बड़े साहब

प्रेमचंद चाटे एक बड़े संस्थान के किसी विभाग में मंडल प्रमुख हैं।थोड़े ही दिन बाद वह मुख्य अभियंता बन जाएँगे ।दफ़्तर में सब लोग उनको बड़े साहब कहते हैं|अपनी इस पदवी से वह काफी हद तक संतुष्ट हैं।उन्हें बहुत अच्छा लगता है जब कर्मचारी के मुँह से निकली बात कभी-कभी उनके कानों तक पहुँचती है कि,…..’बड़े साहब अभी व्यस्त हैं’......’बड़े साहब थोड़ा गुस्से में हैं,अभी अंदर मत जाइए’………’बड़े साहब फोन पर जरूरी बात कर रहे हैं’.........’आप पहले कागज के टुकड़े में अपना नाम लिखकर दीजिए,बड़े साहब यदि पर्मिट करेंगे तभी आप अंदर जा सकते हैं’….........’बड़े साहब अभी जरूरी मीटिंग ले रहे हैं’......इत्यादि-इत्यादि।यह सब सुनकर उन्हें अपने ओहदे पर गर्व होता है।आखिर यही तो उनकी चाहत थी।बड़ा अफसर बनने का ख्वाब उनके दिमाग में स्कूल,कालेज के दिनों से ही था।

बड़े साहब अपने दफ़्तर के आलीशान चैम्बर में एक बड़ी सी ऊँची कुर्सी में थोड़ा झुककर बैठे हैं।यूँ कहिए कि कुछ ख़यालों में खोए हैं।बैठने के बगल वाली दीवार में शीशा लगा हुआ है।जब उनकी इच्छा होती है वह अपना खूबसूरत चेहरा उसमें कभी-कभी देख लेते हैं।बड़े साहब खूबसूरत तो हैं हीं-गोरा रंग,लंबा छरहरा शरीर,बड़ी-बड़ी झील सी आँखें,काले घने बाल,हल्की सी दाढ़ी।उनकी सोचने की आदत है।सोचते-सोचते कभी वह शरमा जाते हैं तो कभी मुस्कुराने लगते है।कभी-कभी अनायास ही गुस्से में बड़बड़ाने लगते हैं,तो कभी-कभी खुश होकर गुनगुनाने लगते हैं। अपनी इन अदाओं को वह आइने में देखते हैं और अपने ही आप पर मोहित हो जाते हैं।भगवान ने क्या गढ़ा है मुझे.........सुंदर ! ...अतिसुन्दर !

दफ़्तर की कुर्सी में बैठने के बाद बड़े साहब अपने को इन्द्र के समान शक्तिशाली समझते हैं।क्या नहीं हैं मेरे पास ?घर में बाप का अच्छा ख़ासा व्यापार है,बैंक में सात अंकों की कई एफ़ डी है,सुंदर बीवी है,बढ़िया दोस्त हैं,अफ़सरी है,रिटायरमेंट के बाद पेंशन है,चाचा के कारण अच्छी ऊँची राजनीतिक पहुँच है,कुल मिलाकर पूरी तरह सुरक्षित भविष्य है।और ज्यादा चाहिए भी क्या ?पर हाँ, यश और इज्जत की जरूर कोई सीमा नहीं होती है।यश अभी और कमाना है।वैसे यश नहीं मिला तो नाम से ही काम चल जाएगा।रावण को भी तो आखिर उतने लोग ही जानते हैं,जितने कि राम को।आज की दुनिया में नाम मिलना चाहिए,चाहे वह किसी भी तरीके से हो।सारी मार्केटिंग नाम के लिए ही तो हो रही है।नाम इसलिए चाहिए कि दुनिया को पता होना चाहिए कि मेरी हैसियत क्या है ?बड़े-बड़े ऋषि मुनि,चक्रवर्ती सम्राट सभी आखिर नाम के लिए ही तो मरते थे।मैं तो कोई त्यागी ऋषि-मुनि भी नहीं हूँ,फिर मैं नाम के लिए मरूँ तो उसमें बुराई क्या है।

बड़े साहब का कमरा बहुत बड़ा है।ऊँची मखमली कुर्सी है,जिसमें वह बैठते है।उनके सामने बड़ा लंबा टेबल है और उसके पीछे छह विजिटिङ्ग कुर्सियाँ हैं।कमरे के एक किनारे पर दीवाल से लगकर सोफे रखें हैं।बाहरी विशिष्ट व्यक्ति के साथ-साथ वह भी कभी-कभी उसमें बैठ जाते हैं।लम्बा सा टेबल है पर फ़ाइल का अता-पता नहीं है।कहते हैं कि बड़े साहब कोई भी फ़ाइल लंबित नहीं रखते हैं।फ़ाइल आई नहीं कि गई।कुछ लोग तो यह भी बताते हैं कि बड़े साहब कुछ फ़ाइलों को अपनी आलमारी में सदा के लिए बंद कर देते हैं।कौन सी फ़ाइल जीवित रहती है और कौन सी मर जाती है,इसका हिसाब किताब किसी को नहीं पता है।टेबल में सामने ही ऐश-ट्रे है।बड़े साहब धुआं बहुत उड़ाते हैं।जरा सा तनाव हुआ कि कागज की आग उगलती पाइप मुँह से लग जाती है।टेबल पर एक किनारे में तीन फोन रखे हुए हैं,दूसरे किनारे में कम्प्यूटर रखा हुआ है।बड़े साहब की जब इच्छा होती है वह उस पर कुछ काम कर लेते हैं।पैसा उनके पास इफ़रात में है अतः शेयर मार्केट में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है।जो लोग शेयर मार्केट का काम दफ़्तर में करते हैं,उन्हें वह बेईमान कहते हैं-“साले सरकारी तनख्वाह पर अपना व्यक्तिगत फायदे का काम करते हैं……देशद्रोही हैं।”

बड़े साहब जो सोचते हैं और जो करते हैं वह हमेशा सही ही रहता है।ऐसा बड़े साहब का विश्वास है और इसे वह अपने ऊपर भगवान की विशेष कृपा मानते हैं।

