मल्टीनेशनल कम्पनियों में सोमवार की सुबह कुछ अलसाई सी होती है और शुक्रवार का अपराह्न नवयवना सी अल्हड़ । सोमवार को जहाँ कर्मचारी विगत दो दिवसीय छुट्टियों के उनींदे खुमारी से बाहर आने के लिये कॉफी के मशीनों पर जुटे रहते हैं वहीं शुक्रवार को आनेवाले दो दिवसीय छुट्टियों का जश्न अपराहन से ही शुरू हो जाता है । कॉफी की मशीनों पर भीड़ इस दिन भी बढ़ जाती है । यूँ तो इस जश्न में मैं भी शामिल होता रहता हूँ लेकिन इस सप्ताह बात कुछ और थी । मैं अगले सप्ताह खत्म होनेवाले प्रोजेक्ट की अंतिम तिथि और प्रोजेक्ट के उलझे नतीजों में अपना सिर खपाये बैठा था । दोपहर के भोजन के बाद नींद ना आये इसलिए काली कॉफी का एक प्याला आधे घंटे पहले ही गटक चुका था । आँखें कंप्यूटर के स्क्रीन पर गड़ीं थीं और उँगलियाँ कीबोर्ड पर गतिमान । ऑफिस की उथल-पुथल के बीच मैं प्रोजेक्ट की खामियों को ठीक करने मे लगा था । सहसा मेरे मोबाइल के कंपन ने मेरी चेतना को दोलित कर दिया । स्क्रीन पर भारतीय कोड इक्यानबे के बाद के दस और नंबर ।

लैंडलाइन के जमाने में सैकड़ों फोन नंबर जबानी थे लेकिन इस मोबाइल के आने से यादाश्त की सीमा संकुचित हो चुकी है । यहाँ तक कि अपने घर का भी नंबर मोबाइल से खोजकर बताना पड़ता है । मैं ऑफिस के समय अन्जाने नम्बर पर बात कम ही करता हूँ और प्रायः उन्हे अस्वीकृत करना बेहतर समझता हूँ... लेकिन यह दस नम्बर कुछ जाना पहचाना सा लगा । अंतिम के चार अंक क्रम में थे । हाँ ये वही नम्बर था जिसे मैं अपने फोन से... नहीं नहीं अपने याद से, अपनी ज़िंदगी से हटा चुका था । चार वर्ष गुजर गए थे, और आज इस समय फिर से... फोन लगातार बजे जा रहा था और मैं असमंजस में था कि क्या करूँ । इसी बीच फोन कट गया... शायद एक समय सीमा के बाद । मैंने सुकून की सांस ली ... लेकिन फोन का कंपन फिर आया । एक मैसेज था ना चाहते हुये भी खोला । सिर्फ चार शब्द ‘प्लीज, फोन उठा लो’...

अचानक ही बीते जीवन के कुछ घटनाक्रम तेजी से आँखों के आगे घूम गए । छोटे से शहर में जहाँ हर आँख एक दूसरे की पहचान रखता है वहाँ दो धड़कनों की मिलती जुलती गूंज नगाड़े की तरह मुनादी करती है । लोगों की नजरें जाने अंजाने इन धड़कनों का पीछा करती हैं । कुछ बातें हवा में तैरनी शुरू होती हैं और ना जाने कब परमाणु विस्फोट से बने खुंभी के छत्ते की तरह पूरे वातावरण को घेर लेती हैं जिनमें घुटन और असह्य पीड़ा होती है । हमें ऐसे ही घुटन से गुजरना पड़ा । आखिर क्यूँ ना होता... समाज कैसे स्वीकारता एक परित्यकता के साथ किसी के इस तरह के मेल जोल को । लेकिन उसकी भी क्या गलती थी ? साथ में खेल कूद बड़े हुये । बड़े क्या बस अभी बचपन बीते गिनती के कुछ साल ही तो हुये थे । उसके माँ-बाप ने परदेश में बढ़िया रिश्ता देख ब्याह कर दिया । पैसे कि कमी नहीं थी दान दहेज देकर अपने से कुछ साल बड़े वर के साथ अबोध बच्ची को विवाहिता बना दिया गया । कुछ टूट गया था मुझमें ।

