघुवीर ताबूत की आखिरी कील ठोक के कान में मन्तर फूंकती मोबाइल रुपी कर्णपिशाची के प्रेम में डूबा एक ओर चला गया. ‘अल्लाह!! साढ़े चार...’ मुझे कुछ नहीं सूझा तो फिर से गर्ल्सरूम में चली आई. वहाँ वही आपाधापी और असंतुष्टियों का बाजार गरम है.

“छी.. कितनी भद्दी लग रही हूँ मैं। इससे पहले मुझे खुद से इतनी नफरत कभी नहीं हुई.” ग्रीन रूम के गेट पर खड़ी अनु मोरवाल किसी भी समय रोने को एकदम तैयार है. ”नहीं अनु, तुम तो इत्ती प्यारी लग रही हो। आओ मैं काला टीका लगा दूँ.” दिव्या जी उसे पटाने में लगी हैं.

“मेम, मैं नकली चोटी लगाऊंगी और आगे भी रखूँगी, नेहा की जिद्दी आवाज ने फिर तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं. ये लड़की जितनी अच्छी डांसर है उतनी ही बुरी अड़ियल है, जन्मजात पेम्पर्ड. मन तो कर रहा है इसे कालेज की बाउंड्री के बाहर छोड़ आऊँ पर इस समय उसका डांस हमारी मजबूरी है सो किसी तरह खुद पर काबू रख कर उसे काबू किया. लगभग आधे घंटे में सब लडकियाँ तैयार हो गईं और अब नये सिरे से परेशान होने-करने लगीं हैं.

“अच्छा, तुम लोग अब फाइनल रिहर्सल कर लो.” उर्मिला जी ने रास्ता खोजा. सही है, ये खाली चिड़ियाएँ कुछ तो बिजी हों. मुख्य-अतिथि के आधा घंटा लेट आने की बात मैं पी गई, इसी में भलाई थी.

“नेहा, तुमसे कहा न ये स्टेप तुम्हें साइड में झुकते हुए करना है, तुम समझती क्यों नहीं?” नेहा का अभी-अभी जनरेट हुआ ये नया ठुमका मेरा माथा ठमका रहा है. सूरज वैसे ही सुबह से ठंडा-ठंडा है, अब और भी ठंडा होने लगा है. लगता है इसे भी चाय की तलब लग रही है, मुझे हँसी के साथ ही फिर से चाय याद आ गई... काश एक प्याली चाय मिल जाती. लेकिन अब, इस समय किसी को कहने का कोई फायदा नहीं. मैंने बाहर झाँका.

बरामदों में घूमते बच्चे और मेहमान अब कुर्सियों पर बिठा दिए गए है जिनमे लड़कियों की तादाद कम दिख रही है. सुखलाल बार-बार ‘हेलो, माइक टेस्टिंग हलो.’ बोल के जा रहा है. मुझे अब कुछ भी नहीं भा रहा है, क्यूंकि दिन ढल रहा है और ठंड बढती जा रही है. सुबह दस बजे से आए बच्चे भी अब हंस-बोल के थक चुके हैं.

“आ गए, मंत्री जी, आ गए” अचानक हल्ला उठा और पल भर में सब कुछ बदल गया. मेहमानों का स्वागत करने वाली लडकियाँ मंत्री जी के साथ आए मेहमानों, मेजबानों और मीडिया की भीड़ में दबी जा रही हैं और बच्चियों की तीन घंटे की मेहनत से बनी सतरंगी रंगोली पल भर में धूल के साथ धूसर रंगी हो कर पैरों में बिखर गई है.

कार्यक्रम पहले ही खासा लेट हो चुका है, मुख्य अतिथि, और विशिष्ठ अतिथि दोनों को जाने की जल्दी है सो चाय-पानी की औपचारिकता में पड़े बगैर प्रिंसिपल साहब मेहमानों के साथ मंच पर चढ़ गए. मैं जगह बना के अनाउंसर टेबल पर पहुंची तब तक डॉ अरुण अनाउन्समेंट शुरू कर चुके थे. हमें मालूम था कि समय कम है और हमें कम से कम बोलना है सो हम शब्दों की लफ्फाजी पर माथा-पच्ची किये बगैर फटाफट बोलते रहे.

बिना देर लगाए सरस्वती पूजन हो गया, साथ ही छात्राओं ने ‘वर दे, वीणा वादिनी वर दे...’ भी निपटा दिया और मेहमान अपना स्थान ग्रहण करें तब तक धर्मा स्वामी की मीठी आवाज में गूंजता स्वागत गीत ‘केसरिया बालम, आओ नी...’ लगभग खत्म हो चुका था. पर अभी तो मात्र सरस्वती-वन्दना और स्वागत गान हुआ है, पुष्प भेंट के बाद सारे अतिथियों के भाषण और दोनों नृत्य अभी बाकी हैं.