बड़े साहब ने अपने कमरे में एक फ्रिज लगवाया हुआ है।वह दफ़्तर में पानी बिसलेरी का ही पीते हैं।वह पानी शुद्ध होता है,ऐसा उनका मानना है।दफ़्तर में चाय वह हर्बल की ही पीते हैं और सबको पिलाते हैं।वह अपनी आयु अच्छे सेहद की वजह से बढ़ाना चाहते हैं।वह अपने टेबल की दराज में इत्र की शीशी और रूई रखते हैं।सुगंध उन्हें प्यारी लगती है क्योंकि उनकी पत्नी का नाम सुगंधा है।वह इत्र को रूई में डालकर उसे अपने कान के ऊपरी घुमावदार हिस्से में दबा देते हैं।बीच-बीच में वह उसे वहाँ से निकालकर अपने नाक के पास ले जाते हैं और फिर वापस वहीं कान में लगा देते हैं।उनकी एक आदत गर्दन घुमाने की भी है।एक बार बाएँ से दाएँ और फिर दाएँ से बाएँ।अंत में थोड़ा ज़ोर का झटका,जिससे एक कुट की आवाज निकलती है।इस कुट की ध्वनि को सुनकर उन्हें असीम आनंद,संतोष और विजय का अनुभव होता है।कभी-कभी जब यह ध्वनि नहीं निकलती है,तो उनकी गर्दन घुमाने की आव्रत्ति बढ़ जाती है।यह तब तक बढ़ी रहती है,जब तक कि वह इस ध्वनि को सुन न लें।टेबल के एक किनारे पर वह चाँदी का एक छोटा चौकोर डिब्बा रखते हैं,जिसमें पान रखा रहता है।बड़े साहब को तंबाकू डाला हुआ बँगला पान खाने का बड़ा शौक है।पान को मुँह में डालकर जब वह बोलते हैं,तब उनकी आवाज को दफ़्तर के कुछ खास लोग ही समझ पाते हैं।पान की ही वजह से कई बार उनकी सफ़ेद शर्ट खराब हो जाती है।बीच-बीच में वह अपने हांथ की लकीरों को देखते रहते हैं।कटी सूर्य रेखा को सुधारने के लिए वह रोज सूरज को जल चढ़ाते हैं। वह भविष्य में छिपे रहस्य को जानना चाहते हैं।उसे अपने हांथ की मुट्ठियों में बंद करके जीत का अहसास करना चाहते हैं।ज्योतिष में उन्हें बहुत विश्वास है।वह कम्पयूटर में कुंडली बनाते और देखते हैं।वह अकसर कहते हैं-“साला दो घंटे पहले पैदा हो जाता तो बात कुछ और ही होती।” यदि गुरु और चंद्रमा एक साथ आ जाते तो मेरी लोकप्रियता सातवें आसमान को छूने लगती।तीन गृह उच्च के हो जाते..........फिर कौन टिकता मेरे सामने,सर्वोच्च कुर्सी से रिटायर होता।लगता है मैंने ही पैदा होने में आलस्य दिखाया।

वह टेबल में दो डायरी रखते हैं।एक डायरी में वह खाली समय में ॐ शब्द लिखते रहते हैं,और दूसरी डायरी सरकारी काम के लिए होती है।किसी महात्मा ने उन्हें ॐ शब्द लिखने के लिए कहा है।वह यह सब शक्ति अर्जित करने के लिए करते हैं।उनकी इच्छा तो पूरी दुनिया जीतने की है पर साला आज के जमाने में ऐसी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए मार्गदर्शन देने वाला कोई गुरू ही नहीं हैं।बड़े साहब में दुर्गुन दो ही हैं-सिगरैट और शराब।वह अकसर मन ही मन कुछ बतियाते रहते हैं।

बाबूजी कहते हैं कि मैंने सरकारी नौकरी ज्वाइन करके गलती की,लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता।कोई जरूरी नहीं था कि चाचाजी के समान मैं भी मन्त्री बन ही जाता।और यदि एक सेकंड के लिए मान लेते हैं कि मन्त्री बन भी जाता तो इसकी क्या गारंटी थी कि मलाईदार विभाग मिलता।यह भी निश्चित नहीं था कि कितने साल तक विधायक,संसद या मन्त्री रहता !

सरकारी अफ़सरी तो पूरे तैंतीस साल की है।मैंने तो ज्वाइन ही लेट किया वरना तीन-चार साल और मिल जाते।जब तक नौकरी है,तब तक मेरे पास राजयोग है।जितनी नवाबी और तानाशाही मैं अपने अधीनस्थों के साथ कर सकता हूँ,उतना कोई नेता क्या प्रधानमंत्री भी किसी के साथ नहीं कर सकते।एक बात जरूर है कि मैं नेता के बराबर किसी का भला नहीं कर सकता,पर मैं कई लोगों को बरबाद जरूर कर सकता हूँ।दूसरी बात,यदि मैं अफसर नहीं होता तो जितना दहेज मुझे मिला था वह कभी नहीं मिलता।महँगी चार पहिए वाली मोटर,पाँच लाख कैश,पत्नी के लिए जेबर और क्या-क्या नहीं ! पन्ने भर जाएँगे यदि सूची बनाऊँगा।इतना दहेज मिला था जबकि हम लोगों ने कुछ डिमांड ही नहीं किया था।(बड़े साहब कार को मोटर कहते हैं और हॉर्न को भोंपू )।और तो और मेरी पत्नी अपने माता-पिता की इकलौती संतान है।यानी ससुराल की सारी संपत्ति मेरी।कई करोड़ो की संपत्ति का मालिक......प्रेमचंद चाटे ।मेरी पत्नी बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी भी है।पैसे के साथ इतनी गुणवान पत्नी बहुत कम लोगों यानि कि मेरे जैसे अफसर को ही मिलती है।वहीं मेरे साथ चुन्नू था,जो बाद में मन्त्री बना,उसके लिए लड़की मिलना भी मुश्किल था।यह बात और थी कि राजनीति में आने के बाद उसके पास कई महिला दोस्त हो गईं थीं।यदि मैं चाहता तो दो चार महिला दोस्त मैं भी बना सकता था,पर अंदर की बात बताता हूँ-सुगंधा के डर के मारे महिला दोस्त बनाने की मेरी कभी हिम्मत ही नहीं हुई।

आज पता नहीं क्यों बड़े साहब पच्चीस साल पुराने समय में कुछ खो से गए थे।पेट में कुछ भारीपन महसूस हुआ तो हमेशा की तरह शरीर का एक भाग थोड़ा ऊपर उठाकर ज़ोर से पटाखा फोड़ दिया।ऐसा करने में उन्हें कोई संकोच या लाज शर्म महसूस नहीं होती।वह सिर्फ अपने से वरिष्ठों के सामने ही इस क्रिया को नहीं करते हैं।

फोन की घण्टी ने मानो बड़े साहब को वर्तमान में ला दिया।हाथ से आँखों को मीजते हुए उन्होने ज़ोर से जम्हाई ली और फिर फोन के हैंडसेट को ऊपर उठाकर कान से सटा लिया।

“कौन ?”

“सर मैं प्रधान !”