छह महीने बाद वापस आई तो दो नन्हें कदमों को धरती पर लाने के लिये अपने शरीर का आश्रय बना चुकी थी । शरीर से आधी हो चुकी आँखों के आगे काले गड्ढे कुछ ऐसा ही देखा था जब वो अपने घर के आगे कार से उतरी । मैं बालकनी में खड़ा था, नजरें मिलीं लेकिन उन नजरों में अब बहुत ही दर्द था । मैं झेल नहीं पाया और चेहरा फेर खड़ा हो गया । शाम होते-होते जो बात मालूम पड़ी मैं कट कर रह गया । ससुराल में यातना और पति के दुर्व्यवहार की मार झेलती आखिर में एक दिन चुपके से माँ बाप को फोन कर दुखड़ा सुनाया । अगले ही दिन उसके पिता उसे लिवाने गए । बहुत कहासुनी और पंचायती के बाद वो मायके आ गयी । अब तलाक की तैयारियाँ चल रही हैं... उफ्फ, मैं फिर से टूट गया ।

उसी समय इंजीनियरिंग के लिये मेरा चयन हुआ था मैं बंगलोर चला गया । दोस्तों से उसका समाचार मिलता रहा । अगले सेमेस्टर में घर आया तो मालूम पड़ा उसके शरीर में आश्रय लेनेवाले उस नन्हें जीव ने जन्म के समय मृत्यु को चुनना ज्यादा उचित समझा । वो टूट चुकी थी और मैं फिर से टूट गया था । एक दिन अचानक उसने मुझे और मैंने उसे देखा । कुम्हलाई सी... कौन कह सकता था कि ये वही सुमि (सुमिता) है जो दिन भर बात बेबात कहकहे लगाती थी । मैं तो नहीं कह सकता । उस दिन निगाहें मिलीं थी, होठों के कोने में एक दर्द भरी मुस्कुराहट के साथ । मैं अगले दिन वापस कॉलेज के लिए निकल पड़ा । कुछ दसएक दिनों बाद एक फोन आया... हाँ वही थी ।

‘अमित, तुम भी मुँह फेर लिये !? मिता अपनी मिता को भूल गये । कम से कम मेरे दर्द को तुम तो समझते । उस दिन तुम्हारी आँखों में भी दर्द था । तुम कुछ कहना चाहते थे और मैं सुनना...’ ढेरों बातें दर्द की परत दर परत खुलती रहीं । मैं सिर्फ सुनता या हुंकारी देता रहा... शायद मेरा मौन और हुंकारी उसके दर्द पर मरहम का काम कर रही थी ।

‘तुम सुन तो रहे हो ना ? मेरी बातों से परेशान तो नहीं हो ना ? कहीं मेरी बातों से तुम्हारा समय तो बर्बाद नहीं हो रहा ना ?’

काश मैं उस समय यह कह देता कि मैं अब पढ़ाई में लगा हूँ । बचपन कि बातों से आगे निकल अपना भविष्य बनाने में लगा हूँ । लेकिन मैं ना कह पाया... युवा मन ना जाने कब कैसे और कौन से बहाव में बहा मैं समझ नहीं पाया । उस दिन के बाद लगभग रोजाना उससे बातें होने लगी । वो अपनी सिमटी दुनिया की बातें बताती और मैं बाहरी दुनिया के आसमान दिखाता । अब वो कभी कभी मेरी बातों पर हँस देती थी । इसी हँसी की एक पतली लकीर के सहारे वो जीवन के आलंबन ढूँढने लगी थी । कॉलेज के स्वछ्न्द वातावरण में मैं उसी एक हँसी के लकीर पर सपनों का महल सँजोने लगा । दो साल बीत गए और इस महल कि बुनियाद की लकीर और गहरी होती गयी ।

नये पंख मिले पखेरू को आसमान छूने की चाहत होती है और सीमाओं का ज्ञान नहीं होता । वो तो हर सीमा को अपने पंखों के बल लांघ जाना चाहता है । उसका आत्मबल बार-बार ललकारता है नई ऊंचाइयों को नापने के लिए । लेकिन जिस दिन सामना किसी नुकीले पंजे और चोंचवाले दैत्याकार बाधा से होता है उसदिन नन्हें परिंदे को अपनी सीमा का ज्ञान हो जाता है । मैं भी आदर्श बनने चला था बाधाओं से अंजान । समाज के हरेक गतिरोध का सामना करने का आमदा रखता था ।