स्वागत की औपचारिकता भी हम जितनी हो सके पूरी कर लेना चाहते हैं लेकिन छात्रसंघ अध्यक्ष अचानक अपने जलवे पर आ गया और प्रिंसिपल की नज़रों की अनदेखी करते हुए एक के बाद दूसरे स्थानीय नेता से मंत्री जी का माल्यार्पण करवाए जा रहा है. छात्रसंघ, स्थानीय नेताओं और स्थानीय लोगों की जलवा गिरी के इस बेबस समय में हम दांत पीस कर तालियाँ बजाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते ये बात प्रिंसिपल सहित हम सब जानते हैं. तेजी से ढलते दिन की ठंडक में भी मेरा खून गरम हो रहा है, सिर दर्द से फटा जा रहा है, एक कप चाय मिले तो कुछ राहत मिले. “अभी सूरज अस्त हो जाएगा तो बच्चों को मेनेज करना मुश्किल हो जाएगा.” डॉ अरुण बुदबुदा रहे हैं और लडकियाँ जाने की फिराक में कसमसा रही हैं.

खैर, इस फालतू खर्चे जैसे उडाए समय की भरपाई जहाँ होनी थी वहीं हुई, कुशल गृहस्थन की तरह प्रिंसिपल साहब ने भी अपना भाषण संक्षिप्त किया और स्थानीय नेताओं को भी चिट के संकेत से संक्षिप्त बोलने के निर्देश दिए गए. जिसे कुछ ने माना कुछ ने नहीं माना.

न मानने वालों के समय का हरजाना तो कालेज को ही भरना था. कटौती की गाज गिरी छात्राओं की कड़ी मेहनत पर, तन्मय होकर नाचती छात्राएं भोंचक्की रह गई जब ‘धरती धोरां री...’ अधबीच में ही रूक गया. अधिकांश लडकियां सुबकते हुए स्टेज से उतरी और नेहा तो गुस्से में अपनी नकली चोटी वहीं फेंक आई है. मुझे और दिव्या जी को भी बहुत बुरा लग रहा है पर बुरा लगाने के अलावा हमारे पास कोई उपाय भी तो नहीं.

अब मुख्य अतिथि अपना उद्बोधन दे रहे हैं, जितना हो सकता है उतना संक्षिप्त उद्बोधन. अंत मैं स्मृति-चिन्ह और धन्यवाद ज्ञापन रह गया. उफ्फ, फिर से स्मृति-चिह्न लेने-देने वालो की लम्बी लिस्ट... प्रिंसिपल साहब भी अपनी कनपटी सहला रहे हैं. सूरज तेजी से अपने घर जा कर सो जाना चाह रहा है तो ठंड को उससे भी ज्यादा जल्दी है कि वो सूरज की खाली की हुई जगह घेर ले. प्रिंसिपल साहब जितनी जल्दी सम्भव हुआ उतनी जल्दी धन्यवाद की औपचारिकता पूरी करने में लगे हैं.

अचानक मेरी नजर सामने पसरे निर्जन एकांत पर पड़ी. सुरमई गगन में उमड़ता-लहराता ये कजरारा सा समुद्र... खाली कोख धरती, सूनी माँग सी पगडंडियां और सिर पर तना ये काला बंजर सागर... मन पर एक उदासी सी छाने लगती है। थके-अकेले मन को ढलती शाम का एकांत अवसाद घेर लेना चाहता है कि... अचानक उस सुरमई सागर की सबसे ऊपर वाली बंजर लहर से रोशनी का अंकुर फूटा और एक ही क्षण में सब कुछ अनिर्वचनीय अनुभूति में, एक गौरवमय शांति में बदल गया.

सामने एक शांत निस्पंद विराट खुला हुआ है जिसमें पश्चिम क्षितिज से तनिक ऊपर एक विशाल सिन्दूरी गोला दमक रहा है. जैसे सूरज की पेट पोंछनी संतान... कैसा दिप-दिप हँसता... प्रेम सा लुभाता और ममता सा बांधता... उसके आने से सूनी-उदास क्षितिज रेखा नवप्रसुता वाला पीला चीर ओढ़ के खिल गई है। ये सूरज की सिन्दूरी छटा...प्रकृति का ये अनिन्द्य वैभव अनुपम है.... इसी बीच डॉ अरुण ने राष्ट्र गीत की उद्घोषणा कर दी.

‘जन-गण-मन अधिनायक जय है.. और उस क्षण में हम ही नहीं जैसे कायनात का सब कुछ राष्ट्रगीत के सम्मान में शीश झुकाए शांत खड़ा हो गया है. अस्ताचल गामी सूरज का गोला, देह को चिकोटी काट कर भागती हवाएं, बादली समुन्दर की फेनिल लहरे...सब कुछ निष्पंद, अपनी-अपनी जगह ठहर गया है, दिशाओं के कंठ से भी वही सूर फूट रहा है “तव शुभ नामे जागे...तव शुभ आशीष माँगे..’ मेरे मन से सारे दिन की ऊब, थकन और तनाव तिरोहित हो गए हैं, अब यहाँ शब्दहीन असीम शांति का साम्राज्य है. थकान से मुरझाए चेहरों पर सिन्दूर सा बिखर गया है जैसे कुदरत अशेष हाथो से हम पर अपना आशीष लुटा रही है. ऐन डूबते हुए सूरज के सामने स्वयं को 'जन गणमंगल दायक..’ गाते हुए देखना अद्भुत और गौरवशाली है.

‘जय जय जय जय है.’ राष्ट्रगीत के समापन के साथ ही उसे सलामी देकर सूरज भी क्षितिज की सीट पर बैठ गया है और एक कोलाहल के साथ ही ये सारा जादू भी अपने घर लौट गया. प्रकृति के दिए हुए ये जीवन के नये इशारे लेकर हम लोग भी घर लौटने की तैयारी करने लगे हैं.

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