“हाँ बोल ! साला तुम हमको नींद से उठा दिया ।”

“सर क्षमा चाहता हूँ ।”

“अब आगे बोल ?”

“सर आप कैसे हैं ?”

“अबे ठीक हूँ ।बता कैसे फोन किया ?”

“सर एक फैलिएर हुआ है ।”

“नालायक कुछ आगे भी बताएगा ?”

“सर पावर स्टेशन का इंजन फ़ेल हो गया है इसलिए पूरा प्रॉडक्शन बंद हो गया है।”

“कब से ?”

“दो-ढाई घंटे से !”

“साइट में कौन-कौन है ?क्या व्यवस्था हुई है ?”

“यह जानकारी अभी मुझे भी लेना है।”

“फिर तुमने फोन क्यों किया ?सब पता करके बात करनी थी ।”

“सर बस दस मिनट के अंदर सब बताता हूँ।”

“व्हाट ब्लडी दस मिनट ....................अभी तक सो रहे थे क्या ?”

“सर क्षमा !”

“गेट लास्ट फ्राम माइ फोन !”

“सर.....सर.......सर.......।”

बड़े साहब ने खुद ही सारी जानकारी इकट्ठा कर ली।करीब आधे घंटे के बाद प्रधान का फोन आया।बड़े साहब ने फोन को उठाया ही नहीं।नालायक हो गए हैं सब के सब !जब हम लोग जूनियर थे तब फ़ेल्युर की सारी जानकारी हमारी मुट्ठी में हुआ करती थी।मुझे नौकरी में आए दो ही महीने हुए थे कि लगभग ऐसा ही एक फ़ेल्युर हुआ था।मैंने सारी जानकारी स्वामीनाथन साहब को पंद्रह मिनट के भीतर दे दी थी।वह इतना प्रसन्न हुए थे कि अगली बार जब क्लब में मिले तो मेरी तरफ देखकर बड़ी गहरी मुस्कान दिए थे।वह साल में बहुत कम मौकों पर ही मुस्कुराते थे ।आजकल ऐसे गंभीर अफसर दिखते ही कहाँ है ? गंभीरता का अपना अलग ही महत्व होता है।ऐसे ही गंभीर रंगनाथन साहब थे।वह अपने जीवन में कभी हँसे ही नहीं।उनकी मैडम हमेशा हँसती रहती थी।वह मैडम के बगल में खड़े होकर कहते रहते,”चमेली ! प्लीज डोंट लाफ अननेसेस्सरी ।”

पर ये सब लोग थे बड़े ज्ञानी ।अपने –अपने क्षेत्र के धुरंधर पंडित !

इन लोगों के चैम्बर में घुसने से पहले कई बार सोचना पड़ता था।पूरी तैयारी करनी पड़ती थी।पता नहीं कब क्या पूंछ लें ? इन लोगों के सामने बैठने की हिम्मत नहीं होती थी।खड़े-खड़े अपनी बात कहो और फिर चुपचाप बाहर आ जाओ।जरूरत पड़ने पर ही वह लोग एकाध शब्द बोलते थे वरना दरवाजे की तरफ इशारा कर देते थे।कितने महान हुआ करते थे,ये सब विद्वान लोग !

आजकल तो कनिष्ठ अफसर जब इच्छा होती है तब दाँत निकालकर घुस आते हैं,वरिष्ठों के चैम्बर में।कुछ पूंछ लो तो एक ही जवाब मिलता है कि ,” सर अभी देखकर बताता हूँ।”

अरे,हर चीज यदि फ़ाइल देखकर ही बताना है तो फिर इन लोगों की जरूरत ही क्या है ? फ़ाइल देखकर हम लोग ही जानकारी देख लेंगे ।

थोड़ी ही देर में प्रधान दौड़ता हुआ बड़े साहब के चैम्बर में आ घुसा ।

“सर मुझे माफ कर दें,अगली बार ऐसी गलती नहीं होगी !”

“तुम्हें क्या हो गया है ?”

“सर मेरे बीवी बच्चे भूंखों मर जाएँगे !”

“क्यों ?”

“यदि आपने चार्जशीट देकर मुझे रिवर्ट करा दिया ।”

“मगर क्यों ?”

“सर मैंने पोजीसन लेने में देरी की है ।”

“कोई बात नहीं,आगे से अब दुबारा ऐसा काम मत करना ! एक चीज और मुझे अनुशासन और प्रोटोकाल बहुत पसंद है,उसमें कभी गलती मत करना।”

“सर,बीवी-बच्चों की कसम,कभी दुबारा गलती नहीं होगी।”

“यार तू हर चीज में बीवी-बच्चों की बात क्यों करने लगता है ?”

“सर वो मेरे ऊपर आश्रित हैं।”

“वह तो सबके साथ होता है।”

“सर आगे से नाम नहीं लूँगा।”

बड़े साहब सोचने लगे,आजकल की युवा पीढ़ी अनुशासन और प्रोटोकाल भूलती जा रही है।इन्हें सब चाहिए-समय पर प्रमोशन,अच्छी जगह पोस्टिंग,सारी अन्य सुविधाएँ..... मगर इनके कर्तव्य क्या हैं यह इनको नहीं पता है।अभी उस रोज ही की तो बात है,मैं भड़के के साथ इन्सपैक्शन पर गया था।भड़के मेरे साथ बगल ही की सीट पर बैठा था।साइट पहुँचने पर वह मोटर से उतरकर आगे चलने लगा।मैं चुपचाप मोटर में ही बैठा रहा।इसके बाद मैंने मोटर चालक को भोंपू बजाने के लिए कहा|भोंपू की आवाज सुनकर भड़के पीछे मुड़कर देखा और वहीं खड़ा हो गया|मैं समझ गया कि इसको प्रोटोकाल की जानकारी नहीं है।मैंने अपने से मोटर का दरवाजा खोला और फिर नीचे उतरा।मेरे काफी देर तक मोटर में बैठे रहने के बावजूद इस नालायक की समझ में कुछ नहीं आया था।अगले दिन मैंने दफ़्तर जाकर एक गोपनीय पत्र दिया,तब बात उसके दिमाग में गई।मैंने साफ़-साफ़ लिखा कि कनिष्ठ अफसर जब वरिष्ठ अफसर के साथ हो तब मोटर का दरवाजा कनिष्ठ अफसर को खुद खोलना चाहिए जिससे वरिष्ठ अफसर नीचे उतर सके।यह बेसिक है,पर भड़के नहीं सीखा।मैं अपने से वरिष्ठों का दरवाजा खुद खोलता था।मुझमें इतनी फुर्ती थी कि मोटर का चालक हमेशा पीछे हो जाता था ।