अंतिमवर्ष के सेमेस्टर के बीच में घर आया तो एक दिन मैंने उसके घर पर उसके घरवालों से हौसला कर अपनी बातें रखीं । लेकिन मेरी बातों के ऊपर समाज का आदर्श कुंडली मार फूंफकारने लगा । भौंए तनी, अपशब्द निकले और फिर ना जाने कहाँ कहाँ चोट लगा । आँखें खुलीं तो सदर हस्पताल का जंग लगे पलंग पर अपने को लिटा हुआ पाया । पट्टियों के बोझ और नसों में बोतल का रंगीन पानी पहुँचाती सुइयां और सिरहाने बैठे पिता । आसपास घर के दो चार लोग...

‘बेटा आदर्श ही दिखाना था तो अपने ही समाज में दिखा लेते । हलवाइयों की मिठाइयाँ भगवान को भोग लगाकर खुद खाने वालों के लिये यह कभी नहीं रहा कि मिठाइयाँ नीची जात वालों के यहाँ बनी है । ईश्वर के नाम का आधार लेकर दूसरों को आदर्श का पाठ पढ़ानेवाला समाज कैसे भूल जाता है कि बिना सबरी के बेर और विदुर पत्नी के हाथों केले के छिलके खाये बगैर ईश्वर भी तृप्त नहीं थे । ईश्वर ने तो आदर्श स्थापित किए लेकिन उन्हें पुजनेवाले इस समाज ने उनके आदर्शों पर चलना तक नहीं सीखा । आदर्श तो लोग कर्मों से बनते हैं। कम से कम जो समाज दूसरे लोगों के मुँह को मीठा करता रहा है उससे ज्यादा आदर्श सामाजिकता कौन जान सकता है ।’

ढेरों सीख... इतना तो अक्ल थी जो अपने भले बुरे को पहचानता । पढ़ाई पुरी की, बढ़िया नौकरी । दो बार विदेश यात्रा भी कर आया । बस यूं ही आगे बढ्ने की धुन में मगन ना जाने कब कंपनी के सहकर्मी को पसंद आ गया । जातिगत बंधन ना पहले माना ना अब मानता था... जीवन में खुशियाँ थी । पुरानेघटनकरम को चार साल गुजर गए थे और कभी सपने में भी बीते दिनों के सपने नहीं आये । फिर अचानक, वर्षों बाद फिर से उसका फोन । मैं झंझावात के भंवर में फंसा था कि फोन फिर बजा... मैंने ना चाहते हुये भी फोन की हरे बटन को दबा दिया ।

‘हल्लो ! अमित... मैं सुमिता । कुछ बात करना चाहती हूँ ... बीमार हूँ और इसका कारण मैं खुद हूँ । एक बोझ है कुछ बातों का... आज कहना चाहती हूँ । काश उसी दिन मैं कुछ कह पाती । लेकिन मेरे विरोध के मदधाम स्वर आदर्शवादिता के फूंफकार में दब गए थे । माफी चाहती हूँ, फिर फोन नहीं करूंगी । मालूम है तुम अपनी ज़िंदगी में खुश हो । खुश रहो मिता... तुम तो इंजीनियर हो... कुछ ऐसा क्यूँ नहीं बनाते कि वर्तमान की परिस्थितियों को भूत में जाकर सही कर लेते... कम से कम मैं उस समय में जाना चाहती हूँ जब अबोध बच्ची को सात फेरों के बाद एक ऐसे खूँटे से बांध दिया गया जो सात जन्म क्या सात महीने भी ना निभा सका । काश मैं वो समय ठीक कर पाती ।’

मैं हँस पड़ा- ‘सुमिता, तुम भी... ! खैर फोन करने के लिए धन्यवाद । नियति के नियमानुसार सबको चलना पड़ता है । नियति बस एक बार ही मौका देती है । नियति को बदलना हर कोई चाहता है पर काश ऐसा होता... !!!




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