सफ़र तभी रास आने लगता है, जब वो ख़त्म होने लगता है !

ये गालों पर कोनों से कोनों तक लटकती मुस्कराहट के साथ एक हाथ मुंह पर और एक पेट पर रख कर कुछ शब्दों से नाइंसाफी करके अपनी बात बोलना !

इसी हंसी पर ही तो दिल दे बैठा था !

कितना समय बीत गया लेकिन मुझे आज भी याद है, वो एक सफ़र की एक रात... उसने एक शर्ट पहनी थी बाजुओं को हाफ फोल्ड करके ! उसके बाल उसके कान के पास से गालों को छूते हुए कभी हवा में उड़ते कभी सीने पर ठहर जाते। उसके परफ्यूम की एक भीनी सी खुशबों उसकी सुंदरता में तो नही लेकिन मुझे उसे पसंद करने में अपना योगदान दे रही थी। सारी दुनिया की नजरों से ओझल मेरी भटकन उसके गाल के तिल पर जा कर केंद्रित हो रही थी, और सामने बैठा-बैठा उसके तिल में खो-सा गया ! उसने जैसे ही मुझे देखा तो मैने नजरें हटा ली ! शायद उसने चोरी पकड़ ली उस समय ! वो फिर जोर से हँसने लगी और मैं उस मुस्कान में उलझता रहा। वो सफ़र आज भी इस मायूस से दिल में एक अनजाना सा अहसास ले कर आ जाता है !

."एक साल पहले......."

.ट्रैन की खिड़की पर बैठा जयपुर स्टेशन की भागमभाग वाली ज़िन्दगी को देख कर सोच रहा था कि थकती नही होगी ये जिंदगी। दिन भर दौड़ भाग, जैसे ही गाड़ी आये तो ये भीड़ जिसमे यात्री, कुली सब टूट पड़ते, ख़त्म होने का नाम ही नही ले रही ये भीड़... भीड़ नही विज्ञान का सिद्धान्त बन गयी थी ये "भीड़ को न उत्पन्न किया जा सकता न ही इसका अंत किया जा सकता। हाँ एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर स्थानान्तरित किया जा सकता है !" थकते-थकते भी भागती होगी ये भीड़ दिन-रात ! न जाने कितने अफसरों, चपरासियों, अध्यापको, वकीलों, डॉक्टरों, व्यापारियों, मैनेजरों, गृहणियों, लड़कियों, लड़को से गाली खाती होगी ये !उसी भीड़ को अपनी कोहनियों से चीरती हुई एक लड़की इसी तरफ आ रही थी ! एक हाथ में छोटा सा पर्स और दूसरे हाथ में एक ट्रॉली बैग लिए बड़ी हड़बड़ाहट मचा रखी थी उसने !उसका बस चलता तो वो हवा में उड़ कर सीधी अपने कोच में आ बैठती ! लेकिन हड़बड़ाहट में वो अपना संतुलन खो कर मोच लगा बैठी। इस संतुलन बिगड़ने और मोच लगने के बीच के समय में मेरे मुंह से अचानक निकल गया। " अरे..! संभल कर। " पर मेरी आवाज भीड़ के शोर के सामने 'नहीं के' बराबर थी ! अब उसने खुद को संभाला और लंगड़ाते हुए चढ़ गई ट्रैन में ! अपना सारा सामान सीट के नीचे रख कर मेरे सामने वाली सीट पर बैठ गयी ! अपनी हिल खोलकर पैरो को समकोण बना लिए ! उसके पैरों को देखते हुए मैंने उसकी मोच का सारा दोष उस हिल पर डाल दिया और पूछ लिया। " ज्यादा लगी तो नहीं !" उसने अचंभित नजरो से मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और दोनों होंठो को चिपका कर एक धीरी सी आवाज में 'नहीं' का इशारा करके मुझे पूरी तरह से इग्नोर करते हुए अपने छोटे बैग से एक मैग्जीन निकाल कर पढ़ने लगी......#शेष_अगले_भाग_में

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