इसी तरह एक दिन मैं इन्सपैक्शन पर आगरा गया हुआ था।अगले दिन मुझे दिल्ली वापस आने के लिए सुबह की गाड़ी पकड़नी थी।मैंने सहायक अभियंता को नाश्ते में आलू का पराठा और गोभी की सूखी सब्जी रखने के लिए कहा ।वह नालायक आलू के पराठे के बजाए पूड़ी-सब्जी रख दिया।ठंड के दिन थे,मेरी आलू का पराठा खाने की इच्छा थी ।जब मैं जूनियर था तो अपने सारे वरिष्ठों की पसंद-नापसंद का पूरा हिसाब-किताब विस्तार से रखता था।सुबह चार बजे उठकर सारी तैयारी कर लेता था और साहब की पहली चाय खुद अपने हांथों से सर्व करता।आज के नालायक अफसर अपने बॉस के उठने के बाद बिस्तर छोड़ते हैं।उन्होने सामने खड़े प्रधान से कहा-“एक चीज याद रखो,बॉस फेलियर भूल जाएगा,पर यदि उसकी व्यवस्था में कुछ गड़बड़ी हुई तो वह उसे कभी नहीं भूलेगा।”

प्रधान सब कुछ ध्यान से सुन रहा था,बोल पड़ा,” सर मैंने तो ऐसी गलती कभी नहीं की है।”

“आगे भी कभी मत करना।अब तुम जा सकते हो।”

प्रधान ने आगे बढ़कर बड़े साहब के पैर छुए और आशीर्वाद लेकर चला गया।

यह लड़का वैसे ठीक है।श्रीनिवास भी ठीक है।सुबह चार बजे हों या पाँच,मुझे रिसीव करने स्टेशन जरूर आएगा।मैं दफ़्तर से कहीं भी जाऊँ वह साए की तरह मेरे पीछे-पीछे चलता है।मेरे कमरे की सारी साफ़ सफाई और मेरी व्यक्तिगत व्यवस्था वह खुद करता है।पर साला,कभी-कभी कुछ ज्यादा ही चापलूसी करने लगता है।इस साल नए साल की पार्टी में मेरे पैरों पर लोट गया।अरे ! यह भी कोई बात हुई !मुझे खराब लग रहा था।

बड़े साहब अक्सर सबसे कहते हैं कि इंसान दो ही प्रकार की दशा में काम करता है।एक लालच के कारण और दूसरा डर के कारण ! वह स्वयं इसी फार्मूले के तहत काम करते हैं।वैसे जब उनके अंदर का अभिमान झुकने से मना कर देता है तब वह किसी से भी भिड़ सकते हैं।

आज से पच्चीस साल पहले की बात है,बड़े साहब और उनके पिता के बीच एक लंबी बहस हुई थी।बड़े साहब उस दिन ऐसे बोले थे मानो अटल बिहारी वाजपेई जी संसद में बोल रहें हों ।आ...हा! हा! .......क्या आवाज और तेवर थे,उनके ! प्रेमचंद चाटे यानी बड़े साहब अक्सर यह बहस अपने खास करीबी लोगों को सुनाया करते थे,जब पिताजी ने उनसे कहा था - “प्रेमचन्द ! तुम मेरे साथ व्यापार करो,नहीं तो चाचा के साथ राजनीति।”

“नहीं पिताजी ! मैं क्लास वन अफसर बनूँगा।”

“तुम्हें जितनी तनख्वाह वहाँ मिलेगी,उससे दुगुना पैसा मैं तुम्हें यहाँ दूंगा।”

“पिताजी,मुझे पैसे के साथ-साथ नाम और यश भी चाहिए।”

“वह तो हम लोगों को मिलता ही है।”

“नहीं,आप लोगों को वह इज्जत नहीं मिलती जो अफसर को मिलती है।”

“तो नेता बन जाओ !”

“मुझे जिंदगी में स्थायित्व चाहिए।राजनीति में स्थायित्व नहीं है।एक बात और,मुझे हार बर्दाश्त नहीं है।राजनीति में हार जीत जनता के ऊपर निर्भर होती है।”

“अच्छा काम करोगे तो फिर क्यों हारोगे ?

“चुनाव सिर्फ अच्छे कामों से नहीं जीता जा सकता है।”

“नहीं,जनता सिर्फ उसी को चुनती है जो अच्छा काम करें।”

“चाचा ने तो जीवन में कभी कोई जनहित का अच्छा काम नहीं किया फिर वह कैसे लगातार चुनाव जीतते गए ?”

“वह अच्छे काम नहीं करता है पर वह अपने कामों को ऐसे दिखाता है जैसे वह उच्चकोटि का जनहित काम कर रहा है।यह भी एक गुण है।”

“मैं इस काम में चाचा जी जैसे तेज नहीं हूँ ।”

“सीखोगे तो यह काम भी आने लगेगा।चाचा के साथ उठा-बैठा करो।”

“मैं वही काम सीख पाता हूँ जिसमें मेरी रुचि हो।”

“कुछ मेरी रुचि का भी ख़याल किया करो बेटा !”

यह कहकर बड़े साहब के पिता जी चुप हो गए।बाप का अधिकार बेटे के अभिमान से हार गया।बड़े साहब के पिताजी आज एक बड़े बंधन से मुक्त हो गए थे,पर बंधन से मुक्त होना भी बड़ा कष्टदायी होता है।जैसे शरीर से प्राण निकलते समय शरीर बहुत छटपटाता है जबकि यह शरीर के लिए मुक्ति का समय होता है।

ऐसा नहीं था कि बड़े साहब अपने पिता की इज्जत नहीं करते थे।वह उन्हें बहुत चाहते थे,पर उनके बीच एक अजीब सी बड़ी महीन दीवार थी,जो उनको गले मिलने से रोक देती थी।सामान्यतः उनकी अपने पिता से बहुत ही कम बातें होती थीं |ज्यादातर संवाद माँ के माध्यम से ही होता था ।

बड़े साहब ने अपनी इच्छानुसार नौकरी के लिए परीक्षा दी और वह उसमें उत्तीर्ण भी हो गए।इस परीक्षा को पास करने के बाद बड़े साहब का आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया था।इस मात्रा में आत्मविश्वास उनके अंदर पहली बार तब आया था जब उन्होने एम टेक आइआइटी से पास किया था।

मैंने अपने जीवन में जो चाहा है,वही किया है।इस परीक्षा को पास कर लेने के बाद,अब मुझे अपनी काबिलियत पर जरा भी संदेह नहीं रह गया है।आइ कैन डू एनिथिंग इन द वर्ल्ड !अब मुझे आज तक की अपनी मेहनत और सफलता को जी भर के सारी जिंदगी एंजॉय करना है।

चैम्बर के दीवाल में लगी घड़ी को देखकर बड़े साहब को मीटिंग का ध्यान आया।यह मीटिंग भी साली बड़ी अजीब चीज है।चतुर्वेदी साहब दोपहर को एक बजे मीटिंग शुरू करते हैं और फिर तीन बजे तक मीटिंग चलती है।लंच का समय तो ऐसे ही चला जाता है।ऐसे लोग न तो ठीक से जीते हैं और न ही दूसरों को जीने देते हैं।इनको ऐसा लगता है जैसे दुनिया इन्हीं के कंधों पर टिकी है।अरे आप बड़े ईमानदार हैं तो इसका मतलब यह थोड़ी ही है कि आप सबकी जान ही ले लो !वैसे भी ईमानदार व्यक्ति का हर जगह एक अलग सम्मान होता है,पर ईमानदार को इस हद तक सनकी नहीं होना चाहिए कि वह सब जगह बुराई ही ढूँढ़े।पता नहीं मैडम इनको सुधार क्यों नहीं पाईं ?वह भी बेचारी इनको कैसे झेलती होंगी ?

सारे अफसरों को पेट की तकलीफ़ हो गई है।कल मैं हांडे के बगल में बैठा था,अचानक ऐसी बदबू आई कि लगा उल्टी हो जाएगी।मैं हांडे को दोष नहीं देता,गलती चतुर्वेदी साहब की है।एक तो लंच के लिए देर से छोड़ेंगे और फिर लंच के बाद साढ़े तीन बजे दूसरी मीटिंग रख देंगे।

बिना चबाए हुए भोजन करना पड़ता है।वह पचता नहीं है।रात को भी नौ बजे तक कुर्सी में बैठे रहो !सुबह उठने पर पहले फेलियर की जानकारी लो और फिर उसे चतुर्वेदी साहब को बताओ।इसी में सुबह का समय चला जाता है। साला अपना कोई जीवन ही नहीं रह गया है !खैर,अभी तो चलना चाहिए,किसी दिन मीटिंग में दिमाग खिसक गया तो सब बोल दूँगा।

मीटिंग की शुरुआत चतुर्वेदी जी ने बड़े साहब से ही की ।

“चाटे जी मरम्मत में तीन घंटे लग गए ?”

“सर मैंने पूरी पोजीशन लेकर सहायक अभियंता को डाँटा है।”

“डाँटने से क्या होगा,चार्जशीट दीजिए !”

“ओके सर !”

मीटिंग समाप्त होने के बाद शाम को बड़े साहब प्रधान को एक लिफाफा थमा देते हैं।

“सर,कृपया मुझे बचा लीजिए।”

“मैं तुम्हें कोई सजा नहीं दूँगा।चिंता मत करो।”

“सर फिर यह चार्जशीट क्यों ?”

“मेरे बड़े साहब का आदेश है।”

“फिर तो सजा पक्की है।”

“क्यों ?”

“सर,चतुर्वेदी साहब बड़े कड़े मिजाज के अफसर हैं|”

“तुम लिख दो कि बड़ा ही भयंकर प्रकार का फ़ेल्युर था।ऐसा न पहले कभी हुआ है और न कभी भविष्य में आगे होने की उम्मीद है।”

“फिर सर ?”

“मैं इस चार्जशीट को चेतावनी में बदल दूँगा।”

प्रधान ने यह सुनते ही आगे बढ़कर बड़े साहब के पैर छू लिए।

“सर,यू आर जीनियस !”

“इट्स ओके .........।”

“सर मेरे कार्यक्षेत्र में निरीक्षण के लिए कृपया कभी समय निकालिए।”

“यार,चतुर्वेदी साहब दिनभर मीटिंग में ही व्यस्त रखते हैं।देखो कभी समय निकालता हूँ।”

“सर मेरे साले साहब मलेशिया में रहते हैं।वहाँ से अच्छी-अच्छी ब्रांड मँगवाई है।”

“वेरी गुड !देखते हैं.........समय निकालते हैं।ओके,यू कैन गो नाऊ !”

“राइट सर ! थैंक यू सर !”

यह लड़का ठीक है लेकिन थोड़ा ढीलाढाला है।सुधर जाएगा !बहुत सारे लोग नौकरी में शुरू–शुरू में ऐसे ही ढीलेढाले होते हैं लेकिन बाद में पूरी तरह बदल जाते हैं।न जाने कितने ईमानदार,बेईमान बन जाते हैं और बहुत से बेईमान और ज्यादा बेईमान हो जाते हैं।कुछ बेईमानी शुरू करके वापस ईमानदार बन जाते हैं।हाँ,मैंने किसी बेईमान को कभी ईमानदार बनते नहीं देखा।कुछ ऐसे होते हैं जो खुद कभी काम नहीं करते हैं पर जब वह काम करवाने वाली कुर्सी पर बैठते हैं तो उनके बराबर काम की प्रगति की पूछताछ कोई नहीं करता है।काम को कैसे करना चाहिए,इस विषय पर उनसे अच्छा भाषण कोई नहीं दे सकता।इनसे अलग एक वो अफसर होते हैं,जिन्हें काम से कोई मतलब ही नहीं होता है।न खुद काम करेंगे और न किसी को काम के लिए कहेंगे।ज्यादातर ऐसे लोग ही सर्वोच्च पद तक पहुँचते हैं क्योंकि इनका कोई दुश्मन नहीं होता है।पर कुछ ऐसे लोग अभी भी हैं जो चुपचाप काम करते रहते हैं,बिना ढ़ोल बाजा बजाए,बिना किसी पहचान के,बिना किसी अवार्ड के,बिना किसी लालच के,सिर्फ और सिर्फ अपने कर्तव्य के पालन के लिए।इन्हीं लोगों की वजह से व्यवस्था चल रही है।अनूप ठीक ही कहता है कि अफसर चार प्रकार के होते हैं-रोगी,भोगी,ढोंगी और योगी।रोगी वो होते हैं जो न कभी खुद सुख शांति के साथ जीते हैं और न दूसरों को प्रसन्न,सुखी देख सकते हैं।ये स्वभावतः ऐसे होते हैं|इनकी सुख शांति का काम के बोझ से कोई लेना देना नहीं होता।दूसरों को हँसता हुआ देखना इनके लिए सबसे ज्यादा कष्टदाई होता है।फिर इन सबसे जुदा चुपचाप काम करने वाले योगी भी कहीं-कहीं मिल जाते हैं,जो बिना ढोल-बाजा बजाए भगवान जाने किस मुराद में काम किया करते हैं।खैर भाड़ में जाएँ साले ! अपन को तो अपने से ही मतलब है।मैं तो जैसे पहले था,वैसे ही अभी भी हूँ और आगे भी ऐसा ही रहूँगा।

प्रेमचंद चाटे इज ए पर्सन ऑफ वर्सेटाइल क्वालिटीज़.........प्रेमचंद चाटे इज युनीक इन होल यूनिवर्स !

बड़े साहब का पूजा का समय हो रहा था।वह नियमित दो बार पूजा करते हैं,बाँकी जब भी समय मिलता है भगवान का नाम लेने लगते हैं।दफ़्तर में भी वह कम से कम एक-दो माला तो जप ही लेते हैं।हांथ पैर धोकर बड़े साहब संध्या करने लगे-“ओम नमः शिवाय,ओम नमः शिवाय,ओम नमः शिवाय.......सीताराम, सीताराम, सीताराम, सीताराम, .....ओम,ओम,ओम.......ओम नमो भगवते वासुदेवाय.....ओम नमो भगवते वासुदेवाय....... जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ,जय कपीश तिहुं लोक उजागर......जय गणपति,जय गजानन,जय गणेश,ओम नमो गणेशाय नमः, ....जय राम रमा रमनं शमनं भव ताप भयाकुल पाहि जनं ......शरणागत मागत पाहि प्रभो ......ओम धनम देहि,ओम विद्या देहि,ओम दुश्मन विनाशय,ओम पद प्रतिस्ठा देहि,ओम बाँकी सब कुछ देहि,ओम सुख शांति देहि,ओम सर्व गुण देहि,ओम अच्छा स्वास्थ्य देहि........जो छूटा हो वह सब कुछ देहि........ओम शान्तिः.....शान्तिः......शान्तिः ।”

बड़े साहब कुछ श्लोक अपने से भी बना लेते हैं।उनका मानना है कि हिन्दी और संस्कृत को मिलाकर एक भाषा बनाई जानी चाहिए।इसी के द्वारा संस्कृत को बचाया जा सकता है।करीब एक घण्टे की पूजा के बाद बड़े साहब उठकर खड़े हुए।वह पूजा करने के बाद अपने अंदर एक अलौकिक शक्ति को महसूस करते हैं|

भगवान पूजा का फल थोड़ी देर से देते हैं।जल्दी देना चाहिए।पता नहीं लोग पूजा क्यों नहीं करते हैं ?

अगले दिन सुबह बड़े साहब अपने नियमित समय पर उठे और पूजापाठ तथा नाश्ता वगैरह करने के बाद तैयार होकर मीटिंग के लिए निकल गए ।

चतुर्वेदी साहब ने मीटिंग की शुरुआत की ।

“जैसा कि आप लोग जानते हैं,आजकल फ़ेल्युर कम करने के लिए बहुत दवाब पड़ रहा है।आप लोग अपने-अपने विभाग में इस दिशा में अथक प्रयास करिए।”

“सर !...... जब तक मशीन है तब तक फ़ेल्युर रहेगा ही।” बड़े साहब ने कहा ।

“वह तो ठीक है,मगर हमारा प्रयास होना चाहिए कि यह कम से कम रहें।”

“वह तो हम सब कर ही रहें हैं।यह कोई नई बात नहीं हुई।मैं तो जबसे नौकरी में आया हूँ,तबसे यही सुन रहा हूँ ।” बड़े साहब ने थोड़े जोशीले अंदाज से कहा ।

“मैं नौकरी में आपसे पहले आया हूँ और मैं भी शुरू से ही यही सुनता आ रहा हूँ।यह हमेशा चर्चा का विषय रहेगा ।यदि इस पर चर्चा बंद हो जाएगी तो हमारी जरूरत ही नहीं रह जाएगी।हम सबको इसी बात की तनख्वाह मिलती है।” चतुर्वेदी साहब ने थोड़ा गुस्से के साथ कहा ।

“आपका मतलब है कि हम लोग फ़ेल्युर ही गिनते बैठे रहें,जैसे और कोई काम ही न हो ।”

“यदि आपने पच्चीस साल की सेवा में यही समझा है,फिर यही सही।वैसे आप यहाँ से जा सकते हैं।”

बड़े साहब उठकर बाहर निकल गए।मीटिंग चालू रही।

अगले दिन उनके लंबित प्रोमोशन के साथ उनका तबादला एक फालतू पोस्ट पर कर दिया गया।बाद में बहुत बार सोचने पर भी उन्हें समझ नहीं आया कि उस रोज उन्हें क्या हो गया था।उत्तेजित होकर खुद का नुकसान करना तो उनके स्वभाव में कभी नहीं रहा।

बड़े साहब ने बहुत ही दुःखी मन से यह पोस्ट स्वीकार की ।

वैसे बड़े साहब जिस पद पर जाते ,वहाँ कुछ अलग करने की कोशिश करते ।यह उनके जिंदगी में नाम कमाने के उद्देश्य का एक हिस्सा था।उन्होने अपने अधीनस्थ मिश्रा से कहा,”मिश्रा,हम लोग मिलकर यहाँ क्रांति ला देंगे।” “सर,यहाँ क्रांति लाने के लिए कुछ है ही नहीं।”

“देखो,यदि काम नहीं भी है तो भी ऐसा कभी नहीं मानना चाहिए कि हमारे पास काम नहीं है।

मिश्रा और बड़े साहब के मध्य उस रोज हुई इस बातचीत का नतीजा यह हुआ कि बड़े साहब के दिमाग में बैठ गया कि मिश्रा फोकस्ड नहीं है।एक दिन बड़े साहब ने गुस्से से कहा-“ मिश्रा यू आर नॉट फोकस्ड टूवर्ड योर जॉब !”

“सर ! व्हाट डू यू मीन ?”

“आइ मीन यू आर नॉट फोकस्ड !”

“सर,कहाँ फोकस करूँ ? फोकस के लिए कुछ होना भी तो चाहिए।” मिश्रा ने उस गुस्से के साथ कहा जो कभी-कभी मातहतों में भी देखने को मिल जाता है।

“यू कैन नॉट टॉक लाइक दिस !”

“आइ टॉक इन दिस मैनर ओनली !”

“आइ कैन फिनिश योर कैरियर !”

“यू आर मोस्ट वेलकम !”

बड़े साहब और मिश्रा के बीच यह वार्तालाप उस श्रेणी में था जिसे एक सामान्य अपवाद कह सकते हैं।मानवीय स्वभाव के सारे गुणा-भाग और दूरंदेशियों को लाँघकर ऐसी घटनाएँ साल-छह महीने में हर सरकारी विभाग में घट जाया करती हैं।

इस असंभावित बातचीत के बाद मिश्रा उठकर चला गया तो बड़े साहब ने सोचा-साला,एक जूनियर इस तरह से बात करता है।मैं आज ही इसको एक गोपनीय पत्र देता हूँ।क्या समय आ गया है,लोग अपने वरिष्ठों की इज्जत नहीं करते हैं।मेरे समय में तो इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।एक बार कानफोड़े ने स्वामीनाथन साहब से बात भिड़ाई थी।स्वामीनाथन साहब ने ऐसी डांट पिलाई थी कि कानफोड़े का पैंट गीला हो गया था।

बड़े साहब ने अंग्रेजी में एक बढ़िया सा ‘गोपनीय’ पत्र लिखा और उसे मिश्रा को भेज दिया।

आज उन्हें कभी अपने साथ रहे सेवकराम जैसे आज्ञाकारी अधिकारी की याद आने लगी।बड़े साहब गुस्से में आकर सेवकराम से कहते,“सेवकराम यू आर ब्लडी डफर !”

“सर !”

“यू आर नॉट फिट फॉर द पोस्ट व्हिच यू आर होल्डिंग !”

“सर !”

“यू ब्लडी शुड बी किक्ड आउट ऑफ द डिपार्टमेंट !”

“सर !”

“ईडियट तुमको कुछ काम नहीं आता !”

“सर !”

“दफा हो जाओ ,मेरे चैम्बर से !”

“सर !”

“नालायक !”

“सर !”

सेवकराम कोई ऐरा-गैरा चपरासी नहीं मंडल अभियंता था।बड़े साहब को सेवकराम की विनम्रता की याद अंदर तक झकझोर गई।उन्हें कुछ पश्चाताप भी हुआ कि वह उसको बहुत डाँटते थे।

आज की घटना के बाद उन्हें लगने लगा कि यदि बाबूजी की बात मानकर चाचा के साथ नेतागीरी में चला जाता तो अच्छा रहता।जो इज्जत और सम्मान अफ़सरी में पहले था,अब नहीं रह गया है।इसके जिम्मेदार भी हम अफसर ही हैं।यदि एक-दो टर्म के लिए भी मंत्री बन जाता तो बाँकी जिंदगी कुछ चिंता नहीं करनी पड़ती।

पर अब पचताने से क्या फायदा ? बेहतर यही होगा कि अपनी शान को दुनिया के सामने ऐसे ही बनाए रखूँ।

अभिमानी व्यक्ति टूट जाना पसंद करता है पर कभी किसी के सामने झुकना पसंद नहीं करता।यह एक बहुत बड़ा नशा है।

बड़े साहब को उनके गोपनीय पत्र के जवाब में मिश्रा ने जो लिखा था उसमें कुछ ऐसा था कि वह कुर्सी से उछल पड़े।वह ज़ोर–ज़ोर से कहने लगे,”नालायक,बद्तमीज़,बेवकूफ़,ईडियट.......साला..... ....प्रेमचंद चाटे को नहीं पहचानता है,…….मुझसे भिड़ेगा .............आइ विल फिनिश हिम ..........फिनिश हिम ...........प्रेमचंद चाटे कभी किसी से हारा नहीं है ..............आइ विल फिनिश हिम ....!”

कुछ सेकंड रुककर वह फिर बोले ,”साले,कल के छोकरे ताव दिखाते हैं..............मुझे नहीं पहचानते !”

उन्होने दफ़्तर के सारे कर्मचारियों को बुलाकर आदेश दिया कि कोई भी मिश्रा के चैम्बर में बिना उनके परमिशन के नहीं जाएगा।

रोज-रोज की किचकिच से मिश्रा भी परेशान होने लगा।कुछ चुगलबाज़ किस्म के अफसर,कर्मचारी इस तरह की लड़ाई से अपनी रोटी सेंकने लगे ।

फिर एक दिन बड़े साहब ने दफ़्तर में फरमान जारी किया कि मिश्रा जी द्वारा लिखा गया कोई भी पत्र दफ़्तर से बाहर न भेजा जाए और न ही उनके पत्रों का कोई रिकार्ड रखा जाए ।मतलब कि मिश्रा साहब को पत्र दिया जा सकता था पर उनके द्वारा जवाब नहीं दिया जा सकता था।इस तरह के फरमानों से कर्मचारी बहुत परेशान हो रहे थे पर बड़े साहब आखिर बड़े साहब थे।कौन उनके आदेशों की अवहेलना करने की हिम्मत करता।सबको परेशान देखकर,बड़े साहब खुश हो जाते थे।उन्हें लगता था कि वह कुछ काम कर रहे हैं।पर वहीं इस घटनाक्रम के कारण उनके शरीर में एक तनाव भी घर कर गया था।वह काँपते रहते थे।एक दिन बड़े साहब कुर्सी में बैठे-बैठे नीचे गिर पड़े ।उनका बीपी बहुत ज्यादा बढ़ गया था।वह बेहोश हो गए थे।पानी छिड़ककर उनको होश में लाया गया ।

“क्या हुआ ? मैं गिर कैसे गया ? लगता है मिश्रा ने धक्का दे दिया।” बड़े साहब ने सबसे कहा।

“सर,मिश्रा साहब तो अपने चैम्बर में हैं।”

“आकर धक्का देकर भाग गया होगा,अपने चैम्बर में !मेरे सामने रहने की तो उसकी हिम्मत ही नहीं है।”

“सर,ऐसा कुछ नहीं हुआ है।”

“फिर मैं कैसे गिरा ?यह कुर्सी तो नहीं गिरी ।”

“सर आप में जीवन है।कुर्सी तो निर्जीव है।चलिये आपको अस्पताल ले चलते हैं।” नादिर ने कहा ।

“जरूर !.............जरूर ! मेरा सिर घूम रहा है।”

सभी लोग बड़े साहब को अस्पताल ले गए।रास्ते भर बड़े साहब यही सोच रहे थे कि वह गिर कैसे पड़े।किसी दिन यदि वह गिरकर नहीं उठ पाए तो क्या होगा? क्या प्रेमचंद चाटे ऐसे ही समाप्त हो जाएगा ? क्या इतना जल्दी सब समाप्त हो जाएगा ? क्या मेरी यही औकात है ? मरने के बाद तो लोग बड़े-बड़ों को भुला देते हैं,मुझे कौन याद रखेगा ? नाम...यश...रुपया पैसा ...सब छलावा है।मतलब कि मैं ऐसे ही भटक रहा था।बड़े साहब यह अपने आप से ही बड़बड़ा रहे थे।अचानक वह अस्पताल के कमरे से चिल्लाने लगे-“सुनो ! कोई है ?.......सुनो...............सुनो..............कोई है।”

“सर !............सर!” राम बाबू चिल्लाते हुए कमरे के अंदर आए ।

“मुझे घर ले चलो !मैं बिल्कुल ठीक हूँ ।”

“सर,डाक्टर साहब ने आपको कुछ दिन आराम के लिए कहा है।”

“अरे मैं बिल्कुल ठीक हूँ भाई !”

“सर,बोतल चढ़ी हुई है कमजोरी हटाने वाली।”

“फेंको इसे ! मैं अच्छा-ख़ासा हूँ।”

इसी समय डाक्टर आ गए।उन्होने कहा-“सर मैं आपको नहीं छोड़ सकता।आपके विचारों में बहुत तेजी से परिवर्तन आ रहे हैं।यह मेडिकल टर्म में थॉट डिसऑर्डर है।”

“डाक्टर साहब,मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

“सॉरी सर !” कहकर डाक्टर चले गए।

दिन में पत्नी आई तो बड़े साहब ने फिर कहा-“मुझे कोई कमजोरी नहीं लग रही है।मेरे विचार भी स्थिर और शांत हैं ।”

“प्रेम प्लीज कोऑपरेट.................एक सप्ताह बस !”

“यह सब मिश्रा की वजह से हुआ है..........ब्लडी आइ विल फिनिश हिम..........आइ विल स्पोइल हिज कैरियर.........आइ विल नॉट लीव हिम !”

“प्रेम ! प्लीज कूल डाउन !”

“सुगंधा,आइ विल नॉट लीव मिश्रा !”

सुगंधा दौड़कर डाक्टर को बुलाने गई ।

“साला !प्रेमचंद चाटे से भिड़ता है।पहली बार किसी ने प्रेमचंद चाटे को ललकारा है ......आइ विल फिनिश हिम !”

यह कहते हुए बड़े साहब ने अपने ऊपर चढ़ी बोतल को दूर फेंक दिया।

“सर प्लीज लेट जाइए,प्लीज.... !”

“डाक्टर,आइ विल फिनिश मिश्रा.........आइ विल नॉट लीव हिम..........ब्लडी ईडियट !”

“सर,प्लीज कूल डाउन !”

डाक्टर सुमित ने नींद का इंजेक्सन देकर बड़े साहब को सुला दिया ।

बड़े साहब के बूढ़े पिता ने डाक्टर सुमित से कहा,”प्रेम बचपन से बड़ा अभिमानी है।मिश्रा अगर झूठ-मूठ ही सही मेरे बेटे से हांथ जोड़कर माफी माँग ले तो प्रेमचंद ठीक हो जाएगा।”

बूढ़े पिता के शब्दों में वेदना,कष्ट,व्यंग्य और असहायता की भावना थी।इस उम्र में अपने बेटे को इस दशा में देखना उन्हें अंदर से बहुत ही कमजोर कर रहा था ।

गद्दे के ऊपर सफ़ेद चादर बिछा हुआ है।बड़े साहब सफ़ेद कवर के तकिये में अपना सिर रखकर सो रहें हैं.....पंखा चल रहा है.......खिड़की खुली हुई है.......खिड़की के बाहर पेड़ों के पत्ते मस्त होकर झूम रहें हैं........दिन विश्राम की ओर बढ़ रहा है......सूर्य महाराज अपनी बारह घंटे की यात्रा पूरी कर चुके हैं.....बाहर हल्की लालिमा छाई हुई हैं ।खिड़की से कमरे की हवा बाहर और बाहर की हवा अंदर कमरे में आ रही है।प्रक्रति निःस्वार्थ भाव से सेवा कर रही है।

बड़े साहब के पिताजी वहीं कमरे के अंदर कुर्सी में बैठकर झपकी लेने लगते हैं।सुगंधा कमरे से बाहर आकर नीले आसमान की तरफ देखती हैं और उन्हें असीम शांति का अनुभव होता है।

ठीक इसी समय मिश्रा ने बड़े साहब के पास जाकर उनको नमस्कार किया ।

बड़े साहब ने मुँह को दूसरी तरफ फेर लिया ।

“सर कृपया मुझे क्षमा कर दें !”

अब बड़े साहब बिस्तर से उठकर खड़े हो गए|उन्होने खुद को संयत करने की कोशिश की,लेकिन स्वर था कि संभल ही नहीं रहा था|वह बोले,”हम लोग अधिकारी हैं।हमारे ऊपर पूरी व्यवस्था का उत्तरदायित्व रहता है।अपने कर्तव्य निर्वहन के लिए हमारा व्यवहार औरों से थोड़ा अलग रहता है।जब हमने नौकरी ज्वाइन की थी,उस समय हमारे वरिष्ठ लोग बहुत ज्यादा अनुशासित हुआ करते थे।उनके चैम्बर में घुसने से पहले हम लोगों के हांथ पैर कांपते थे।छोटी सी गलती के लिए भी हमें बहुत डांट खानी पड़ती थी।पर हम लोग इसे बड़ों का आशीर्वाद समझते थे।अपने से छोटों को समझाना और डाँटना यह बड़ों का अधिकार है।हम यह इसीलिए करते हैं जिससे आप लोगों को सही रास्ता दिखा सकें।हमारा अनुभव आपसे कहीं ज्यादा है।यदि हर कोई अपने वरिष्ठों को जवाब देने लगेगा तो यह व्यवस्था चरमरा जाएगी।मैंने भी एक दो बार यह गलती की है,लेकिन बाद में मुझे बड़ा पश्चाताप हुआ।हमारी ताकत आप लोग ही हैं।आप लोगों के कारण ही हमारे ओहदे की इज्जत है।याद रखना,यदि हमारी इज्जत गिरेगी तो आपकी इज्जत अपने आप ही गिर जाएगी।हमारा गुस्सा ही तो हमारी शान है,ताकत है,रुतबा है और अभिमान है।यह हमारी असलियत पर ऊपरी आवरण की तरह होता है।क्या तुम हमारी शान छीनना चाहते हो ?”

बड़े साहब की बातों ने मिश्रा को अंदर तक झकझोर दिया।

“आप बिल्कुल सही कह रहें हैं सर !मैं आपका रुतबा कभी नहीं गिरने दूंगा।”

“मुझे तुमसे यही उम्मीद थी।अच्छा अब जल्दी से जाकर डाक्टर को कहो कि वह मुझे यहाँ से रिलीज करें |”

मिश्रा,कमरे से बाहर निकलकर डाक्टर की तलाश में बढ़ गया।

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